माता-पिता के हृदय की पुकार: बच्चों की परवरिश और उनके जीवन के निर्णय

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माता-पिता का जीवन बच्चों के इर्द-गिर्द घूमता है। वह पल, जब एक बच्चा इस दुनिया में पहली सांस लेता है, माता-पिता के लिए न केवल खुशी का क्षण होता है, बल्कि एक अनकहा वादा भी, जिसमें वे अपने बच्चे को हर सुख, हर सुविधा देने का संकल्प लेते हैं। भारत जैसे देश में, जहां परिवार और रिश्तों की नींव पर समाज टिका है, माता-पिता अपने बच्चों को न केवल पालते हैं, बल्कि उनके लिए अपने सपनों को, अपनी इच्छाओं को, और कई बार अपनी खुशियों को भी ताक पर रख देते हैं। लेकिन जब यही बच्चे, जिन्हें मां-बाप ने अपने कलेजे से लगाकर पाला, एक दिन कहते हैं, “मैं बालिग हो गया/गई हूं, अब मुझे अपने जीवन का फैसला खुद करने का अधिकार है,” तो उस माता-पिता के दिल पर क्या बीतती है? यह प्रश्न आज के समाज में गहरी चिंता का विषय बन चुका है।

माता-पिता का बलिदान और प्रेम

भारतीय परिवारों में माता-पिता का प्रेम एक अनमोल रिश्ता है। एक मां जो रात-रात भर जागकर अपने बच्चे की छोटी-सी बेचैनी को दूर करती है, एक पिता जो अपनी थकान और आर्थिक तंगी को छिपाकर बच्चे की हर छोटी-बड़ी इच्छा पूरी करता है, वे केवल इसलिए ऐसा करते हैं ताकि उनके बच्चे को जीवन में कोई कमी न आए। वे अपने बच्चों को वह सब कुछ देना चाहते हैं, जो शायद उन्हें खुद नहीं मिला। स्कूल की फीस, अच्छी शिक्षा, बेहतर भविष्य के लिए विदेश भेजना, या फिर छोटी-छोटी खुशियां—हर चीज में माता-पिता अपनी पूरी जिंदगी झोंक देते हैं।

जब एक बच्चा बीमार पड़ता है, तो मां-बाप उस दर्द को अपने ऊपर ले लेते हैं। जब बच्चा स्कूल में अच्छा प्रदर्शन नहीं करता, तो माता-पिता खुद को दोष देते हैं। हर कदम पर, वे अपने बच्चों के लिए ढाल बनकर खड़े रहते हैं। लेकिन जब यही बच्चे, जिनके लिए माता-पिता ने अपनी जिंदगी का हर पल समर्पित किया, एक दिन कहते हैं, “मुझे अपने जीवनसाथी का फैसला खुद करना है,” तो माता-पिता का दिल टूट जाता है। यह टूटन इसलिए नहीं कि बच्चा प्रेम में है या उसने अपने लिए कोई साथी चुना है, बल्कि इसलिए कि उस फैसले में माता-पिता की राय, उनकी भावनाओं, और उनके अनुभव को कोई महत्व नहीं दिया गया।

आधुनिकता और बदलते मूल्य

आज का दौर आधुनिकता का दौर है। वैश्वीकरण, तकनीक, और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव ने भारतीय समाज के पारंपरिक मूल्यों को चुनौती दी है। बच्चे अब स्वतंत्रता की बात करते हैं, अपने अधिकारों की बात करते हैं। यह स्वतंत्रता गलत नहीं है, लेकिन जब यह स्वतंत्रता माता-पिता के प्रेम और उनके बलिदानों को दरकिनार कर देती है, तो यह एक गहरी चोट बन जाती है।

आजकल, बच्चे 18 साल की उम्र पार करते ही यह मान लेते हैं कि अब वे अपने जीवन के हर फैसले के लिए स्वतंत्र हैं। कानून भी इसकी इजाजत देता है। लेकिन क्या कानून भावनाओं को समझ सकता है? क्या कानून उस मां के आंसुओं को देख सकता है, जो रात-रात भर अपने बच्चे के लिए प्रार्थना करती है? क्या कानून उस पिता के दर्द को महसूस कर सकता है, जो अपने बच्चे के भविष्य के लिए दिन-रात मेहनत करता है, लेकिन एक दिन उसे सुनने को मिलता है कि उसकी राय अब मायने नहीं रखती?

