दयानंद पांडेय
लखनऊ। यह एक किताब के दो कवर सोशल मीडिया पर मजे ले रहे हैं। किस को सच माना जाए? जब कि लेखक नरवड़े और प्रकाशक पेंग्विन दोनों कह रहे हैं कि किताब छपी नहीं है। पर यह दोनों अब जागे हैं जब दिल्ली पुलिस ने एफ़ आई आर दर्ज कर दी, तब। कारवां पत्रिका में इस किताब पर लेख भी छपा और बजट सत्र में राहुल गांधी ने अपने अराजक अंदाज़ में ग़दर काट दिया।
सवाल यह है कि लेखक और प्रकाशक एफ़ आई आर होने के पहले गूंगे क्यों बने हुए थे। प्रकाशक व्यवसाई है l इस तरह की मूर्खता से वह भरसक परहेज़ करेगा। फिर अंगुली उठती है, नरवड़े पर। नरवड़े अब राहुल गांधी बन चुके हैं। नरवड़े और राहुल के फ्रस्ट्रेशन अब एक पड़ाव पर हैं। ठीक उस फिल्मी गाने की तरह l तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं।
अराजक, अहंकारी राहुल गांधी को छोड़िए। लेकिन नरवड़े ने न सिर्फ़ सेना का अनुशासन तोड़ा है, अपने सेनाध्यक्ष होने की साख पर बट्टा लगाया है। सब जानते हैं कि सरहद पर सेना ही नहीं, डिप्लोमेसी भी लड़ती है। सोचिए कि जब चीनी टैंक भारत की सरहद में घुसे होंगे तब सेनाध्यक्ष की सूचना के बाद भी रक्षा मंत्री, प्रधान मंत्री क्या कंबल ओढ़ कर सो गए होंगे? स्पष्ट है कि नहीं। चीन और भारत के बीच कांग्रेस के समय का समझौता है कि कोई समस्या आती है, सरहद पर तो सैनिक कार्रवाई नहीं होगी। नरवड़े यह बात नहीं जानते थे?
अच्छा चीनी टैंक क्या नरवड़े ने भगाए कि ख़ुद वापस चले गए? क्या अपने आप चले गए? कोई डिप्लोमेसी नहीं हुई होगी, भारत और चीन के बीच? नरवड़े इतने नादान तो नहीं। नरवड़े नहीं जानते कि इस तरह के कंवर्सेशन प्रधान मंत्री, रक्षा मंत्री या सेनाध्यक्ष कभी भी लिखित या मौखिक पब्लिक डोमेन में नहीं रख सकते। नरवड़े जानते थे तो किस खुशी में यह लिखा और रखा?
किस के लिए इस्तेमाल हुए यह सब लिख कर? जब सरकार ने यह किताब प्रकाशित करने के लिए अनुमति नहीं दी तो प्रकाशक के पास क्यों पहुंची? सरकार ने अनुमति नहीं दी छापने की तो उस के अंश कैसे और क्यों पब्लिक डोमेन में आए?
सेना अनुशासन में बंधी होती है। नरवड़े ने यह अनुशासन तोड़ने की क्या क़ीमत हासिल की? यह बड़ा सवाल है।
नेपोलियन दुनिया का सर्वोच्च कमांडर माना जाता है। अकसर वह युद्ध में ही होता था। पर जब कभी युद्ध नहीं होता था तब वह अपने सैनिकों को नदी के जल में उतार देता था। कहता था कि पानी को बटो। पानी को रस्सी की तरह कभी नहीं बटा जा सकता, दुनिया जानती है। नेपोलियन भी जानता था और उस के सैनिक भी। फिर भी अगर कोई सैनिक इस बाबत सवाल उठाता था तो नेपोलियन उस सैनिक को अनुशासनहीनता के आरोप में तुरंत बर्खास्त कर देता था। क्यों कि वह सेना का अनुशासन तोड़ रहा होता था। सैनिक का काम सेनापति के आदेश को आँख मूँद कर मान लेना होता है। सवाल जवाब करना नहीं।
नरवड़े ने यही अनुशासन तोड़ा है। उन को जो भी क़ानूनी सज़ा मुमकिन हो ज़रूर दी जानी चाहिए। सख़्त से सख़्त सज़ा। बिना किसी रियायत के। अगर नियम है कि बिना अनुमति किताब नहीं छपे तो बिना छपे पब्लिक डोमेन में कैसे आई? और जो कनवर्सेशन गोपनीयता के तहत थे, वह क्यों सार्वजनिक किए गए?
हिंदुस्तान की जनता और सरकार भी सेना को अपने सिर माथे बिठाती है। अपनी आन बान शान मानती है। जनता और सरकार द्वारा दिए गए मान और सम्मान को मिट्टी में मिला दिया है, नरवड़े ने।
नरवड़े ने देश की अनुशासित सेना पर एक काला दाग़ लगाया है। सेना का राजनीतिक दुरुपयोग किया है। चीन , रूस जैसे देश में अगर नरवड़े होते तो अब तक उन को गोली मार दी गई होती। अफ़सोस कि नरवड़े हिंदुस्तान में हैं।
नहीं होना चाहिए।



