शरद जोशी का 1977 में कांग्रेस पर लिखा व्यंग्य

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शरद जोशी

दिल्ली । कांग्रेस को राज करते-करते 30 साल बीत गए. कुछ कहते हैं, तीन सौ साल बीत गए. गलत है. सिर्फ तीस साल बीते. इन तीस सालों में कभी देश आगे बढ़ा, कभी कांग्रेस आगे बढ़ी. कभी दोनों आगे बढ़ गए, कभी दोनों नहीं बढ़ पाए. फिर यों हुआ कि देश आगे बढ़ गया और कांग्रेस पीछे रह गई. तीस सालों की यह यात्रा कांग्रेस की महायात्रा है. वह खादी भंडार से आरम्भ हुई और सचिवालय पर समाप्त हो गई.

पूरे 30 साल तक कांग्रेस हमारे देश पर तम्बू की तरह तनी रही, गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही, बर्फ सी जमी रही. पूरे तीस साल तक कांग्रेस ने देश में इतिहास बनाया, उसे सरकारी कर्मचारियों ने लिखा और विधानसभा के सदस्यों ने पढ़ा. पोस्टरों, किताबों ,सिनेमा की स्लाइडों, गरज यह है कि देश के जर्रे-जर्रे पर कांग्रेस का नाम लिखा रहा रेडियो, टीवी डाक्यूमेंट्री, सरकारी बैठकों और सम्मेलनों में, गरज यह कि दसों दिशाओं में सिर्फ एक ही गूँज थी और वह कांग्रेस की थी. कांग्रेस हमारी आदत बन गई. कभी न छूटने वाली बुरी आदत. हम सब यहां वहां से दिल दिमाग और तोंद से कांग्रेसी होने लगे. इन तीस सालों में हर भारतवासी के अंतर में कांग्रेस गेस्ट्रिक ट्रबल की तरह समा गई.

जैसे ही आजादी मिली कांग्रेस ने यह महसूस किया कि खादी का कपड़ा मोटा, भद्दा और खुरदुरा होता है और बदन बहुत कोमल और नाजुक होता है. इसलिए कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि खादी को महीन किया जाए, रेशम किया जाए, टेरेलीन किया जाए. अंग्रेजों की जेल में कांग्रेसी के साथ बहुत अत्याचार हुआ था. उन्हें पत्थर और सीमेंट की बेंचों पर सोने को मिला था. अगर आजादी के बाद अच्छी क्वालिटी की कपास का उत्पादन बढ़ाया गया, उसके गद्दे-तकिए भरे गए और कांग्रेसी उस पर विराज कर, टिक कर देश की समस्याओं पर चिंतन करने लगे. देश में समस्याएं बहुत थीं, कांग्रेसी भी बहुत थे. समस्याएं बढ़ रही थीं, कांग्रेस भी बढ़ रही थी.

एक दिन ऐसा आया की समस्याएं कांग्रेस हो गईं और कांग्रेस समस्या हो गई. दोनों बढ़ने लगे. पूरे तीस साल तक देश ने यह समझने की कोशिश की कि कांग्रेस क्या है? खुद कांग्रेसी यह नहीं समझ पाया कि कांग्रेस क्या है? लोगों ने कांग्रेस को ब्रह्म की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा. जो दाएं नहीं है वह कांग्रेस है. जो बाएं नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य में भी नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य से बाएं है वह कांग्रेस है. मनुष्य जितने रूपों में मिलता है, कांग्रेस उससे ज्यादा रूपों में मिलती है. कांग्रेस सर्वत्र है. हर कुर्सी पर है. हर कुर्सी के पीछे है. हर कुर्सी के सामने खड़ी है. हर सिद्धांत कांग्रेस का सिद्धांत है. इन सभी सिद्धांतों पर कांग्रेस तीस साल तक अचल खड़ी हिलती रही.

तीस साल का इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने हमेशा संतुलन की नीति को बनाए रखा. जो कहा वो किया नहीं, जो किया वो बताया नहीं,जो बताया वह था नहीं, जो था वह गलत था. अहिंसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से. सत्य की नीति पर चली, पर सच बोलने वाले से सदा नाराज रही. पेड़ लगाने का आन्दोलन चलाया और ठेके देकर जंगल के जंगल साफ़ कर दिए. राहत दी मगर टैक्स बढ़ा दिए. शराब के ठेके दिए, दारु के कारखाने खुलवाए; पर नशाबंदी का समर्थन करती रही.

