शिक्षा का ‘ए प्लस’ खेल: चमकती इमारतें, खोखला सिस्टम और माफियाओं के मकड़जाल में फंसता भारत का युवा

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अक्षय शर्मा
मुजफ्फरनगर : देश  में शिक्षा का गंदा खेल अब किसी से छुपा नहीं है। व्यापार और राजनीति के बीच की गहरी दलदल में भारत के युवाओं की जिंदगी फंसती जा रही है। शिक्षा माफियाओं के मकड़जाल में फंसकर युवा अपार आर्थिक बोझ झेल रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें बेहतर शिक्षा नहीं मिल रही।
*AI समिट में शर्मिंदगी और संस्थानों की साख पर सवाल*
हाल ही में भारत में आयोजित AI समिट में दुनिया भर से डेलिगेशन और दुनिया बड़ी टेक कंपनियों के सीईओ पहुंचे थे। इसी मंच पर देश की प्रतिष्ठित मानी जाने वाली Galgotias University ने भी प्रतिभाग किया और अपने चाइनीज कुत्ते से उन्होंने उस वैश्विक मंच पर भारत की साख पर बंटा लगाने का जो अभूतपूर्व काम किया है वह सदियों तक याद किया जाएगा।
मेरी जानकारी के अनुसार इस विश्वविद्यालय को NAAC का A+ ग्रेड मिला हुआ है।
*NAAC (National Assessment and Accreditation Council) एक सरकारी संस्था है जो भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता का मूल्यांकन और ग्रेडिंग करती है।*
*A+ और A++ का सच: कागजों में उत्कृष्ट, हकीकत में खोखले*
देश में कई कॉलेज और यूनिवर्सिटी ऐसे हैं जहां पढ़ाने के लिए पर्याप्त क्वालीफाइड टीचर्स तक नहीं हैं, फिर भी उन्हें NAAC ने A+ और A++ ग्रेड दे रखा है।
सवाल यह है कि जब शिक्षक ही नहीं, संसाधन नहीं, तो यह उत्कृष्टता किस आधार पर?
ये संस्थान बाहर से शानदार इमारतों में चमकते हैं, लेकिन अंदर से बिल्कुल वैसे ही खोखले हैं जैसे मिट्टी से बनी दीवार पर चमकदार प्लास्टर कर दिया जाए।
ऊपर से चमक, अंदर से कमजोरी — फर्क बस इतना है कि दीवार शायद टिक जाए, लेकिन इस सिस्टम में फंसा युवा कैसे टिकेगा?
*युवा शक्ति के दावों और जमीनी हकीकत का अंतर*
जिस देश के युवाओं की ताकत का डंका बजाते हुए प्रधानमंत्री Narendra Modi दुनिया भर में बात करते हैं, उसी देश का युवा अगर ऐसे हालात में पढ़ेगा तो वह आत्मविश्वास के साथ सिर उठाकर चलने लायक भी नहीं बचेगा।
*A++ ग्रेड की ‘चूल’ और लोन का जाल*
संस्थानों में A++ ग्रेड लेने की होड़ का एक बड़ा कारण आर्थिक फायदा भी है।
उदाहरण के तौर पर Bihar Government छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए क्रेडिट लोन देती है, जिसे पढ़ाई पूरी होने के बाद लौटाना होता है।
गरीबी से जूझ रहे बच्चे इस योजना का लाभ लेना चाहते हैं, लेकिन कई बार वे समझ नहीं पाते कि चमकदार कैंपस के लालच में वे अपने भविष्य को कर्ज के बोझ तले दबा रहे हैं।
*दलालों का नेटवर्क और सपनों की दलाली*
इन संस्थानों ने हर जिले में कमीशनखोर एजेंट बैठा रखे हैं जो परिवारों को चमकदार कैंपस और सुनहरे सपनों का झांसा देते हैं।
कार्यक्रमों, सेमिनारों और प्रचार के जरिए बच्चों को लुभाया जाता है और फिर उन्हें इन शिक्षा के खोखले अड्डों तक ले आया जाता है।
शुरुआत में सब अच्छा लगता है, लेकिन जब हकीकत सामने आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है — क्योंकि तब तक फीस, लोन और समय सब कुछ दांव पर लग चुका होता है।
*आखिर क्या होगा भारत के भविष्य का?*
जब शिक्षा ही व्यवसाय बन जाए और गुणवत्ता सिर्फ कागजों में रह जाए, तो देश का भविष्य खतरे में पड़ना तय है।

*सुझाव:- पिछले 25 सालों की संस्थागत जांच हो*

मेरी मांग है कि देश में एक उच्च स्तरीय जांच समिति बने जो पिछले 25 वर्षों में बने सभी संस्थानों की मान्यता, संसाधन और गुणवत्ता की जांच करे।
साथ ही NAAC द्वारा दिए गए ग्रेड्स का भी पुनः मूल्यांकन किया जाए।
अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए तो भारत का गौरव कहे जाने वाला युवा भ्रष्टाचार की दलदल में फंसकर अपना भविष्य खो देगा।

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