प्रेम और परिवार का संतुलन

यह लेख प्रेम के खिलाफ नहीं है। प्रेम एक पवित्र भावना है, जो जीवन को सुंदर बनाती है। लेकिन सच्चा प्रेम वही है, जो परिवार के मूल्यों और माता-पिता की भावनाओं का सम्मान करता है। अगर कोई युवा अपने जीवनसाथी के लिए प्रेम में है, तो उसे अपने परिवार के साथ खुलकर बात करनी चाहिए। उसे अपने माता-पिता को समझाना चाहिए कि उसका प्रेम सच्चा है और वह अपने परिवार को छोड़ना नहीं चाहता। सत्याग्रह का रास्ता अपनाया जा सकता है—यानी, बिना माता-पिता की सहमति के शादी नहीं होगी, लेकिन यह भी स्पष्ट करना कि वह अपने चुने हुए साथी के अलावा किसी और से शादी नहीं करेगा।

ऐसा सत्याग्रह न केवल प्रेम को और गहरा करता है, बल्कि माता-पिता को भी यह विश्वास दिलाता है कि उनका बच्चा उनकी भावनाओं का सम्मान करता है। प्रेम की परीक्षा तब और निखरती है, जब वह परिवार की सहमति के साथ आगे बढ़ता है। माता-पिता, जो अपने बच्चों के लिए इतना कुछ करते हैं, क्या उनके पास यह अधिकार नहीं कि वे अपने बच्चे के जीवन के सबसे बड़े फैसले में शामिल हों?

ओल्ड एज होम और टूटते रिश्ते

आज के समय में ओल्ड एज होम की बढ़ती संख्या एक कड़वी सच्चाई है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां परिवार और रिश्तों को सबसे अधिक महत्व दिया जाता था, वहां भी अब ओल्ड एज होम देखकर आश्चर्य नहीं होता। यह एक संकेत है कि समाज में कुछ गलत हो रहा है। बच्चे, जो अपने माता-पिता की देखभाल को अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते, क्या वे यह भूल जाते हैं कि यही माता-पिता थे, जिन्होंने उन्हें चलना सिखाया, बोलना सिखाया, और जीवन की हर मुश्किल में उनका साथ दिया?

यह दुखद है कि आधुनिकता के नाम पर या व्यस्त जीवनशैली के कारण, बच्चों की परवरिश में कमी आ रही है। माता-पिता या तो अपने बच्चों को विदेश भेज देते हैं, या फिर अच्छी शिक्षा के नाम पर उन्हें अपने से दूर कर देते हैं। इससे बच्चे और माता-पिता के बीच भावनात्मक दूरी बढ़ती है। जब बच्चे बड़े होकर अपने फैसले लेने लगते हैं, तो वे यह भूल जाते हैं कि उनके माता-पिता ने उनके लिए कितना कुछ किया।

माता-पिता की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

माता-पिता की बच्चों के जीवन में भूमिका केवल उन्हें पालने और बड़ा करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जिन्होंने अपने बच्चों के लिए अपनी जिंदगी का हर पल समर्पित किया, उनके अनुभव, उनकी राय, और उनकी भावनाओं का सम्मान होना चाहिए। शादी जैसे महत्वपूर्ण निर्णय में माता-पिता की सहमति जरूरी है, क्योंकि यह न केवल दो लोगों का मिलन है, बल्कि दो परिवारों का भी मिलन है।

