UGC विनियम: ब्रिटिश युग के अपराधी जाति अधिनियम की वापसी!

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मुदित अग्रवाल

दिल्ली । ब्रिटिश शासन के अपराधी जाति अधिनियम(1871) कानून में भारत की अनेक जातियों को जन्मजात अपराधी माना गया था। ऐसा ही एक विनियम UGC लेकर आई है जिसमें अनेक जातियों को जन्मजात अपराधी व नैचुरल क्रिमिनल घोषित किया गया है?

इस विनियम को बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद सर्वसामान्य समझ के आधार पर यह लेख लिखा है। आप सब शुरुआत से अंत तक यह लेख पूरा पढ़ें, (चाहें थोड़ा सा बोर हों) और यदि संभव हो तो इसका खंडन करें ताकि देश की एकता को बचाया जा सके।

उच्च शिक्षा संस्थानों में तथाकथित समता के संवर्धन हेतु UGC विनियम 2026 का घोषित उद्देश्य है कि,

“6 आधारों पर 5 प्रकार के लोगों के साथ भेदभाव का उन्मूलन करना”

◆ ये 6 और 5 क्या हैं?

“१. धर्म, २. नस्ल, ३. जाति, ४. लिंग, ५. जन्म-स्थान या ६. दिव्यांगता के आधार पर विशेष रूप से
१. अनुसूचित जाति SC एवं
२.अनुसूचित जनजाति ST,
३.सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों OBC,
४. आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों EWS,
५. दिव्यांगजनों
अथवा इनमें से किसी के भी सदस्यों के विरुद्ध भेदभाव का उन्मूलन करना तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के हितधारकों के मध्य पूर्ण समता एवं समावेशन को संवर्धन देना।”

तो ये 6 आधार हैं जिनके आधार पर 5 प्रकार के लोगों साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। परिभाषा खण्ड में क्रमांक (ड़) में भी ये उल्लेखित हैं।

फिर क्रमांक (ग.) में उल्लेखित “जाति आधारित भेदभाव” का अर्थ पुनः मात्र SC, ST व OBC से जाति आधारित भेदभाव दिया है। जिसमें से EWS को भी गायब कर दिया है। यानि मूलतः यह विनियम केवल SC ST OBC के लिए ही है, इसलिए इसका नाम भी समता विनियम की जगह SCSTOBCता विनियम होना चाहिए।

◆ यह विनियम केवल छात्रों के लिए नहीं है। 3.(ख) के अनुसार यह हितधारकों यानि, छात्र, संकाय के सभी सदस्य शिक्षकों, सभी कर्मचारियों, प्रबंधन समिति, व संस्था निदेशक/प्राचार्य/ कुलपति तक सभी के बीच समता स्थापित करेगा, इसका सीधा सा अर्थ है कि शिक्षकों से लेकर कुलपति तक पर भेदभाव का आरोप लगाकर घसीटा जाना सुनिश्चित किया गया है। 10(ख) वापिस इस बात की पुष्टि करता है।

इसके निहितार्थ क्या हैं:-

1. विश्वविद्यालयों में केवल SC, ST, OBC, EWS, दिव्यांग हितधारकों से भेदभाव होता है। अर्थात जनरल छात्र के साथ कोई भेदभाव हो ही नहीं सकता या होता ही नहीं है।

2. धर्म के आधार पर सिर्फ SC, ST, OBC, EWS व दिव्यांग के साथ भेदभाव होता है। अर्थात सभी प्रकार के धर्म केवल ये 5 वर्ग ही मानते हैं व जनरल वर्ग किसी भी धर्म में नहीं आता जिस कारण उनके साथ धार्मिक भेदभाव हो ही नहीं सकता या होता ही नहीं है।

3. नस्ल के आधार पर सिर्फ SC, ST, OBC, EWS व दिव्यांग के साथ भेदभाव होता है।

4. जाति के आधार पर सिर्फ SC, ST, OBC के साथ भेदभाव होता है।

5. जाति के आधार पर EWS के साथ भी भेदभाव हो ही नहीं सकता या होता ही नहीं है, क्योंकि इसमें भी सवर्ण होते हैं। इसलिए सवर्ण हितधारकों के साथ देश में किसी भी तरह का भेदभाव हो ही नहीं सकता, ऐसा UGC मानती है।

