संघ के मौन तपस्वी को नमन

2-1-21.jpeg

अनुराग सक्सेना

हमारे प्रिय माणक जी भाईसाहब, जो मिश्री-सी मधुरता से स्नेह लुटाते, पाथेय कण का नवीनतम अंक बाँटते, और युवावस्था से हमारे संरक्षक बने, अब हमारे बीच नहीं रहे। उनका सहज, सरल, निर्लिप्त, निस्पृह और निरहंकारी स्वभाव हर किसी को बाँध लेता था। मन व्यथित है, क्योंकि पुरानी पीढ़ी के प्रचारक धीरे-धीरे हमसे दूर हो रहे हैं। माणक जी जैसा वात्सल्य और मार्गदर्शन शायद अब इस जीवन में न मिले।

दो वर्ष पूर्व पाथेय कण कार्यालय में उनके साथ बिताए कुछ घंटे आज भी स्मृति में जीवंत हैं। उत्साह और प्रेम से उन्होंने मेरा स्वागत किया, अल्पाहार और भोजन कराया। पुरानी स्मृतियों, नए कार्यकर्ताओं, प्रचारकों और भावी योजनाओं पर लंबी चर्चा की। मेरे लिए उनकी चिंताएँ, सलाह और आशीर्वाद आज भी हृदय को स्पर्श करते हैं। वह स्थान, जहाँ से साधना, तपस्या और स्थिरप्रज्ञता की प्रेरणा मिलती थी, जहाँ प्रेम और वात्सल्य का प्रवाह आत्मिक आनंद से भर देता था, अब सूना हो गया है।

माणक जी भाईसाहब को भूलना असंभव है। संघ कार्य की नींव में विसर्जित अनाम पुष्प की तरह, वे सतत साधना, मौन तपस्या और आत्म-विसर्जन की साकार मूर्ति बनकर सदा स्मरणीय रहेंगे। उनकी दैदीप्यमान आभा हमें निरंतर प्रेरित करती रहेगी।

कोटि-कोटि नमन, मौन तपस्वी माणक जी भाईसाहब को!

The EVM Controversy: A Calculated Political Maneuver or Coincidence?

2-18.png

Delhi. In January 2019, a press conference in London, led by a self-proclaimed cyber expert named Syed Shuja sparked a firestorm of controversy in India. Shuja alleged that Electronic Voting Machines (EVMs) used in the 2014 Lok Sabha elections were hacked, claiming the results were rigged in favor of the Bharatiya Janata Party (BJP). The event, organized by the Indian Journalists’ Association (Europe), drew significant attention due to the presence of senior Congress leader Kapil Sibal. This convergence of events, coupled with the involvement of social media influencer Avi Dandiya (not Dandia), who later interviewed Shuja, raises questions about whether this was a coordinated effort by the Congress party to undermine India’s electoral process or a series of unrelated coincidences.

Kapil Sibal’s attendance at the London event was highly scrutinized. As a prominent Congress leader and former Union minister, his presence lent credibility to Shuja’s claims, despite the Congress party’s official stance distancing itself from the event. Sibal clarified that he attended at the personal invitation of journalist Ashish Ray, not as a Congress representative, and insisted the allegations warranted investigation. Critics, including the BJP, labeled it a “Congress-sponsored conspiracy” to defame Indian democracy. Union Minister Ravi Shankar Prasad questioned Sibal’s role, asking, “In what capacity was he present?” The Election Commission of India (ECI) dismissed Shuja’s claims as baseless, noting that EVMs are standalone machines with no external connectivity, making hacking implausible. The ECI even considered legal action against Shuja for spreading misinformation.

Adding to the intrigue, Avi Dandiya, a YouTuber known for his anti-Modi rhetoric, interviewed Shuja, presenting his claims as credible. Dandiya’s history of spreading false narratives came under scrutiny after the Pulwama attack in February 2019, when he circulated a fake audio clip implicating BJP leaders in a conspiracy. According to a report by The Hindu on March 4, 2019, Delhi Police filed an FIR against him under Sections 465 and 469 of the Indian Penal Code for forgery and spreading false information. Despite this, in September 2023, the Congress appointed Dandiya as the social media head of the Indian Overseas Congress (IOC), a move that fueled speculation about the party’s intentions. Critics argue this decision reflects Congress’s willingness to align with individuals known for divisive propaganda, potentially to amplify anti-government narratives abroad.

