संविधान के 75 वर्ष : कला, स्वतंत्रता और मर्यादाओं पर IGNCA में विचारोत्तेजक संगोष्ठी सम्पन्न

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नई दिल्ली: भारतीय संविधान के 75 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में संस्कार भारती दिल्ली प्रान्त द्वारा संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय “कला अभिव्यक्ति : स्वतंत्रता एवं मर्यादाएँ” था, जिसमें देश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, कलाकारों, चिंतकों और सिनेमा विशेषज्ञों ने भाग लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्कार भारती दिल्ली प्रांत के अध्यक्ष श्री प्रभात कुमार के स्वागत वक्तव्य एवं प्रस्तावना से हुआ। प्रथम सत्र साहित्य पर केंद्रित रहा, जिसमें इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, प्रख्यात साहित्यकार डॉ. अलका सिन्हा तथा प्रसिद्ध लेखक श्री व्योमेश शुक्ल ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के अंतर्संबंध पर गहन विचार रखे।

द्वितीय सत्र दृश्य कला पर आधारित था। इसमें प्रख्यात मूर्तिकार श्री नीरज गुप्ता, ललित कला अकादेमी के उपाध्यक्ष डॉ. नंदलाल ठाकुर तथा प्रसिद्ध आंतरिक सज्जाकार सुश्री सीतू कोहली ने कला में संवेदनशीलता, लोकमर्यादा और सौंदर्यबोध के महत्व को रेखांकित किया।

तृतीय सत्र प्रदर्शनकारी कलाओं पर केंद्रित रहा, जिसमें संगीत नाटक अकादेमी की अध्यक्ष डॉ. संध्या पुरेचा, प्रसिद्ध बाँसुरी वादक श्री चेतन जोशी तथा सुविख्यात गायिका सुश्री विद्या शाह ने परंपरा, नवाचार और आधुनिक चुनौतियों पर सार्थक संवाद किया।

चतुर्थ सत्र चल–चित्र (सिनेमा) पर आधारित था, जिसमें फिल्म निर्देशक श्री अतुल पांडेय, प्रख्यात पत्रकार श्री अनंत विजय तथा फिल्म समीक्षक श्री मुरतजा खान ने सिनेमा में अभिव्यक्ति की सीमाओं और सामाजिक प्रभावों पर अपने विचार व्यक्त किए।

समापन सत्र में संस्कार भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री अभिजीत गोखले ने अपने संबोधन में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों एवं कर्तव्यों तथा देशकाल परिस्थितियों के अनुरूप कला निर्माण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कला की स्वतंत्रता तभी सार्थक है, जब वह समाज, संस्कृति और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी हो।

कार्यक्रम की विशेषता यह रही कि प्रत्येक सत्र से पूर्व विषय बोध कराने हेतु नुक्कड़ नाटक प्रस्तुत किए गए। साथ ही भारतीय संविधान की महिला शिल्पियों के योगदान एवं संविधान में निहित कला पक्ष को दर्शाती एक चित्र प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। कार्यक्रम के संचालक भूपेंद्र कौशिक के अनुसार, संगोष्ठी संविधान के 75 वर्षों की यात्रा को कला के माध्यम से समझने और आत्ममंथन करने का एक सार्थक एवं प्रेरक प्रयास सिद्ध हुई है। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में कलाकारों, कलाधर्मियों तथा कला के छात्र–छात्राओं एवं संस्कार भारती के कार्यकर्ताओं ने सहभाग किया।

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