साइंस फिक्शन के वो उपन्यास जो हकीकत बन गए

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मुंबई । एक पनडुब्बी अनजाने समंदर की गहराइयों में उतरती है, वो भी 1870 में, जब बैटरी नाम की चीज़ बस तजुर्बा भर थी। एलियन तीन पैरों वाली डरावनी मशीनों से हमला करते हैं, और वही कल्पना इंसानों को चाँद तक ले जाने वाले रॉकेट्स की प्रेरणा बन जाती है। बिजली से “ज़ॉम्बी” को ज़िंदा करने की कहानी, आज अस्पतालों में दिल बचा रही है।

ज़रा ठहरिए… अगर मैं कहूँ कि ये “अजीब” कहानियाँ सिर्फ़ मनोरंजन नहीं थीं? इन्होंने हमारी दुनिया का नक़्शा बनाया। जब कहानियाँ बड़े ख़्वाब देखती हैं, तो विज्ञान जाग उठता है, और हक़ीक़त पीछे-पीछे दौड़ती है। पहले ख़याल आते हैं, औज़ार बाद में।

रात के 2 बजे, तीसरी चाय और मोबाइल की रौशनी के बीच एक अजीब सा ख़याल आता है, क्या भविष्य चुपचाप आ चुका है, बिना किसी फ़िल्मी संगीत के? क्या जिन गैजेट्स को हम रोज़ छूते हैं, जो मशीनें सोचती दिखती हैं, और जो स्क्रीन हमें देखती हैं, ये सब पहले ही सोची जा चुकी थीं? लगता है भविष्य अचानक नहीं आया, वो धीरे-धीरे, अध्याय दर अध्याय टपकता रहा।

1945 में सेटेलाइट कम्युनिकेशन का सपना देखने वाले, सर आर्थर सी. क्लार्क ने कहा था, बहुत उन्नत तकनीक जादू जैसी लगती है। जो उन्होंने नहीं कहा, वो ये कि ये जादू अक्सर किसी की लिखी कहानी से शुरू होता है।

1870 में जूल्स वर्ने ने ट्वेंटी थाउज़ैंड लीग्स अंडर द सी लिखी। समंदर तब भी रहस्य था। उनकी पनडुब्बी नॉटिलस बिजली से चलती थी, बैलास्ट टैंक थे, स्लीक अंदरूनी ढांचा था, और महीनों लहरों के नीचे रहने वाली टीम। तब बैटरियाँ भारी-भरकम खिलौने थीं, पनडुब्बियाँ ताबूत समझी जाती थीं। वर्ने को “कल्पनाशील” कहकर छोड़ दिया गया।

कुछ दशक बाद न्यूक्लियर सबमरीन समंदरों में गश्त करने लगीं, हैरतअंगेज़ तौर पर वैसी ही। पेरिस्कोप झाँकता है, धड़ फिसलता है, ख़ामोशी गूंजती है। वर्ने ने सिर्फ़ मशीन नहीं, उसकी ज़िंदगी भी लिख दी थी।

1898 में एच. जी. वेल्स ने द वॉर ऑफ़ द वर्ल्ड्स से लोगों को दहला दिया। मंगल ग्रह के जीव, तीन पैरों वाली मशीनें, गर्म किरणें। इन्हें पढ़ने वालों में एक लड़का था, रॉबर्ट गोडार्ड। उसे एलियंस का डर नहीं लगा, उसे रॉकेट्स का शौक़ लगा। आगे चलकर वही आधुनिक रॉकेट्री का पिता बना। एलियन नहीं आए, इंसान चाँद पर पहुँचे। कल्पना ने धरती पर हमला नहीं किया, हमें उससे आगे धकेल दिया।

