A Call for Educational Transformation from the Birthplace of Adi Shankaracharya

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Atharva Sharma

• Four-day education-focused program by Dr. Mohan Bhagwat begins in Kerala
• Four-day national meeting begins at Adi Shankara Nilayam, Kerala
• National Chintan Baithak of Shiksha Sanskriti Utthan Nyas commences
• 100 selected karyakartas from across Bharat participate in the gathering

The event is being held in the special presence of Dr. Mohanrao Bhagwat, Sarsanghchalak of Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS)

Kalady ( Kerala) : There must be a balance of materialism and spirituality in education. The work of the Nyas and the transformation of Bharat’s education are not separate tasks. We must focus not only on identifying problems but also on progressing with solutions. We are here to review and plan for the Nyas’s work—both programmatic and organizational—for the next five years.

This was stated by Dr. Atul Kothari, National Secretary of Shiksha Sanskriti Utthan Nyas, during his opening remarks at the inaugural session of the National Chintan Baithak held at Adi Shankara Nilayam, Kalady.

He further added that no single organization, institution, or platform can bring about transformation in the education system of Bharat alone. A united, collective effort is required.

This is the third national Chintan Baithak of the Nyas –
• The first was held in Vrindavan in 2012
• The second in Coimbatore in 2019
• And the third is now being held at the birthplace of Adi Shankaracharya in Kalady

Dr. Kothari affirmed that from its inception, the Nyas has been committed to providing an alternative in Bhartiya education. The task is so vast that events like Gyanotsav, Gyan Kumbh, and Gyan Sabha alone are not enough. We must continue working to expand and deepen this mission.

Acharya Vivittananda, head of Chinmaya Mission, Kerala region, stated: “It is our good fortune that such a vital educational brainstorming session—focused on bringing foundational changes in Bharat’s education—is being held on our campus. Our Bhartiya knowledge tradition is the foundation of our unity.
Your efforts are bringing an end to the Macaulay system. I am confident that because of your work, the state of education will change, and the Indianization of education will be realized throughout the country.”

Dr. Pankaj Mittal, Chairperson of Shiksha Sanskriti Utthan Nyas, in her address during the inaugural session, said: “Since its inception, the Nyas has strived to rejuvenate Bhartiya education by blending traditional knowledge systems with modern-day needs, offering a meaningful alternative to the current system.
In Bharat, the aim of education was never limited to livelihood—it was a path toward becoming a complete human being. That is the direction in which we must take our education system.”

Sharing details of the inaugural session, Atharva Sharma, National Media Head of the Nyas, stated that the National Chintan Baithak was formally inaugurated by P.Pu. Dr. Mohan Bhagwat, Sarsanghchalak of the Rashtriya Swayamsewak Sangh.
Also present on the occasion were Swami Vivittananda of Chinmaya Mission, Dr. Pankaj Mittal (Chairperson of the Nyas), A. Vinod (Convenor, Nyas), and Shri Sudarshan from Chinmaya Mission.
The session was conducted by Shri Sanjay Swami, Co-Convenor of the Nyas.

In the second session of the first day, Dr. Atul Kothari reflected on the journey of the Nyas and stated: “When distortions in education became evident, a nationwide ‘Shiksha Bachao Andolan’ was launched. It was after that effort that Shiksha Sanskriti Utthan Nyas was formed to offer a constructive alternative. Initially, the Nyas focused on six core areas. Today, it works across 11 Vishay, 3 Aayam, 3 Karya Vibhag, and 2 Abhiyan. Our approach is not just to deliver speeches but to enter the system and bring change from within.”

Dr. Kothari reiterated that over the years, Shiksha Sanskriti Utthan Nyas has been continuously working in the field of education to awaken the soul of Bharat through its nation-centric efforts. This meeting is a powerful continuation of that journey.

The Nyas believes that grassroots change in education is the primary responsibility of society. For this, joint efforts of society and government are essential. Those directly involved in the education sector have a key role to play, only then can foundational changes be made in the system.This ongoing work is part of a nationwide campaign and movement. Making education a national priority is imperative.

