वंशवाद की ढलती शाम: बिहार की शिकस्त के बाद कांग्रेस का धुंधला होता भविष्य

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दिल्ली । गांधी परिवार की रणनीति हमेशा यह रही है कि पार्टी का मुखिया कोई ऐसा व्यक्ति हो जो “काबू में” रहे। वर्तमान अध्यक्ष खड़गे इस सोच के लिए बिल्कुल मुफ़ीद साबित हुए। पार्टी के हर स्वतंत्र या प्रभावशाली नेता को धीरे-धीरे किनारे लगाया गया। ममता बनर्जी बाहर हो गईं, शरद पवार को ठंडे बस्ते में भेज दिया गया, जगन रेड्डी दूर चले गए, हेमंत विश्व शर्मा जैसे नेता अपमानित महसूस कर निकल गए। सिंधिया, देवरा, थरूर, पायलट एक लंबी फेहरिस्त है उन लोगों की जिन्होंने या तो हार मान ली या दरकिनार कर दिए गए। सवाल यह नहीं कि गाड़ी का पहिया पंचर है, बल्कि यह है कि गाड़ीवान को मंज़िल का पता ही नहीं। राहुल गांधी आज पीटर पैन की तरह दिखते हैं, जिन्हें बड़ा होना ही मंज़ूर नहीं।
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2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का धुआँ अभी छँटा भी नहीं कि तस्वीर एकदम साफ़ झलकने लगी।कांग्रेस की अगुवाई वाले महागठबंधन का पतन ऐतिहासिक रहा। 243 सीटों में से कांग्रेस केवल एक पर सिमट गई। यह हार सिर्फ़ एक चुनावी नतीजा नहीं, राहुल गांधी के नेतृत्व पर गहरा अविश्वास भी है। ठीक वैसे ही जैसे इस साल हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में देखा गया।
आज कांग्रेस घटकर केवल तीन राज्यों में रह गई है, और इंडिया गठबंधन में भी साथी दल उससे दूरी बना रहे हैं। बिहार का नतीजा अब एक आईना है जिसमें कांग्रेस न दिशा लिए दिखाई देती है, न उद्देश्य।

नेतृत्व द्वारा एस्केपिज्म का खेल
इस राजनीतिक मलबे के बीच होंठों पर वही पुराने बहाने हैं। राहुल गांधी ने नतीजों को “चौंकाने वाला” और “अनफेयर” करार देकर ज़मीनी हक़ीक़त से अपने फासले को ही उजागर किया। मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ मीटिंग में फिर “वोट चोरी” का रोना। वही पुरानी स्क्रिप्ट जो अब असरहीन हो चुकी है।
यह नेतृत्व नहीं, बचने की कोशिश है। राहुल का दृष्टिकोण अब भी वहीं अटका है कि विपक्ष का मतलब हर सरकारी निर्णय का विरोध करना है, चाहे अर्थव्यवस्था का मामला हो, विदेश नीति हो या सुधारों का। जबकि असली विपक्ष वह होता है जो वैकल्पिक दृष्टि दे, तर्कपूर्ण आलोचना करे और अपनी नीति गढ़े।
एक रिएक्शन मशीन बन चुकी पार्टी
राहुल के युग में कांग्रेस एक “रिएक्शन पार्टी” बन गई। न विज़न, न दिशा। हर बयान में ग़ुस्सा है, हर बयान में असुरक्षा। चुनाव आयोग को “क़ैदी”, लोकतंत्र को “घेराबंदी में” बताने वाली भाषा जनता के भरोसे को ही कमजोर करती है। यह वक्त है कि पार्टी अपनी राजनीति में गरिमा लाए। टकराव नहीं, संवाद तलाशे; दीवारें नहीं, पुल बनाए।

