शमा मोहम्मद और सुप्रिया श्रीनेत की जोड़ी पर सिन्हाजी की तीखी नजर

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नई दिल्ली: भारतीय राजनीति के रंगमंच पर एक नया तमाशा शुरू हो गया है, जहां कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. शमा मोहम्मद ने सुप्रिया श्रीनेत के लिए छाता पकड़कर सुर्खियां बटोर लीं।

यह नजारा इतना रोचक था कि सोशल मीडिया के फायरब्रांड इंफ्लूएंसर सिन्हाजी ने इस पर तंज कसने में देर नहीं लगाई। सिन्हाजी ने व्यंग्य भरे अंदाज में कहा, “शमा जी छाता पकड़ रही हैं, लेकिन सुप्रिया जी की सियासी गर्मी से बचाने के लिए शायद छाता छोटा पड़ गया!”

यह घटना तब हुई जब एक कार्यक्रम के दौरान बारिश ने माहौल को ड्रामेटिक बना दिया। शमा मोहम्मद ने तत्परता दिखाते हुए सुप्रिया के लिए छाता थामा, लेकिन सिन्हाजी ने इसे सियासी नौटंकी करार दिया। सिन्हाजी ने चुटकी लेते हुए कहा, “कांग्रेस में छाता पकड़ने की ट्रेनिंग तो जबरदस्त है, लेकिन जनता का भरोसा पकड़ने की ट्रेनिंग कब होगी?”

यह पहली बार नहीं है जब शमा मोहम्मद विवादों में घिरी हैं। इससे पहले रोहित शर्मा की फिटनेस पर उनकी टिप्पणी ने हंगामा मचाया था। अब यह छाता प्रकरण सियासी गलियारों में हंसी का पात्र बन गया है।

मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में ऐतिहासिक बदलाव: पहली बार महिला अध्यक्ष और महासचिव

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तिरुवनंतपुरम: मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, एसोसिएशन ऑफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट्स (एएमएमए) ने पहली बार महिलाओं को अपने अध्यक्ष और महासचिव के रूप में चुना है। शुक्रवार को हुए चुनाव में अभिनेत्री श्वेता मेनन को अध्यक्ष और कूकू परमेश्वरन को महासचिव चुना गया। यह कदम हेमा कमेटी की रिपोर्ट के बाद आए तूफानी विवादों और यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद संगठन के पुनर्गठन का हिस्सा है।

हेमा कमेटी की रिपोर्ट, जो पिछले साल जारी हुई थी, ने मलयालम फिल्म उद्योग में यौन उत्पीड़न और लैंगिक असमानता के गंभीर मुद्दों को उजागर किया था। इसके बाद, मोहनलाल के नेतृत्व वाली 17 सदस्यीय कार्यकारी समिति ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया था। इस पृष्ठभूमि में, श्वेता मेनन ने दिग्गज अभिनेता देवन को हराकर अध्यक्ष पद हासिल किया, जबकि कूकू ने रवींद्रन को पराजित किया।
नवनिर्वाचित अध्यक्ष श्वेता मेनन ने कहा, “हम संगठन में बदलाव लाएंगे और सभी सदस्यों को एकजुट करेंगे। हमारे लिए कोई पुरुष-महिला भेद नहीं, सभी कलाकार हैं।” कूकू परमेश्वरन ने भी सभी 508 सदस्यों को विश्वास में लेकर निर्णय लेने का वादा किया।

इसके अतिरिक्त, लक्ष्मी प्रिया और जयंत चेरथला को उपाध्यक्ष, जबकि अंसिबा को संयुक्त सचिव चुना गया। उन्नी शिवपाल को कोषाध्यक्ष बनाया गया। यह नई समिति अगले तीन वर्षों तक कार्य करेगी।
हेमा रिपोर्ट ने उद्योग में शक्तिशाली पुरुष समूहों की मौजूदगी को उजागर किया था, जिसके बाद कई अभिनेताओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आए। इस संदर्भ में, श्वेता और कूकू का नेतृत्व न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि उद्योग में समावेशिता और सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।