माता-पिता का दुख तब और बढ़ जाता है, जब बच्चे उनकी बात को अनसुना कर देते हैं। वे यह नहीं समझते कि माता-पिता का विरोध इसलिए नहीं है कि वे बच्चों की खुशी नहीं चाहते, बल्कि इसलिए कि वे अपने अनुभव के आधार पर उनके लिए सबसे अच्छा चाहते हैं। माता-पिता का प्रेम स्वार्थी नहीं होता; यह एक ऐसा प्रेम है, जो केवल देना जानता है।

आज जरूरत है कि बच्चे और माता-पिता के बीच संवाद बढ़े। बच्चों को यह समझना होगा कि स्वतंत्रता का मतलब अपने माता-पिता को पीछे छोड़ देना नहीं है। प्रेम और परिवार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। माता-पिता को भी अपने बच्चों की भावनाओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए और उन्हें खुलकर अपनी बात रखने का मौका देना चाहिए।

सच्चा प्रेम वही है, जो परिवार की सहमति और आशीर्वाद के साथ फलता-फूलता है। माता-पिता, जिन्होंने अपने बच्चों को अपने खून-पसीने से पाला, उनके दिल की पुकार को अनसुना नहीं करना चाहिए। उनके जीवन के सबसे बड़े फैसले में उनकी भूमिका को सिरे से खारिज करना न केवल उनके प्रेम का अपमान है, बल्कि उस रिश्ते का भी अपमान है, जो भारतीय संस्कृति की नींव है। आइए, हम एक ऐसे समाज का निर्माण करें, जहां प्रेम और परिवार एक साथ चलें, और माता-पिता का सम्मान बच्चों के हर निर्णय में झलके।

अमेरिका और कांग्रेस की सांठ-गांठ: भारत पर चौतरफा हमला और तख्तापलट की साजिश

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दिल्ली। भारत आज एक अभूतपूर्व वैश्विक और आंतरिक चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत के खिलाफ आक्रामक नीतियां और टैरिफ युद्ध की धमकियां हैं, तो दूसरी तरफ देश के भीतर विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा चुनावी धांधली के आरोपों के जरिए अराजकता फैलाने की कोशिशें तेज हो रही हैं। यह स्थिति महज संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है, जिसका मकसद भारत की आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता को कमजोर करना और संभवतः तख्तापलट जैसी स्थिति पैदा करना है। हाल के घटनाक्रम, खासकर बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार के पतन से पहले की परिस्थितियों से इसकी समानता, इस खतरे को और गंभीर बनाती है। यह रिपोर्ट अमेरिका और कांग्रेस की भूमिका को बेनकाब करने का प्रयास करती है, जो भारत के खिलाफ एक साथ काम करते दिख रहे हैं।

ट्रंप का टैरिफ युद्ध: रूसी तेल या कुछ और?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में भारत पर 25% टैरिफ और अतिरिक्त जुर्माने की घोषणा की, जिसे बाद में बढ़ाकर 50% कर दिया गया। यह कदम कथित तौर पर भारत द्वारा रूस से तेल खरीदने के जवाब में उठाया गया। ट्रंप का तर्क है कि भारत का रूस से तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद यूक्रेन युद्ध के बीच वैश्विक हितों के खिलाफ है। लेकिन क्या यह वास्तव में रूसी तेल का मामला है, या इसके पीछे कोई बड़ा मकसद छिपा है?

ट्रंप का एक बयान इस सवाल का जवाब देता है। जब एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि यदि रूस यूक्रेन के साथ युद्धविराम पर सहमत हो जाता है, तो क्या वे भारत पर टैरिफ हटाएंगे, तो ट्रंप का जवाब था, “अभी तो हम टैरिफ और बढ़ाने जा रहे हैं।” यह बयान साफ करता है कि टैरिफ युद्ध का असली मकसद रूसी तेल नहीं, बल्कि भारत को आर्थिक दबाव में लाकर उसकी नीतियों को प्रभावित करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप भारत के कृषि, डेयरी, और मत्स्य क्षेत्रों को अमेरिकी कंपनियों के लिए खोलने का दबाव बना रहे हैं। यदि भारत इन क्षेत्रों में अमेरिकी उत्पादों के लिए बाजार खोल देता है, तो यह भारतीय किसानों, छोटे व्यवसायियों, और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी हो सकता है।

