भारत एवं यूके के बीच मुक्त व्यापार समझौते से बढ़ेगा विदेशी व्यापार

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दिल्ली । दिनांक 24 जुलाई 2025 को भारत एवं यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी एवं यूके के प्रधानमंत्री श्री कीर स्टारमर की उपस्थिति में सम्पन्न हो गया। यूके के यूरोपीयन यूनियन से अलग होने के बाद यूके का भारत के साथ यह द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता यूके के इतिहास में सबसे बड़ा द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता कहा जा रहा है। इस द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के सम्पन्न होने के बाद भारत एवं यूके के बीच विदेशी व्यापार में अतुलनीय वृद्धि की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। यूके ने हाल ही में अमेरिका के साथ भी एक व्यापार समझौता सम्पन्न किया है परंतु यूके के प्रधानमंत्री भारत के साथ संपन्न किए गए द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते को उससे भी बड़ी डील बता रहे हैं। अमेरिका एक ओर जहां विभिन्न देशों के साथ टैरिफ युद्ध की घोषणा कर रहा है एवं अन्य देशों से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर भारी भरकम टैरिफ लगा रहा हैं वहीं भारत एवं यूके के बीच द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत टैरिफ की दरों को कम किया जाकर शून्य के स्तर पर लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। अतः यह द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता विश्व के अन्य देशों के लिए एक बहुत बड़ी सीख है।

द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत सामान्यतः दो देशों के बीच होने वाले विदेशी व्यापार पर टैरिफ की दरों को कम किया जाता है अथवा शून्य के स्तर तक लाया जाता है ताकि इन दोनों देशों के बीच विदेशी व्यापार को बढ़ावा दिया जा सके। इसी सिद्धांत के अंतर्गत भारत को जिन क्षेत्रों में लाभ हो सकता है, इनमें फुटवीयर उद्योग, लेदर उद्योग, टेक्स्टायल उद्योग, इंजीनीयरिंग उद्योग एवं जेम्स एवं ज्वेलरी उद्योग शामिल हैं। इसी प्रकार यूके को जिन क्षेत्रों में लाभ हो सकता है, इनमे विस्की, कार, चोकलेट, बिस्किट, कासमेटिक, आदि उत्पाद निर्मित करने वाले उद्योग शामिल हैं। साथ ही, यूके को उम्मीद है कि भारत एवं यूके के बीच सम्पन्न हुए इस द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते से 800 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश भारतीय कम्पनियों द्वारा यूके में किया जा सकता है। यह यूके के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यूके में रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे।

वर्तमान में भारत एवं यूके के बीच 56,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का विदेशी व्यापार प्रतिवर्ष होता है। उक्त द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के सम्पन्न होने के बाद भारत एवं यूके के बीच 34,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष का विदेशी व्यापार बढ़ सकता है। वर्ष 2030 तक भारत एवं यूके के बीच विदेशी व्यापार को 120,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष के स्तर तक ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके बाद वर्ष 2040 तक दोनों देशों के बीच विदेशी व्यापार को 160,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर तक ले जाया जा सकेगा। भारत से यूके को निर्यात होने वाले लगभग 99 प्रतिशत पदार्थों पर यूके द्वारा टैरिफ की दर को शून्य किया जा रहा है। इसी प्रकार, भारत द्वारा भी यूके से आयात किए जाने वाले 64 प्रतिशत पदार्थों पर टैरिफ की दर को शून्य किया जा रहा है। वर्तमान में भारत में यूके से आयात होने वाले पदार्थों पर औसत टैरिफ दर 15 प्रतिशत है, इसे घटाकर 3 प्रतिशत किया जा रहा है। दोनों देशों द्वारा एक दूसरे से विभिन्न पदार्थों के होने वाले विदेशी व्यापार पर टैरिफ की दरें कम करने से दोनों देशों में एक दूसरे से आयात किया जाने वाले उत्पाद सस्ते हों जाएंगे। उत्पाद सस्ते होने से उनकी बाजार में मांग बढ़ेगी, इन उत्पादों की मांग बढ़ने से उनका उत्पादन बढ़ेगा जो अंततः रोजगार के नए अवसर निर्मित करेगा। अतः इस द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते से दोनों देशों को ही लाभ होने जा रहा है।

