विचित्र कानूनो पर राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता

images-1-1.jpeg

रामेश्वर मिश्र पंकज

दिल्ली । कहा जा रहा है कि शिवसेना की एक माननीय सांसद ने संसद में शासक पक्ष को यह सूचना दे दी कि संसद में माननीय स्त्री सांसद गण में से कुछ अचानक कुछ झूठे नाटक करने वाली है कपड़े फाड़ने आदि का और झूठे आरोप लगाने वाली है ।
इससे डर कर माननीय लोकसभा अध्यक्ष ने माननीय प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि इस समय संसद में ना आए।।

इतनी महत्वपूर्ण घटना पर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए परंतु नहीं हो रहा है।

इस घटना का जो सबसे पहला निष्कर्ष है, वह यह है कि प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और संपूर्ण शासक दल जानता है कि स्त्रियों से संबंधित जो एक्ट है वह झूठ अन्याय और अनीति को बढ़ावा देने वाला है। स्त्रियों के द्वारा झूठे आरोप भी लगते ही रहते हैं और ऐसी भी स्त्रियां होती हैं जो प्रतिशोध या द्वेष या विरोध भाव वश झूठे आरोप इस प्रकार के लगाने लगी हैं।
यद्यपि भारत में परंपरागत रूप में ऐसी किसी भी स्त्री की कल्पना हिंदू समाज में कभी नहीं की गई कि वह अपनी ही अस्मिता को इतना लांछित करें ।
परंतु अब यह दिन भी आ गए।।

लेकिन मुख्य बात जिस पर विमर्श होना चाहिए कि अगर स्वयं प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष और शासक दल एक ऐसे एक्ट की संभावना मान रहा है जो सरासर अनीति असत्य और अन्याय का आधार बनाया जा सकता है और स्त्री की सुरक्षा के नाम पर इस प्रकार का एक्ट बना दिया गया है तो प्रारंभिक जांच उस एक्ट में भी अनिवार्य की जाए ।
जब पता चल जाए कि निश्चित कोई घटना हुई है तभी अपराध दर्ज किया जाए ।
यह नहीं कि स्त्री ने आरोप लगाया और बस,जिस पर आरोप लगाया गया है वह जेल जाए ।।

यही क्यों,
अन्य कानूनों में भी यही होता है:- अनुसूचित जाति जनजाति की सुरक्षा के नाम पर जो एक्ट बना है उसका भी भीषण दुरुपयोग हो रहा है। आरंभिक जांच का निर्देश माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दिया था लेकिन हमारे कुंवारे प्रधानमंत्री जी ने उसे बदल दिया।।
कुंवारे लोगों को स्त्रियों के प्रति जो आदर होता है वह सब प्रकार से सम्मान योग्य है परंतु वह भावुकता की अति तक जाने पर देश के संदर्भ में अगर आप समर्थ हैं तो देश की हानि कर देते हैं।क्योंकि आप अपने निजी विचार को सारे देश पर लागू कर देते हैं।
एक ऐसे समय में जब स्त्री हो या पुरुष सब लोग कानून के दुरुपयोग पर आमादा बना दिए गए हैं ऐसा राष्ट्रीय परिवेश बना दिया गया है,, तब प्रत्येक कानून का सदुपयोग हो और दुरुपयोग ना हो, यह सुनिश्चित करना शासन का दायित्व है और यह सुनिश्चित होगा कानून की संरचना में।
नेताओं के भाषण से कुछ सुनिश्चित नहीं होता ।

अभी विश्वविद्यालयों के विषय में जो घिनौने और भीषण विनियम यूजीसी ने जारी किया है उसके लिए भी यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि प्रारंभिक जाँच के बिना कुछ नहीं होगा, कोई एक केस दर्ज नहीं किया जाएगा ।

सही तो यह है कि विश्वविद्यालय का कानून आपको बनाना ही है, अपने नौनिहालों पर, किशोरों पर युवाओं पर आपको बिल्कुल भरोसा नहीं है ,आप उन सबको दुष्ट स्वभाव का , चरित्र हीन और भेदभाव करने वाला ही मानते हैं तो कम से कम ऐसा नियम बनाया जाय कि किसी भी छात्र छात्रा के साथ यदि भेदभाव मूलक कोई व्यवहार होता है तो उस पर विश्वविद्यालय प्रशासन कार्रवाई करेगा। वैसे तो यह प्रावधान है ही।

विद्यार्थियों को बांटने वाली बुद्धि को धिक्कार है। धिक्कार है।
वैसे 80 वर्षों तक सरकारी नियंत्रण में शिक्षा विभाग चलने के बाद यदि शासको और विपक्षियों दोनों को लग रहा है कि विश्वविद्यालय में ऐसा भीषण और अनुचित परिवेश है कि शासन को या विश्वविद्यालय को कानून बनाना पड़ रहा है और एक्शन लेना पड़ रहा है तो उचित तो यह है कि शिक्षा विभाग को भारत सरकार और सभी राज्य सरकार अपने नियंत्रण से हटा दें।

केवल शिक्षा के मानक स्वरूप पर नजर रख सकती हैं वह भी बहुत लचीलेपन के साथ नियम बनाए जाएं कि शिक्षा क्या होगी, अलग-अलग शिक्षण संस्थान स्वयं तय करें ,अपनी परीक्षाएं भी वे लें । संबंधित क्षेत्र में सेवा के लिए हर क्षेत्र के लिए अपनी एक विभागीय परीक्षा अनिवार्य हो और अपने प्रतिष्ठा के बल पर स्वयं ही संस्थाओं की कीर्ति बढ़ेगी।

सरकार ने शिक्षा के नाम पर अगर देश में भेदभाव करने वाले विद्यार्थी होंगे ऐसा परिवेश बना दिया है तो उसका अर्थ है कि शिक्षा राजनीति और शासन के नियंत्रण से बाहर होना चाहिए। केवल एक सुपरविजन का काम शासकीय अधिकारी करें। एक छोटी टीम के साथ। बस।
बाद में उसकी भी आवश्यकता ना रहे क्योंकि अगर समाज भ्रष्ट नहीं है तो इसकी आवश्यकता नहीं है और अगर समाज भृष्ट है तो अधिकारी भी अवश्य भृष्ट होंगे इसलिए इसकी आवश्यकता नहीं है।

Share this post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

scroll to top