नशा मुक्त जीवन ही आपको श्रेष्ठ बनाता हे – दीपाली चंदौरिया

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मुरैना – मध्यप्रदेश पुलिस महानिदेशक के द्वारा पूरे प्रदेश में संचालित “नशे से दूरी हे जरूरी” के तहत “नशा मुक्त भारत ” को लेकर जन – जागरूकता अभियान चलाया जा रहा हे। जिसके तहत राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के संयुक्त तत्वाधान में प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह अभियान 15 जुलाई से 30 जुलाई तक संपूर्ण प्रदेश में चलाया जा रहा हे। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य समाज को नशा मुक्त बनाना हे।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पधारी शहर की पुलिस उपाधीक्षक दीपाली चंदौरिया ने विद्यार्थियों को समझाया कि जीवन बेहद कीमती हे और इसको किसी भी प्रकार के नशे से बर्बाद नहीं करना चाहिए। एक श्रेष्ठ जीवन जीने में नशा बहुत बड़ी बाधा बन जाता हे और कई लोगों के भविष्य इस नशे की लत से गर्त में चले गए यहां तक कि कई परिवार भी इस नशा की आदत से तबाह हो गए हे। युवाओं में नासमझी के चलते जो औरों की देखा देखी ने नशे की लत लग जाती हे वह उनको सामाजिक, मानसिक पीड़ा में डाल देती हे यहां तक कि कई लोग इस वजह से अवसाद का शिकार हो जाते हे। इसलिए हम प्रतिज्ञा करे कि स्वयं नशे से दूर रहे और समाज को भी जागरूक करें।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के केंद्रीय प्रचार समिति सदस्य एवं प्रांत प्रचार प्रमुख, पत्रकार अर्पित शर्मा ने युवाओं को स्वाभिमान की एहमियत बताते हुए कहा कि युवा जीवन स्वाभिमान और मेहनत से जीने का सबसे बड़ा प्रेरणा स्त्रोत होता हे इस अवस्था में युवा अपनी मेहनत की दम पर गर्व के साथ जीवन में हर कार्य को करने के लिए तत्पर रहता हे और जीवन को बड़ी ही आजादी के साथ जीने का आनंद लेता हे ऐसे में जब वह नशे की लत में आता हे तो छुप छुप रहना शुरू कर देता हे और घरवालों को, समाज को कहीं पता ना चल जाए उसके लिये वह बुरी संगत में पड़ जाता हे और खुद को नशे की लत से बाहर नहीं निकाल पाता यहां तक कि जब उसका जेब खर्च नशे के पदार्थों पर खर्च हो जाते हे तो वह उसे पूरा करने क्राइम के रास्ते पर भी चला जाता हे। इन सब की वजह से जो युवा अपना उच्च भविष्य बनाकर देश के काम आ सकता था वह स्वयं को नशे में ऐसा बर्बाद कर लेता हे कि फिर वह अपने लक्ष्य से भी भटक जाता हे, इसलिए युवाओं को हमेशा सर उठाकर जीने के लिए नशे जैसी बुरी आदतों से दूर रहना चाहिए और घर में भी अगर कोई व्यक्ति किसी भी प्रकार का नशा करता हे तो उनको इस बार का विरोध अपने घर में भी दर्ज कराना चाहिए। स्वयं बदलेंगे तो समाज बदलेगा और समाज बदलेगा तो देश बदलेगा। इसलिए आप सभी इस देश और परिवार की धरोहर हो, इस स्वयं की धरोहर को हमेशा सम्भल कर रखे और देश को महान बनाने में अपना योगदान दे स्वामी विवेकानंद जी को अपना आदर्श बनाए और उनके जैसा उच्च जीवन जीने का प्रयास करें।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि फिल्म निर्माता एवं समाजसेवी अंकित शर्मा ने नशे से होने वाले नुकसानों को बताते हुए कहा कि हर वर्ष 1 लाख से ज्यादा लोग इस नशे की वजह से मृत्यु को प्राप्त हो रहे और यह आंकड़ा कोरोना जैसी महामारी से होने वाली मृत्यु से भी भयानक हे। नशे से होने वाली बीमारियों के इलाज में ना जाने कितने परिवार तबाह हो गए, कितनो के घर, जेवर तक बिक गए। इसलिए सभी लोग इस नशा खोरी से स्वयं से दूर रखते हुए समाज में जहां रहे वहां इस नशे के खिलाफ प्रचार करें। स्वयं की एवं परिवार की कीमत समझे और नशे जैसे खतरनाक राक्षस को समाज से खत्म करें।

