पत्रकारिता का मूल उद्देश्य समाज को सच दिखाना, तथ्यों को निष्पक्षता से प्रस्तुत करना और कानून के शासन को बढ़ावा देना है। लेकिन भारत समाचार का यह रवैया न केवल पक्षपातपूर्ण है, बल्कि हिंसा को बढ़ावा देने वाला भी है। जब एक व्यक्ति पर हमला होता है, तो कानून को अपना काम करना चाहिए। राशिदी की टिप्पणी आपत्तिजनक थी, तो इसके लिए कानूनी रास्ता अपनाया जा सकता था। लेकिन समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कानून को हाथ में लिया, और चैनल ने इसे नायकत्व के रूप में पेश किया। यह निंदनीय है कि संविधान की दुहाई देने वाले नेता और उनकी पार्टी इस घटना पर खामोश हैं, जबकि चैनल हिंसा को सामान्य बनाने में जुटा है।
ऐसी पत्रकारिता समाज में हिंसा और अराजकता को बढ़ावा देती है। सनसनीखेज थमनेल और भड़काऊ शब्दों का उपयोग दर्शकों को आकर्षित करने का सस्ता हथकंडा है, जो नैतिकता और जिम्मेदारी को ताक पर रखता है। भारत समाचार जैसे चैनलों को यह समझना होगा कि उनकी भूमिका समाज को जोड़ने और जागरूक करने की है, न कि विभाजन और हिंसा को बढ़ावा देने की। इस तरह की गटरछाप पत्रकारिता न केवल मीडिया की विश्वसनीयता को ठेस पहुंचाती है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को कमजोर करती है। समाज को ऐसी पत्रकारिता से सावधान रहने की जरूरत है, जो सत्य के बजाय सनसनी को प्राथमिकता दे।