102 साल के लेखक को अंजुरी भर प्रणाम !

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दयानंद पांडेय

गोरखपुर : लगभग सभी विधाओं में निरंतर लिखते रहने वाले रामदरश मिश्र आज 102 वें वर्ष में प्रवेश कर गए। यह सौ साल जीने का सौभाग्य बहुत कम लोगों को मिल पाता है। ख़ास कर एक हिंदी लेखक को। दिलचस्प यह है कि इस उम्र में भी न सिर्फ़ देह और मन से पूरी तरह स्वस्थ हैं बल्कि रचनाशील भी हैं। रामदरश मिश्र की इस वर्ष भी कुछ किताबें प्रकाशित हुई हैं। उन की याददाश्त के भी क्या कहने। नया-पुराना सब कुछ उन्हें याद है। जस का तस। अभी जब उन से फ़ोन पर बात हुई और उन्हें बधाई दी तो वह गदगद हो गए। वह किसी शिशु की तरह चहक उठे। भाव-विभोर हो गए। उन की आत्मीयता में मैं भीग गया। कहने लगे आप की याद हमेशा आती रहती है। चर्चा होती रहती है। कथा-लखनऊ के बारे में भी बहुत चर्चा करते रहते थे। एक प्रकाशक से विवाद के कारण भी वह चर्चा करते थे। बाद में उस प्रकाशक ने उन्हें भी आख़िर ठगा और उन के साथ बदसलूकी भी की।

जब कथा-गोरखपुर की तैयारी कर रहा था तब उन्हों ने अपनी कहानी तो न सिर्फ़ एक बार के कहे पर ही भेज दी बल्कि गोरखपुर के कई पुराने कथाकारों का नाम और कहानी का विवरण भी लिख कर वाट्सअप पर भेजा। वह कोरोना की पीड़ा के दिन थे। पर वह सक्रिय थे। चार वर्ष पहले दिसंबर , 2018 में वह लखनऊ आए थे। उन के चर्चित उपन्यास जल टूटता हुआ पर आधारित भोजपुरी में बन रही फिल्म कुंजू बिरजू का मुहूर्त था। उस कार्यक्रम में रामदरश जी ने बड़े मान और स्नेह से मुझे न सिर्फ़ बुलाया बल्कि उस का मुहूर्त भी मुझ से करवाया। रामदरश जी को जब उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का शीर्ष सम्मान भारत भारती मिला तो मुझे भी लोक कवि अब गाते नहीं उपन्यास पर प्रेमचंद सम्मान मिला था। वह बहुत प्रसन्न थे। मंच पर खड़े-खड़े ही कहने लगे अपने माटी के दू-दू जने के एक साथ सम्मान मिलल बा। यह उन का बड़प्पन था। संयोग ही है कि रामदरश मिश्र के बड़े भाई रामनवल मिश्र के साथ भी मुझे कविता पाठ का अवसर बार-बार मिला है , गोरखपुर में।

गोरखपुर में उन का गांव डुमरी हमारे गांव बैदौली से थोड़ी ही दूर पर है। इस नाते भी उन का स्नेह मुझे और ज़्यादा मिलता है। उन की आत्मकथा में , उन की रचनाओं में उन का गांव और जवार सर्वदा उपस्थित मिलता रहता है। कोई चालीस साल से अधिक समय से उन के स्नेह का भागीदार हूं। साहित्य अकादमी उन्हें वर्ष 2015 में मिला। सरस्वती सम्मान इसी वर्ष मिला है। उम्र के इस मोड़ पर यह सम्मान मिलना मुश्किल में डालता है। यह सारे सम्मान रामदरश मिश्र को बहुत पहले मिल जाने चाहिए थे। असल बात यह है कि हिंदी की फ़ासिस्ट और तानाशाह आलोचना ने जाने कितने रामदरश मिश्र मारे हैं । लेकिन रचना और रचनाकार नहीं मरते हैं। मर जाती है फ़ासिस्ट आलोचना। मर जाते हैं फ़ासिस्ट लेखक। बच जाते हैं रामदरश मिश्र। रचा ही बचा रह जाता है। रामदरश मिश्र ने यह ख़ूब साबित किया है। बार-बार किया है।