हिंदी की हिमायती रही अंग्रेजी को चालू रखा. योजना बनायी तो लागू नहीं होने दी. लागू की तो रोक दिया. रोक दिया तो चालू नहीं की. समस्याएं उठी तो कमीशन बैठे, रिपोर्ट आई तो पढ़ा नहीं. कांग्रेस का इतिहास निरंतर संतुलन का इतिहास है. समाजवाद की समर्थक रही, पर पूंजीवाद को शिकायत का मौका नहीं दिया. नारा दिया तो पूरा नहीं किया. प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ पब्लिक सेक्टर को खड़ा किया, पब्लिक सेक्टर के खिलाफ प्राइवेट सेक्टर को. दोनों के बीच खुद खड़ी हो गई.

एक को बढ़ने नहीं दिया. दूसरे को घटने नहीं दिया. आत्मनिर्भरता पर जोर देते रहे, विदेशों से मदद मांगते रहे. ‘यूथ’ को बढ़ावा दिया, बुड्द्धों को टिकेट दिया. जो जीता वह मुख्यमंत्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया. जो केंद्र में बेकार था उसे राज्य में भेजा, जो राज्य में बेकार था उसे उसे केंद्र में ले आए. जो दोनों जगह बेकार थे उसे एम्बेसेडर बना दिया. वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा. एकता पर जोर दिया आपस में लड़ाते रहे.
जातिवाद का विरोध किया, मगर अपनेवालों का हमेशा ख्याल रखा. प्रार्थनाएं सुनीं और भूल गए. आश्वासन दिए, पर निभाए नहीं. जिन्हें निभाया वे आश्वश्त नहीं हुए. मेहनत पर जोर दिया, अभिनन्दन करवाते रहे. जनता की सुनते रहे अफसर की मानते रहे. शांति की अपील की, भाषण देते रहे. खुद कुछ किया नहीं दूसरे का होने नहीं दिया. संतुलन की इन्तहा यह हुई कि उत्तर में जोर था तब दक्षिण में कमजोर थे. दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गए.

कांग्रेस अमर है. वह मर नहीं सकती. उसके दोष बने रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आएंगे. जब तक पक्षपात ,निर्णयहीनता ढीलापन, दोमुंहापन, पूर्वाग्रह, ढोंग, दिखावा, सस्ती आकांक्षा और लालच कायम है, इस देश से कांग्रेस को कोई समाप्त नहीं कर सकता. कांग्रेस कायम रहेगी. दाएं, बाएं, मध्य, मध्य के मध्य, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको कांग्रेस नजर आएगी. इस देश में जो भी होता है अंततः कांग्रेस होता है….जो कुछ होना है उसे आखिर में कांग्रेस होना है. तीस नहीं तीन सौ साल बीत जाएंगे, कांग्रेस इस देश का पीछा नहीं छोड़ने वाली.”

बंगाल की सियासी आग: तृणमूल का तुष्टीकरण और 2026 का हिंदू जागरण

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कोलकाता की गलियों में राम नवमी की धूम मच रही थी। हिंदू युवा भगवा झंडे लहराते, मंदिरों की घंटियां बज रही थीं। तभी, मुरशिदाबाद के बेल्डंगा में एक पोस्टर चिपका मिला—’बाबरी मस्जिद का शिलान्यास 6 दिसंबर को’। यह घोषणा तृणमूल कांग्रेस के विधायक हुमायूं कबीर की थी। “तीन साल में मस्जिद पूरी हो जाएगी, मुस्लिम नेता आएंगे,” उन्होंने कहा। दूर अयोध्या में राम मंदिर की भव्यता का जश्न मनाते हिंदू समाज के लिए यह चुभन थी। बीजेपी नेता सुकंता मजुमदार ने इसे “हिंदुओं के लिए खुली धमकी” कहा। बिहार के डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने चेतावनी दी, “भारत माता के बच्चे जाग चुके हैं, बाबर का कोई समर्थक अब बाबरी नहीं बना सकेगा।”

