दिल्ली । साल 2025 भारत की सुप्रीम कोर्ट के लिए असाधारण रहा। कई महत्वपूर्ण मामलों में अदालत ने अपने ही फैसलों पर पुनर्विचार किया, कभी जन विरोध के कारण, कभी प्रक्रियात्मक त्रुटियों की वजह से, तो कभी व्यापक जनहित को देखते हुए। कुछ ने इन्हें यू-टर्न कहा, कुछ ने न्यायिक सुधार। वास्तव में, ये पाँच बड़े मामले थे जहाँ समीक्षा, विरोध या नए तथ्यों ने अदालत को दिशा बदलने पर मजबूर किया। ये घटनाएँ न्यायपालिका की जीवंतता दिखाती हैं, लेकिन बार-बार बदलाव से संस्थागत विश्वसनीयता पर सवाल भी उठाती हैं।
पहला: अरावली पहाड़ियों की परिभाषा
अरावली विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में एक है, हिमालय से भी पुरानी। ये उत्तर भारत का पर्यावरणीय ढाल हैं: थार मरुस्थल को रोकती हैं, भूजल रिचार्ज करती हैं और दिल्ली जैसे शहरों को धूल भरे तूफानों से बचाती हैं। वर्षों से खनन और निर्माण ने इन्हें भारी क्षति पहुँचाई।
20 नवंबर 2025 को कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की समिति की रिपोर्ट स्वीकार कर अरावली की परिभाषा सीमित कर दी: स्थानीय स्तर से 100 मीटर ऊँची भूमि और 500 मीटर दायरे में जुड़े क्लस्टर। इसे वैज्ञानिक बताया गया, लेकिन पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी कि इससे बड़े क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएँगे, खनन और निर्माण के द्वार खुल जाएँगे। विरोध भड़क उठा, सोशल मीडिया से सड़कों तक हंगामा, प्रदर्शन और याचिकाएँ।
29 दिसंबर 2025 को छुट्टियों में विशेष बेंच ने स्वयं संज्ञान लिया। नवंबर फैसले पर रोक लगा दी और नई हाई-पावर एक्सपर्ट कमेटी गठित की, जो परिभाषा, छूट, खनन जोखिम और पूरी श्रृंखला की सेहत की जाँच करेगी। तब तक पूर्व प्रतिबंध बरकरार। यह जनता की आवाज़ की जीत थी, न्याय की बुद्धिमत्ता, जो गलती सुधारने में नहीं हिचकिचाती। अरावली अब भी खड़ी हैं, क्योंकि लोग और अदालत ने सुन लिया।
दूसरा: एक्स-पोस्ट-फैक्टो पर्यावरण मंज़ूरी
मई 2025 में वनशक्ति मामले में कोर्ट ने बाद में दी जाने वाली (एक्स-पोस्ट-फैक्टो) पर्यावरण मंज़ूरी को अवैध घोषित किया। कई परियोजनाएँ रुक गईं, इसे पर्यावरण संरक्षण की मजबूत मिसाल कहा गया। लेकिन नवंबर में समीक्षा पर तीन जजों की बेंच (2:1 बहुमत) ने फैसला पलट दिया। कुछ विशेष हालात में इन्हें मान्य किया, ताकि पूरी परियोजनाएँ ध्वस्त न हों और जनहित प्रभावित न हो। आलोचकों ने कहा यह उल्लंघन को वैध बनाता है, जबकि समर्थकों ने इसे व्यावहारिक बताया।
तीसरा: राज्यपालों की विधेयक स्वीकृति पर समय-सीमा
अप्रैल 2025 में कोर्ट ने राज्यपालों को विधेयकों पर समयबद्ध फैसला लेने का निर्देश दिया, जिससे राज्यों में राहत की लहर दौड़ी। लेकिन नवंबर में पाँच जजों की संविधान पीठ ने इसे रद्द कर दिया, कहा कि समय-सीमा तय करना न्यायपालिका का क्षेत्र नहीं। राज्यपालों की विवेक शक्ति बरकरार, लेकिन अनिश्चित देरी संघवाद के खिलाफ। यह राष्ट्रपति के संदर्भ पर दिया गया मत था, जो संघीय संतुलन की याद दिलाता है।
चौथा: भूषण पावर एंड स्टील दिवालिया मामला
मई 2025 में कोर्ट ने कंपनी को लिक्विडेशन का आदेश दिया, क्योंकि रिज़ॉल्यूशन प्लान में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियाँ पाई गईं, यहाँ तक कि JSW की खरीद भी प्रभावित हुई। बाज़ार और कर्मचारियों में हड़कंप मचा। बाद में समीक्षा पर अदालत ने फैसला वापस लिया, त्रुटियाँ स्वीकारीं और कंपनी पुनर्जीवन की अनुमति दी। यह IBC के उद्देश्य, कंपनी बचाना, लिक्विडेशन अंतिम विकल्प, की पुनर्स्थापना थी।
पाँचवाँ: आवारा कुत्तों का पशु कल्याण मामला
शुरू में अगस्त 2025 में कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों, खासकर स्कूलों-अस्पतालों से कुत्तों को हटाने पर सख्ती दिखाई। पशु प्रेमियों के विरोध और प्रदर्शनों के बाद नीति संशोधित हुई, नसबंदी, टीकाकरण और वापस छोड़ने पर जोर, लेकिन संवेदनशील संस्थागत क्षेत्रों से हटाने की व्यवस्था बरकरार। यह जन सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन का प्रयास था।
ये पुनर्विचार गंभीर सवाल उठाते हैं: बीच का नुकसान, पर्यावरणीय क्षति, रुके निवेश, खोई नौकरियाँ, बढ़ते हमले, की जिम्मेदारी किसकी? अगर विरोध न होता, तो क्या गलत फैसले बने रहते? न्याय तब सच्चा होगा जब अदालतें त्रुटियाँ सुधारें, नुकसान का मूल्यांकन करें और सुनिश्चित करें कि हर आवाज़ सुनी जाए, चाहे जोरदार हो या नहीं।
2025 ने साबित किया: न्यायपालिका सुनती है, सुधारती है। लेकिन बार-बार बदलाव विश्वास हिलाते हैं। अंत में, ये लोकतंत्र की ताकत है, जनता की आवाज़ न्याय को नई दिशा देती है।