महाविद्याल के प्राचार्य ऋषभ पाल सिंह ने सभी विद्यार्थी को समझाते हुए कहा कि वह स्वयं को नशे से दूर रखे और अपने महाविद्यालय परिषर के आस पास भी ऐसा जागरूक अभियान चलाए, साथ ही उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उनका स्वयं का एक रिश्तेदार जो पढ़ने से लेकर खेल की गतिविधि में भी सबसे अव्वल आता हे वह अचानक कुछ गलत संगत में आकर नशे की लत में पड़ गया जिस वजह से आज उसका पूरा जीवन तबाह हो गया और जो किसी उच्च पद तक जाकर देश की सेवा कर सकता था वह अब अपने परिवार को भी ठीक से नहीं संभाल पा रहा। आगे उन्होंने कहा कि ऐसे उदाहरण देख कर हमें सिख लेना चाहिए और स्वयं को, अपने परिवार को इन सबसे दूर रखना चाहिए। एवं अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने की ओर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

मंच संचालक प्रोफेसर दिलीप कटारे द्वारा आखिर में कार्यक्रम के समापन में पुलिस विभाग द्वारा सभी को शपथ दिलाई गई कि वह स्वयं को नशे से दूर रखेंगे एवं अपने परिवार और समाज को भी नशे से दूर रहने के लिये प्रेरित करेंगे और समाज में एक आदर्श जीवन के रूप में स्वयं को स्थापित करेंगे।

पत्नी के अपमान पर खामोश क्यों हैं अखिलेश यादव

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लखनऊ। डिम्पल यादव पर मौलाना साजिद रशीदी द्वारा की गई अभद्र टिप्पणी, जिसमें उनकी मस्जिद में बैठने की शैली और कपड़ों को लेकर आपत्तिजनक बयान दिया गया, ने उत्तर प्रदेश की सियासत में हलचल मचा दी है। इस मुद्दे पर अखिलेश यादव और डिम्पल यादव की चुप्पी ने कई सवाल खड़े किए हैं। इस चुप्पी की वजह को समझने के लिए हमें सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भों को देखना होगा।

पहली बात, अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी (सपा) की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सपा ने हमेशा “मुस्लिम-यादव” (MY) समीकरण को अपनी ताकत माना है। मौलाना साजिद रशीदी जैसे प्रभावशाली धार्मिक नेताओं की टिप्पणियों का विरोध करने से मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग में नाराजगी की आशंका रहती है, जो सपा के लिए जोखिम भरा हो सकता है। अखिलेश की चुप्पी को इस संदर्भ में देखा जा सकता है कि वह वोट बैंक को नाराज करने से बचना चाहते हैं, खासकर तब जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं।

दूसरी ओर, डिम्पल यादव की चुप्पी को उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक व्यक्तित्व के नजरिए से समझा जा सकता है। डिम्पल एक सांसद के रूप में अपनी छवि को मजबूत और संयमित बनाए रखना चाहती हैं। इस तरह के विवाद में प्रत्यक्ष रूप से उलझने से उनकी छवि को नुकसान हो सकता है। साथ ही, वह इस मुद्दे को अनदेखा कर इसे समय के साथ ठंडा होने देना चाहती होंगी।

मुलायम सिंह यादव को “मुल्ला मुलायम” कहे जाने का तंज उनके मुस्लिम समुदाय के प्रति कथित तुष्टिकरण नीति से जुड़ा है। अखिलेश भी इस छवि से बचने की कोशिश करते हैं, लेकिन इस मामले में उनकी चुप्पी इसे और पुख्ता करती दिखती है। हालांकि, यह कहना कि एक नेता अपनी पत्नी के अपमान को केवल वोट बैंक के लिए सहन करेगा, सरलीकरण होगा। यह संभव है कि अखिलेश इस मुद्दे को तूल न देकर सांप्रदायिक तनाव से बचना चाहते हों।

अखिलेश और डिम्पल की चुप्पी रणनीतिक हो सकती है, जो राजनीतिक नुकसान से बचने और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की कोशिश को दर्शाती है। लेकिन यह चुप्पी सपा की छवि को कमजोर भी कर सकती है, क्योंकि यह उनके समर्थकों में यह संदेश दे सकती है कि वे अपमान के खिलाफ खड़े होने में असमर्थ हैं।

दिल्ली में NUJ(I) और DJA के पदाधिकारियों की एक दिवसीय बैठक सम्पन्न

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नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) [NUJ(I)] और दिल्ली जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन (DJA) के पदाधिकारियों की एक दिवसीय बैठक का आयोजन किया गया।

