सत्यजीत रे से TVS तक: जब बंगाल ने भाषण चुना और तमिलनाडु ने आर्थिक नतीजे

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कोलकाता । शाम की सैर, ठंडी हवा, एक मासूम-सा मज़ाक, और अचानक एक कड़वी सच्चाई सामने आ गई।
पार्क की पगडंडी पर टहलते हुए मेरी मुलाक़ात हमारे बेहद तहज़ीबदार बंगाली बैंक मैनेजर, चटर्जी बाबू से हो गई। हल्के-फुल्के अंदाज़ में पूछ लिया,
“तो चटर्जी बाबू, 1 अप्रैल को रिटायरमेंट के बाद कोलकाता की ट्रेन पकड़ रहे हैं?”

वो जैसे ठिठक गए। भौंहें ऐसे उठीं, मानो बैलेंस शीट में कोई जानलेवा गलती पकड़ ली हो।
आधे मुस्कराते हुए बोले,

“अभी दिमाग़ EMI क्लोज़िंग मोड में नहीं गया है। बच्चे बेंगलुरु में सेटल हैं। फ्लैट है, लिफ्ट है, सिक्योरिटी है, पास में अस्पताल है। बंगाल में अब बचा ही क्या है? कुछ बचपन की यादें… कुछ धुंधली तस्वीरें… बस।”

बस, यही था वो अनकहा इक़रार। उस पूरी पीढ़ी का जो तरक़्क़ी की तलाश में घर से निकली और फिर पलटकर नहीं देख सकी। उनका इशारा साफ़ था, कौन लौटे उस ज़मीन पर, जहाँ तक़रीर बहुत है, तरक़्क़ी लंगड़ाती है, टकराव हमेशा रहता है और मौक़े थोड़े वक़्ती होते हैं?

यह मामूली-सी बातचीत एक बेहद असहज सवाल खड़ा करती है:
आख़िर कैसे पश्चिम बंगाल, जो कभी आज़ादी के बाद भारत की बौद्धिक, औद्योगिक और आर्थिक मशाल था, तमिलनाडु से इतना पीछे छूट गया, जबकि तमिलनाडु ख़ामोशी से तरक़्क़ी की पहली कतार में जा बैठा?

1950 के दशक में तस्वीर बिल्कुल अलग थी। पश्चिम बंगाल की साक्षरता दर तमिलनाडु से ज़्यादा थी। राष्ट्रीय औद्योगिक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी लगभग दोगुनी थी। प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफ़ी ऊपर थी। कोलकाता उद्योग, शिक्षा और संस्कृति का मरकज़ था। मद्रास प्रेसीडेंसी तब साफ़ तौर पर पीछे चल रही थी।

उस दौर का कोई भी अर्थशास्त्री या नीति-निर्माता यह सोच भी नहीं सकता था कि कुछ दशकों में यह समीकरण पूरी तरह उलट जाएगा।
लेकिन आज हालात बिल्कुल पलट चुके हैं। तमिलनाडु में साक्षरता 85 प्रतिशत से ऊपर है, मज़बूत मैन्युफैक्चरिंग बेस है, ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स के वर्ल्ड-क्लास हब हैं, और IT व सर्विस सेक्टर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। प्रति व्यक्ति आय ₹3 से 4 लाख के बीच पहुँच चुकी है।

वहीं पश्चिम बंगाल अच्छी-ख़ासी साक्षरता के बावजूद सिमटते उद्योग, घटते रोज़गार और ₹1.5 से 2 लाख के बीच अटकी आय से जूझ रहा है।
तो ग़लती कहाँ हुई?

जवाब क़िस्मत में नहीं, फ़ैसलों में छुपा है, राजनीतिक, वैचारिक और प्रशासनिक फ़ैसलों में।

आज़ादी के बाद तमिलनाडु ने व्यावहारिकता को चुना। सबसे पहले इंफ़्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दिया, डैम, सड़कें, औद्योगिक क्षेत्र। शिक्षा संस्थानों का योजनाबद्ध विस्तार हुआ। 1958 में गिंडी इंडस्ट्रियल एस्टेट सिर्फ़ एक परियोजना नहीं था, बल्कि इरादों का ऐलान था।

1991 में उदारीकरण आया तो तमिलनाडु ने विरोध नहीं किया, उस पर टूट पड़ा। निर्यात आधारित उद्योग, IT पार्क, स्किल डेवलपमेंट और निवेश-अनुकूल माहौल ने राज्य को आर्थिक इंजन बना दिया।

द्रविड़ राजनीति को उत्तर भारत में अक्सर मज़ाक़ बनाया जाता है, लेकिन यहाँ उसे श्रेय देना होगा। उसने सामाजिक न्याय और कल्याण की बात की, मगर उद्योग से दुश्मनी नहीं पाल ली। शिक्षा और स्वास्थ्य को ख़ैरात नहीं, निवेश समझा गया। उद्यमिता को शैतान नहीं बनाया गया। TVS जैसे उद्योग समूह सिस्टम के बावजूद नहीं, बल्कि सिस्टम की वजह से फले-फूले। खेती, उद्योग और सेवाएँ, तीनों साथ आगे बढ़ीं।

