रवि पाराशर
देहरादून । उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी लागू हुए एक साल पूरा हो गया है। पिछले साल 27 जनवरी को राज्य में यूसीसी लागू किया गया था। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी मानते हैं कि समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद उत्तराखंड ऐतिहासिक बदलाव का साक्षी बन रहा है। मंगलवार, 27 जनवरी को संहिता लागू होने के एक साल पूरा होने के मौके पर राज्य में यूसीसी दिवस मनाया गया।
समान नागरिक संहिता के तहत उत्तराखंड में शादियों का रजिस्ट्रेशन अब पहले के मुकाबले ज्यादा सरल और पारदर्शी हो गया है। आर्थिक कारणों से राज्य का कोई भी नागरिक अधिकार से वंचित न हो, इसके लिए 26 जुलाई 2025 तक शादियों के रजिस्ट्रेशन के लिए कोई फीस वसूल नहीं की गई। अब तक करीब चार लाख 75 हजार शादियों का रजिस्ट्रेशन यूसीसी के प्रावधानों के तहत किया जा चुका है। साफ है कि देश में पहली बार यूसीसी लागू कर उत्तराखंड दूसरे राज्यों के लिए उदाहरण बन गया है।
उत्तराखंड सरकार ने समान नागरिक संहिता संशोधन अध्यादेश 2026 लागू कर दिया है। राज्यपाल की मंजूरी के बाद अध्यादेश तत्काल रूप से प्रभावी हो गया है। इसके जरिए यूसीसी एक्ट 2024 के कई प्रावधानों में प्रक्रियात्मक, प्रशासनिक और दंडात्मक सुधार किए गए हैं, ताकि इसे असरदार, पारदर्शी और सुचारू रूप से लागू किया जा सके।
यूसीसी अध्यादेश के अनुसार नए नियमों के तहत शादी के वक्त पहचान छिपाना या झूठी जानकारी देना विवाह को रद्द करने का आधार बना दिया गया है। इसके साथ ही शादी और लिव-इन रिलेशनशिप में जबरदस्ती, दबाव, धोखाधड़ी या अवैध कृत्य करने वालों को कड़ी सजा के प्रावधान किए गए हैं। संशोधन में यह भी प्रावधान किया गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप खत्म होने पर रजिस्ट्रार टर्मिनेशन सर्टिफिकेट जारी करेगा। इसके अलावा कानून में “विधवा” शब्द की जगह अब “पति/पत्नी” शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा।
अध्यादेश के तहत रजिस्ट्रार जनरल को शादी, तलाक, लिव-इन रिलेशनशिप और उत्तराधिकार से जुड़े रजिस्ट्रेशन रद्द करने का अधिकार भी दिया गया है। साथ ही अगर सब-रजिस्ट्रार तय समय में कार्रवाई नहीं करता है, तो मामला अपने आप रजिस्ट्रार और रजिस्ट्रार जनरल के पास भेज दिया जाएगा।
सजा के प्रावधानों में भी बदलाव कर दिया गया है। अब दंड प्रक्रिया संहिता 1973 और भारतीय दंड संहिता 1860 की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय न्याय संहिता 2023 को लागू किया गया है। लगाए गए जुर्माने के खिलाफ अपील का अधिकार भी दिया गया है और जुर्माने की वसूली भू-राजस्व की तरह की जाएगी।
यूसीसी लागू होने से पहले राज्य में शादियों का रजिस्ट्रेशन उत्तराखंड अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम 2010 के तहत किया जाता था। इसकी पूरी प्रक्रिया ऑफलाइन थी। लेकिन यूसीसी के तहत अब करीब-करीब 100 प्रतिशत विवाह पंजीकरण ऑनलाइन किए जा रहे हैं। आंकड़ों को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसके अच्छे नतीजे देखने को मिल रहे हैं।
समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग चार के अनुच्छेद 44 में किया गया है। यह राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है, जिसमें कहा गया है कि है कि राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता यानी विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में एक जैसे अधिकार सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। अनुच्छेद 44 में दिए गए सुझाव का मुख्य मकसद निजी कानूनों में एकरूपता लाकर सभी नागरिकों को एक जैसे अधिकार देना है, ताकि धर्म, संप्रदाय या लिंग के आधार पर भेदभाव खत्म हो सके।
लेकिन आजादी के बाद उत्तराखंड को छोड़ कर किसी भी राज्य ने इस ओर कोई पहल ही नहीं की। हालांकि गोवा में 1867 के पुर्तगाली कानून के तहत समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है। अब गौर करने वाली बात यह भी है कि देश के कई हाई कोर्टों और सुप्रीम कोर्ट ने भी बहुत बार अपने ऐतिहासिक निर्णयों में देश में समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत प्रमुख रूप से रेखांकित की है, लेकिन राज्यों ने यूसीसी लागू करने की कोई जरूरत अभी तक क्यों नहीं समझी है, इस बड़े प्रश्न का एक मुख्य उत्तर तो यही है कि वोट बैंक की राजनीति या कहें कि तुष्टीकरण की राजनीति की वजह से पार्टियों या गठबंधनों की सरकारों ने इसे लागू करने के बारे में किसी भी स्तर पर विचार ही नहीं किया।
उत्तराखंड में भी समान नागरिक संहिता लागू किए जाने पर कई कट्टरपंथी संगठनों ने इसका भरपूर विरोध किया, लेकिन महिलाओं, खास कर मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक मिलने की बात समझ में आने के बाद वे इसका विरोध नहीं कर रही हैं। यूसीसी लागू होने के बाद अब हलाला, इद्दत और तलाक जैसी प्रथाओं पर प्रतिबंध लग गया है। इसने संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में महिलाओं के लिए समान अधिकार तय किए हैं। शादी और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य किया गया है। जो जोड़े विवाह या तलाक का पंजीकरण नहीं कराएंगे, उन्हें सरकारी फायदे नहीं मिलेंगे। लिव-इन रिश्तों का रजिस्ट्रेशन भी जरूरी कर दिया गया है। ऐसे रिश्तों से पैदा हुए बच्चों को भी यूसीसी के तहत वैधता दी गई है।
उत्तराखंड सरकार ने विवाह, तलाक, उत्तराधिकार अधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाया है। पोर्टल पर अपनी परेशानी की शिकायत भी की जा सकती है। सीमित इंटरनेट पहुंच वाले दूरदराज या ग्रामीण इलाकों में लोगों की मदद के लिए कॉमन सर्विस सेंटर यानी सीएससी को रजिस्ट्रेशन के लिए अधिकृत किया गया है। सीएससी एजेंट जरूरी रजिस्ट्रेशन के लिए पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में घरों का दौरा कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में ग्राम पंचायत विकास अधिकारियों को इस प्रक्रिया में मदद0 के लिए उप-रजिस्ट्रार के तौर पर नामित किया गया है।
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