भारत के जेम्स एवं ज्वेलरी उद्योग से प्रतिवर्ष यूके को होने वाले निर्यात, आगामी दो वर्षों में दुगने होकर 250 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। टेक्स्टायल उद्योग के मामले में भारत के उत्पादों को वियतनाम एवं बांग्लादेश के साथ गला काट प्रतियोगिता का सामना करना पढ़ता है। परंतु, अब भारत के उत्पादों पर टैरिफ की दरें कम अथवा शून्य होने से भारत के उत्पाद यूके में प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे। यूके में कुल आयात होने वाले गारमेंट्स में भारत की हिस्सेदारी केवल 6 प्रतिशत है जो अब आगामी वर्षों में दुगनी होकर 12 प्रतिशत होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। भारत के इंजीनीयरिंग उद्योग को इस मुक्त व्यापार समझौते से अत्यधिक लाभ हो सकता है और भारत के इस क्षेत्र से यूके को निर्यात, वर्ष 2030 तक दुगने होकर 750 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर तक पहुंच जाने की सम्भावना है। समुद्रीय खाद्य उत्पाद के क्षेत्र में भी भारत से यूके को निर्यात जो अभी केवल 10 करोड़ अमेरिकी डॉलर के हैं, दुगने होकर 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर के स्तर को पार कर सकते हैं। अभी यूके में समुद्रीय खाद्य पदार्थों के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी केवल 3 प्रतिशत की है। लेदर उद्योग से होने वाले भारत से आयात पर भी टैरिफ की दर को यूके में शून्य किया जा रहा है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि उक्त वर्णित समस्त क्षेत्र/उद्योग भारत में श्रम आधारित उद्योग हैं। अतः इन क्षेत्रों से निर्यात बढ़ने पर भारत में इन क्षेत्रों में रोजगार के लाखों नए अवसर निर्मित होंगे। इन क्षेत्रों से होने वाले उत्पादों पर द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते के अंतर्गत यूके द्वारा टैरिफ की दर को शून्य करने पश्चात यूके में यह पदार्थ सस्ते होंगे इससे यूके में इन पदार्थों की मांग तेजी से बढ़ेगी और भारतीय कम्पनियों के यूके को इन पदार्थों के निर्यात बढ़ेंगे। इससे भारतीय कंपनियों को अपनी उत्पादन क्षमता में वृद्धि करनी होगी, जिससे भारत में रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे।

भारत में यूके से आयात किए जाने वाले पदार्थ, जिन पर भारत द्वारा आयात कर में कमी की जाने वाली हैं, उनमें शामिल हैं – स्कॉच विस्की जिस पर टैरिफ की दरों को 150 प्रतिशत से घटाकर 75 प्रतिशत किया जा रहा है। यूके में निर्मित कारों के आयात पर अभी भारत द्वारा 110 प्रतिशत का टैरिफ लगाया जा रहा है, इसे घटाकर आगे आने वाले 5 वर्षों में 10 प्रतिशत कर दिया जाएगा। इसी प्रकार ब्रिटेन में निर्मित चोकलेट, बिस्किट एवं कासमेटिक उत्पादों पर भी आयात करों में कमी होने से यह उत्पाद भारत में सस्ती दरों पर उपलब्ध होंगे। भारत में कृषकों के हितों का ध्यान रखते हुए डेयरी, तेल एवं फलों आदि जैसे कृषि पदार्थों को इस मुक्त व्यापार समझौते से बाहर रखा गया है।