बंगाल की कहानी ठीक उलटी है, दर्दनाक और ख़ुद की बनाई हुई।

दरारें जल्दी दिखने लगी थीं। फ़्रेट इक्वलाइज़ेशन पॉलिसी ने कोयला और स्टील जैसे प्राकृतिक फ़ायदों को कमज़ोर कर दिया। बँटवारे के बाद शरणार्थियों का भारी बोझ पड़ा।

असली झटका 1977 में लगा, जब लेफ़्ट फ़्रंट का 34 साल लंबा, बिना रुके शासन शुरू हुआ।

ईमानदारी से कहें तो शुरुआती सालों में नतीजे आए। ज़मीन सुधारों से किसान मज़बूत हुए। 1980 के दशक में कृषि वृद्धि शानदार रही, बंगाल चावल निर्यातक बन गया। ग़रीबी घटी, यह सच है।

लेकिन फिर कहानी वहीं ठहर गई, जैसे कोई सरकारी बंद। नक्सलवाद, लेनिनवाद, माओवाद, आक्रामक यूनियनवाद, बार-बार की हड़तालें, पूंजी के प्रति वैचारिक नफ़रत और “एंटी-इंडस्ट्री” राजनीति के रोमांटिक नारे, इन सबने निवेशकों को डरा दिया। फैक्ट्रियाँ बंद हुईं, पूंजी भाग गई। डी-इंडस्ट्रियलाइज़ेशन कोई हादसा नहीं था, बल्कि लापरवाही से बनी नीति थी।

धीरे-धीरे शासन एक “पार्टी-सोसायटी” में बदल गया, जहाँ पार्टी कार्ड ही नौकरी, ठेके और ज़िंदगी का पासपोर्ट बन गया। नवाचार दम घुटने लगा। प्रतिस्पर्धा शक़ के दायरे में आ गई। असहमति ख़तरनाक हो गई।

1990 के दशक में जब उदारीकरण की हवा चली, बंगाल खिड़की पर खड़ा हाथ बाँधे देखता रहा।
सिंगूर और नंदीग्राम अलग-अलग घटनाएँ नहीं थीं, वे लक्षण थे। गाँव नाराज़ हुए, मिडिल क्लास मायूस हुआ, और 2011 में सत्ता हाथ से निकल गई। मगर तब तक नुक़सान बहुत गहरा हो चुका था।

तो क्या बंगाल की तबाही के लिए सिर्फ़ कम्युनिज़्म ज़िम्मेदार है? यह सतही विश्लेषण है। केरल इस तर्क को तोड़ देता है। वहाँ भी वामपंथ रहा, लेकिन सत्ता बदलती रही, जवाबदेही बनी रही। शिक्षा और स्वास्थ्य पर लगातार निवेश हुआ। मानव विकास ऊँचा रहा, बिना उद्योग को तबाह किए। समस्या विचारधारा नहीं थी, समस्या थी अहंकार और सुधार से इनकार।

ऊपर से बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ का जटिल मसला। लाखों अवैध प्रवासियों ने सस्ता श्रम दिया, मगर स्थानीय रोज़गार पर दबाव बढ़ा, मज़दूरी घटी और सार्वजनिक सेवाओं पर बोझ पड़ा। पहचान की राजनीति तेज़ हुई, शासन और कमज़ोर हुआ। यह मूल कारण नहीं था, लेकिन जलती आग में पेट्रोल ज़रूर था।

नतीजा सख़्त और असुविधाजनक है:
तमिलनाडु आगे बढ़ा क्योंकि उसने वक़्त के साथ ख़ुद को बदला। बंगाल पीछे रह गया क्योंकि उसने बदलने से इनकार कर दिया।
लचीलापन जीता, जमी हुई विचारधारा हारी।

यह कहानी सिनेमा में भी उतनी ही साफ़ दिखती है, जितनी अर्थव्यवस्था में।
एक ज़माना था जब बंगाली सिनेमा भारतीय सिनेमा की आत्मा था। सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन, ये सिर्फ़ फ़िल्मकार नहीं, संस्थान थे। सोच, संवेदना और सामाजिक यथार्थ, बंगाल ने मानक तय किए।

लेकिन धीरे-धीरे इकोसिस्टम टूट गया। संस्थागत समर्थन ख़त्म हुआ, बाज़ार की हक़ीक़तों को नज़रअंदाज़ किया गया।
दक्षिण भारत ने सिनेमा को उद्योग की तरह देखा। तकनीक, स्केल, मार्केटिंग, कहानी, हर चीज़ में निवेश किया। आज तमिल, तेलुगु और कन्नड़ फ़िल्में न सिर्फ़ बॉलीवुड से मुक़ाबला कर रही हैं, बल्कि कई मामलों में उसे पछाड़ भी रही हैं।

उद्योग से विचार तक, फैक्ट्रियों से फ़िल्मों तक, पैटर्न एक ही है।
बंगाल ने अतीत की यादों को चुना।
तमिलनाडु ने भविष्य को।
और चटर्जी बाबू?
वो बेंगलुरु में रिटायर होंगे, उन लोगों की तरह, जो कभी मानते थे कि कल का भारत बंगाल में जन्म लेता है।

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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