दिल्ली । यहाँ सामाजिक और अकादमिक जगत का एक ऐसा नक़्शा है, जहाँ वैचारिक सिपाही दो खेमों में बँटे नजर आते हैं-एक तरफ वे जो हलचल मचाते हैं, दूसरी तरफ वे जो हवा में तैरते रहते हैं, बिना कभी लहर पैदा किए।
आइए इनका परिचय कराते हैं। हवा में बिना लहर पैदा किए तैरने वाला समूह है ‘एडजस्टमेंट मास्टर्स’ का। ये लोग व्यवस्था के हर रंग में घुल-मिल जाते हैं। सत्ता बदले या न बदले, इनका रुतबा बना रहता है। इन्हें ‘बार्टर सिस्टम’ का आधुनिक अवतार कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। तुम मुझे यहाँ सपोर्ट दो, मैं वहाँ तुम्हारा बैक दे दूँगा। ये लोग न कभी पूरी तरह विरोध में खड़े होते हैं, न पूरी तरह समर्थन में। बस बीच में लटके रहते हैं-एक ऐसी कुर्सी पर, जो हर सरकार, हर विचारधारा के आने-जाने के बावजूद हिलती नहीं। इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इनके होने और न होने में कोई खास फ़र्क़ नहीं पड़ता, फिर भी ये सभी सरकारों में ‘अनिवार्य’ बने रहते हैं। इनकी डिमांड सभी विचारधाराओं में ‘हाई’ है।
दूसरी ओर हैं वे जो बदलाव की बात करते हैं। ये लोग व्यवस्था में चुभन पैदा करते हैं। इनकी मौजूदगी से लोगों को असहजता होती है, क्योंकि ये सवाल उठाते हैं, लड़ते हैं, पुरानी आदतों को चुनौती देते हैं। इन्हें ‘आरामजीवियों’ का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता है। आरामजीवी समूह सोचता है-“सब ठीक चल रहा है न? फिर ये नाटक क्यों?” इन परिवर्तन-प्रेमियों को हर तरफ़ से घेर लिया जाता है-आलोचना, ट्रोलिंग, अलग-थलग करना, यहाँ तक कि ‘ओवर-एक्टिव’ या ‘अति-उत्साही’ का ठप्पा लगाना भी इनके हिस्से आता है।
पर इस समूह में भी सभी एक जैसे नहीं होते। दो उप-प्रकार हैं इनके।
पहले वे ‘नए रंगरूट’। बाहर से आए, नए-नए वैचारिक सिपाही। इन पर साबित करने का भारी दबाव होता है। इसलिए ये ओवर-ड्राइव में चले जाते हैं। हर मुद्दे पर सबसे आगे, हर पोस्ट में सबसे तेज़, हर मीटिंग में सबसे ज़्यादा बोलने वाले। इनकी सक्रियता देखकर तालियाँ भी बजती हैं, लेकिन ज़्यादातर लोग जानते हैं कि यह सक्रियता विचारधारा की नहीं, बल्कि ‘बिग बी’ को इम्प्रेस करने की है। बिग बी खुश हुआ, तो टिकट मिलेगा, पद मिलेगा, वीसी बनेंगे, समितियों में जाएंगे, फ़ायदा मिलेगा। ये लोग कल अगर सत्ता बदल गई तो उसी गति से नई सत्ता के साथ ‘एडजस्ट’ हो जाएँगे।
दूसरे हैं ‘वैचारिक सिपाही’। ये किसी को खुश करने के लिए नहीं, बल्कि विचार को ज़मीन पर उतारने के लिए लड़ते हैं। ये मॉडल खड़ा करने की कोशिश करते हैं-छोटा सा ही सही, लेकिन ईमानदार। इन्हें सबसे ज़्यादा हमले झेलने पड़ते हैं। क्योंकि ये न सिर्फ़ बाहर के दुश्मन से, बल्कि अपने ही कैंप के ‘एडजस्टर्स’ से भी लड़ते हैं।
फिर सबसे मज़ेदार वर्ग है-‘निष्क्रिय महानुभाव’। इन्हें जो मिलना था, उनका उद्देश्य पूरा हो चुका है। इन्हें व्यवस्था में जहां बिठाया गया है। वहां सभी के साथ एडजस्ट करके वे बैठ गए हैं। बैठने के बाद वे अपनी निष्क्रियता के लिए शानदार तर्क गढ़ते हैं। ‘पदस्थ हूँ, इसलिए कुछ नहीं कर सकता’, ‘सिस्टम बहुत मज़बूत है’, ‘अंदर से बदलाव लाना ज़रूरी है’। वाह! क्या गहन विश्लेषण। पर सवाल यह है-अगर कुछ नहीं हो पा रहा, तो अंदर की गंदगी बाहर क्यों नहीं लाते? उसे सार्वजनिक क्यों नहीं करते? किसी के माध्यम से अंदर की बात को बाहर क्यों नहीं लाते? राजनीति का सच क्यों नहीं बोलते? पद छोड़ने से किसने रोका है? क्या सच में कोई बन्दूक सिर पर रखकर कह रहा है— “यहीं रहो, चुप रहो, कुछ मत करो”?
नहीं। असलियत यह है कि क्रांतिकारी का टैग लगवाना है, पर नाखून से ज़्यादा कुछ कटना नहीं चाहिए। बस थोड़ी-सी पोस्ट, थोड़ा-सा भाषण, थोड़ी-सी फोटो-और जनता ताली बजाए। जनता खुश, नेता संतुष्ट, व्यवस्था सुरक्षित और हर तरफ वाह वाही। भाई साहब आपने तो कमाल ही कर दिया।
और इस पूरे नाटक का उपसंहार यह है कि असली बदलाव लाने वाले हमेशा अकेले पड़ जाते हैं, जबकि ‘एडजस्टमेंट आर्टिस्ट’ और ‘निष्क्रिय दार्शनिक’ हमेशा भीड़ में चमकते रहते हैं। क्योंकि इस बाज़ार में सबसे ज़्यादा बिकने वाला माल है-आराम और दिखावा।