नई राजनीति की ज़रूरत
बिहार की शिकस्त एक संकेत है। कांग्रेस को बुनियादी पुनर्गठन की जरूरत है। नेतृत्व, विचार और चेहरों, तीनों में नवाचार जरूरी है। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की पुरानी सियासत अब असरदार नहीं रही, विशेषकर बिहार जैसे सूबे में जहाँ जातीय समीकरण ही राजनीति की रीढ़ हैं।
आरजेडी पर निर्भरता और यादव, मुस्लिम वोट बैंक की उम्मीद कांग्रेस को बार-बार कमजोर साबित करती रही है। जबकि एनडीए ने हिंदू वोटों के एकत्रीकरण, (कंसोलिडेशन) से अपनी स्थिति मज़बूत की है। कांग्रेस को अब धर्मनिरपेक्षता के अपने पुराने ढाँचे से बाहर निकलकर, एक समावेशी सांस्कृतिक बहुलता का नया नैरेटिव पेश करना होगा ।

कांग्रेस के पास अब खोने को कुछ नहीं बचा, न प्रतिष्ठा, न जनविश्वास। इंडिया गठबंधन के सहयोगी भी उसकी हिंदी पट्टी की कमज़ोरी से बेचैन हैं। वक्त आ गया है पार्टी नई पीढ़ी को निर्णायक जिम्मेदारी दे, बूढ़ी हो चुकी दरबारी राजनीति को किनारे रखे, और युवाओं की आकांक्षाओं, रोजगार, शिक्षा सुधार, डिजिटल समानता, पर केंद्रित नई राजनीति शुरू करे।
राहुल गांधी को अब यह स्वीकार करना होगा कि नेतृत्व सिर्फ उपस्थिति का नाम नहीं होता। 2009 की बुलंदी से अब तक के सफर में कांग्रेस का वोट शेयर बीस प्रतिशत से नीचे गिर चुका है, यह सिर्फ़ आंकड़ा नहीं, एक संकेत है कि जनता अब बदलाव चाहती है।
अगर राहुल पीछे हटते हैं, तो पार्टी के पास रीसेट का मौका है, ठीक वैसे जैसे भाजपा ने आडवाणी युग के बाद अपने को नया रूप दिया था। लेकिन अगर नहीं हटते, तो यह डूबती नाव और नीचे जाएगी। यूपी में समाजवादी पार्टी पहले ही गठबंधन पर पुनर्विचार कर रही है, और बिहार की लहर का असर वहाँ भी महसूस होने लगा है।
बिहार का नतीजा सिर्फ एक हार नहीं, एक चेतावनी है। या तो कांग्रेस अब आत्ममंथन कर जाग जाए, या इतिहास की किताब में एक हाशिया बनकर रह जाए। समाप्त।
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पीटर पेन 1902 में लिखे एक उपन्यास का नायक है।
राहुल गांधी की छवि की तुलना अकसर पीटर पैन से की जाती है, वह काल्पनिक लड़का जो बड़ा होने से इंकार करता है। जैसे पीटर पैन कभी-कभी ज़िम्मेदारियों से बचते हुए रोमांच और आदर्शवाद की दुनिया में खोया रहता है, वैसे ही आलोचक कहते हैं कि राहुल गांधी भी राजनीति की कठोर यथार्थवादी दुनिया में पूरी तरह “परिपक्व नेता” की भूमिका अपनाने से हिचकते नज़र आते हैं। पीटर पैन की बाल सुलभ ऊर्जा उसे Neverland का नायक बनाती है।

हास्य ही हमारा सुरक्षा कवच है!

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शिमला । भारत में लोकतंत्र की मजबूती, और स्थायित्व की प्रमुख वजह हमारा हंसमुख स्वभाव है। हम न कानून को सीरियसली लेते हैं, न ही अपने देवताओं को, नेताओं को तो सर्कस का जोकर मानते हैं। बाबाओं, गुरुओं, प्रवचन कर्ताओं ने हमारी जिंदगी को हास्यात्मक कवच से सुदृढ़ कर दिया है जिसकी वजह से इमरजेंसी की तानाशाही फेल हो गई, कोविड महामारी कन्फ्यूज्ड हो गई , ट्रंप के टैरिफ दिशा भ्रमित हो गए। न सरकार को पता है, न आंदोलन जीवियों को कैसे अपना भारत उपलब्धियों की बुलंदी छू रहा है। सबसे बड़ा मजाक बिहार चुनाव परिणाम आपके सामने हैं। जीतने वाले खिलाड़ी भी de code नहीं कर पा रहे हैं प्रशांत किशोर ने ये कौन सा एल्गोरिथम लिखा!