उन की पत्नी सरस्वती जी का दो बरस पहले जब स्वर्गवास हुआ तो पता चलने पर फ़ोन किया। कहने लगे , अच्छा हुआ चली गईं। उन का कष्ट अब देखा नहीं जा रहा था। अभी पिछले महीने ही साहित्य अकादमी , दिल्ली में उन से भेंट हुई तो सर्वदा की तरह धधा कर मिले। साहित्य अकादमी ने उन के सौ बरस का होने पर एक संगोष्ठी आयोजित की थी। जिस में वह सपरिवार पधारे थे। बिलकुल चेतन और स्वास्थ्य संपन्न। भाषण भी दिया। ऐसे बोलते रहे , सब से मिले रहे गोया वह सौ बरस के नहीं , अस्सी के आसपास ही हों। ललक युवाओं जैसी। अनेक लेखकों के जन्म-शताब्दी कार्यक्रमों में शरीक़ होने का सौभाग्य मिला है। पर उस दिन एक जीवित लेखक रामदरश मिश्र के जन्म-शताब्दी संगोष्ठी में शिरकत करने का सौभाग्य मिला। रामदरश मिश्र जी हमारे ज़िले गोरखपुर के हैं। उन का गांव और हमारा गांव भी आसपास है। इस लिए भी वह मुझे सर्वदा से स्नेह करते हैं। साहित्य अकादमी , दिल्ली द्वारा आयोजित जनशताब्दी संगोष्ठी में भी वह हमेशा की तरह मुझ से धधा कर मिले। ऐसे लगा , जैसे वह क्या पा गए हैं। मिल तो वह हर किसी से रहे थे पर उन के सबल हाथ मेरे कंधे पर अनायास आ गए। मन मगन हो गया , उन के इस स्नेह से।

उन को सुनना भी बहुत सुखद था। तीन अलग-अलग सत्र में साहित्य अकादमी ने रामदरश मिश्र की कथा , कविता और कथेतर गद्य पर चर्चा आयोजित की थी। पूरा दिन साहित्य अकादमी परिसर रामदरश मिश्र मय रहा। शतायु तो हो ही गए हैं , रामदरश जी , स्वस्थ भी बहुत हैं और प्रसन्न भी ख़ूब। और क्या चाहिए भला ! लगता है कम से कम दस बरस वह और जिएंगे। आज भी जब उन से बात हुई , बधाई दी तो उन की प्रसन्नता का पारावार न था। मुदित थे , मगन थे और पुलकित भी।

सोचिए कि रामदरश मिश्र और नामवर सिंह हमउम्र हैं। न सिर्फ़ हमउम्र बल्कि रामदरश मिश्र और नामवर सहपाठी भी हैं और सहकर्मी भी। दोनों ही आचार्य हजारी प्रसाद के शिष्य हैं। बी एच यू में साथ पढ़े और साथ पढ़ाए भी। एक ही साथ दोनों की नियुक्ति हुई। रामदरश मिश्र कथा और कविता में एक साथ सक्रिय रहे हैं। पर नामवर ने अपनी आलोचना में कभी रामदरश मिश्र का नाम भी नहीं मिला। जब कि अपनी आत्मकथा अपने लोग में रामदरश मिश्र ने बड़ी आत्मीयता से नामवर को याद किया है। नामवर सिंह की आलोचना की अध्यापन की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। बहुत सी नई बातें नामवर की बताई हैं। सर्वदा साफ और सत्य बोलने वाले रामदरश मिश्र को उन की ही एक ग़ज़ल के साथ जन्म-दिन की कोटिश: बधाई !

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे।

किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे-धीरे।

जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर,
वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे।

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी,
उठाता गया यूँ ही सर धीरे-धीरे।

न हँस कर न रोकर किसी में उडे़ला,
पिया खुद ही अपना ज़हर धीरे-धीरे।

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया,
गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे।

ज़मीं खेत की साथ लेकर चला था,
उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे।

मिला क्या न मुझको ए दुनिया तुम्हारी,
मोहब्बत मिली, मगर धीरे-धीरे।

— डॉ. रामदरश मिश्र

स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने समृद्ध भारत का अद्भुद विजन प्रस्तुत किया है