यह घटना 2025 की है, लेकिन 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की नींव इसी पर रखी जा रही है। ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप सालों से लगते रहे हैं। अब ‘पश्चिम बंगाल’ को ‘पश्चिम बांग्लादेश’ कहना बीजेपी का नया हथियार बन गया है। कारण? अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय बदलाव और हिंदू असुरक्षा। बीजेपी की नजर में, यह तुष्टीकरण बंगाल को ‘ईस्ट पाकिस्तान’ की तरह विभाजित करने की साजिश है। 1947 में बंगाल का धार्मिक आधार पर बंटवारा हुआ था—पूर्वी हिस्सा मुस्लिम बहुल ईस्ट बंगाल (बाद में बांग्लादेश) बना, पश्चिमी हिस्सा हिंदू बहुल वेस्ट बंगाल। आज, बीजेपी दावा करती है कि ममता की नीतियां उसी इतिहास को दोहरा रही हैं।
कबीर का बयान कोई पहला उदाहरण नहीं। तृणमूल का मुस्लिम तुष्टीकरण लंबे समय से विवादों में रहा है। 2012 में, ममता सरकार ने 77 मुस्लिम समुदायों को OBC कोटा में शामिल किया—इनमें से 75 शुद्ध मुस्लिम थे। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” करार देते हुए रद्द कर दिया।

बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, “OBC का मतलब अब ‘वन साइडेड बेनिफिशरी’ हो गया—केवल मुसलमानों के लिए।” इससे पहले, इमामों को 2500 रुपये मासिक भत्ता दिया गया, जबकि हिंदू पंडितों को सिर्फ 1000। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहराया। ममता ने खुद 2019 में कहा, “मैं मुसलमानों का तुष्टीकरण करती हूं, और सौ बार करूंगी। दूध देने वाली गाय की लात खाने को तैयार हूं।” फुरफुरा शरीफ दावत-ए-इफ्तार में उनकी मेजबानी, वक्फ एक्ट विरोध में मुसलमानों को “दीदी आपकी संपत्ति की रक्षा करेगी” का आश्वासन—ये सब तुष्टीकरण के प्रमाण हैं।
‘पश्चिम बांग्लादेश’ की उपाधि का आधार जनसांख्यिकीय आंकड़े हैं। 2011 की जनगणना में मुसलमान 27% थे, लेकिन अब अनुमान 30% से ऊपर। बीजेपी का आरोप है कि बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ ममता सरकार की आंखें बंदी से बढ़ी। 2025 में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) अभियान में 10 लाख नए वोटर जोड़े गए—जिनमें से अधिकांश मुस्लिम। बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा, “यह चुपचाप जनसांख्यिकीय आक्रमण है। 2026 का चुनाव बंगाल और बंगाली हिंदुओं के अस्तित्व का फैसला करेगा।” मुरशिदाबाद में Waqf एक्ट विरोध के दौरान हिंसा हुई—तीन मौतें, 150 गिरफ्तारियां। बीजेपी ने इसे “इस्लामिस्ट भीड़” कहा, जबकि TMC ने “बीजेपी की साजिश”। संदेशखाली हिंसा, जहां हिंदू महिलाओं पर अत्याचार हुए, ने हिंदू मतदाताओं को झकझोर दिया।

बीजेपी के लिए यह सुनहरा अवसर है। 2024 लोकसभा में 38.73% वोट शेयर के साथ, वे 2026 में 7-8% की बढ़ोतरी चाहते हैं। हिंदू ध्रुवीकरण उनकी रणनीति है—राम मंदिर जश्न, हनुमान जयंती पर भगवा झंडे। सुवेंदु अधिकारी कहते हैं, “ममता हिंदू-विरोधी हैं, बंगाल को बांग्लादेश बना देंगी।” RSS की घासफूस मजबूत हो रही है, गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों (ईसाई, बौद्ध) को लुभाया जा रहा। लेकिन चुनौती बाकी: मुस्लिम 30% वोट TMC के पक्के हैं, 100 सीटों पर वे निर्णायक। बीजेपी को 150+ सीटें चाहिए, जो TMC की बूथ-स्तरीय ताकत से मुश्किल।

