टिप टॉप के बहाने अस्सी के देहारादून की याद

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गोविंद सिंह

देहारादून : यदि आपका लिखने-पढ़ने की बिरादरी से थोड़ा भी संबंध है और अस्सी या नब्बे के दशक के देहरादून में रहे हैं, तो टिप टॉप नाम से जरूर वाकिफ होंगे। घंटाघर से चकराता रोड की तरफ बढ़ते ही 100 मीटर की दूरी पर बाईं तरफ टिप टॉप रैस्टौरेंट हुआ करता था, जो इस शहर के लेखकों-पत्रकारों का पसंदीदा अड्डा हुआ करता था। नए-पुराने लेखक यहाँ आया करते थे। अपनी रचनाएँ सुनाते और अनुभव बांटते थे। यहाँ उन्हें नई-नई जानकारियाँ मिलतीं। नए लेखक अपने बड़ों से सीखते थे। कवि-चित्रकार अवधेश कुमार, गजलकार हरजीत, पत्रकार नवीन नौटियाल, कुँवर प्रसून, गुरुचरन, फोटोग्राफर अरविंद शर्मा, कहानीकार प्रेम मनराल आदि नियमित रूप से यहाँ मिलते। पहाड़ से आने वाले नए पुराने लेखकों-पत्रकारों का यही ठिकाना होता था। बाहर से किसी खास स्टोरी की तलाश में आने वाले बड़े पत्रकार भी यहीं मिलते थे। दिल्ली, मुंबई या किसी और शहर में रह रहे यहाँ के पत्रकार जब भी घर आते, यहाँ जरूर हाजिरी लगाते। सुरेश उनियाल, सूरज प्रकाश ऐसे ही कथाकार थे, जिनसे यहीं पहली मुलाक़ात हुई। एक और कथाकार, धीरेन्द्र अस्थाना जो देहरादून से निकल कर सारिका में पहुंचे, उनका भी अक्सर जिक्र होता। खासकर उनके प्रेम विवाह के बारे में। कि कैसे सारिका में छपी एक कहानी को पढ़कर मुंबई की लड़की ने उन्हें विवाह का प्रस्ताव भेजा! काका हरिओम यहीं से धर्मयुग गए, तरुण विजय पाञ्चजन्य पहुंचे। कई छोटे स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ता भी यहाँ आते। एक तरह से अघोषित प्रेस क्लब थी यह दुकान।

अपनी पहली नौकरी के सिलसिले में जब मैं 1981 के दिसंबर में देहारादून आया, तो कुछ ही दिनों में यह मेरा प्रिय ठिकाना बन गया था। यहाँ आने से पहले मैंने देहारादून के अनेक लेखकों के नाम पढ़ रखे थे, लेकिन अवधेश कुमार से जल्दी ही आत्मीयता हो गई, क्योंकि वे चौथा सप्तक के पहले कवि थे और सप्तक पर मैंने एमफिल का शोध लिखा था। चौथा सप्तक में उनका पता छपा था, इसलिए उन्हें खोजना मेरे लिए बहुत आसान था। पहली बार टिप टॉप का नाम उन्हीं से सुना। उन्होने बताया कि आगे से हम टिप टॉप में मिलेंगे। वहाँ और लोगों से भी तुम्हारी मुलाक़ात हो जाएगी। उसके बाद अक्सर हम टिप टॉप में मिलते। उनसे मिलने और भी लोग आते। जल्दी ही देहरादून के अनेक संघर्षरत लेखकों-पत्रकारों से परिचय हो गया। अरविंद शर्मा मेरा प्रिय साथी बन गया। आठ महीने में ही मैंने देहारादून से अनेक लेख-फीचर लिखे। मैं फीचर लिखता और अरविंद फोटो खींचता। मेरे लेख के साथ उसके फोटो पर उसका नाम छपता। नाम छपने की खुशी सबसे बड़ी थी। साथ में कुछ पैसे भी मिल जाते। हम सब धर्मयुग, रविवार या सारिका आदि में छपने वाली हर रचना की गहन समीक्षा करते। कुँवर प्रसून, नवीन नौटियाल और गुरुचरन की रविवार में छपने वाली खोजी रिपोर्टों की खूब चर्चा होती। उनकी एक रिपोर्ट एक स्थानीय नेता के खिलाफ थी, जिसने रविवार पत्रिका को बाज़ार में आने से पहले ही गायब करवा दिया। इसलिए डाक से आने वाली लेखकीय कॉपी का इंतज़ार करना पड़ा। उनकी एक रिपोर्ट पर मुकदमा हुआ, जो संभवतः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।