भारत ने इस दबाव को सिरे से खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने आत्मविश्वास के साथ कहा कि भारत अमेरिकी दबाव में नहीं आएगा और न ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को छोड़ेगा। भारत की यह सख्ती ट्रंप की हताशा का कारण बन रही है, जैसा कि उनके बयानों में दिखता है। उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था को “डेड” तक कह डाला, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के आंकड़े बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था 2025-26 में 6.4% की दर से बढ़ेगी, जो अमेरिका की 1.9-2% की वृद्धि दर से कहीं अधिक है। यह दिखाता है कि ट्रंप का बयान तथ्यों से परे, भारत को नीचा दिखाने की कोशिश है।

कांग्रेस की अराजकता: आंतरिक मोर्चे पर हमला

जबकि ट्रंप बाहरी दबाव बना रहे हैं, कांग्रेस पार्टी देश के भीतर अराजकता फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। विपक्षी नेता राहुल गांधी और अन्य कांग्रेस नेताओं ने हाल ही में 2024 के लोकसभा चुनावों में धांधली के गंभीर आरोप लगाए हैं। ये आरोप न केवल भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश हैं, बल्कि इनका समय भी संदिग्ध है। बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार के खिलाफ भी तख्तापलट से पहले इसी तरह के आरोपों को हवा दी गई थी, जिसके बाद वहां हिंसा और अस्थिरता फैल गई।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने ट्रंप के टैरिफ को लेकर मोदी सरकार की विदेश नीति को “लड़खड़ा गई” बताते हुए तीखा हमला बोला। जयराम रमेश ने “हाउडी मोदी” और “नमस्ते ट्रंप” जैसे आयोजनों का जिक्र करते हुए दावा किया कि मोदी की ट्रंप से नजदीकी बेकार साबित हुई। सुप्रिया श्रीनेत ने टैरिफ को अर्थव्यवस्था के लिए “विनाशकारी” बताया, जबकि राहुल गांधी ने ट्रंप के “डेड इकोनॉमी” बयान का समर्थन करते हुए कहा कि वे इस बात से “प्रसन्न” हैं। यह रुख न केवल भारत की आर्थिक प्रगति को कमतर आंकने की कोशिश है, बल्कि ट्रंप की आलोचना का इस्तेमाल सरकार को अस्थिर करने के लिए भी किया जा रहा है।

कांग्रेस की यह रणनीति नई नहीं है। 2019 और 2024 के चुनावों में भी उसने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। लेकिन इस बार, ट्रंप के बयानों और टैरिफ की आड़ में ये आरोप और तीखे हो गए हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह एक सुनियोजित रणनीति हो सकती है, जिसमें बाहरी ताकतों (जैसे अमेरिका) और आंतरिक विपक्षी दलों का गठजोड़ भारत में अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहा है।

बांग्लादेश का सबक: इतिहास दोहराने की कोशिश?

दिल्ली। बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार के पतन से पहले वहां भी इसी तरह का माहौल बनाया गया था। चुनावी धांधली के आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया, जिसके बाद हिंसक प्रदर्शन हुए और अंततः उनकी सरकार गिर गई। भारत में भी अब यही पैटर्न दिख रहा है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल चुनावी धांधली के आरोपों को हवा दे रहे हैं, और इनका समर्थन कुछ अंतरराष्ट्रीय ताकतों से मिलता दिख रहा है। ट्रंप के सहयोगी स्टीफन मिलर ने भारत पर “विशाल टैरिफ, रूसी तेल खरीद, और अमेरिकी वीजा सिस्टम के दुरुपयोग” का आरोप लगाया, जो भारत के खिलाफ एक व्यापक अभियान का हिस्सा लगता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में कहा, “मुझे पता है कि मुझे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।” यह बयान सामान्य नहीं है। यह संकेत देता है कि मोदी सरकार को इस साजिश की गहराई का अंदाजा है। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता की नीति, खासकर रूस से तेल खरीद और BRICS जैसे संगठनों में सक्रियता, वैश्विक शक्तियों के लिए असहज है। अमेरिका, जो अपनी मुद्रा (डॉलर) और व्यापारिक प्रभुत्व को बनाए रखना चाहता है, भारत जैसे उभरते देशों को दबाव में लाने की कोशिश कर रहा है।