भारत में हंसी कोई साधारण चीज़ नहीं—यह राष्ट्रीय स्तर का स्टेबिलाइज़र है, ट्रिपल-डोज़ का वैक्सीन है जो किफायती तनाव-नाशक है, और लोकतंत्र का असली ‘Z+ सुरक्षा कवच’ है। 1.4 अरब लोगों वाला देश, जिसमें लोग गोलगप्पे की तीखेपन पर भी भीषण युद्ध छेड़ सकते हैं, वहाँ हर चुनाव, घोटाला और घमासान के बाद देश शांत कैसे रहता है?

सिंपल: क्योंकि यहां लोग नेता को लाठी से नहीं, LOL से मारते हैं। कभी पीलू मोदी, कभी राज नारायण, लालू यादव या राहुल भैया।
हम दुनिया का पहला देश हैं जिसने खोजा कि “Kill them with humour”। ये वास्तव में हथियारबंद टकराव से ज़्यादा असरदार है। यहाँ नेता का मज़ाक उड़ाओ, और पब्लिक का गुस्सा भाप बनकर उड़ जाता है।नेता मीम में बदल जाए, तो जनता पत्थर से नहीं, गुलगुली से लोट पोट हो जाती है।
जिस दिन राहुल गांधी पहली बार “पप्पू” हुए, कांग्रेस ने समझ लिया कि ट्रेन जलाने से अच्छा है टेम्पलेट जलाओ। और जनता को भी पता चल गया: “इतनी आसानी से गुस्सा निकल जाए? ये तो थेरेपी से भी सस्ता है!”

मोदी जी के 10-लाख वाले सूट ने अर्थव्यवस्था को भले न बढ़ाया हो,लेकिन मीम इंडस्ट्री का Sensex आसमान छू गया। उनके समर्थकों ने दंगे नहीं किए, बल्कि उन्हें भारतीय Met Gala का “Best Dressed Leader” अवार्ड दे दिया। दूर-दूर तक Photoshop फैक्ट्रियाँ चलने लगीं, देश में GDP से ज़्यादा GIF बनने लगे।

उधर मफलर धारी केजरीवाल की खांसी अब दिल्ली का बैकग्राउंड म्यूज़िक है। लोग कहते हैं: “सर, आपका खांसना भी जनता से कनेक्शन बढ़ाता है, WiFi से तेज़।”

यह है असली सर्जिकल नहीं सेटआयरिकल स्ट्राइक, गुस्से पर! हमारे कार्टूनिस्ट, मीम-मास्टर्स और स्टैंड-अप आर्टिस्ट असल में लोकतंत्र के ICU डॉक्टर हैं। गुस्सा बढ़े तो तुरंत पंचलाइन की IV drip लगा देते हैं। दिमाग गरम हो तो ठंडा कम्प्रेस मीम लगा देते हैं।

और अगर जनता उबल रही हो, तो एक तगड़ा व्यंग्य का इंजेक्शन सीधे नस में। UN के शांति सैनिकों को बुलाने की ज़रूरत नहीं, एक सही समय पर डाला गया वॉट्सऐप फॉरवर्ड दंगे रोक सकता है।

अगर देश का तापमान सच में कम करना है, तो AC से नही, ह्यूमर से होगा। स्कूलों में “Advanced Sarcasm 101”, कॉलेजों में “लोकतांत्रिक Mimicry Lab”, और सरकारी बजट में “National Meme Mission” जरूरी है।

सरकार को अपने सटायरिकल कलाकारों को रणनीतिक संपत्ति की तरह बचाना चाहिए, जैसे एटॉमिक वैज्ञानिक होते हैं, वैसे ही ये “बम के बिना बम” वाले कलाकार होते हैं।