6. लिंग के आधार पर सिर्फ SC, ST, OBC, EWS व दिव्यांग के साथ ही भेदभाव होता है।संभवतया जनरल सवर्ण वर्ग में एक ही लिंग के लोग हैं इसलिए उनमें लैंगिक भेदभाव संभव नहीं है।

7. जन्म स्थान के आधार पर सिर्फ SC, ST, OBC, EWS व दिव्यांग के साथ भेदभाव होता है। तो जन्मस्थान भी भेदभाव का कारक नहीं हुआ, मूल कारक जाति ही हुई।

8. दिव्यांगता के आधार पर SC, ST, OBC, EWS, दिव्यांग वर्ग के दिव्यांगों के साथ भेदभाव होता है।

9. इसका सीधा सा अर्थ है कि पीड़ित केवल SC, ST, OBC, EWS व दिव्यांग हैं, व जनरल वर्ग कभी भी पीड़ित नहीं हो सकता है। जनरल केवल घोषित रूप से अपराधी हो सकता है।

10. SC, ST, OBC, दिव्यांग कभी भी इस विनियम में अपराधी नहीं हो सकता है, क्योंकि ये सब आपस में ही एक दूसरे पर जाति भेदभाव का आरोप लगा सकेंगे तो आपस में एक दूसरे की शिकायत ही क्यों करेंगे?

11. OBC की स्थिति इसमें SC-ST एक्ट से बिल्कुल अलग व अच्छी है क्योंकि SC ST एक्ट में केवल SCST जातिगत पीड़ित थे जबकि इस विनियम के जातिगत भेदभाव में SC ST OBC तीनों सम्मिलित हैं जिस कारण SC-ST इस विनियम में OBC के विरुद्ध शिकायत नहीं कर सकेंगे।

13. कुल मिलाकर केवल जनरल ही अपराधी कहलाने के लिए बचेंगे जिनके विरुद्ध शिकायत की जा सकेगी।

14. “अजनरल” छात्र जनरल शिक्षक से लेकर जनरल कुलपति तक का कैरियर खराब कर सकेगा, व “अजनरल” हितधारक जनरल छात्र की शिक्षा व कैरियर तबाह कर सकेगा।

◆ अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष:

1. 7.(ज) व 8.(क) में कथित पीड़ित की पहचान गोपनीय रखने का प्रावधान। कथित भेदभाव से पीड़ित के लिए बलात्कार पीड़ित का प्रावधान क्यों रखा गया है? यह आरोपित के मानवाधिकार का हनन है, जिसे पता नहीं चलेगा कि किस अपराध के लिए उसपर कार्यवाही की जा रही है। व कोई भी एनोनिमसली आरोप लगाकर अपने अनैतिक हित सिद्ध कर सकेगा।

2. गलत शिकायत करने वाले को सजा का कोई भी प्रावधान नहीं है। यानि गोपनीय रूप से झूठी शिकायत कर जनरल वर्ग के सम्मान से खिलवाड़ करने की छूट दी गई है। व उनके मानसिक उत्पीड़न की कोई भी जवाबदेही न तो झूठे शिकायतकर्ता की है, न समता समिति की, न शिक्षण संस्थान की, न यूजीसी की, न सरकार की। यह कैसा अंधा कानून है ?

अधिकांश जनरल वर्ग के सदस्यों वाली कमिटी ने ही ऐसे अंधकारपूर्ण विनियम बनाए हैं, या तो वे कम्युनिस्ट विचारधारा के हो सकते हैं, या पहले से ही तय प्रारूप पर औपचारिक भर कर सकते हैं, दोनों ही स्थितियों में न्याय की सामान्य समझ वाले लोग भी ऐसे विनियम नहीं बना सकते हैं।

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