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दिल्ली। किसी भी आधुनिक घर के निर्माण के लिए विकास के लिए प्लंबिंग अत्यधिक आवश्यक है। प्लंबिंग यानि कि बिजली, जल एवं मल-मूत्र के आवागमन के लिए तार, पाइपलाइन, वाल्व, सम्बंधित उपकरण, टैंक इत्यादि का जाल बिछाना। यह प्लंबिंग अदृश्य होती हैं। लेकिन इसके बिना न तो बिजली-पानी आएगा, न ही मल-मूत्र निकासी होगी। और यह प्लंबिंग करना परिश्रम का कार्य हैं, बोरिंग होता हैं।

यही प्लंबिंग राष्ट्र निर्माण के लिए बिछानी पड़ती है। जैसे कि सभी नागरिको के लिए आधार, बैंक अकाउंट, घर, शौचालय, बिजली, नल से जल, गैस प्रदान करना। निर्धनों एवं बुजुर्गो के लिए फ्री अन्न एवं आयुष्‍मान स्वास्थ्य उपलब्ध कराना।

इस नींव, इस प्लंबिंग को बिछाये बिना आप घर नहीं बना सकते है; उसे सुन्दर नहीं बना सकते। प्लास्टर एवं पेंट नहीं कर सकते है। टॉयलेट सीट, पंखा, बल्ब, टीवी, कंप्यूटर, AC पंखा नहीं लगा सकते है।

अब जब मूलभूत प्लंबिंग समाप्त होने वाली है या हो चुकी है, इस स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को नयी तकनीकी का प्रयोग करके समृद्ध बनाने का आह्वान किया है।

इसके पूर्व के सम्बोधन में वे अधिकतर समय भारत में “प्लंबिंग” डालने की बात करते थे।
प्रधानमंत्री मोदी बतलाते है कि इस समृद्धि का आधार होगा नयी टेक्नोलॉजी। मिशन मोड में सेमीकंडक्टर के काम के आगे बढ़ाया है। इसी वर्ष भारत की बनी हुई, भारत में बनी हुई, भारत के लोगों द्वारा बनी हुई मेड इन इंडिया चिप्स, बाजार में आ जाएगी।

ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनाना बहुत जरूरी है। हम परमाणु ऊर्जा क्षमता 10 गुना से भी अधिक बढ़ाने का संकल्प लेकर के आगे बढ़ रहे हैं। मिशन ग्रीन हाइड्रोजन में हजारों करोड़ रुपए इन्वेस्ट हो रहा है। सोलर एनर्जी 30 गुणा बढ़ चुकी है। समुद्र के भीतर के तेल के भंडार, गैस के भंडार, उसको खोजने की दिशा में एक मिशन मोड में काम करना चाहते हैं और इसलिए भारत नेशनल डीप वाटर एक्सप्लोरेशन मिशन शुरू करने जा रहा है।

नेशनल क्रिटिकल मिनरल (जो कंप्यूटर, सेल फोन, लड़ाकू विमान, मिसाइल, इलेक्ट्रिक वाहन, CAT एवं MRI इत्यादि में लगता है) मिशन हमने लॉन्च किया है, 1200 से अधिक स्थानों पर खोज का अभियान चल रहा है, और हम क्रिटिकल मिनरल में भी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
देश के 300 से ज्यादा स्टार्टअप्स अब स्पेस सेक्टर में काम कर रहे हैं। हम स्पेस में भी अपने दम पर आत्मनिर्भर भारत गगनयान, अपना स्पेस स्टेशन बनाने की दिशा में हम काम कर रहे हैं।
मेड इन इंडिया फाइटर जेट्स के लिए जेट इंजन हमारा होना चाहिए।

मेडिसिन में रिसर्च और डेवलपमेंट में और ताकत लगाएं, हमारे अपने पेटेंट हो, हमारे अपनी बनाई हुई सस्ती और सबसे कारगर नई-नई दवाइयों की शोध हो। BioE3 (Biotechnology for Economy, Environment, and Employment) पॉलिसी भारत सरकार ने बनाई है जिसका उद्देश्य आर्थिक विकास, पर्यावरणीय स्थिरता और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने के लिए जैव प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना है।