उन दिनों देहारादून के जिन अन्य लेखकों, पत्रकारों की चर्चा होती थी, उनमें सुभाष पंत, रवीद्र नाथ त्यागी, भीमसेन त्यागी, शशि प्रभा शास्त्री, हरि दत्त भट्ट शैलेश, कविजी यानी सुखबीर विश्वकर्मा, गुरुदीप खुराना, कृष्णा खुराना, शैल शर्मा, फॉटोग्राफर शिवानंद नौटियाल, ब्रह्मदेव आदि प्रमुख थे। श्रीश डोभाल, हिमानी भट्ट (शिवपुरी) भी दिल्ली से आया करते। इनमें से अनेक लोग बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। अवधेश जी की देखादेखी चित्र-कोलाज आदि बनाया करते, गजल लिखा करते और नाटक में काम करते।… बड़े लेखकों से मिलने उनके घर या किसी निजी अड्डे पर जाना होता। छायाकार ब्रह्मदेव जी की एशले हाल के पास एक बड़ी दुकान थी, जिसके टॉप पर साहित्य संसद का अड्डा हुआ करता। यहाँ महीने में एक बार गोष्ठी होती। नए रचनाकारों को भी मौका मिलता। एक बार मैंने अपनी एक कहानी पढ़ी। सुभाष पंत जी ने अच्छी-ख़ासी खिंचाई कर दी। बाद में बाहर आकर बड़े प्यार से बोले, तुममें संभावनाएं लगी, इसलिए इतना बोल दिया, बुरा मत मानना। मैंने सचमुच बुरा नहीं माना। जब तक देहारादून में रहा, उनसे लगातार मिलता रहा। एक बार रवीन्द्र नाथ त्यागी जी ने व्यंग्य पढ़ा। वह उतना अच्छा नहीं था। लोग आलोचना करने लगे तो त्यागी जी नाराज हो गए। उन्होने बोलने वाले को झिड़क दिया। वे बड़े सरकारी अफसर थे। रौब में रहते थे। एक गोष्ठी में भीमसेन त्यागी जी ने एक चाय के बदले अपना पूरा उपन्यास ही सुना डाला। बड़े बोर हुए, लेकिन किसी ने चूँ तक नहीं की। अङ्ग्रेज़ी के भी कई बड़े लेखक यहाँ रहते। लेकिन उनकी दुनिया शायद अलग थी। राजपुर रोड पर नेहरू जी की बहन विजयलक्ष्मी पंडित रहतीं। आपातकाल में इन्दिरा गांधी से मतभेद के बाद वो यहाँ रहने लगी थीं। उनकी कोठी का गेट बंद ही रहता। उनकी बेटी नयनतारा सहगल भी यहाँ थीं। अङ्ग्रेज़ी पत्रकार नर्गिस दलाल भी देहारादून में ही थीं। मैं इन लोगों से मिलने की कोशिश करता रहता। सफलता कम ही मिलती। यह भी लगता कि मिल भी गए तो क्या बात करूंगा! मैं जानता ही कितना हूँ! मोहिनी रोड पर कम्यूनिस्ट इंटरनेशनल के संस्थापक-सदस्य रहे मानवेंद्र नाथ रॉय का घर था। वे अपने अंतिम दिनों में जब भारतीय दर्शन की ओर झुक गए तो यहाँ आकर रहने लगे। वे महर्षि अरविंद के अनुयायी बन गए। उन्होने भारतीय राजनीति को रैडिकल ह्यूमेनिज़्म का दर्शन दिया। शायद अस्सी से पहले ही उनका निधन हो गया था। उनके घर का नाम रैडिकल ह्यूमेनिस्ट हाउस था और वहाँ पर इंडियन रेनेसां इंस्टीट्यूट चल रहा था। एसएन पुरी जी वहाँ रहते थे। वे भी पुराने ह्यूमेनिस्ट थे। उन्होने मुझे रॉय के बारे में कुछ किताबें दीं। इस पर भी मैंने दैनिक ट्रिब्यून में एक फीचर लिखा।

