-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली । भारत जैसे बहुलतावादी, लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, बाल कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में इन संगठनों ने दशकों से समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंच बनाकर उल्लेखनीय कार्य किए हैं। परंतु, इसके साथ ही विदेशी निधि के उपयोग को लेकर उठे सवालों, विशेषकर धर्मांतरण और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों ने एक व्यापक और गंभीर बहस को जन्म दिया है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) को अधिक सख्त, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए हैं।
वास्तव में, विदेशी अंशदान का नियमन कोई नया विषय नहीं है। भारत में इसका प्रारंभ 1976 में हुआ था, जिसे 2010 में संशोधित कर अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया। इसके बावजूद समय के साथ यह महसूस किया गया कि कुछ संगठनों द्वारा कानून की खामियों का लाभ उठाकर विदेशी धन का दुरुपयोग किया जा रहा है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 के बाद से अब तक 20,000 से अधिक एनजीओ के एफसीआरए पंजीकरण रद्द या समाप्त किए जा चुके हैं। वर्तमान में लगभग 16,000 संगठनों को ही विदेशी निधि प्राप्त करने की अनुमति है, जिन्हें प्रतिवर्ष करीब 20,000 से 22,000 करोड़ रुपये की विदेशी सहायता प्राप्त होती है।
वस्तुत: यह आंकड़ा स्वयं इस बात का संकेत है कि विदेशी धन का प्रवाह कितना व्यापक और प्रभावशाली है। जब इतनी बड़ी मात्रा में धन देश के भीतर आ रहा हो, तब उसके उपयोग की पारदर्शिता और वैधता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है। विभिन्न जांचों में यह सामने आया है कि कई संस्थाओं ने प्राप्त धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए नहीं किया। लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं करने से लेकर धन को अन्य गतिविधियों में स्थानांतरित कर देना सामने आता रहा है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) तथा गृह मंत्रालय की रिपोर्टों में भी वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत किया गया है, जिसने सरकार को कठोर कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।
इस पूरे विमर्श में सबसे संवेदनशील मुद्दा धर्मांतरण का रहा है। विशेष रूप से आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत कुछ संगठनों पर यह आरोप सिद्ध पाए गए हैं कि उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य या सामाजिक सेवा की आड़ में कमजोर वर्गों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया। कई राज्यों- जैसे झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से समय-समय पर इस प्रकार की शिकायतें सामने आई हैं।
यहां ध्यातव्य है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, किंतु जब धर्म परिवर्तन में प्रलोभन, दबाव या विदेशी प्रभाव की भूमिका सामने आए, तब यह कानून के साथ नैतिक प्रश्न भी बन जाता है। जिसका सही समाधान देना निश्चित तौर पर सरकार का काम है, यही कारण है कि कई राज्य सरकारों ने धर्मांतरण विरोधी कानून भी बनाए हैं, जिनमें ऐसे मामलों में सख्त दंड का प्रावधान है। इस संदर्भ में विदेशी निधि का दुरुपयोग एक अतिरिक्त चिंता के रूप में उभरा है, क्योंकि इससे बाहरी प्रभावों के माध्यम से आंतरिक सामाजिक संरचना को प्रभावित करने की आशंका बढ़ती है।
यही कारण है जो पिछले वर्षों में कई चर्चित संगठनों पर कार्रवाई हुई है, ‘ग्रीनपीस इंडिया’ को लेकर सामने आया कि उसने विदेशी निधि के माध्यम से भारत की विकास परियोजनाओं के खिलाफ अभियान चलाए, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ को वित्तीय अनियमितताओं के कारण अपने संचालन को सीमित करना पड़ा। ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ और ‘ऑक्सफैम इंडिया’ जैसे प्रतिष्ठित संगठनों पर भी विदेशी निधि के उपयोग को लेकर प्रश्न उठे हैं।
इसके अतिरिक्त, कुछ संगठनों के मामले राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से अधिक गंभीर पाए गए। ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ (पीएफआई) और उससे जुड़े संगठनों पर कट्टरपंथी इस्लामिक, जिहादी गतिविधियों और विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग के आरोप सिद्ध होने के बाद प्रतिबंध लगाया गया। इसी प्रकार, ‘इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन’, जिसकी स्थापना जाकिर नाइक ने की थी, पर भी वैचारिक कट्टरता (जिहाद) फैलाना पाया गया। राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील मामलों में राजीव गांधी फाउंडेशन और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट के एफसीआरए पंजीकरण रद्द किए गए, जिससे यह स्पष्ट संदेश गया कि सरकार इस विषय पर किसी प्रकार की ढिलाई बरतने के पक्ष में नहीं है।
इन परिस्थितियों में सरकार द्वारा एफसीआरए में संशोधन लाना एक स्वाभाविक और आवश्यक कदम था। 2020 में किए गए संशोधनों में कई महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़े गए, जैसे कि विदेशी निधि को अन्य एनजीओ को स्थानांतरित करने पर रोक, प्रशासनिक खर्च की सीमा को 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत करना और सभी विदेशी अंशदान को सिर्फ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की नई दिल्ली स्थित मुख्य शाखा में खोले गए खाते के माध्यम से प्राप्त करना अनिवार्य किया गया। इन प्रावधानों का उद्देश्य धन के प्रवाह को अधिक नियंत्रित और पारदर्शी बनाना रहा है।
अब प्रस्तावित नए संशोधनों में यह व्यवस्था की जा रही है कि यदि किसी संगठन का पंजीकरण रद्द होता है, तब उस स्थिति मे उसकी विदेशी निधि से निर्मित संपत्तियों को जब्त किया जा सकेगा। साथ ही इन संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक विशेष प्राधिकरण के गठन की भी योजना है। पंजीकरण के नवीनीकरण की प्रक्रिया को भी अधिक सख्त और समयबद्ध बनाया गया है, जिससे अनियमित संस्थाएं स्वतः ही प्रणाली से बाहर हो जाएं।
सरकार का तर्क स्पष्ट है; यह कानून उन तत्वों के खिलाफ है, जो विदेशी निधि का उपयोग व्यक्तिगत लाभ, अवैध धर्मांतरण या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए करते हैं। गृह राज्य मंत्री द्वारा संसद में दिए गए वक्तव्यों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि एफसीआरए के पुराने प्रावधानों में कई अस्पष्टताएं थीं, जिनका दुरुपयोग हो रहा था। नए संशोधन इन खामियों को दूर करने का प्रयास हैं, ताकि एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था स्थापित की जा सके।
समग्र रूप से देखा जाए तो विदेशी अंशदान विनियमन में हो रहे ये बदलाव भारत की बदलती नीति और प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं। एक ओर सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और आर्थिक पारदर्शिता को सुनिश्चित करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर वह यह भी स्पष्ट कर रही है कि ईमानदारी और नियमों के दायरे में काम करने वाले संगठनों के लिए कोई बाधा नहीं है।
वास्तव में, यह समय की मांग है कि विकास और सामाजिक सेवा के नाम पर आने वाले विदेशी धन का उपयोग पूरी तरह पारदर्शी और उत्तरदायी ढंग से हो। यदि ऐसा नहीं होगा तो यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी संकट खड़ा करेगा। इसलिए सख्त लेकिन संतुलित नीति ही इस दिशा में सबसे उपयुक्त मार्ग है।