फिर भी, कबीर का बयान बीजेपी का ट्रंप कार्ड है। यह हिंदू असंतोष को भुनाएगा—जैसे हरियाणा, महाराष्ट्र में हुआ। ममता का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ (मंदिर दर्शन, दुर्गा पूजा) जवाब है, लेकिन घुसपैठ और हिंसा के सवालों से बचना मुश्किल। 2026 में बंगाल ‘NRC चुनाव’ से ‘SIR चुनाव’ बनेगा। हिंदू जागेंगे, बीजेपी मजबूत। ममता की कुर्सी डगमगाएगी। बंगाल की मिट्टी में राम का नाम गूंजेगा, बाबर का नहीं। क्या यह ‘पश्चिम बांग्लादेश’ को ‘मां भारती का अभिन्न अंग’ बना देगा? समय बताएगा, लेकिन बीजेपी का संदेश साफ: “हम बंगाल बचाएंगे।”

धर्मेंद्र की मृत्यु पर सोशल मीडिया पर बने दो खेमे

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सर्जना शर्मा

दिल्ली। सिने स्टार धर्मेंद्र की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर दो तरह के खेमे हैं एक जो हेमा मालिनी को धर्मेंद्र के परिवार की खुशी के लिए बलिदान और त्याग की देवी बता रहे हैं । दूसरे वो जो प्रकाश कौर की सहनशीलता , संयम, भलमानसत और सामाजिक गरिमा की बात कर रहे हैं । कुछ लोग कह रहे हैं कि देयोल परिवार ने हेमा मालिनी को अंतिम संस्कार और शोकसभा से दूर रख कर अच्छा नहीं किया ।

एक बार जरा इतिहास में जाएं एमजी रामाचंद्रन की पत्नी जानकी रामाचंद्रन ने जय ललिता को क्या सबक सिखाया था । जॉर्ज फर्नाडीस की पत्नी लैला कबीर ने कैसे दशकों बाद आ कर बीमार फर्नाडीज की जिम्मेदारी और देखभाल अपने हाथ में ले ली थी । जया जेतली को जार्ज से मिलने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा था । और जॉर्ज नें अदालत में लैला कबीर के साथ रहने का मूक संकेत दिया था क्योंकि वे बोल नहीं पा रहे थे । लैला ने अंतिम समय में ज़ॉर्ज की सेवा की क्योंकि लैला कबीर ने कभी अपने पति से तलाक नहीं लिया था । जब जया जेटली और जॉर्ज की नजदीकियां बढ़ी और दोनो एकसाथ रहने लगे तो जया के आईएएस पति अशोक जेटली और जॉर्ज की हाई प्रोफाइल पत्नी लैला कबीर बिना किसी तमाशे के अलग हो गए थे। जया और जॉर्ज को अपने मन की जिंदगी जीने के लिए छोड़ दिया था । लेकिन भारतीय पत्नी का कोई मुकाबला नहीं जब देखा कि जॉर्ज बहुत बीमार है असहाय हो चुके हैं लैला कबीर लौट आयीं और बन गयी सती अनुसुइया । पति के सत्तर खून माफ जया जेटली की क्या गत हुई सब जानते हैं ।

अब बात करते हैं दक्षिण भारत की सुंदरी और दबंग नेता एस जयललिता की । एम जी रामाचंद्रन की पत्नी जानकी सब कुछ देखती रही सहती रही लेकिन अपने पति को तलाक नहीं दिया । एमजीआर की मृत्यु के समय जयललिता के साथ एमजीआर के परिवार ने क्या सलूक किया हर राजनीतिक संवाददाता जानता है । जय ललिता को इतनी चिकोटियां काटी औऱ धक्के दिए कि जिस ट्रक पर एमजीआर का शव अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा था उससे उतरना पड़ा जयललिता को । भाजपा के एक वरिष्ठ तमिल ब्राह्मण नेता से जय ललिता का भाई बहिन का रिश्ता था उनको जय ललिता ने आप बीती सुनायी थी । एमजीआर की मौत के बाद जानकी और जय ललिता में पार्टी को लेकर भी बहुत विवाद चला चुनाव आयोग तक पहुंची जानकी।