लाल किला: मुगल विरासत, स्वतंत्रता का प्रतीक और नैरेटिव की राजनीति

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लाल किला, दिल्ली का वह ऐतिहासिक स्मारक है जो भारत की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक यात्रा का प्रतीक है। इसे मुगल बादशाह शाहजहाँ ने 17वीं शताब्दी में बनवाया था, और यह मुगल वास्तुकला का एक उत्कृष्ट नमूना है। लेकिन आज, जब लाल किले पर तिरंगा फहराया जाता है, तो इसे केवल मुगल संपत्ति के रूप में देखना कितना उचित है? विशेष रूप से तब, जब यह स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा और भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य की संपत्ति के रूप में स्थापित है। इस प्रश्न के इर्द-गिर्द कई ऐतिहासिक, कानूनी और सामाजिक आयाम हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है। साथ ही, यह भी देखना जरूरी है कि इस तरह के नैरेटिव को कौन और क्यों बनाता है?

लाल किला और मुगल विरासत

लाल किला, जिसे 1638 में शाहजहाँ ने बनवाना शुरू किया था, मुगल साम्राज्य की शक्ति और वैभव का प्रतीक था। यह दिल्ली में मुगल शासन का प्रशासनिक और सांस्कृतिक केंद्र था। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित इस किले में दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, रंग महल और मोती मस्जिद जैसी संरचनाएँ मुगल कला और वास्तुकला की बारीकियों को दर्शाती हैं। लेकिन यह कहना कि लाल किला केवल मुगल संपत्ति है, इतिहास को एक संकीर्ण दृष्टिकोण से देखना होगा।

मुगलों ने दिल्ली पर कब्जा किया और स्थानीय संसाधनों, कारीगरों और श्रमिकों का उपयोग करके इस किले का निर्माण किया। न तो वे अपने साथ धन लाए, न ही किले के निर्माण में लगे मजदूर मुगल थे। ये कारीगर और श्रमिक स्थानीय थे, जिन्होंने अपनी कला और श्रम से इस स्मारक को आकार दिया। इस दृष्टि से, लाल किला भारतीय कारीगरी और संसाधनों का प्रतीक है, न कि केवल मुगल संपत्ति का।

स्वतंत्रता आंदोलन और लाल किला

लाल किला का महत्व केवल मुगल काल तक सीमित नहीं है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में यह विद्रोहियों का केंद्र बना, जब बहादुर शाह जफर को विद्रोहियों ने अपना नेता घोषित किया। हालांकि, विद्रोह के दमन के बाद अंग्रेजों ने किले को अपने नियंत्रण में ले लिया और इसे सैन्य छावनी में बदल दिया। फिर भी, 20वीं सदी में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लाल किला भारतीय स्वतंत्रता का प्रतीक बन गया। 15 अगस्त 1947 को, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया, तो यह न केवल आजादी का प्रतीक बना, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य की संप्रभुता का भी प्रतीक बन गया।

आज हर स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से प्रधानमंत्री का संबोधन इसकी राष्ट्रीय महत्व को और मजबूत करता है। ऐसे में, लाल किले को केवल मुगल संपत्ति के रूप में देखना इसके ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व को कम करना है। यह किला अब भारत की साझा विरासत का हिस्सा है, जो विभिन्न युगों और संस्कृतियों को अपने में समेटे हुए है।

कानूनी और संवैधानिक दृष्टिकोण

भारत के संविधान के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद देश की सारी संपत्ति भारत सरकार के अधीन है। लाल किला, जो अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है, भारत की राष्ट्रीय संपत्ति है। इसे यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। कानूनी रूप से, इसे मुगल संपत्ति के रूप में दावा करने का कोई आधार नहीं है, क्योंकि मुगल साम्राज्य का अस्तित्व समाप्त हो चुका है और भारत एक संप्रभु लोकतंत्र है।

जब मुगलों ने दिल्ली पर कब्जा किया, तो उन्होंने स्थानीय संसाधनों का उपयोग किया। उसी तरह, आज भारत सरकार ने देश की सारी ऐतिहासिक संपत्तियों को अपने नियंत्रण में लिया है, ताकि उनकी सुरक्षा और संरक्षण हो सके। इस दृष्टिकोण से, लाल किले को मुगल संपत्ति के रूप में देखना न तो कानूनी रूप से सही है और न ही ऐतिहासिक रूप से संतुलित।