वेल्स यहीं नहीं रुके। 1914 में द वर्ल्ड सेट फ़्री में उन्होंने “एटॉमिक बम” का ज़िक्र किया, न्यूक्लियर विज्ञान से बहुत पहले। वैज्ञानिक लियो सिलार्ड ने माना कि इस ख़याल ने सोच को झकझोरा। डरावनी बात ये है, ख़याल इजाज़त नहीं माँगते, वो हक़ीक़त बन जाते हैं।

मैरी शेली की फ़्रैंकनस्टाइन (1818) को हम डरावनी कहानी मानते हैं। पर असल में ये बिजली से ज़िंदगी को फिर जगाने की बात है। आज डिफ़िब्रिलेटर वही करते हैं, बिना राक्षस के। दिल रुकता है, बिजली दौड़ती है, ज़िंदगी लौट आती है। जो कभी सिहरन देता था, आज रोज़ जान बचाता है।

साइंस-फिक्शन माहौल में चूक सकता है, तरीक़ा अक्सर सही बैठता है।ब्रैडबरी के कानों में फिट रेडियो, आज के वायरलेस ईयरबड्स। क्लार्क के स्पेस स्टेशन की स्क्रीन, हमारे टैबलेट। स्टार ट्रेक के कम्युनिकेटर, फ़्लिप फोन की प्रेरणा। नील स्टीफ़ेंसन का “मेटावर्स”, विलियम गिब्सन का “साइबरस्पेस”।
आज एआई पर बहसें, आइज़ैक असिमोव के 1940 के रोबोट क़ानूनों की गूँज हैं। कोड इंजीनियर लिखते हैं, पर भविष्य के फ़लसफ़ीकार अक्सर पहले लेखक होते हैं।

बिग ब्रदर, जॉर्ज ऑरवेल की 1984 ने निगरानी की चेतावनी दी। हमने सिर हिलाया… और हर जगह कैमरे लगा दिए। ऑल्डस हक्सले की ब्रेव न्यू वर्ल्ड, क्लोनिंग और डिज़ाइनर बच्चे, आज छिड़ी नैतिक बहस। ब्लैक मिरर पूछता है, तकनीक बढ़ेगी, पर इंसानी गरिमा बचेगी?

लेखक कल्पना करते हैं। वैज्ञानिक जाँचते हैं। इंजीनियर बनाते हैं। कहानीकार न हों तो नवाचार बेकाबू हो जाता है; विज्ञान न हो तो कहानियाँ ख़्वाब रह जाती हैं।

एआई, जलवायु अनिश्चितता और डिजिटल लत के दौर में यह साझेदारी और भी ज़रूरी है। कल्पना विज्ञान को ज़मीर देती है; विज्ञान कल्पना को सच होने का मौक़ा।

तो अगली बार कोई साइंस-फिक्शन कहानी बेतुकी लगे, ज़्यादा हँसिए मत। मुमकिन है आप कल का इंस्ट्रक्शन मैनुअल पढ़ रहे हों।
लेखक ख़्वाब देखते हैं, लैब उन्हें आज़माती है। बिना ख़्वाब विज्ञान अटकता है, बिना विज्ञान ख़्वाब बिखरते हैं।
लेकिन हैरी पॉटर की जादुई दुनिया अगर हकीकत में तब्दील हो गई तब क्या होगा?

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Brij Khandelwal

Brij Khandelwal

Brij Khandelwal of Agra is a well known journalist and environmentalist. Khandelwal became a journalist after his course from the Indian Institute of Mass Communication in New Delhi in 1972. He has worked for various newspapers and agencies including the Times of India. He has also worked with UNI, NPA, Gemini News London, India Abroad, Everyman's Weekly (Indian Express), and India Today. Khandelwal edited Jan Saptahik of Lohia Trust, reporter of George Fernandes's Pratipaksh, correspondent in Agra for Swatantra Bharat, Pioneer, Hindustan Times, and Dainik Bhaskar until 2004). He wrote mostly on developmental subjects and environment and edited Samiksha Bharti, and Newspress Weekly. He has worked in many parts of India.

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