भारत से यूके को अभी 1450 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात प्रतिवर्ष होता है, यह यूके के कुल आयात का केवल 1.8 प्रतिशत है। इस प्रकार, अभी भारत से यूके को निर्यात बहुत कम मात्रा में होता है। वर्तमान में भारत द्वारा सबसे अधिक मात्रा में निर्यात, 200 करोड़ अमेरिकी डॉलर का, पेट्रोलीयम उत्पादों का किया जा रहा है। फार्मा सेक्टर से अभी यूके को केवल 85 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया जा रहा है, जो यूके के कुल आयात का केवल 2.8 प्रतिशत है। इस प्रकार भारत को उक्त विभिन्न क्षेत्रों में यूके के रूप में एक बहुत बड़ा बाजार मिल रहा है। केमिकल, आयरन एवं स्टील, फूटवेयर, रबर, आदि भी ऐसे क्षेत्र/उद्योग हैं जिनसे भारत से यूके को बहुत कम मात्रा में निर्यात किया जाता है। भारत के लिए यह समस्त उद्योग अहम हैं क्योंकि इन क्षेत्रों/उद्योगों में रोजगार के अवसर निर्मित करने की अपार सम्भावनाएं मौजूद हैं। यूके के कुल आयात में भारत का मार्केट शेयर बहुत कम है। भारतीय उद्योगों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देना होगा और भारत में निर्मित उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना होगा ताकि इनके निर्यात को बढ़ाया जा सके।

अमेरिका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा लगातार विभिन्न देशों के साथ टैरिफ युद्ध की घोषणा के बीच विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं, भारत एवं यूके ने आपस में द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते को सम्पन्न कर पूरे विश्व को राह दिखाई है कि किस प्रकार एक दूसरे के हितों को ध्यान में रखकर विदेश व्यापार किया जा सकता है।

बिहार में बढ़ते अपराध और राजनीतिक समीकरण

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पटना। बिहार में हाल के महीनों में अपराध की घटनाओं, खासकर हत्याओं में उल्लेखनीय वृद्धि ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विपक्षी नेता तेजस्वी यादव द्वारा बार-बार यह दावा किया जा रहा है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार अपराध नियंत्रण में पूरी तरह विफल रही है। इसके साथ ही, कुछ लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि अधिकांश अपराधी ‘माई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण से प्रेरित होकर बेखौफ हो रहे हैं, और उन्हें यह संदेश मिल रहा है कि तेजस्वी यादव के सत्ता में आने की संभावना के कारण अपराध करने का ‘लाइसेंस’ मिल गया है। दूसरी ओर, नीतीश कुमार की खराब सेहत और कथित कमजोर नेतृत्व को भी इस अराजकता का कारण बताया जा रहा है। इस जटिल स्थिति में, बिहार की जनता सबसे अधिक प्रभावित हो रही है, जो भय और असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर है।

अपराध का बढ़ता ग्राफ और आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में 2015 से 2022 तक हत्या के मामले उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर रहे हैं। 2025 के पहले छह महीनों में ही 1,379 हत्याएं दर्ज की गईं, जिनमें व्यक्तिगत रंजिश (37.8%) और संपत्ति विवाद (10.2%) प्रमुख कारण रहे। हाल की घटनाएं, जैसे पटना में एक निजी अस्पताल में कुख्यात अपराधी की हत्या, सीतामढ़ी में व्यवसायी की गोलीबारी, और समस्तीपुर में सरपंच की हत्या, यह दर्शाती हैं कि अपराधी बेखौफ होकर खुले आम वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। तेजस्वी यादव ने दावा किया है कि केवल सात दिनों में 97 हत्याएं हुईं, जो कानून-व्यवस्था की बदहाली को उजागर करता है।

माई समीकरण और अपराध का कथित संबंध

‘माई’ समीकरण, यानी मुस्लिम और यादव मतदाताओं का गठजोड़, लंबे समय से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की ताकत रहा है। कुछ लोग यह आरोप लगाते हैं कि इस समीकरण से जुड़े अपराधी बिहार में बढ़ते अपराधों के लिए जिम्मेदार हैं। यह धारणा इसलिए भी बल पकड़ रही है क्योंकि तेजस्वी यादव की ‘माई-बहिन मान योजना’ जैसे वादों ने उनके समर्थन आधार को और मजबूत करने की कोशिश की है। हालांकि, यह आरोप तथ्यपरक कम और राजनीतिक ज्यादा लगता है। अपराध के कारणों में व्यक्तिगत रंजिश और संपत्ति विवाद प्रमुख हैं, न कि किसी विशेष समुदाय का एकमात्र प्रभाव। फिर भी, यह धारणा कि तेजस्वी के संभावित सत्ता में आने से अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं, बिहार की जनता में भय और अविश्वास पैदा कर रही है। यह स्थिति 1990 के दशक के ‘जंगलराज’ की यादें ताजा करती है, जब लालू-राबड़ी शासन में अपराध चरम पर था।