नैरेटिव का निर्माण और उसका उद्देश्य

फिर सवाल उठता है कि लाल किले को मुगल संपत्ति से जोड़ने का नैरेटिव कौन बनाता है और क्यों? इस तरह के नैरेटिव का निर्माण अक्सर राजनीतिक, सांस्कृतिक या सामाजिक एजेंडा के तहत होता है। कुछ लोग इसे मुगल काल को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने या उसकी आलोचना करने के लिए इस्तेमाल करते हैं। यह नैरेटिव भारतीय इतिहास को ध्रुवीकरण का हथियार बनाने की कोशिश करता है, जिसमें मुगल काल को या तो गौरवशाली बताया जाता है या उसे विदेशी आक्रांताओं की विरासत के रूप में चित्रित किया जाता है।

ऐसे नैरेटिव बनाने वाले लोग अक्सर इतिहास को अपने दृष्टिकोण से तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं। कुछ के लिए, यह सांस्कृतिक पहचान की लड़ाई है, जहाँ वे मुगल काल को भारतीय संस्कृति पर एक बाहरी प्रभाव के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर, कुछ लोग मुगल काल को भारतीय इतिहास का एक अभिन्न अंग मानते हैं, जो भारत की समन्वित संस्कृति का हिस्सा है। सलमान रश्दी के उपन्यास मिडनाइट्स चिल्ड्रन में “आधी रात की संतानों” का उल्लेख भारत की आजादी के समय जन्मी पीढ़ी के लिए है, जो देश के जटिल इतिहास और सांस्कृतिक विविधता से जूझती है। इस संदर्भ में, “मुगलों की आधी रात की संताने” एक रूपक हो सकता है उन लोगों के लिए जो इतिहास को एक विशेष दृष्टिकोण से देखते हैं और उसे अपने राजनीतिक या सामाजिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं।

इतिहास का समन्वय और भविष्य

लाल किला न तो केवल मुगल विरासत है और न ही केवल स्वतंत्रता का प्रतीक। यह भारत के बहुआयामी इतिहास का एक जीवंत दस्तावेज है। इसे मुगल बनाम गैर-मुगल के द्वंद्व में फंसाना इतिहास की जटिलता को सरल बनाने की कोशिश है। भारत का इतिहास विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और शासकों का मिश्रण है। मुगल, मराठा, राजपूत, गुप्त, चोल-सभी ने इस देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को समृद्ध किया है। लाल किला इस समन्वय का प्रतीक है।

इस तरह के नैरेटिव को बढ़ावा देने के बजाय, हमें लाल किले को एक राष्ट्रीय धरोहर के रूप में देखना चाहिए, जो भारत की विविधता और एकता को दर्शाता है। इसे मुगल संपत्ति या स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में सीमित करने के बजाय, हमें इसे भारत के इतिहास के एक जीवंत हिस्से के रूप में स्वीकार करना चाहिए।

लाल किला भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का एक अनमोल हिस्सा है। इसे केवल मुगल संपत्ति के रूप में देखना न तो ऐतिहासिक रूप से सही है और न ही कानूनी रूप से उचित। यह किला भारत के स्वतंत्रता संग्राम और लोकतांत्रिक गणराज्य का प्रतीक है। इस तरह के नैरेटिव जो इसे मुगल बनाम गैर-मुगल की बहस में उलझाते हैं, अक्सर राजनीतिक या सांस्कृतिक उद्देश्यों से प्रेरित होते हैं। सलमान रश्दी के शब्दों को उधार लें तो, ये नैरेटिव “आधी रात की संतानों” की तरह हैं, जो इतिहास को अपने हिसाब से परिभाषित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन लाल किला इससे कहीं बड़ा है—यह भारत की आत्मा का प्रतीक है, जो विभिन्न युगों और संस्कृतियों को अपने में समेटे हुए है। इसे उसी रूप में स्वीकार करना ही इसका सच्चा सम्मान है।

शंकराचार्य की जन्मभूमि से शिक्षा परिवर्तन का शंखनाद

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अथर्व शर्मा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत की विशेष उपस्थिति में हो रहा आयोजन