1972 में स्थापित यह संगठन देश का सबसे पुराना और पत्रकारों का सबसे बड़ा संगठन माना जाता है। इस बैठक में देश भर से आए पत्रकारों ने हिस्सा लिया और पत्रकारिता के समक्ष मौजूदा चुनौतियों पर चर्चा की।

बैठक में पत्रकारों के अधिकारों, प्रेस की स्वतंत्रता, और डिजिटल युग में पत्रकारिता की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ। NUJ(I) और DJA ने पत्रकारों के कल्याण, उनकी सुरक्षा, और कार्यस्थल पर बेहतर सुविधाओं के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई गई। संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने पत्रकारों के हित में नीतिगत बदलावों और सरकार से संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

इस अवसर पर संगठन के 53 वर्षों की उपलब्धियों को याद किया गया। एनयूजे से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार सगीर अहमद बताते हैं, NUJ(I) के साथ मेरा जुड़ाव पिछले 25 वर्षों से है, और यह संगठन पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए निरंतर प्रयासरत रहा है।

बैठक में युवा पत्रकारों को संगठन से जोड़ने और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए नए प्रस्ताव भी पारित किए गए। कार्यक्रम में वक्ताओं ने पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी पर बल दिया। यह बैठक पत्रकारों के बीच एकजुटता को मजबूत करने और संगठन के भविष्य के रोडमैप को तैयार करने के उद्दश्य से बुलाई गई थी। 

कला, ध्यान और दर्शन का संगम बनी संस्कार भारती की मासिक संगोष्ठी

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बृजेश भट्ट

नई दिल्ली: संस्कार भारती के केंद्रीय कार्यालय ‘कला संकुल’, नई दिल्ली में प्रत्येक माह के अंतिम रविवार को आयोजित होने वाली मासिक कला संगोष्ठी इस बार “अंतर्यात्रा : कल्पना, कला और ध्यान” विषय पर केंद्रित रही, जिसमें कला, दर्शन और आत्मचिंतन के मध्य एक गहन संवाद देखने को मिला।

इस प्रेरणादायी संगोष्ठी की मुख्य वक्ता रहीं वैशाली गाहल्याण, जो मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र की सहायक प्राध्यापक हैं एवं भारतीय चिंतन पर गहन शोध कर रही हैं। उन्होंने कहा, “भारतीय कला केवल दृश्य रचनात्मकता नहीं, बल्कि आत्मा और ब्रह्म की खोज है। यह एक अंतर्यात्रा है, जो कलाकार को साधक बनाती है। कल्पना, ध्यान और साधना के माध्यम से वह स्वयं को जानता है और फिर अपने अनुभवों को समाज के समक्ष अभिव्यक्त करता है।”

कार्यक्रम की शुरुआत सावन की रिमझिम फुहारों से मेल खाती एक भावपूर्ण कजरी प्रस्तुति से हुई, जिसे स्नेहा मुखर्जी एवं उनके समूह ने प्रस्तुत किया। इस लोकसंगीत ने श्रोताओं को उत्तर भारत की पारंपरिक लोकध्वनियों और हरियाली तीज के उत्सव से आत्मीयता के साथ जोड़ा।

इसके पश्चात नीलाक्षी खंडकर सक्सेना द्वारा प्रस्तुत कथक नृत्य ने नारी चेतना, लय और भाव की सजीव अभिव्यक्ति के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा की गरिमा को मंच पर जीवंत किया।

संगोष्ठी में दिल्ली के कला, संस्कृति एवं शिक्षा क्षेत्र से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित विद्वान, कलाकार, शोधकर्ता एवं संस्कार भारती के पदाधिकारी उपस्थित रहे।

संस्कार भारती की ये मासिक संगोष्ठियाँ अब केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय कला एवं दर्शन को समकालीन दृष्टिकोण से जोड़ने वाला एक जीवंत विमर्श बन चुकी हैं — जहाँ कला केवल प्रदर्शन नहीं, संवाद और साधना के रूप में प्रकट होती है।

उल्लेखनीय है कि दिल्ली के कला केंद्र कहे जाने वाले संस्कार भारती – कला संकुल ने राजधानी के कला प्रेमियों के लिए एक प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। इसके भूतल पर मंचीय कला प्रस्तुतियों का आयोजन होता है, जबकि प्रथम तल पर स्थित आर्ट गैलरी भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित विविध कला विधाओं को एक उत्कृष्ट मंच प्रदान करती है। यहाँ आयोजित मासिक संगोष्ठियों में वैचारिक विमर्श के साथ-साथ नृत्य, संगीत, काव्य एवं अन्य सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी नियमित रूप से होती हैं।

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