नीतीश कुमार की जिम्मेदारी और कमजोर छवि

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर अपराध नियंत्रण में नाकामी के गंभीर आरोप लग रहे हैं। उनकी खराब सेहत और कथित ‘सुषुप्त अवस्था’ को लेकर विपक्ष और सहयोगी दल, जैसे चिराग पासवान, भी सवाल उठा रहे हैं। नीतीश की उम्र और स्वास्थ्य को लेकर चर्चाएं उनकी नेतृत्व क्षमता पर संदेह पैदा कर रही हैं। तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया है कि सरकार ‘रिमोट कंट्रोल’ से चल रही है और भ्रष्ट अधिकारी व बीजेपी के करीबी नेता बिहार को लूट रहे हैं। नीतीश सरकार का दावा है कि अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है, लेकिन बार-बार होने वाली आपराधिक घटनाएं इस दावे को कमजोर करती हैं।

जनता की पीड़ा और राजनीतिक ध्रुवीकरण

बिहार की जनता इस बढ़ते अपराध के माहौल में सबसे अधिक प्रभावित है। शिक्षक, डॉक्टर, व्यवसायी, और आम नागरिकों की हत्याएं और गैंगरेप जैसी घटनाएं जनता में भय पैदा कर रही हैं। यह स्थिति न केवल कानून-व्यवस्था का सवाल है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा दे रही है। अपराध की घटनाएं किसी खास समुदाय को निशाना बनाती दिखती हैं, तो यह वोटबैंक की राजनीति को और जटिल बनाती है। तेजस्वी यादव को लगता है कि नीतीश सरकार की कमजोरियां उन्हें सत्ता दिला सकती हैं, लेकिन ‘जंगलराज’ की छवि उनके लिए भी चुनौती बनी हुई है।

बिहार में बढ़ते अपराध और ‘माई’ समीकरण को जोड़ने का प्रयास राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह समस्या की जड़ को नहीं दर्शाता। अपराध के पीछे सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण ज्यादा प्रभावी हैं। नीतीश कुमार की सरकार को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर सख्त कदम उठाने होंगे, वहीं तेजस्वी यादव को भी ‘जंगलराज’ की छवि से मुक्त होने के लिए ठोस नीतियां पेश करनी होंगी। बिहार की जनता को इस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे एक सुरक्षित और समृद्ध राज्य की आवश्यकता है।

ऑपरेशन सिंदूर : संसद में गूंजी विजयघोष की वाणी, राष्ट्र की अस्मिता का सिंहनाद

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 प्रणय विक्रम सिंह

भारत की लोकतांत्रिक परंपरा में वह दृश्य दुर्लभ होता है, जब संसद की छतों पर मात्र तर्क नहीं, राष्ट्रगौरव की ध्वनि गूंजती है। आज लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर संबोधन उस नवभारत की हुंकार था, जो अब आहत होकर नहीं, आक्रोशित होकर खड़ा होता है। जो अब सहन नहीं, सटीक प्रतिकार करता है। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘हम गोली का जवाब गोले से देंगे’, यह मात्र प्रतिक्रिया नहीं, प्रतिज्ञा थी। यह उस भारत की घोषणा थी जो अब आक्रांताओं को मिट्टी में मिलाने का विजयोत्सव मना रहा है।

प्रधानमंत्री ने संसद को बताया कि यह सत्र भारत के गौरवगान का सत्र है। यह शौर्य, संकल्प और संस्कृति के संघर्ष की वह परंपरा है, जिसकी विजयध्वनि अब सदी की सीमाओं को पार कर रही है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर केवल सैन्य उत्तर नहीं, भारत की 140 करोड़ जनता की इच्छाशक्ति की जीत है और मैं उन्हीं की आवाज लेकर इस सदन में खड़ा हूं। प्रधानमंत्री के स्वर में वह चेतना थी जो कहती है कि ‘सिंदूर की सौगंध को पूरा करने का यह विजय उत्सव है।’