एर्नाकुलम (केरल) । शिक्षा में भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों का समन्वय ज़रूरी। न्यास का काम और देश की शिक्षा में बदलाव का काम अलग नहीं है। हमें समस्या नहीं समाधान की चर्चा करनी है, समस्या को आइडेंटिफाई करना है और समाधान के विषय में आगे बढ़ना है। हम यहाँ न्यास के 5 वर्षों की कार्यक्रमात्मक व संगठनात्मक दोनों स्तर पर समीक्षा व योजना बनाई जाएगी। यह बात शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ अतुल कोठारी ने आदिशंकरा निलयम, कालड़ी में आयोजित राष्ट्रीय चिंतन बैठक के उद्घाटन सत्र की प्रस्ताविका रखते हुए कही। उन्होंने आगे कहा कि कोई एक संस्था, एक संगठन या एक मंच देश की शिक्षा में बदलाव लाना संभव नहीं है, इसके लिए सभी को एक दिशा में कार्य करना होगा। न्यास की यह तीसरी चिंतन बैठक है, पहली चिंतन बैठक 2012 में वृंदावन में हुई, दूसरी चिंतन बैठक 2019 में कोयंबतूर में, और यह तीसरी चिंतन बैठक आदि शंकराचार्य जी के जन्मस्थली कालड़ी में संपन्न हो रही है। डॉ कोठारी ने कहा कि अपनी स्थापना से ही न्यास भारत की शिक्षा में नया विकल्प देने हेतु प्रतिबद्ध है, यह कार्य इतना व्यापक है कि केवल ज्ञानोत्सव, ज्ञान कुंभ व ज्ञान सभा ही इस कार्य हेतु पर्याप्त नहीं, इसके आगे भी हमें कार्य को सतत बढ़ाने हेतु कार्य करते रहना होगा।

चिन्मय मिशन के केरल क्षेत्र के प्रमुख आचार्य विवित्तानन्द जी ने कहा कि यह हमारा सौभाग्य है कि भारत की शिक्षा में आधारभूत परिवर्तन लाने वाले प्रयासों की एक महत्वपूर्ण चिंतन बैठक हमारे परिसर में हो रही है। हमारी भारतीय ज्ञान परम्परा ही हमारी एकता का आधार है। उन्होंने कहा है कि आपके प्रयासों से मैकॉले की पद्धति समाप्त होने की कगार पर है, मुझे विश्वास है कि आप लोगों के कारण शिक्षा की यह स्थिति बदलेगी, और शिक्षा का भारतीयकरण पूरे देश में होगा।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की अध्यक्षा डॉ पंकज मित्तल ने न्यास अपने प्रारम्भ काल से ही शिक्षा में भारतीय ज्ञान परम्परा को आधार बनाकर वर्तमान एवं भविष्य की आधुनिक आवश्यकताओं का संयोजन करके देश की शिक्षा को एक नया विकल्प देकर भारतीय शिक्षा का पुनरुत्थान हो, इस दिशा में प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि भारत में शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन नहीं था, बल्कि मनुष्य को ‘पूर्ण मानव’ बनाने का माध्यम था। हमें इस दिशा में शिक्षा को लेकर जाना है।

उद्घाटन सत्र के विषय में जानकारी देते हुए प्रचार प्रमुख अथर्व शर्मा ने बताया कि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की इस राष्ट्रीय चिंतन बैठक का उद्घाटन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प.पू. सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत जी के कर कमलों से किया गया। इस अवसर पर चिन्मय मिशन के स्वामी विवित्तानंद जी, न्यास की अध्यक्षा डॉ पंकज मित्तल जी, संयोजक ए विनोद जी, चिन्मय मिशन के सुदर्शन जी उपस्थित थे। संचालन न्यास के सह संयोजक संजय स्वामी जी ने किया।

चिंतन बैठक के प्रथम दिन के द्वितीय सत्र में डॉ अतुल कोठारी ने न्यास की विकास यात्रा पर चर्चा करते हुए कहा कि शिक्षा में व्याप्त विकृतियाँ पर देशव्यापी शिक्षा बचाओ आन्दोलन चलाया गया उसके पश्चात देश की शिक्षा को एक नया विकल्प देने हेतु शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास का गठन किया गया। उन्होंने कहा कि प्रारंभ में आधारभूत 6 विषयों पर प्रमुख रूप से कार्य हुआ, वर्तमान में 11 विषय, 3 आयाम, 3 कार्य विभाग, 2 अभियान हैं। हमारी कार्य पद्धति है कि हम भाषण देने का काम नहीं करेंगे, हम सिस्टम में जाकर बदलाव का कार्य करेंगे।

