सोशल मीडिया पर छोटे कपड़ों की होड़: लाइक्स और फॉलोअर्स की प्यास में खोती पहचान

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दिल्ली। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया हर किसी के लिए स्टेज बन गया है। इंस्टाग्राम, टिकटॉक और एक्स जैसी प्लेटफॉर्म्स पर लाखों मॉडल्स, इन्फ्लुएंसर्स और यहां तक कि हॉलीवुड-बॉलीवुड अभिनेत्रियां रोजाना पोस्ट करती हैं। लेकिन इन पोस्ट्स में एक आम ट्रेंड दिखता है-छोटे, रिवीलिंग कपड़े, डीप नेकलाइन, हाई स्लिट वाली ड्रेसेज और बिकिनी-स्टाइल आउटफिट्स। ये सब सिर्फ फैशन नहीं, बल्कि लाइक्स, शेयर्स, कमेंट्स और फॉलोअर्स बढ़ाने की बेचैनी का नतीजा लगते हैं।

कई युवा मॉडल्स और उभरती अभिनेत्रियां मानती हैं कि ज्यादा स्किन शो करने से एंगेजमेंट बढ़ता है। एक इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर ने खुलासा किया कि रिवीलिंग आउटफिट वाली रील्स को सामान्य पोस्ट्स से 5-10 गुना ज्यादा व्यूज मिलते हैं। इंडोर की एक इन्फ्लुएंसर ने पब्लिक प्लेस पर छोटे कपड़ों में रील बनाई, जो वायरल हो गई, लेकिन ट्रोलिंग के बाद माफी मांगनी पड़ी। इसी तरह मुंबई में खुशी मुखर्जी जैसी अभिनेत्री-इन्फ्लुएंसर ने ब्लैक रिवीलिंग ड्रेस पहनकर पोज दिए, तो लोग उन्हें “वुल्गर” कहकर ट्रोल करने लगे। फिर भी, ऐसे पोस्ट्स से फॉलोअर्स और ब्रांड डील्स बढ़ते हैं।

बॉलीवुड में भी ये ट्रेंड पुराना नहीं है। प्रियंका चोपड़ा, मलाइका अरोड़ा, जान्हवी कपूर, नोरा फतेही जैसी अभिनेत्रियां अक्सर बोल्ड आउटफिट्स में नजर आती हैं। एक वायरल वीडियो में स्टाइल एक्सपर्ट अनुषा मूर्ति ने कहा कि क्लीवेज और लेग्स दोनों एक साथ दिखाना ओवरडोन लगता है-सोफिस्टिकेटेड नहीं। फिर भी, ऐसे लुक्स से मीडिया हेडलाइंस बनती हैं, और इंस्टाग्राम पर लाखों लाइक्स आते हैं। हाल ही में अवनीत कौर की बोल्ड फोटो पर विराट कोहली का “एक्सीडेंटल लाइक” वायरल हुआ, जिससे उनकी फॉलोअर्स में लाखों की बढ़ोतरी हुई और ब्रांड्स की लाइन लग गई।

ये बेचैनी कहां से आती है? सोशल मीडिया का एल्गोरिदम एंगेजमेंट को प्राथमिकता देता है। ज्यादा लाइक्स और कमेंट्स का मतलब ज्यादा रीच, ज्यादा फॉलोअर्स, और आखिर में ज्यादा कमाई। कई इन्फ्लुएंसर्स मानते हैं कि अगर वे “सेफ” कपड़े पहनें, तो उनकी पोस्ट्स दब जाती हैं। रेडिट पर एक यूजर ने लिखा कि कई कंटेंट क्रिएटर्स सिर्फ कैमरे के लिए छोटे कपड़े पहनते हैं, रोजमर्रा में नहीं। ये एक तरह का ट्रैप है—शॉर्ट-टर्म अटेंशन मिलता है, लेकिन लॉन्ग-टर्म में रिस्पेक्ट और वैल्यू कम हो जाती है।

ट्रोलिंग और बैकलैश का बोझ भी इन महिलाओं पर पड़ता है। एक तरफ लोग “अटेंशन सीकर” कहते हैं, दूसरी तरफ “माइ बॉडी, माय चॉइस” का सपोर्ट। लेकिन कई बार ये चॉइस स्वतंत्र नहीं लगती—ये मार्केट की डिमांड है। जहां फैशन एक्सप्रेशन होना चाहिए, वहां वैलिडेशन की भूख बन जाती है। स्टाइल एक्सपर्ट्स कहते हैं कि असली एलिगेंस बैलेंस में है, न कि ज्यादा स्किन शो में।

अंत में, ये ट्रेंड सवाल उठाता है—क्या छोटे कपड़े पहनकर लाइक्स हासिल करना सशक्तिकरण है या सिर्फ एक नया तरीका खुद को ऑब्जेक्टिफाई करने का? सोशल मीडिया ने मौका दिया है अपनी आवाज बुलंद करने का, लेकिन अगर वो आवाज सिर्फ बॉडी शो पर टिकी हो, तो पहचान कहां बचती है? शायद समय आ गया है कि हम फैशन को अटेंशन से ज्यादा सेल्फ-एक्सप्रेशन से जोड़ें, न कि सिर्फ नंबर्स से।

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