उन्होंने बताया कि पहलगाम में निर्दोष लोगों को नाम पूछकर मारा गया। यह हमला केवल व्यक्ति पर नहीं, भारत की आत्मा पर था। भारत में दंगे फैलाने की गहरी साजिश थी, लेकिन भारत की जनता ने उस साजिश को नाकाम कर दिया। प्रधानमंत्री ने कहा ‘आतंकियों को मिट्टी में मिलाने का वादा किया था और सेना को कार्रवाई की खुली छूट दी गई थी।’ परिणामस्वरूप पाकिस्तान के आतंक आकाओं की नींद उड़ गई। उन्हें समझ में आ गया कि अब भारत आएगा, और मार कर जाएगा। 22 अप्रैल के हमले का बदला 22 मिनट में लिया गया। पाकिस्तान के कोने-कोने में आतंकी अड्डे धुआं-धुआं हो गए। उनकी न्यूक्लियर धमकियों का डर समाप्त हो गया। आज उनका एयरबेस ICU में पड़ा है। भारत ने वर्षों की तैयारी का लाभ उठाया है। यह युग अब तकनीक आधारित युद्ध का है और भारत की तीनों सेनाओं ने पाक के छक्के छुड़ा दिए हैं।

उन्होंने सगर्व बताया कि भारत पर आतंकी हमला हुआ तो हमने जवाब दिया। पाकिस्तान के सीने पर सटीक प्रहार किया गया। और सबसे बड़ी बात यह रही कि दुनिया के किसी नेता ने भारत को यह कार्रवाई रोकने को नहीं कहा। केवल तीन देश पाकिस्तान के पक्ष में खड़े हुए, जबकि शेष दुनिया भारत के साथ आई, यह भारत की कूटनीतिक दृढ़ता और वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है।

प्रधानमंत्री ने ट्रंप के बयान को खारिज करते हुए साफ किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति से कोई बात नहीं हुई। जेडी वेंस ने 3-4 बार कॉल किया, लेकिन भारत ने किसी भी विदेशी दबाव में नहीं झुकने का निर्णय लिया, यही है आत्मनिर्भर भारत की आत्मा। प्रधानमंत्री ने संसद में दोहराया कि ‘मैं फिर कहता हूं, ऑपरेशन सिंदूर जारी है।’

अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के छिछोरेपन और सेना विरोधी रवैये पर भी करारा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि जब सेना सीमा पर दुश्मन को ध्वस्त कर रही थी, तब कांग्रेस मेरे ऊपर निशाना साध रही थी। यह कांग्रेस का पुराना चरित्र है, जो पाकिस्तान को क्लीन चिट देती है, सेना से प्रमाण मांगती है, और विदेश मंत्री के बयान तक को स्वीकार नहीं करती। यह वही कांग्रेस है, जिसकी गलतियों की सजा आज भी देश भुगत रहा है। प्रधानमंत्री ने नेहरू द्वारा किए गए सिंधु जल समझौते को लेकर भी तीखा हमला बोला। बताया कि देश के जल संसाधनों पर भारत का हक रोका गया, और यह समझौता विकास की धारा को जकड़ने वाला बना।

प्रधानमंत्री मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत ने तीन ऐतिहासिक सिद्धांतों पर अब निर्णायक नीति अपना ली है। पहला, भारत पर कोई भी आतंकी हमला हो, तो भारत अपनी मर्जी से, अपने समय पर, अपनी शैली में उत्तर देगा। दूसरा, परमाणु ब्लैकमेल अब काम नहीं आएगा और तीसरा, आतंकवाद को पनाह देने वालों और आतंकियों के बीच कोई भेद नहीं किया जाएगा।