अब बात करते हैं एन टी रामाराव और उनकी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती की । यहां एनटीरामाराव की पत्नी का देहांत हो चुका था । लक्ष्मी पार्वती एनटीआर से उम्र में तीस साल छोटी थी । दोनों ने शादी की लेकिन एनटीआर के बच्चों को ये पसंद नहीं आया । एनटीआर के दामाद चंद्रबाबू नायडु के नेतृत्व में उन्होंने विद्रोह कर दिया । लक्ष्मी पार्वती के बढते दखल का हवाला दे कर टीडीपी पार्टी पर कब्जा कर लिया । वो पूरा रहस्य रोमांच भरा नाटक भला किसको याद नहीं है । पार्टी पर चंद्र बाबू नायडू के कब्जे के पांच महीने बाद एनटीआर चल बसे और साथ ही गुमनामी के अंधेरों में खो गयी लक्ष्मी पार्वती ।
धर्मेंद्र की पत्नी प्रकाश कौर ने बहुत गरिमा , संयम और धैर्य के साथ सब कुछ सहा लेकिन कभी हेमा मालिनी के खिलाफ मीडिया में बयान नहीं दिया । धर्मेंद्र के बेटों और बेटियों ने भी कभी हेमा मालिनी या अपनी दोनों सौतेली बहनों के खिलाफ कभी कुछ नहीं कहा । लैला कबीर और जानकी रामाचंद्रन की तरह प्रकाश कौर ने भी धर्मेंद्र को तलाक नहीं दिया । अपने चारों बच्चों में मगन हो कर रहीं । धर्मेंद्र के बीमार पडने पर प्रकाश कौर ने दिन रात एक कर उनकी सेवा की । कुछ लोगों को यदि संदेह हो तो बॉबी देयाल का वो इंटरव्यू पढ़लें जिसमें उन्ंहोने बताया कि हेमा मालिनी देखने और मिलने नहीं आती हैं मम्मी ही पापा का ध्यान रख रही हैं ।

अब धर्मेंद्र की मौत के बाद देयोल परिवार ने क्या किया कैसे किया क्यों किया मुझे लगता है उन पर ही छोड़़ देना चाहिए । ये उनका अपना निजी मामला है कि धर्मेंद्र का अंतिम संस्कार और शोक सभा वे कैसे करना चाहते थे । हां एक बात मैं ज़रूर कहना चाहूंगी कि हेमा मालिनी को देयोल परिवार की शोक सभा से किसी अलग दिन शोक सभा रखनी चाहिए थी । देयोल परिवार उनके लिए बहुत नरम रहा और उनको पूरा सम्मान दिया है ।

SIR पर भ्रम का वातावरण ठीक नहीं, BLO का दर्द समझें

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~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

भोपाल । के नाम पर अविश्वास, भ्रम का वातावरण तैयार करना किसी भी स्थिति में ठीक नहीं है। मुझे लगता है कि—हमारे निर्वाचन आयोग से निष्पक्ष और न्यूनतम संसाधनों में निरन्तर चुनाव करा पाना अन्यत्र कहीं संभव नहीं है। मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि— आंशिक तौर पर भले कुछ अशुद्धियां सामने आ जाएं। लेकिन देश के चुनाव आयोग से बेहतर प्रबंधन किसी और देश के पास नहीं है। भारत जैसा विशाल देश और निरन्तर चुनाव। ये सब करा पाना इतना आसान नहीं है। जैसा हमारे यहां हो पाता है।

•ये तब है जबकि केवल चुनाव के समय निर्वाचन आयोग को कार्यकारी शक्तियां मिलती हैं। चुनाव के बाद अधीनस्थों के अतिरिक्त कोई दंडात्मक शक्तियां नहीं रहती हैं।

•इस बीच लगातार SIR से जुड़े कर्मचारियों की मौतों की ख़बरें आ रही हैं। वो डरावनी हैं। भले BLO की मौतों के कारणों का वास्तविक पता नहीं चल पा रहा हो। लेकिन सच्चाई ये है कि BLO पर वर्क प्रेशर बहुत ज़्यादा है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

मेरे पिताजी मध्यप्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग में शिक्षक थे। इसके अतिरिक्त उनके पास BLO का भी सरकार की ओर से अतिरिक्त दायित्व था। इस कारण मैंने उनकी समस्याओं को बेहद क़रीब से देखा है। जब भी चुनाव का समय आता था। साल भर पहले से लगातार उनकी मीटिंग्स का दौर शुरू हो जाता था।