भारत की प्रतिक्रिया: सख्ती और आत्मविश्वास

भारत ने ट्रंप की धमकियों का जवाब आत्मविश्वास और सख्ती से दिया है। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि भारत किसी भी दबाव में नहीं आएगा और अपनी नीतियों को अपने हितों के आधार पर तय करेगा। इसके अलावा, भारत ने 3.6 अरब डॉलर की बोइंग जेट डील पर ब्रेक लगाकर और रूसी Su-57 जेट्स की ओर रुख करके अमेरिका को स्पष्ट संदेश दिया है। यह दिखाता है कि भारत न केवल आर्थिक बल्कि रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है।

कांग्रेस की अंदरूनी अराजकता को लेकर भी सरकार सतर्क है। विपक्ष के आरोपों का जवाब संसद में दिया जा रहा है, और जनता को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि ये आरोप भारत की प्रगति को रोकने की साजिश का हिस्सा हैं।

भारत पर खतरा, लेकिन दृढ़ता बरकरार

ट्रंप का टैरिफ युद्ध और कांग्रेस की अराजकता एक ही सिक्के के दो पहलू प्रतीत होते हैं। एक तरफ अमेरिका भारत को आर्थिक और कूटनीतिक दबाव में लाने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस आंतरिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास कर रही है। लेकिन भारत की स्थिति मजबूत है। उसकी अर्थव्यवस्था, कूटनीति, और जनता का समर्थन उसे इन चुनौतियों का सामना करने की ताकत देता है। बांग्लादेश की तरह भारत में तख्तापलट की साजिश को कामयाब होने से रोकने के लिए सरकार और जनता को एकजुट रहना होगा। यह समय है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता को और मजबूत करे, ताकि बाहरी और आंतरिक शक्तियों की साजिशों को नाकाम किया जा सके।

वरिष्ठ पत्रकार रवि त्रिपाठी ने छोड़ी पत्रकारिता, बिहार में बीजेपी के साथ शुरू किया राजनीतिक सफर

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पटना: ज़ी न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार रवि त्रिपाठी ने पत्रकारिता को अलविदा कहकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थाम लिया है। यह कदम बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उठाया गया है, जिससे यह संकेत मिलता है कि त्रिपाठी आगामी चुनाव में बीजेपी के टिकट पर मैदान में उतर सकते हैं। त्रिपाठी ने केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात के बाद औपचारिक रूप से बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की।

रवि त्रिपाठी लंबे समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी बेबाक और विश्लेषणात्मक शैली के लिए जाने जाते हैं। उनकी गहरी समझ और बिहार के सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर पकड़ ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाया है। उनके इस फैसले को बिहार की राजनीति में एक सकारात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। यह माना जा रहा है कि त्रिपाठी जैसे शिक्षित और जागरूक व्यक्तित्व बिहार की राजनीति को नई दिशा दे सकते हैं।

बिहार में राजनीति अक्सर जातिगत समीकरणों और क्षेत्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में, त्रिपाठी जैसे लोग, जो विकास और सुशासन के मुद्दों को प्राथमिकता दे सकते हैं, बिहार की राजनीतिक दशा सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उनकी पत्रकारिता के अनुभव से नीति-निर्माण में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