ऑपरेटिंग सिस्टम से लेकर के साइबर सुरक्षा तक, डिप टेक से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक, सारी चीजें हमारी अपनी हो।
भारत की आवश्यकता के अनुसार हम अपना फर्टिलाइजर तैयार करें, हम औरों पर निर्भर ना रहे।
ईवी बैटरी, सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल्स के लिए जिन-जिन चीजों की आवश्यकताएं है, वो हमारी अपनी होनी चाहिए।

जो युवा मैन्युफैक्चरिंग के बारे में सोचते हैं, उभे अगर सरकार के नियमों में बदलाव करना है, तो प्रधानमंत्री जी को बताइए।

अगर हमें विश्व बाजार में अपने सामर्थ्य का लोहा मनवाना है, तो हमें क्वालिटी में निरंतर नहीं ऊंचाइयों को पार करना है। हमारे हर प्रोडक्ट का दम ज्यादा हो, लेकिन दाम कम हो।

हम स्वदेशी मजबूरी में नहीं, मजबूती के साथ उपयोग करेंगे। यह हमारी ताकत होनी चाहिए।

प्रधानमंत्री मोदी अपने अनुभव से कहते है कि किसी दूसरे की लकीर छोटी करने के लिए अपनी ऊर्जा हमें नहीं खपानी है, हमें पूरी ऊर्जा के साथ हमारी लकीर को लंबा करना है।

स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स की बात हो, रेगुलेटरी रिफॉर्म्स की बात हो, पॉलिसी रिफॉर्म की चर्चा हो, प्रोसेस रिफॉर्म की चर्चा हो, कांस्टीट्यूशनल रिफॉर्म करने की जरूरत हो, हर प्रकार के रिफॉर्म्स (इन सभी रिफॉर्म्स पर अलग पोस्ट लिखी जा सकती है), ये हमारा लक्ष्य हैं।

नेक्स्ट जनरेशन रिफॉर्म्स के लिए हमने एक टास्क फोर्स गठित करने का निर्णय किया है। यह टास्क फोर्स समय सीमा में इस काम को पूरा करें। वर्तमान नियम, कानून, नीतियां, रीतियां 21वीं सदी के अनुकूल, वैश्विक वातावरण में अनुकूल हो।

एक बहुत बड़ा रिफॉर्म इनकम टैक्स एक्ट में हुआ है। करीब 280 से ज्यादा धाराएं हमने समाप्त करने का निर्णय किया है।

अगर सुरक्षा के प्रति उदासीनता बरतते हैं, तो समृद्धि भी किसी काम की नहीं रहती है।
राष्ट्र के सभी महत्वपूर्ण स्थलों को टेक्नोलॉजी के नए प्लेटफॉर्म द्वारा पूरी तरह सुरक्षा का कवच दिया जाएगा।

आत्मनिर्भरता का नाता हमारे सामर्थ्य से जुड़ा हुआ है और जब आत्मनिर्भरता खत्म होने लगती है, तो सामर्थ्य भी निरंतर क्षीण होता जाता है।

अंत में प्रधानमंत्री मोदी कहते है कि गरीबी क्या होती है, यह मुझे किताबों में पढ़ना नहीं पड़ा है।
यही एक स्वीकृति उन्हें पप्पू पॉवरपॉइंट एवं अन्य अति समृद्ध पॉलिटिशियन्स से अलग कर देती है।

हमारा अभी ब्रेनवाश नहीं हुआ है

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स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती

जरा दिमाग पर जोर डालिये और मात्र दस साल पहले 2014 अगस्त याद कीजिये जब कांग्रेस ने प्रशांत किशोर को ठेका दिया था राहुल गांधी को राजनीति में चमकाने का! प्रशांत ने 350 करोड़ में राहुल गांधी को राजनीति का सूरज बना देने का कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था। अगस्त के आखिर में प्रशांत किशोर ने बाकायदा सोशल मीडिया पर एक विज्ञप्ति निकाली थी कि जो लोग सोशल मीडिया पर लिखने में एक्सपर्ट हैं वे उससे जुड़े और करीब 60 हजार लोगों की लिस्ट बनी थी मुंबई में एक मीटिंग रखी गई दूसरी बनारस में। लगभग पांच हजार लोगों को छांट कर एक आईटी सेल बनाई गई जो दिन रात कांग्रेस को अपग्रेड करते थे!