The question remains: Was Shuja’s press conference a Congress-orchestrated ploy to cast doubt on EVMs and India’s electoral integrity? Several factors suggest this possibility. Shuja’s claims lacked evidence, and his identity as a former employee of the Electronic Corporation of India Limited (ECIL) was unverified. The timing of the event, just months before the 2019 general elections, aligned with Congress’s broader narrative questioning EVM reliability after its 2014 defeat. The presence of Sibal, a seasoned Congress strategist, and the subsequent elevation of Dandiya within the IOC, indicate a pattern of leveraging controversial figures to challenge the ruling government’s legitimacy.

However, there are counterarguments. Congress’s official dissociation from Shuja’s claims and Sibal’s assertion of attending in a personal capacity suggest the party may not have directly engineered the event. Shuja’s disappearance after the press conference adds ambiguity, as does the lack of concrete evidence linking Congress to a broader conspiracy. Dandiya’s appointment to the IOC could be seen as a pragmatic move to harness his social media influence, rather than an endorsement of his past actions.

The EVM controversy highlights the delicate balance between free speech and electoral integrity in India’s democracy. While skepticism about electoral processes is legitimate, unsubstantiated allegations risk eroding public trust. The involvement of figures like Sibal and Dandiya raises valid concerns about political motives and foreign interference, but without definitive proof, the question of whether Shuja was a Congress ‘plant’ remains speculative. What is clear is that such episodes underscore the need for robust safeguards to protect India’s democratic institutions from both domestic and external manipulation.

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर: मालेगांव ब्लास्ट केस से बरी होने की पूरी कहानी

2-29.jpeg

दिल्ली। आज मुंबई की एक विशेष एनआईए अदालत ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और छह अन्य आरोपियों को 2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस में सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। यह फैसला उस लंबी और दर्दनाक यात्रा का अंत था, जिसने साध्वी प्रज्ञा के जीवन को लगभग दो दशकों तक प्रभावित किया। 17 साल की कानूनी लड़ाई, जेल में बिताए नौ साल, शारीरिक और मानसिक यातनाएं, और सामाजिक अपमान—यह कहानी न केवल एक व्यक्ति की है, बल्कि यह उन सवालों को भी उठाती है कि कैसे एक निर्दोष को इतने बड़े मामले में फंसाया गया और क्यों। साध्वी प्रज्ञा ने कोर्ट में कहा, “मैंने शुरू से ही कहा था कि जिन्हें भी जांच के लिए बुलाया जाता है, उनके पीछे कोई न कोई आधार ज़रूर होना चाहिए। मुझे जांच के लिए बुलाया गया और मुझे गिरफ़्तार करके प्रताड़ित किया गया। इससे मेरा पूरा जीवन बर्बाद हो गया।”

प्रारंभिक जीवन और देशभक्ति की शुरुआत

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का जन्म 2 फरवरी 1970 को मध्य प्रदेश के भिंड जिले में एक साधारण परिवार में हुआ। उनके पिता, चंद्रपाल सिंह ठाकुर, एक आयुर्वेदिक चिकित्सक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सक्रिय सदस्य थे। प्रज्ञा ने इतिहास में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की और युवावस्था में ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और विश्व हिंदू परिषद की महिला शाखा, दुर्गा वाहिनी, से जुड़ गईं। उनकी विचारधारा हिंदू राष्ट्रवाद और सनातन धर्म के प्रति समर्पण से प्रेरित थी। वह एक साध्वी के रूप में आध्यात्मिक जीवन की ओर मुड़ीं और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहीं। उनकी देशभक्ति और धार्मिक कार्यों ने उन्हें एक मजबूत पहचान दी, लेकिन 2008 में मालेगांव ब्लास्ट ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया।

मालेगांव ब्लास्ट और गिरफ्तारी

29 सितंबर 2008 को, मालेगांव में एक मोटरसाइकिल में बम विस्फोट हुआ, जिसमें छह लोग मारे गए और 101 से अधिक घायल हुए। इस घटना की जांच शुरू में महाराष्ट्र के आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) ने की, जिसके प्रमुख हेमंत करकरे थे। जांच में दावा किया गया कि विस्फोट में प्रयुक्त मोटरसाइकिल साध्वी प्रज्ञा के नाम पर रजिस्टर्ड थी। इसके आधार पर, अक्टूबर 2008 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित और अन्य को भी आरोपी बनाया गया।