बीजेपी नेताओं ने त्रिपाठी के इस कदम का स्वागत किया है और इसे पार्टी की विकास-उन्मुख सोच को मजबूती देने वाला बताया है। बिहार की जनता को अब यह देखना है कि त्रिपाठी अपने अनुभव और दृष्टिकोण का उपयोग कर राजनीति में कितना बदलाव ला पाते हैं। उनके इस कदम से बिहार की राजनीति में एक नई बहस शुरू हो गई है कि क्या शिक्षित और जागरूक लोग राजनीति को बेहतर बना सकते हैं।

वामपंथ की अतिशयोक्ति और कांग्रेस की सोशल मीडिया रणनीति

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पंकज कुमार झा

कांग्रेस के सोशल मीडिया प्रबंधकों की रणनीति अब हास्यास्पद स्तर तक पहुंच चुकी है। इनके कार्यों पर केवल दया ही की जा सकती है। जब भी मैं इनके खिलाफ कुछ असुविधाजनक लिखता हूं, ये मेरे वर्षों पुराने पोस्ट का स्क्रीनशॉट संदर्भ बदलकर या छिपाकर साझा कर देते हैं।

यह पोस्ट उस समय का है जब मैंने अभिनेत्री कंगना रनौत के समर्थन में लिखा था। उस समय कंगना न तो भाजपा में थीं, न सांसद थीं, और न ही उनकी वर्तमान जिम्मेदारियां थीं। फिर भी, मुझे कभी सफाई देने की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि ऐसी गंदगी का जवाब सफाई से नहीं दिया जा सकता। फिर भी, इसे स्पष्ट करना जरूरी है।

दरअसल, कंगना के राष्ट्रवादी विचारों से परेशान कांग्रेस समर्थकों ने उन्हें लगातार ट्रोल करना शुरू किया था। उनकी एक बिकिनी वाली तस्वीर को कांग्रेस के बड़े हैंडल्स और समर्थकों द्वारा बार-बार साझा कर उनका अपमान किया जा रहा था। तब मैंने उस तस्वीर को री-पोस्ट करते हुए लिखा था कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है। इसे तोड़-मरोड़कर पेश करना बंद किया जाए।

कांग्रेस की सोशल मीडिया रणनीति की निम्नता यहीं नहीं रुकी। जब कंगना को भाजपा से टिकट मिला, तो कांग्रेस की एक सोशल मीडिया नेत्री ने अश्लील भाषा में उनका ‘मंडी में भाव’ पूछा था, जिसे बाद में भारी आलोचना के बाद हटाना पड़ा। मेरे उस समर्थन वाले पोस्ट को आज भी ये मेरे खिलाफ हथियार बनाने की नाकाम कोशिश करते हैं।

इसी तरह, एक अन्य घटना में कांग्रेस ने एक भारतीय लड़की, जिसे पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में पकड़ा गया था, को भाजपा की टोपी पहनाकर उसे भाजपा सदस्य के रूप में पेश करने की कोशिश की। मैंने तब कांग्रेस नेताओं से अनुरोध किया था कि ऐसी फर्जी तस्वीर हटाई जाए। कुछ नेताओं ने मेरी बात मानी और वह पोस्ट हटा लिया। लेकिन मजेदार बात यह है कि उसी फर्जी तस्वीर के खिलाफ लिखे मेरे पोस्ट को कांग्रेस समर्थक बार-बार फर्जी तस्वीर के रूप में रिपोर्ट करते हैं। मेटा भी इसे मानकर मुझे ‘दंडित’ करता है-कभी फीड की पहुंच कम करके, कभी अन्य प्रतिबंध लगाकर।

मैं 2014 से कहता आ रहा हूं-कांग्रेस से जीतने का जज्बा तो लाया जा सकता है, लेकिन यह वामपंथी निम्नता कहां से लाई जाए? अच्छी बात यह है कि अब भाजपा भी इन्हें इनकी ही भाषा में जवाब देना शुरू कर चुकी है।

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