यह भाषण संसद के इतिहास में केवल एक वीरगाथा नहीं था, यह रणचंडी संसद की हुंकार थी। यह उस राष्ट्र की चेतना थी, जो कहती है कि हम क्षमा कर सकते हैं, लेकिन कायरता को कभी क्षमा नहीं करेंगे। यह वह भारत है, जो अब अपने सैनिकों पर विश्वास करता है, अपने निर्णयों पर दृढ़ होता है और अपनी सीमाओं की नहीं, अपनी संस्कृति की भी रक्षा करता है।

प्रधानमंत्री का यह संबोधन आने वाली पीढ़ियों को सिखाएगा कि संसद में सिर्फ विधेयक ही नहीं गूंजते, कभी-कभी विजयशंख भी बजते हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जारी है और अब भारत की चेतना भी अनवरत जागृत है।

यह वह भारत है जो भूलेगा नहीं, रुकेगा नहीं, और झुकेगा नहीं। यही नया भारत है, जो ‘सिंदूर’ से ‘सिंधु’ तक अपनी अस्मिता की रक्षा करता है।

लेखक गाँव: हिमालय की गोद में साहित्य और संस्कृति का संगम

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दिल्ली। डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, एक प्रख्यात साहित्यकार, राजनेता और विचारक, जिन्होंने अपने साहित्यिक और सामाजिक योगदान से भारतीय संस्कृति और साहित्य को नए आयाम दिए हैं, ने ‘लेखक गाँव’ की संकल्पना को मूर्त रूप देने का बीड़ा उठाया है। यह लेखक गाँव न केवल एक भौगोलिक स्थान है, बल्कि यह एक वैचारिक तपोभूमि है, जहाँ साहित्य, संस्कृति और विचारों का अनूठा संगम होगा। यह लेख इस अनूठी परियोजना की अवधारणा, उद्देश्य, और इसके सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालता है, साथ ही ‘स्पर्श हिमालय महोत्सव 2025’ के संदर्भ में इसके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करता है।

लेखक गाँव की संकल्पना

‘लेखक गाँव’ हिमालय की गोद में बसा एक ऐसा स्थान है, जो साहित्य और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार के लिए समर्पित है। डॉ. निशंक के शब्दों में, यह “मात्र एक स्थान नहीं, अपितु वह वैचारिक तपोभूमि है जहाँ हिमालय की मौन चेतना में साहित्य बोलता है, संस्कृति मुस्कराती है और विचार साधना का स्वरूप लेते हैं।” यह परियोजना भारतीय साहित्य और संस्कृति को एक वैश्विक मंच प्रदान करने का प्रयास है, जहाँ रचनाकार, विचारक और शिक्षाविद् एकत्रित होकर भारतीयता के मूल्यों को पुनर्जनन और प्रचारित करेंगे।

लेखक गाँव का विचार हिमालय की प्राकृतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रेरित है। हिमालय, जो भारतीय संस्कृति में सदा से साधना, ज्ञान और शांति का प्रतीक रहा है, इस परियोजना का आधार बनता है। यह गाँव एक ऐसी जगह होगी जहाँ साहित्यकार अपनी रचनात्मकता को निखार सकेंगे, विचारक गहन चिंतन में डूब सकेंगे, और संस्कृति के संवाहक भारतीय मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचा सकेंगे। यह स्थान केवल लेखकों के लिए नहीं, बल्कि उन सभी के लिए खुला होगा जो भारतीय संस्कृति और साहित्य के प्रति संवेदनशील हैं और इसे समृद्ध करना चाहते हैं।

स्पर्श हिमालय महोत्सव 2025

लेखक गाँव की अवधारणा को और अधिक सशक्त बनाने के लिए डॉ. निशंक ने ‘स्पर्श हिमालय महोत्सव की घोषणा की है। यह महोत्सव लेखक गाँव में आयोजित होने वाला एक अनूठा आयोजन होगा, जो साहित्य, संस्कृति और विचारों का उत्सव होगा। डॉ. निशंक के अनुसार, यह महोत्सव “भारतीयता, विचार और सृजन का जीवंत संगम” बनेगा। इसमें देश-विदेश के साहित्यकार, शिक्षाविद्, और संस्कृति प्रेमी हिस्सा लेंगे, और यह आयोजन विचारों के यज्ञ के रूप में उभरेगा।


