दिल्ली। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल की संयुक्त मिसाइल हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत हो गई। यह हमला न केवल ईरान के लिए, बल्कि पूरे इस्लामी दुनिया के लिए एक गहरा आघात है। खामेनेई की मौत के साथ उनके परिवार के कई सदस्य, शीर्ष सलाहकार अली शमखानी और आईआरजीसी कमांडर मोहम्मद पाकपुर भी शहीद हो गए। तेहरान में शोक की लहर है, जहां लोग सड़कों पर काले परिधान में इकट्ठा होकर अमेरिका-इज़राइल की निंदा कर रहे हैं। ईरान ने 40 दिनों का शोक घोषित किया है, और राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने इसे “मुस्लिमों के खिलाफ खुली जंग” करार दिया है।
संक्रमण काल की कमान अब अंतरिम नेतृत्व परिषद के हाथ में है। ईरान के संविधान के अनुसार, इस परिषद में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, मुख्य न्यायाधीश घोलाम-होसैन मोहसिनी-एजेई और गार्जियन काउंसिल के विधि विशेषज्ञ सदस्य अयातुल्लाह अलीरेजा अराफी शामिल हैं। अयातुल्लाह अराफी को विशेष रूप से इस परिषद में शामिल किया गया है, जो नए सर्वोच्च नेता के चयन तक देश की कमान संभालेंगे। यह व्यवस्था ईरान की स्थिरता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन युद्ध की स्थिति में अमेरिका-इज़राइल यदि परिषद के किसी सदस्य को निशाना बनाते हैं, तो स्थिति और जटिल हो सकती है। फिर भी, ईरान की क्रांतिकारी सेनाएं और जनता का संकल्प अटल है-खामेनेई की शहादत से ईरान कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत होगा।
भारत में शिया समुदाय का गहरा शोक और विरोध
भारत में, खासकर शिया समुदाय में, खामेनेई की शहादत पर गहरा दुख व्याप्त है। लखनऊ, जो शिया संस्कृति का केंद्र है, में सआदतगंज और अन्य इलाकों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। वे अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, काले झंडे लहरा रहे हैं। प्रसिद्ध शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद ने तीन दिनों का शोक घोषित किया है। उन्होंने अपील की है कि लोग काले कपड़े पहनें, घरों पर काले परचम लगाएं, और दुकानें बंद रखें। उन्होंने कहा, “खामेनेई को मारकर दुनिया सोचती है कि ईरान खत्म हो जाएगा, लेकिन अमेरिका-इज़राइल को करारा जवाब मिलेगा।” आज रात 8 बजे छोटे इमामबाड़े में शोक सभा और कैंडल मार्च निकाला जाएगा।
ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी इसी तरह का आह्वान किया है। मौलाना यासूब अब्बास ने इसे “सदी की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना” बताया और ईरान के मजबूत प्रतिकार की भविष्यवाणी की। श्रीनगर में भी लाल चौक पर शिया समुदाय ने प्रदर्शन किया, काले झंडे और कपड़ों में विरोध जताया।
एक नए संघर्ष की शुरुआत
यह विरोध भारत की विविधता और एकता का प्रतीक है। भारत ने हमेशा ईरान के साथ मजबूत संबंध बनाए रखे हैं-ऊर्जा, व्यापार और सांस्कृतिक स्तर पर। खामेनेई की शहादत पर भारत सरकार को सतर्क रहना होगा, ताकि घरेलू शांति बनी रहे। पिछले वर्ष लेबनान की घटनाओं की तरह, यहां भी शिया-सुन्नी मतभेद भुलाकर एकजुटता दिखी है।भारत की नजर में संदेश
खामेनेई की शहादत से साफ है कि अमेरिका-इज़राइल की आक्रामकता क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल रही है। भारत, जो बहुपक्षीयता और शांति का समर्थक है, इस संकट में संतुलित रुख अपनाएगा। लेकिन भारतीय मुस्लिम समुदाय, खासकर शिया भाई-बहन, की भावनाएं स्पष्ट हैं-वे उत्पीड़न के खिलाफ खड़े हैं। ईरान मजबूत रहेगा, और भारत जैसे देशों की एकजुटता से इस्लामी दुनिया नई ताकत हासिल करेगी। यह शहादत अंत नहीं, बल्कि एक नए संघर्ष की शुरुआत है।