पॉडकास्ट, ठेका और चाय पर चर्चा

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जयपुर : कुछ दिन पहले मुझे एक पॉडकास्ट के लिए कुदरत स्टूडियो में बुलाया गया। वहां पहुंचने की कहानी भी रोचक है—एक कार्यकर्ता ने ही उनके कार्यक्रम में मेरी भेंट करवाई थी। रिकॉर्डिंग शुरू हुई, और मैंने लोकसभा में राहुल गांधी के अराजक भाषण व व्यवहार पर अपनी राय रखी। तभी स्टूडियो के लोग बोले, “हम किसी का नाम नहीं लेंगे, न ही किसी से शत्रुता मोल लेंगे। सबको साथ लेकर चलना है। हिंदुत्व पर भी नरम लहजे में बात करें तो बेहतर होगा।” मैंने स्पष्ट कहा, “मैं अपने अंदाज में ही बोलूंगा। आपका चैनल है, आपको जैसा उचित लगे, एडिट कर लीजिएगा। लेकिन मैं आपके नियंत्रण में नहीं बंध सकता।”

बाद में पता चला कि ये महाशय अपने “दायित्ववान” कार्यकर्ताओं को स्टूडियो घूमाने के बहाने बुलाते हैं, ताकि उनकी हरियाणा वाली मूल कंपनी को मोबाइल टावर के ठेके आसानी से मिल सकें। इस जुगत में वे दिन-रात लगे हैं। विडंबना देखिए, हमारे कुछ लोग प्रेमवश वहां चले जाते हैं, और भाईसाहब मुख्यमंत्री के साथ अपनी फोटो डीपी पर लगाकर अपना कद बढ़ाने में मशगूल हैं।

कई लोग मुझसे फोन पर पूछते हैं, “भाई साहब आपका स्टूडियो कैसा है? एक बार देख लें?” मैं कहता हूं, “बस एक लैपटॉप, छोटा-सा माइक और मोबाइल से काम चल जाता है।” यह सुनकर वे आते नहीं। लेकिन बड़े-बड़े माइक वाले इन तथाकथित पॉडकास्ट स्टूडियोज में हंसते-हंसाते रिकॉर्डिंग के लिए पहुंचना उन्हें आनंददायक लगता है।

खैर, मेरी बेबाक प्रतिक्रिया शायद उन्हें पची नहीं। नतीजा? न तो कार्यक्रम के टाइटल में, न थंबनेल में, न ही डिस्क्रिप्शन में मेरा नाम या परिचय शामिल किया गया। चूरमा खिलाने की बातें हो रही थीं, मगर अंत में एक चाय के साथ ही घर वापसी हो गई। 

अब तो कुदरत स्टूडियो और कुदरत न्यूज के नाम से जहां भी बात होगी, साफ-साफ उनका नाम बताकर चलूंगा।

लौटे पुस्तक की ओर – परंपरा और विचारों की ओर वापसी

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चंदन झा
बेतिया (बिहार) : मोबाइल की चमकती स्क्रीन ने हमारी आंखों को बांध लिया है, लेकिन मन को खोखला कर दिया है। अंगूठे चलाकर हम अनगिनत सूचनाएं खींच लाते हैं, पर मन में स्थायी ज्ञान नहीं भर पाते। वहीं, एक पुरानी किताब का पन्ना खोलते ही शब्दों की खुशबू और विचारों की गहराई मन को छू लेती है। दादी-नानी की कहानियां सिर्फ सुनाने का आनंद नहीं देती थीं, बल्कि संस्कार, इतिहास और परंपरा की जड़ें मजबूत करती थीं।

किताबें हमें धैर्य, एकाग्रता और गहन सोच सिखाती हैं। मोबाइल हमें क्षणिक मनोरंजन देता है, लेकिन किताब जीवन का दीर्घकालिक मार्गदर्शन करती है। पुस्तक पढ़ना मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करता है, शब्द भंडार बढ़ाता है और कल्पना को पंख देता है।

आरोही कला संस्कृति वेलफेयर ट्रस्ट की मुहिम “लौटे पुस्तक की ओर” इसी खोई आदत को फिर से जगाने का प्रयास है – ताकि हम फिर से अपने बच्चों को कहानियों में जीवन के सबक दे सकें, परंपरा को बचा सकें और विचारों की गहराई से जुड़ सकें। मोबाइल सूचना का स्रोत हो सकता है, लेकिन किताबें ही ज्ञान, संस्कार और रचनात्मकता का सच्चा घर हैं। आइए, पन्नों की ओर लौटें।

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