महोत्सव का उद्देश्य भारतीय साहित्य और संस्कृति को वैश्विक मंच पर स्थापित करना है। यहाँ होने वाले संवाद और चर्चाएँ न केवल साहित्यिक होंगी, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मुद्दों पर भी केंद्रित होंगी। यह आयोजन भारतीयता के मूल्यों को पुनर्जनन करने और उन्हें आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा। हिमालय की पृष्ठभूमि में आयोजित यह महोत्सव पर्यावरण, स्थिरता और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे विषयों को भी प्राथमिकता देगा, जो आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक हैं।

लेखक गाँव का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

लेखक गाँव और इसके अंतर्गत आयोजित होने वाला स्पर्श हिमालय महोत्सव भारतीय समाज और संस्कृति के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, यह परियोजना साहित्य और संस्कृति को आमजन तक पहुँचाने का एक प्रयास है। आज के डिजिटल युग में, जहाँ साहित्य और संस्कृति को अक्सर व्यावसायिकता के दबाव में उपेक्षित किया जाता है, लेखक गाँव एक ऐसी जगह होगी जहाँ रचनात्मकता को प्रोत्साहन मिलेगा और साहित्य को उसका खोया हुआ गौरव वापस मिलेगा।

दूसरा, यह परियोजना भारतीयता के मूल्यों को पुनर्जनन करने का एक प्रयास है। भारतीय संस्कृति में साहित्य, कला और दर्शन का गहरा समन्वय रहा है, और लेखक गाँव इस समन्वय को पुनर्जनन करने का एक मंच प्रदान करेगा। यहाँ होने वाले आयोजन युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने में मदद करेंगे, जो आज के वैश्वीकरण के दौर में अपनी पहचान खोने के खतरे में हैं।

तीसरा, लेखक गाँव हिमालय के पर्यावरणीय और आध्यात्मिक महत्व को भी रेखांकित करता है। हिमालय न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय दर्शन और साहित्य का स्रोत भी रहा है। लेखक गाँव इस क्षेत्र की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और इसे वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का एक प्रयास है।

डॉ. निशंक का योगदान और दृष्टिकोण

डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने अपने साहित्यिक और राजनैतिक जीवन में हमेशा भारतीय संस्कृति और शिक्षा को प्राथमिकता दी है। 100 से अधिक पुस्तकों के लेखक के रूप में, उन्होंने साहित्य के विभिन्न रूपों—कविता, उपन्यास, कहानी—के माध्यम से भारतीय मूल्यों को प्रस्तुत किया है। उनकी यह पहल उनके उस दृष्टिकोण का हिस्सा है, जिसमें वे साहित्य और संस्कृति को समाज के विकास का आधार मानते हैं।

लेखक गाँव और स्पर्श हिमालय महोत्सव की संकल्पना डॉ. निशंक की दूरदर्शिता का परिचय देती है। उन्होंने न केवल इस परियोजना की नींव रखी, बल्कि इसे देश के प्रबुद्ध शिक्षकों और चिंतकों के साथ साझा कर इसे एक सामूहिक प्रयास बनाने का प्रयास किया है। उनकी यह पहल न केवल साहित्यिक समुदाय को प्रेरित करेगी, बल्कि समाज के हर वर्ग को भारतीयता के प्रति गर्व का अनुभव कराएगी।

लेखक गाँव और स्पर्श हिमालय महोत्सव 2025 भारतीय साहित्य, संस्कृति और विचारों के लिए एक नया युग शुरू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह परियोजना हिमालय की शांति और सौंदर्य को साहित्य और संस्कृति के साथ जोड़कर एक ऐसी तपोभूमि का निर्माण कर रही है, जहाँ विचारों का यज्ञ होगा और संस्कृति की लौ प्रज्वलित होगी। डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की यह पहल न केवल साहित्यकारों के लिए, बल्कि प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय है। यह परियोजना हमें याद दिलाती है कि हमारी सांस्कृतिक विरासत हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, और इसे संरक्षित और समृद्ध करना हम सभी का दायित्व है।

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