और हाँ, “hurt sentiments” वाला कानून थोड़ा आराम दे, वरना देश का सबसे उपयोगी उद्योग: हँसी-व्यंग्य, बार-बार बंद हो जाएगा।
भारत का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक करिश्मा : हम दुनिया को ये साबित कर चुके हैं कि यहाँ आप एक नेता को दिन में सौ बार roast कर सकते हैं, और दूसरे दिन भी देश सलामत उठता है। क्योंकि हमारा नियम सरल है,

जोक मारो, रोस्ट करो, फ्राई मत करो।

मेम बनाओ, मोर्चा नहीं।

The Humour Times, व्यंग्यकार, कार्टूनिस्ट और मीम आर्टिस्ट, न सिर्फ़ मनोरंजन करते हैं, वे लोकतंत्र का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में रखते हैं। टकराहट होने वाली हो, तो ये हंसी का हैंडब्रेक खींच देते हैं। और इसलिए लिख लो, छाप लो, फ्रेम कर लो, पंचलाइन तलवार से तेज़ होती है,व्यंग्य लाठी से भारी होता है,और ह्यूमर बम से ज्यादा धमाकेदार।

पवित्र ब्रजभूमि की मौन कशिश: पर्यावरण विनाश से मिटती ‘कृष्ण लीला’ की धरती

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बृज खंडेलवाल

मथुरा । ब्रजभूमि — श्रीकृष्ण की वह पावन धरती जो मथुरा के आस-पास लगभग 150 किलोमीटर तक फैली है — केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक गहरी रूहानी और पौराणिक विरासत है। यह वही इलाका है जहाँ वृंदावन, गोवर्धन और गोकुल की गलियाँ आज भी “राधे-राधे” और “जय श्रीकृष्ण” की पुकार से गूंजती हैं। लेकिन अफसोस! आज यही धरती एक अस्तित्व संकट से जूझ रही है — बेहिसाब विकास परियोजनाओं, अवैध निर्माणों और पर्यावरणीय विनाश की वजह से। भीड़ तो हजार गुणा बढ़ी है पर भक्ति भावना की जगह व्यावसायिक लाभ के लिए टूरिज्म हावी हो रहा है।

धर्म और आस्था के नाम पर चल रही ये “तरक्की” दरअसल ब्रज की आत्मा को खोखला कर रही है — जहाँ कभी हरे-भरे वन थे, वहाँ अब कंक्रीट के जंगल खड़े हैं; जहाँ कभी पवित्र कुंड और नदियाँ बहती थीं, वहाँ अब गंदगी और प्लास्टिक का सैलाब है। श्रद्धालु जब इस पावन भूमि पर कूड़े और भीख माँगते बच्चों के बीच थकान से गुजरते हैं, तो सवाल उठता है — क्या ब्रजभूमि अब सिर्फ एक “पिकनिक स्पॉट” बनकर रह जाएगी?

ब्रज के पर्यावरण संकट की जड़ में उसकी प्राकृतिक पहचान का विनाश है। गोवर्धन पर्वत, जिसे श्रीकृष्ण ने इंद्र के कोप से ग्वालों की रक्षा के लिए उठाया था, अब चारों ओर से कालोनियों और ऊँची इमारतों से घिर गया है। जहाँ कभी हरियाली और गायों के झुंड दिखते थे, वहाँ अब सीमेंट और धूल है। पवित्र कुंड, मेड़ और झाड़ियाँ मिट रही हैं, जिससे भूमि क्षरण, जैव विविधता का ह्रास और जलसंकट बढ़ रहा है।

यमुना, जिसमें कृष्ण ने कालिया नाग का विनाश किया था, अब जहरीले कचरे और नालों की गंदगी से बेहाल है। यह न केवल लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि इस पवित्र नदी की रूहानी पाकीज़गी को भी दागदार कर रहा है। मथुरा के पर्यावरण कार्यकर्ता कहते हैं — “कृष्ण की लीला करुणा और समानता की प्रतीक थी, लेकिन आज का ब्रज लोभ और असंवेदनशीलता का शिकार है।”

