सुरेंद्र चतुर्वेदी
जयपुर : केंद्र सरकार के अति उत्साह ने समाज को आंदोलित कर दिया है। यह दूसरा अवसर है जब केंद्र सरकार के निर्णय से आम जनता में ना केवल आक्रोश है अपितु गहरी निराशा भी। यू जी सी दिशा निर्देशों के आने से पहले भाजपा के चार सौ पार के नारे पर समाज का समर्थन नहीं मिला। इसके अलावा किसान सुधार बिल पर जनता में मिश्रित प्रतिक्रिया थी लेकिन किसी ने भी केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल नहीं उठाए। किसान आंदोलन को लोगों ने राजनीतिक हताशा में उपजा आंदोलन माना, और इस प्रमाण को भी स्वीकारा कि किसान आंदोलन के बहाने मोदी के पक्ष में आए जनमत को ठुकराने की वह विदेशी चाल थी, जिसे भारत के कुछ अवसरवादी राजनीतिक दल हवा दे रहे थे ! लेकिन इस बार बात अलग है। समाज के सभी वर्गों में यू जी सी दिशा निर्देशों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया है। आश्चर्यजनक तथ्य तो ये है कि समाज के जिस वर्ग को आश्वस्त करने के लिए ये दिशा निर्देश जारी किए गए, उसमें ही काफ़ी अंतर्विरोध उभर आया है। सर्वोच्च न्यायालय की रोक के बावजूद समाज में यह विषय तेजी से अपनी जगह बनाता जा रहा है।
राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि भाजपा के मातृ संगठन *राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में आए इन दिशा निर्देशों ने संघ के सामाजिक सौहार्द के प्रयासों को बहुत अंदर तक चोट पहुंचाई है। संघ हिंदू समाज को जातिगत भेदभाव से ऊपर उठाकर हिंदू होने के स्वाभिमान के साथ देश में एकात्मता का वातावरण बना रहा है लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इस आदेश ने संघ की एकात्मक विचारधारा को ही खोखला करने की शुरुआत कर दी है।* हिंदू समाज को जातियों में बांटने का जो काम विपक्ष के नेता राहुल गांधी नहीं कर पाए, इसे एक सरकारी आदेश ने कर दिखाया।
यह सही है कि 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने समाज कई उपेक्षित वर्गों को राजनीतिक रूप से नेतृत्व देने में सफलता पाई है जो आजादी के बाद से अपनी पहचान को तरस रहे थे। पूरे देश में राजनीति के माध्यम से परिवर्तन दिख भी रहा है। लेकिन *यह भी उतना ही कड़वा सच है कि अनुसूचित जाति और जनजाति का बड़ा वर्ग भाजपा की बजाय अन्य दलों के साथ अपनी सहजता महसूस करता है, इनके साथ मुस्लिम मतदाताओं के आ जाने से भाजपा के विरोध में वातावरण बनाने में मदद मिलती है जिस पर ग़ैर भाजपाई दलों की गिद्ध दृष्टि बनी रहती है।* इसलिए वो कोई भी ऐसा मौका नहीं चूकते जिससे समाज के इन वर्गों को बरगलाया जा सके। कांग्रेस द्वारा 2024 के आम चुनावों में संविधान को बदल देने का कथानक इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
*सबसे बड़ी समस्या यह है कि यू जी सी दिशा निर्देशों ने भाजपा के परंपरागत मतदाताओं को बहुत नाराज कर दिया है। उनकी नाराज़गी को दूर करने का उपाय आसान भी नहीं है। दूसरी तरफ़ सरकार के पास यह मौक़ा भी है कि वो सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली, मूल्यांकन और अन्वेषण के पुराने और सड चुके सिस्टम को बदल कर एक ऐसी प्रणाली को सामने लाए जो प्रतिभावान की प्रतिभा को जातीय द्वेष से दूर कर उसकी क्षमता और प्रतिभा के अनुसार अवसर उपलब्ध कराये।* ऐसी व्यवस्था का निर्माण देश से प्रतिभा पलायन को रोकने में भी मददगार साबित होगा। यह ऐसा अवसर भी है जब कि केंद्र सरकार पूरे देश के विश्वविद्यालयों अभिव्यक्ति के नाम पर देश विरोधी गतिविधियों की विषबेल का उन्मूलन कर सकती है।
लेकिन मुद्दा यह है कि क्या मोदी सरकार समाज को बांटने वाले इस तरह के कुत्सित प्रयासों को रोकने के लिए कृत संकल्पित है या वो जातीय वैमनस्यता की नर्सरी बन चुके इन शिक्षा परिसरों को राजनीतिक विचारधारा की प्रयोगशाला बने रहना देना चाहती है ?
(लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट से संबद्ध है)



