सम्मेलन में विशिष्ट अतिथि एवं मुख्य अतिथि का स्वागत करते हुए शिवाजी कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर वीरेंद्र भारद्वाज ने इस कार्यक्रम की सफलता, महत्व एवं संभावनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह के सम्मेलन न केवल किसी एक औषधीय पौधे शतावरी के माध्यम से भारत की उन्नत और समृद्ध औषधीय एवं आयुर्वेदिक परंपरा को स्थापित करते हैं बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की वर्तमान और समकालीन प्रासंगिकता को भी दर्शाते हैं। इस संगोष्ठी और कार्यशाला की महत्ता इस बात में भी निहित है कि यह अकादमिक अभियान से अधिक एक सामाजिक जागरूकता अभियान बने। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि के रूप में अपनी बात रखते हुए राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रोफेसर महेश कुमार दाधीच ने कहा कि हमने हमेशा दवा के साथ खान पान और रहन सहन पर बल दिया है। उन्होंने आगे कहा कि लोग कहते हैं नाम में कुछ नहीं रखा लेकिन हमारे शास्त्रों में किसी भी शब्द को निरर्थक नहीं माना गया है। हमने आंवला, मोरिंगा, अश्वगंधा और अब शतावरी के औषधीय गुणों को जन जन तक पहुंचाने के लिए अभियान चलाया है। आने वाला समय प्राकृतिक चिकित्सा का होगा। इसलिए आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति की ओर लौटने की जरूरत है।

सम्मेलन में बतौर विशिष्ट अतिथि एवं अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के निदेशक प्रदीप कुमार प्रजापति ने छत्रपति शिवाजी महाराज की महान परंपरा और विरासत का उल्लेख करते हुए शतावरी को एक सदाबहार पौधा बताया जो बारह महीने हरा रहता है।
इस दो दिवसीय कार्यशाला एवं सम्मेलन में अलग-अलग क्षेत्र से विशेषज्ञ, शोधार्थी, विद्यार्थी एकेडमिक और औद्योगिक जगत के जाने माने एंटरप्रेन्योर्स एवं छात्रों ने भागीदारी की। शतावरी एवं औषधीय पौधों से संबंधित लगभग अस्सी पोस्टर प्रस्तुती हुई। यह सम्मेलन अपनी वैज्ञानिक कृषि और व्यावसायिक पहलुओं पर बातचीत करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में स्थापित हुआ जहां आयुर्वेद, फार्मा, कृषि विज्ञान जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान जैसे अलग-अलग क्षेत्र के विशिष्ट विद्वानों ने अपने ज्ञान और शोध का आदान प्रदान किया। प्राचार्य एवं अतिथियों द्वारा कॉलेज के हर्बल गार्डन में शतावरी पौधों का रोपण किया गया। सम्मेलन में स्वागत उद्बोधन सम्मेलन की संयोजक डॉ. स्मिता त्रिपाठी ने एवं धन्यवाद ज्ञापन आयोजन सचिव डॉ. अनुराग द्वारा किया गया।