तेज़ी से बढ़ते निर्माण और अव्यवस्थित पर्यटन ने हालात को और बदतर कर दिया है। ब्रज सर्किट — जो उत्तर प्रदेश की सबसे लोकप्रिय धार्मिक यात्रा मानी जाती है — असली विकास के बजाय अवैध कब्ज़ों और अंधाधुंध निर्माण का गढ़ बन गई है। वृंदावन और गोवर्धन में महंगे फ्लैट, आलीशान आश्रम, और फिल्मी हस्तियों के रिज़ॉर्ट बन रहे हैं। गोवर्धन की 21 किलोमीटर लंबी परिक्रमा मार्ग को सीमेंट से पाटा जा रहा है और जगह-जगह दुकानों से घेर दिया गया है। वृंदावन में तो अब मथुरा से ज़्यादा ऊँची इमारतें हैं, जहाँ हरियाली का नामोनिशान मिट रहा है।

स्थानीय ब्रजवासी कहते हैं, “अब यह भूमि हमारे हाथ से निकल रही है। परिक्रमा मार्गों को भी अब निजी होटलों और आलीशान भवनों में बदल दिया गया है।”

यह सब ब्रज की आत्मा के खिलाफ है — जो सादगी, भक्ति और प्रकृति की पवित्रता पर आधारित है। प्रस्तावित गगनचुंबी मंदिर को लेकर भी स्थानीय पर्यावरणविदों ने विरोध जताया है कि इससे जल और बिजली संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा और ब्रज की ‘देहाती-रूहानी’ छवि नष्ट होगी। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) में न दृष्टि है, न योजना। आधुनिकता की अंधी दौड़ में पुरानी वास्तुकला और सांस्कृतिक माहौल सब गड्डमड्ड हो गया है। ब्रज संस्कृति की आत्मा लापता है।

ट्रैफिक जाम, गंदे नाले, अतिक्रमण, टूटी हवेलियाँ और उजड़े घाट — सब इस विनाश की गवाही दे रहे हैं। मनोरंजन पार्कों, लग्ज़री रिज़ॉर्ट्स और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स ने आध्यात्मिकता की जगह उथले मनोरंजन को दे दी है। यह पर्यटकनुमा विकास ब्रज की पवित्रता और पुरातात्विक धरोहर दोनों को मिटा देगा।
विदेशी अनुयायियों की बढ़ती भीड़ भी इस पवित्र भूमि पर उपभोक्तावाद का दबाव बढ़ा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य और धरोहर संरक्षणवादी डॉ. मुकुल पंड्या का कहना है कि अब वक़्त है कि “मुनाफे के लालच” के बजाय “संतुलित और सतत विकास” को अपनाया जाए। हेरिटेज ग्रुप के गोपाल सिंह कहते हैं, “ब्रज की पाकीज़गी को बचाना ही असली भक्ति है, न कि इसे मनोरंजन का बाज़ार बनाना।”

अब वक्त है एक समन्वित और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाने का — जिसमें वृक्षारोपण, यमुना की सफाई, ठोस कचरा प्रबंधन, और स्थानीय समुदाय की भागीदारी हो। शाश्वत पर्यटन, पर्यावरण शिक्षा, सांस्कृतिक जागरूकता और निगरानी के ठोस कदम उठाने होंगे।

अंततः, ब्रजभूमि का विनाश सिर्फ पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि उसकी आत्मा पर वार है। श्रीकृष्ण की वह भूमि जहाँ प्रकृति और प्रेम एक थे, अब लालच और लापरवाही की भेंट चढ़ रही है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह धरती ‘भक्ति की भूमि’ से ‘व्यापार की भूमि’ बन जाएगी।
ब्रज को बचाना केवल पारिस्थितिकी नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण की अमर कथा की अस्मिता को बचाना है — ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस पवित्र भूमि की सच्ची खुशबू महसूस कर सकें