दूसरा आपको ‘द वायर’ याद हैं! जिसने अमित शाह के बेटे पर 300% मुनाफा कमाने का आरोप लगाया था और रातों रात चर्चा में आई थी?? हालांकि ‘द वायर’ ने बाद में केजरीवाल की तरह माफी भी मांगी और कोर्ट में जुर्माना भी भरा था लेकिन द वायर को चर्चा में आना था सो वह आ गई।

अब तीसरा हाल ही का ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ को भी याद कीजिए कि हजार करोड़ लेकर कांग्रेस से सरकार बनवाने का कॉन्ट्रेक्ट इसी कम्पनी ने लिया था। ये कैम्ब्रिज अमेरिकी कंपनी हैं जिसने ट्रम्प का प्रचार किया था और कांग्रेस ने इसी बेस पर इसे राहुल गांधी के लिये हजार करोड़ देकर यहां भारत मे एप्रोच किया!

अब प्रशांत किशोर ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया हैं लेकिन जाते जाते आईटी सेल दे गया। उसकी बनाई आईटी सेल के हर व्यक्ति को बीस हजार महीने से लेकर योग्यता अनुसार लाख से ऊपर तक महीने की तनख्वाह दी जाती हैं। प्रशिक्षण देकर लाइव डिबेट के लिये तैयार किया जाता हैं।

हर विषय को कैसे हैंडल करना है, इसपर बाकायदा किताबे छपी हुई हैं और ये सब लोग रात दिन अपनी तनख्वाह बढ़ाने के चक्कर मे सोशल मीडिया पर लगे हुए हैं जो आज भी जारी है और हर महीने सैकड़ों करोड़ पानी की तरह इनपर कांग्रेस बहा रही है।

अब ‘द वायर’ जैसी हजारों वेबसाइट और ब्लॉग धड़ल्ले से चल रहे हैं जिनका काम सिर्फ न्यूज लिंक क्रिएट करना हैं और वही न्यूज बनानी है जो आईटी सेल चाहती हैं।

कैम्ब्रिज ने इनसे दो कदम आगे बढ़कर वो फार्मूला आजमाया जो ये गोरे शुरू से आजमाते हैं। कैम्ब्रिज ने 2014 के वोट प्रतिशत और किस जगह से कितने आये किस जाति से कितने आए इसकी डिटेल निकाली और इन वोटों को तोड़ने की उसने बाकायदा आधिकारिक घोषणा की कि वह इस हिंदुत्व की एकता को ही तोड़ देंगे ‘न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी’।

प्रशांत किशोर से लेकर केंब्रिज के बीच और भी बहुत प्रयास हुए हैं।

अब इस गेम को समझिए की कहाँ से आते हैं वो फोटोशॉप जो नफरत फैलाते हैं? कैसे गलत न्यूज रातों रात वायरल हो जाती हैं? कैसे मोदी के बयान को तोड़कर उसे गलत सिद्ध करने के लिये तुरन्त लिंक न्यूज फैल जाते हैं? कैसे अखबार की एडिट कटिंग तुरन्त मिल जाती हैं? लेकिन बात यहीं तक नही हैं ये मोदी विरोध के चक्कर मे कब देश का विरोध करने लगे उन्हें भी नहीं पता! कब जातिवाद के चक्कर में धर्म को गालियां देने लगे इन्हें भी नही पता हैं! मोदी विरोध के फेर में ये भारत को ही गालियां देने लगे हैं।

आईटी सेल के हर व्यक्ति को मोदी विरोध का पैसा मिलता हैं। जो जितना ज्यादा प्रभावी ढंग से विरोध करेगा उतना ही ज्यादा पैसा हैं लेकिन इसका ये मतलब तो नही की हमारी अक्ल घास चर रही हैं! केवल चार साल में इनका फैलाया जहर इस हद तक फैल गया कि दिमाग में एक दूसरे के लिए सिर्फ नफरत को जगह हैं बाकी ब्लेंक!