•डोर टू डोर हर घर जाना। मतदाता सूची में नए नाम जोड़ना। दावा-आपत्तियां स्वीकार करना। मृत लोगों के नाम हटाना। कभी नया फोटो अपडेट करना। कभी आधारकार्ड और मोबाइल नंबर फीड करना। संबंधित ऐप में डाटा अपडेट करना। ऑनलाइन आए फॉर्म को जांच-परख कर अप्रूवल देना। निर्वाचन कार्यालय से वोटर आईडी कार्ड लाकर वितरण करना। वो ये सारे कार्य अध्यापन कार्य के साथ ही पूरे करते थे। पूरी प्रक्रिया के दौरान सारे अवकाश कैंसल रहते थे। यहां तक कि रविवार भी।

•ऊपर से निर्वाचन आयोग की किसी भी स्तर की मीटिंग का ख़ौफ अलग रहता था। एक मीटिंग में अगर BLO नहीं पहुंच पाता है तो तुरंत ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी हो जाता है। यानी कार्रवाई की तलवार हर वक्त उस पर लटकती रहती है। ऊपर से कोई सनकी नोडल/ सेक्टर/ जिला अधिकारी हो तो— आप प्रेशर का अंदाजा नहीं लगा सकते। नोटिस के बाद अब BLO लिखित और मौखिक स्तर पर संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों के पेशी में दौड़ता फिरे। अपने सही होने की गवाही देता रहे। याकि अगर बहुत ज्यादा टेक्नो फ्रेंडली न हो तो व्यवस्था का दंड भुगते।

वहीं अगर एक नाम के—दो लोग हों और धोखे से किसी का नाम कट जाए। याकि पिता का नाम ग़लत लिख जाए तो संबंधित BLO की नौकरी ख़तरे में आ जाती है। जबकि उसकी नियुक्ति चुनाव आयोग में नहीं बल्कि शिक्षा विभाग या अन्य विभागों में होती है।

•ऊपर से मतदाता महोदय महान रहते हैं। एक घर के सभी सदस्यों से जुड़ी सभी जानकारियां फीड करने/ अपडेट करने के लिए BLO को न जाने कितनी मशक्कत करनी पड़ती है। ऊपर से डेडलाइन में कार्य पूरा करने का अलग दबाव रहता है। कई लोग तो ऐसे होते हैं जो कई जगह नाम जुड़वाए होते हैं। जो कि कानून अपराध है। बावजूद इसके अगर BLO इस आधार पर तथ्यात्मक जानकारी के साथ संबंधित के नाम काटने का प्रपत्र भर दे..तो शिकायतों का अंबार और जवाब देते-देते थक जाए।

•फिर जब चुनाव आता है तो घर-घर वोटिंग पर्चियां पहुंचाना । चुनाव के दिन पोलिंग टीम की समुचित व्यवस्था करना। बुजुर्गों और दिव्यांगों के घर जाकर आम लोगों के मतदान से पहले उनकी मतदान की प्रक्रिया पूरी करवाना। चुनाव शुरू होने से लेकर चुनाव टीम रवाना होने तक BLO का हर समय मौजूद रहना। ये सब झमेले झेलने पड़ते हैं। यानी BLO सबसे निरीह प्राणी होता है।

अब आपको BLO का मानदेय बताऊं? संभवतः जब पिताजी के पास ये दायित्व था । उस समय BLO कार्य के लिए सालाना 12 हज़ार से 18 हज़ार रुपए निर्वाचन आयोग की ओर से आता था। जोकि सालाना वाहन के पेट्रोल खर्च के बराबर नहीं रहता था। अथक परिश्रम। हर समय मानसिक तनाव। ये सब मामूली बात थी। पिताजी तो निर्वाचन के समय अपना मोबाइल फोन भी हम बच्चों के हाथों नहीं लगने देते थे। उन्हें लगता था कि कहीं कोई गड़बड़ी न कर दें।