सच्चिदा बाबू नहीं रहे

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अवधेश कुमार

पटना। अभी-अभी श्री सच्चिदानंद सिन्हा या सच्चिदा बाबू के निधन की सूचना मिली। पटना से पत्रकार मुकेश बालयोगी जी ने बताया कि कुछ ही देर पहले सच्चिदा बाबू का निधन हो गया है। यद्यपि सच्चीदा बाबू ने लंबा जीवन जिया। बावजूद उनकी मृत्यु देश के लिए अपूरणीय क्षति है। संपूर्ण क्षमता और योग्यता होते हुए भी उन्होंने समाज के अंतिम पायदान के आदमी के रूप में अपनी जिंदगी को ढाला। पिछले लगभग साढ़े तीन दशक से बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का मुसहरी गांव उनका ठिकाना था। गांव में रहते हुए बिना टेलीविजन के वे देश और दुनिया की घटनाओं को लेकर हमेशा अद्यतन रहते थे। कुछ वर्ष पहले तक समाचार पत्रों में उनके विचारोत्तेजक आलेख आते रहते थे। वे विचारधारा से समाजवादी थे और यही उनके जीवन में दिखता था। सच कहा जाए तो वह एक क्रांतिकारी थे। अपने जीवन को न्यूनतम खर्च तक सीमित करके जीना सक्रिय जीवन में किसी क्रांति से कम नहीं है।

उनकी पुस्तकें – पुस्तिकाएं आज भी बदलाव के लिए रचनात्मक एवं संघर्षात्मक अभियानों में लगे लोगों के लिए वैचारिकी ही नहीं व्यावहारिक प्रेरणा भी हैं। यह समय का दुर्भाग्य है कि आज राजनीति ही नहीं समाज और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय लोगों द्वारा जितना उनका उपयोग किया जा सकता था नहीं किया गया। यह हमारे समय में दृष्टि भ्रम का ही परिणाम है। मुझे अनेक बार उनसे मिलने ,बात करने, कार्यक्रमों में साथ रहने और साथ जाने- आने का भी अनुभव रहा। मुझे याद है एक समय देश के दूरस्थ या राजधानी दिल्ली द से जाने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और एक्टिविस्टों की चाहत सच्चिदा बाबू से मिलने की होती थी।‌ उनके कार्यक्रमों में मुसहरी जाना भी शामिल होता था। पहले मुसहरी गांव के लोगों को भी समझ में नहीं आया कि यह कौन आदमी है। धीरे-धीरे जब उनके पास लोग पहुंचने लगे, उन्हें कार्यक्रमों में ले जाया जाने लगा, नए पत्रकारों को भी उनके बारे में जानकारी हुई तथा समय-समय पर उनकी टिप्पणियां ली जाने लगीं तब मुसहरी और आसपास के गांव को उनके कद का आभास हुआ। हालांकि इससे उनके जीवन में कोई अंतर आया हो ऐसा नहीं है। जब तक उनका शरीर साथ देता रहा वह साइकिल की ही सवारी करते रहे।

कई बार किसी को कुछ टिप्पणी देनी होती तो वह साइकिल से ही पहुंच कर दे आते। मैंने उनसे एक बार पूछा था कि आपका भोजन कैसे होता है तो उन्होंने उत्तर दिया कि मैं चूड़ा दही रखता हूं। बिहार में चूड़ा दही सुबह का मुख्य जलपान होता था। कई लोग जो अकेले होते थे दिन में और रात में भी उसका उपयोग करते थे। दुर्भाग्य से इधर लंबे समय से उनसे मिलना नहीं हुआ। मिलना होता तो समझ पाता कि वर्तमान भारत , बिहार और दुनिया के बारे में उनकी सोच क्या है और वो कैसा भविष्य देखते हैं। आने वाली पीढ़ी को तो छोड़िए वर्तमान समय में भी ज्यादातर लोगों को यह कल्पना नहीं होगी कि संपूर्ण सुख के जीवन की क्षमता रखते हुए भी कोई ऐसा व्यक्ति हमारे आसपास था जिसने ऐच्छिक गरीबी को अपनाया और उसी में शत-प्रतिशत संतुष्ट रहते हुए अपनी अंतिम सांसें ली।

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