याद रखिये ‘अंध विरोध की काट अंधभक्त होना ही हैं’ हमारे आपके जैसे अंधभक्तो ने प्रशांत किशोर, द वायर और कैम्ब्रिज जैसो को घुटनों पर ला दिया हैं और आगे भी कोई देशविरोधी होंगे तो उन्हें भी लाएंगे!

हिन्दू समाज के परिष्कार के लिये हुई विहिप की स्थापना

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अम्बरीष

दिल्ली । विश्व हिन्दू परिषद अपनी जीवन यात्रा के 61 वर्ष पूर्ण कर रहा है। भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य दिवस पर परिषद् की स्थापना एक दैवी संयोग ही है,श्रीकृष्ण के अवतार के कालखण्ड में देश की परिस्थिति और परिषद के स्थापना के समय देश की स्थिति में अनूठा साम्य दिखता है। 61 वर्ष की गौरवशाली यात्रा के कुछ अविस्मरणीय और अनूठे पड़ाव हैं,कुछ को पढ़ा है, कुछ को बड़ों से सुना है और कुछ का तो स्वयं मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं। स्थापना काल के समय कैसा मनोहारी रहा होगा वह दृश्य ? स्वामी चिन्मयानन्द जी के आश्रम संदीपनी साधनालय मुंबई में,विश्व भर के हिन्दुओं की दिशा और दशा के चिंतन हेतु एकत्रित देश के लब्धप्रतिष्ठित महानुभाव स्वामी चिन्मयानन्द जी, संघ के द्वितीय सरसंघचालक पूज्य श्री गुरूजी, श्री के.एम्. मुनशी , मास्टर तारा सिंह,पूज्य कुशक बकुला, पूज्य सुशील मुनि सदृश मनीषी।

उनके द्वारा विराट हिन्दू समाज को जाति,मत,पंथ और भाषा से ऊपर उठ हिन्दू के नाते संगठित करने का संकल्प। प्रयाग के पावन संगम तट पर महाकुम्भ के अवसर पर आयोजित प्रथम विश्व हिन्दू सम्मलेन का ऐतिहासिक दृश्य हिन्दू समाज ने वर्षों बाद अपने सभी मत पन्थों के पूज्य धर्माचार्यों को एक मन्च पर देखा, यह सुयोग बन पाया पूज्य श्री गुरूजी की प्रेरणा और विश्व हिन्दू परिषद के प्रथम महामन्त्री दादा साहब आप्टे के अनथक श्रम से, स्मरण आ रहा है पूज्य संतो के मार्मिक भाषण के अंश,मैं इस विराट हिन्दू समाज का अंगभूत घटक हूं, मेरे पंथ के प्रथम पुरुष ने हिन्दू समाज के संगठन और परिष्कार के लिये ही इस पंथ की स्थापना की थी हम अनवरत इस पुनीत कार्य में लगे हैं और लगे रहेंगे। 1969 में उडुपी में हिन्दू सम्मलेन मन्च पर विराजमान पूज्य संतों द्वारा उदघोष “हिन्दवः सोदरा सर्वे न हिन्दू पतितो भवेत” अश्पृश्यता के विरुद्ध प्रस्ताव पारित ,हिन्दू के लिये ऐतिहासिक क्षण ।