प्रज्ञा पर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए। एटीएस ने दावा किया कि वह और उनके सह-आरोपी हिंदू चरमपंथी संगठन अभिनव भारत के सदस्य थे, जिसने कथित तौर पर इस हमले की साजिश रची थी। हालांकि, साध्वी ने शुरू से ही इन आरोपों को खारिज किया और दावा किया कि उन्हें झूठे आधार पर फंसाया गया।

जेल में यातनाएं और स्वास्थ्य संकट

गिरफ्तारी के बाद, साध्वी प्रज्ञा ने दावा किया कि उन्हें महाराष्ट्र एटीएस द्वारा गंभीर शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गईं। उन्होंने कहा कि उन्हें लाठियों और बेल्ट से पीटा गया, नींद से वंचित किया गया, और अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ा। हालांकि, पूर्व सरकारी वकील रोहिणी सालियन ने इन दावों को खारिज किया, लेकिन प्रज्ञा के समर्थकों का मानना है कि उनकी धार्मिक पहचान को निशाना बनाया गया।

जेल में प्रज्ञा की स्वास्थ्य स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। उन्हें ब्रेस्ट कैंसर का निदान हुआ, और उनके समर्थकों का दावा है कि जेल में उचित चिकित्सा सुविधाएं नहीं दी गईं, जिससे उनकी हालत और गंभीर हो गई। 2017 में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनकी खराब स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें जमानत दी, लेकिन तब तक वह नौ साल जेल में बिता चुकी थीं। जमानत देते समय कोर्ट ने कहा कि उनके खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता।

जांच की खामियां और “हिंदू आतंकवाद” की थ्योरी

2011 में, मालेगांव ब्लास्ट केस की जांच एनआईए को सौंप दी गई। एनआईए ने 2016 में साध्वी प्रज्ञा को क्लीन चिट दी, यह कहते हुए कि उनके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं। हालांकि, विशेष अदालत ने इस क्लीन चिट को खारिज कर दिया और प्रज्ञा सहित सात आरोपियों के खिलाफ यूएपीए के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया।

2025 के अंतिम फैसले में, कोर्ट ने पाया कि साध्वी की मोटरसाइकिल के स्वामित्व का कोई ठोस सबूत नहीं था। मोटरसाइकिल के चेसिस नंबर को मिटा दिया गया था, और इसे पुनर्स्थापित नहीं किया जा सका। कर्नल पुरोहित के घर पर आरडीएक्स होने का भी कोई सबूत नहीं मिला। 323 गवाहों की जांच की गई, जिनमें से 37 गवाह अपने बयानों से मुकर गए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सजा के लिए नैतिक आधार पर्याप्त नहीं हैं; ठोस और विश्वसनीय सबूतों की आवश्यकता होती है, जो इस मामले में नहीं थे।

इसके साथ ही, “हिंदू आतंकवाद” या “भगवा आतंकवाद” की थ्योरी पर सवाल उठने लगे। कई लोगों ने इसे एक राजनीतिक साजिश बताया, जिसका उद्देश्य हिंदू संगठनों को बदनाम करना था। सोशल मीडिया पर भी इस फैसले के बाद “भगवा आतंकवाद” को झूठा और निराधार बताया गया।

तुष्टिकरण और राजनीतिक साजिश के आरोप

मालेगांव ब्लास्ट मुस्लिम बहुल क्षेत्र में हुआ था, और उस समय सामाजिक तनाव को कम करने के लिए जल्दबाजी में कार्रवाई की गई हो, यह संभव है। कुछ लोगों का मानना है कि साध्वी प्रज्ञा को फंसाना एक तुष्टिकरण की नीति थी, जिसका उद्देश्य एक विशेष समुदाय को संतुष्ट करना था। उस समय की कांग्रेस सरकार पर आरोप लगे कि उन्होंने हिंदू नेताओं को निशाना बनाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की। हालांकि, इन दावों का कोई ठोस सबूत नहीं है, लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि बिना पर्याप्त सबूतों के साध्वी को इतने बड़े मामले में कैसे फंसाया गया।