अब, जबकि SIR जैसी विशेष प्रक्रिया चल रही है। उस वक्त आप BLO के ऊपर आ रहे मानसिक प्रेशर का सहज ही अंदाज़ा लगा सकते हैं। ऐसे में ज़रुरी ये है कि इस अभियान में पर्याप्त सहयोग दीजिए। निर्वाचन आयोग को भी BLO के प्रति लचीला व्यवहार करने की आवश्यकता है। उनकी समस्याओं और वस्तुस्थितियों के समझें। वरिष्ठ अधिकारी डेडलाइन और आंकड़ों के लिए प्रेशर न बनाएं। क्योंकि ज़मीन पर आप जैसे आदेश देने वाले महारथी नहीं हैं। बल्कि अपनी नौकरी को दांव में लगाकर काम करने वाले समर्पित लोग हैं। जो हर तरह की समस्याओं के बावजूद महत्वपूर्ण कार्य में तन्मयता से जुटे हैं। कुछ दिनों पहले ही पिताजी ने हम सभी के संबंधित रिकॉर्ड मंगाकर — अपने शिक्षक साथी रहे BLO को दिया है। SIR की प्रक्रिया पूरी की है।

•इन सब बातों के कहने का आशय ये भी है कि — जो लोग SIR के नाम पर हाय तौबा मचाए हुए हैं। वो निर्वाचन आयोग के सबसे अंतिम लेकिन सबसे मज़बूत स्तंभ यानी BLO की वर्तमान स्थिति का अंदाजा नहीं लगा सकते हैं। वो किन परिस्थितियों में मोर्चा संभाले हुए हैं। 4 नवंबर से जबसे SIR प्रक्रिया शुरू हुई है। BLO चैन से सोए नहीं होंगे। ऐसे में SIR का विरोध करने वाले क्या देश की सांविधानिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा नहीं कर रहे हैं? क्या ये लोग मानसिक दबाव नहीं बना रहे हैं?

ऊपर से राहुल गांधी और कांग्रेस जैसी पार्टियों की अराजक मानसिकता के क्या कहने हैं। जो जनता की ओर से बारंबार ख़ारिज होने के बाद अपनी नाकामी का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ रहे हैं। लोगों के अंदर हर सांविधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का वातावरण तैयार कर रहे हैं। क्या ये किसी के हिसाब से लोकतंत्र के लिए सही है? ये कौन लोग हैं जो हर सांविधानिक संस्था को कटघरे में खड़ा कर, संविधान की दुहाई देते हैं? क्या ये कभी संविधान के रक्षक हो सकते हैं? राहुल गांधी वही हैं न जो भारत निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया से जनता द्वारा जनप्रतिनिधि चुने गए हैं। लेकिन दूसरी ओर उसी चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ ज़हर उगल रहे हैं। क्या ये दोहरा मापदंड नहीं है?

इन्हीं कारणों के चलते, आप मानें या न मानें लेकिन BLO पर निर्वाचन कार्य से अधिक प्रेशर राहुल गांधी जैसे ग़ैर ज़िम्मेदार नेताओं ने बना रखा है। आधे लोगों को ये भय है कि – क्या पता कब राहुल गांधी सरीखे नेता और उनके अनुयायी। किसी मामूली भूल के लिए भी BLO की शिकायत लेकर पहुंच जाएं। फिर निर्वाचन आयोग तो नोटिस जारी कर कार्रवाई की अनुशंसा कर ही देगा न !… क्या कोई BLO की पैरवी करेगा?

ऐसे में ये नितांत आवश्यक है कि निर्वाचन आयोग SIR के लिए पर्याप्त समय दे। अपने BLO और इस प्रक्रिया से जुड़े समस्त अधिकारियों और कर्मचारियों की मानसिक सेहत का ध्यान दे। साथ ही राष्ट्र यज्ञ में हर व्यक्ति अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए। सहजता-सरलता के साथ पूरी प्रक्रिया में BLO का सहयोग करे। क्योंकि ये केवल SIR नहीं है बल्कि राष्ट्र के नागरिकों के सांविधानिक अधिकारों की गारंटी है। घुसपैठियों और कालनेमियों के मुखौटों को नोंच फेंकने का सशक्त माध्यम है। एक राष्ट्रभक्त नागरिक का कर्तव्य निभाना हमारा प्रथम कर्तव्य है। ऐसे में SIR की प्रक्रिया ख़ुद पूरी कीजिए और सभी से आग्रह कीजिए।

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