ख़ैर, टिप टॉप की बात चली तो बता दूँ कि इसके मालिक प्रदीप गुप्ता को कभी भी चिढ़ते नहीं देखा। हम लोग सिर्फ एक चाय पीकर घंटों गप्पें मारते, कविता-कहानियाँ सुनते-सुनाते, फोकट में उनका पंखा चलता रहता लेकिन गुप्ता जी हमेशा खुश रहते। इस तरह से वे हम सबकी हौसला अफजाई करते। निश्चय ही उनके भीतर भी साहित्य का कोई न कोई कीड़ा था, जो उन्हें लेखन की दुनिया के करीब रखता।

कोई दस महीने पहले जब मैं देहारादून आया। जब भी इधर से गुजरता, मेरी आँखें टिप टॉप को तलाशती रहतीं। लेकिन टिप टॉप नहीं मिला। राज्य बनने के बाद देहारादून राजधानी बना तो बहुत कुछ बदल गया। सड़कें चौड़ी हो गईं। बहुत सी दुकानें टूट गईं। जो दुकानें हैं भी, उनका रूपकार भी बादल गया। उन्होने अपने काम भी बदल लिए। कुछ लोग नहीं रहे, बहुत से लोग कहीं और चले गए, कुछ लोग स्मृति से ओझल हो गए। इसलिए जिससे भी पूछो, कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया। लेकिन पिछले दिनों जब इस इलाके में पैदल चल रहा था, तब एक दुकान पर एक बुजुर्ग-से सज्जन दिखे। उनसे पूछ बैठा। वे सचमुच जानकार निकले। उन्होने बताया, उसी लाइन में दस दुकान आगे टिप टॉप नाम से एक मोबाइल की छोटी-सी दुकान है, वहाँ पूछिए। वहाँ पहुंचा तो पता चला कि मैं सही ठिकाने पर पहुंचा हूँ। जो सज्जन दुकान चला रहे हैं, वे प्रदीप गुप्ता जी के सुपुत्र कुणाल गुप्ता हैं। बोले, रैस्टौरेंट तो 1995 में ही बंद हो गया था, लेकिन 2007-08 के आसपास जब ये सड़क चौड़ी होने लगी तो हमारी दुकान आगे से आधी कट गई। इसलिए जो थोड़ी जगह बच गई, उसमें यही काम हो सकता था। उनके पिता जी और दादाजी, दोनों अब इस संसार में नहीं हैं। बहुत से पुराने लोग आते हैं, टिप टॉप रैस्टौरेंट के बारे में पूछते हैं। हम उनकी बातें सुन-सुनकर खुश हो लेते हैं।

मुझे लगा, टिप टॉप के बहाने अस्सी के दशक के देहारादून के साहित्यिक माहौल को याद करूंगा। मैं साढ़े सात महीने ही देहारादून में रहा। दोस्त कहते, तुम्हारी साढ़ेसाती टल गई। यहाँ मुझे अपार आत्मीयता मिली। मुंबई रवाना होने से पहले टिप टॉप में बकायदा मुझे बिदाई दी गई। छोटे शहरों में वास्तव में ज्यादा आत्मीयता होती है। वैचारिक दुराव कम होता है। 45 साल बाद यहाँ लौटा हूँ तो वही आत्मीयता फिर से तलाश रहा हूँ। कहाँ से मिलेगी!

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