साध्वी की पीड़ा और सामाजिक पुनर्वास

साध्वी प्रज्ञा ने नौ साल जेल में बिताए, कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का सामना किया, और सामाजिक अपमान सहे। उनकी छवि को एक आतंकी के रूप में चित्रित किया गया, जिसने उनके परिवार और समर्थकों को गहरा आघात पहुंचाया। 2017 में जमानत मिलने के बाद, उन्होंने 2019 में भोपाल से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा और कांग्रेस के दिग्विजय सिंह को हराकर सांसद बनीं। यह उनके लिए एक सामाजिक और राजनीतिक पुनर्वास था, लेकिन उनकी कुछ टिप्पणियों, जैसे नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहना, ने विवादों को जन्म दिया।

2024 में, बीजेपी ने उन्हें लोकसभा चुनाव के लिए टिकट नहीं दिया, और उनकी जगह भोपाल से आलोक शर्मा को उम्मीदवार बनाया गया। फिर भी, साध्वी प्रज्ञा ने अपनी निर्दोषता पर जोर दिया और कहा कि उनकी जिंदगी इस मामले ने बर्बाद कर दी।

अनुत्तरित सवाल और सामाजिक असंतोष

साध्वी प्रज्ञा के बरी होने के बाद कई सवाल अनुत्तरित रह गए। अगर वह निर्दोष थीं, तो उन्हें इतने सालों तक जेल में क्यों रखा गया? बिना सबूतों के उन्हें इतने बड़े मामले में कैसे फंसाया गया? और सबसे महत्वपूर्ण, मालेगांव ब्लास्ट के लिए जिम्मेदार कौन है? कोर्ट ने मृतकों के परिवारों को 2 लाख रुपये और घायलों को 50,000 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, लेकिन यह सवाल बना रहा कि क्या इस मुआवजे से उनके दर्द की भरपाई हो सकती है?

साध्वी प्रज्ञा की कहानी एक व्यक्ति के संघर्ष की कहानी है, जो जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता, राजनीतिक हस्तक्षेप, और सामाजिक ध्रुवीकरण पर सवाल उठाती है। यह मामला न केवल कानूनी प्रक्रिया की कमियों को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे एक निर्दोष व्यक्ति की जिंदगी को सामाजिक और राजनीतिक कारणों से बर्बाद किया जा सकता है। साध्वी प्रज्ञा की बरी होने की खबर ने उनके समर्थकों में खुशी लाई, लेकिन यह समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या न्याय केवल कोर्ट के फैसले तक सीमित है, या इसके पीछे गहरे सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ हैं

श्रध्देय प्रमिलताई जी नही रही..!

unnamed-2-3.jpg


प्रशांत पोल

भोपाल ।

राष्ट्र सेविका समिती की चतुर्थ प्रमुख संचालिका, आदरणीय प्रमिलताई मेढे का आज कुछ समय पहले दुःखद निधन हुआ हैं. 97 वर्ष की प्रमिलताई ने, अपने श्वासों के अंतिम समय तक मात्र राष्ट्र कार्य की ही चिंता की. अत्यंत प्रगल्भ, अत्यंत दूरद्रष्टा एवं अत्यंत स्नेहिल प्रमिलताई ने समिति के कार्य को नया आयाम दिया था.

दुःखद संयोग ऐसा रहा की आज ही प्रातः सुमेधा और मैं, श्रध्देय प्रमिलताई से मिलने अहिल्या मंदिर गए थे. वे ऑक्सिजन पर थी, किंतू समझ रही थी, अत्यंत क्षीण आवाज मे बोल भी रही थी. मैने मेरी नई पुस्तक के बारे मे उन्हे बताया. उन्होने पुस्तक का विषय पुछा. मैं भाग्यशाली हूं, कि मेरा लिखा अधिकतम साहित्य उन्होने पढा था. हम लोग उनके साथ लगभग साठे आठ बजे तक थे. नौ बजकर पांच मिनट पर उन्होने अंतिम सांस ली.

एक प्रखर राष्ट्रभक्त, कुशाग्र बुध्दि धारण करने वाली, तेजस्वी और चैतन्यशील आत्मा हमारे बीच से चली गई..!

श्रध्देय प्रमिलताई ताई जी को भावपूर्ण श्रध्दांजली !
ॐ शांति.

scroll to top