-1979 प्रयागराज के संगम तट पर ही द्वितीय विश्व हिन्दू सम्मेलन तब तक परिषद् का विस्तार 7 समुद्र पार तक पहुँच चूका था देश विदेश के हिन्दू समाज और धर्म धाराओं का मिलन हुआ। 1981 में मिनाक्षीपुरम के दुर्भाग्यपूर्ण धर्मान्तरण के बाद गिरिवासी वनवासी बंधुओं के बीच सेवा कार्यों की श्रंखला खड़ी करने का संकल्प ,”धोखा लालच पेट्रो डालर नहीं चलेगा” का शंखनाद। बड़े परिमाण में सेवा कार्य आरम्भ का संकल्प लिया गया। 1983 में गंगा माता और भारतमाता रथारूढ़ हो एकात्मता यात्रा के रूप में गांव गली गलियारे में अपने भक्तों के बीच निकलीं,सभी भेद टूट गये पूरे देश के दिग-दिगन्त में गूँज उठा भारतमाता की जय गंगा माता जय का जयघोष। 1984 श्री अयोध्या जी में सरयू की पावन रेती पर पूज्य संतों के नेतृत्व में रामभक्तों ने संकल्प लिया रामलला की जन्मभूमि पर विदेशी आक्रमणकारी बाबर के नाम पर बनी ईमारत में ताले में बन्द रामजी के विग्रह को मुक्त कर भव्य राममन्दिर के निर्माण का,आकाश गुंजायमान हो गया “बच्चा बच्चा राम का जन्म भूमि के काम का” , “राम लला हम आयेंगे मंदिर यहीं बनायेंगे”, “राम ने उत्तर दक्षिण जोड़ा भेदभाव का बन्धन तोड़ा” और आरम्भ हो गया दुनिया का सहस्त्राब्दी का सबसे बड़ा जनांदोलन। यह आन्दोलन लाखों राममंदिर में कोई एक और राममन्दिर बनाने के लिये नहीं अपितु राष्ट्रीय स्वाभिमान के पुनर्प्रतिष्ठा के रुके हुये उस महाअनुष्ठान का अगला चरण था जिसका आरम्भ देश के प्रथम गृहमन्त्री सरदार पटेल ने सोमनाथ के मन्दिर के पुनर्प्रतिष्ठा से की थी।

6 दिसम्बर 1992 को हिन्दू शक्ति ने पराधीनता के प्रतीक ढाँचे को ढहा दिया। हिन्दू के इस विराट सामूहिक शक्ति प्रदर्शन का सुपरिणाम रामजी के मन्दिर निर्माण की बाधाएं दूर हुईं भव्य मंदिर तीव्र गति से पूर्णता की ओर अग्रसर है। हिन्दू समाज के सम्मान के प्रत्येक संघर्ष में परिषद का अनूठा योगदान है। अमरनाथ यात्रा का पुनर्जीवन,रामसेतु आन्दोलन,गऊ रक्षा समर्पित कार्यकर्ताओं और हिन्दू समाज की श्रद्धा के बल पर हिन्दू जागरण में परिषद ने अग्रणी भूमिका निभा रहा है। महर्षि देवल, परशुरामाचर्य,स्वामी रामानन्द तथा स्वामी दयानन्द की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए परिषद अपने स्थापना काल से ही धर्मान्तरित बंधुओं के घर वापसी के सत्कार्य में लगा है । मठ मंदिर,अर्चक पुरोहित ,तीर्थ और संस्कृत की पुनर्प्रतिष्ठा का कार्य भी परिषद् सफलता पूर्वक कर रहा है । गिरिवासी वनवासी अञ्चल में अपने बंधुओं के बीच सेवा कार्यों की श्रृंखला विविध उपक्रमों से परिषद समाज देवता की साधना में निरन्तर लगा हुआ है।
संगठन बढ़ा कार्य बढ़ा लेकिन 61वर्ष में हिन्दु समाज और देश के समक्ष चुनोतियाँ भी बढ़ी हैं।

गऊ माँ के देश में उसका बहता हुआ रक्त, अपने ही देश में शरणार्थी काश्मीरी हिन्दू, बांग्लादेशी घुसपैठिये,जेहादी आतंकवाद,लव जेहाद, नक्सलवाद, विदेशी धन से ईसाईकरण,हिन्दू समाज के विखंडन के षडयंत्र , सिमटती पतितपावनी गंगा तथा पर्यटन केंद्र में बदल रहे तीर्थस्थल राष्ट्रहित की भी कीमत पर तुष्टिकरण । इन चुनौतियों का सामना करने के लिये हमें अनथक श्रम कर गिरिवासीवनवासी,नगरवासी,ग्रामवासी हिन्दू समाज में से लक्षाधिक कार्यकर्त्ता खड़ा कर गांव गांव तक संगठन के तंत्र को फैला देने का संकल्प करना है और उसे पूर्णता की ओर पहुंचाना है।

हमारा लक्ष्य संगठित ,आग्रही, सक्रिय, जागरूक श्रद्धालु और आक्रामक हिन्दू । हम सफल ही होंगे हमारी ध्येयनिष्ठा और श्रम के साथ हमारे रामजी की कृपा हमारे साथ है।

(लेखक विश्व हिन्दू परिषद के प्रवक्ता हैं)

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