डॉ कोठारी ने कहा कि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास विगत वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रहितकारी कार्यों के माध्यम से भारत की आत्मा को जाग्रत करने में सतत कार्यरत है। यह बैठक उसी क्रम की एक सशक्त कड़ी है। न्यास का मानना है कि शिक्षा में जमीनी बदलाव समाज का प्रमुख दायित्व है। इस हेतु समाज एवं सरकार इन दोनों के संयुक्त प्रयास आवश्यक हैं। इसमें प्रत्यक्षतः शिक्षा क्षेत्र से जुड़े लागों की प्रमुख भूमिका है, तभी शिक्षा में आधारभूत परिवर्तन संभव होगा। इन प्रयासों को देशव्यापी अभियान एवं आन्दोलन बनाने हेतु यह कार्य किया जा रहा है। शिक्षा देश की प्राथमिकता का विषय बने यह भी आवश्यक है।

वैचारिक दलाल संदीप चौधरी की एकपक्षीय पत्रकारिता

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दिल्ली। संदीप चौधरी, एबीपी न्यूज के कथित पत्रकार, जिनका शो देखकर ऐसा लगता है मानो उनकी सैलरी सीधे कांग्रेस आईटी सेल के खाते से आती हो।

उनकी पत्रकारिता का ढोंग इतना साफ़ झलकता है कि दर्शक चैनल बदलने को मजबूर हो जाते हैं। चौधरी का शो ‘सीधा सवाल’ नाम से भले ही चलता हो, लेकिन यह ‘सीधा प्रोपेगेंडा’ ज्यादा लगता है, जहां तथ्यों को तोड़-मरोड़कर कांग्रेस और आप के पक्ष में नरेटिव बनाया जाता है। इसलिए बीजेपी नेताओें के बच्चों के संबंध में बताया जाता है कि वे विदेश में कहां कहां पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन उसमें कांग्रेस के किसी नेता के बेटे का जिक्र जानबुझ कर आने नहीं दिया जाता। यह पत्रकारिता तो नहीं है। मनीष सिसोदिया उनके शो में साक्षात्कार के लिए आए भी थे लेकिन साहसी दिखने का ढोंग करने वाले संदीप यह साहस नहीं जुटा पाए कि मनीष से उनके बेटे के संबंध में सवाल पूछ लेते। इतना भर पूछ लेते कि जब दुनिया की सबसे अच्छी शिक्षा की व्यवस्था दिल्ली में हो गई थी फिर बच्चे को पढ़ने के लिए विदेश भेजने की क्या मजबूरी आ गई?

उनके शो में बीजेपी के खिलाफ ज़हर उगलने की कला बखूबी दिखती है। चाहे कोई भी मुद्दा हो, चौधरी उसे बीजेपी की नाकामी से जोड़ने में माहिर हैं, भले ही तर्कों का कोई आधार न हो। उनकी बहसों में पक्षपात इतना साफ़ दिखता है कि लगता है, वे पत्रकार कम, कांग्रेस के पे-रोल पर चलने वाले प्रवक्ता ज्यादा हैं। यह बीमारी इन दिनों कई कथित पत्रकारों को लगी हुई है। जिसमें आशुतोष गुप्ता और डॉ. मुकेश कुमार का नाम प्रमुख है। अजीत अंजुम, रवीश कुमार, साक्षी जोशी, आरफा खानम, अभिसार शर्मा, कुमकुम बिनवाल जैसे पत्रकार यू ट्यूब अवतार में सालों से यही काम कर रहे हैं।

संदीप की एक्स पर लोग खुलकर आलोचना करते हैं, कहते हैं कि उनकी बदनामी ने एबीपी की रेटिंग्स को तहस-नहस कर दिया। विज्ञापनदाता भी अब चैनल से मुंह मोड़ रहे हैं, क्योंकि चौधरी का चेहरा देखते ही लोग रिमोट का बटन दबा देते हैं।

उनके शो में अक्सर यही तमाशा देखने को मिलता है। यहाँ तथाकथित ‘विश्लेषण’ के नाम पर केवल एकतरफा कहानी परोसी जाती है। चौधरी की पत्रकारिता की आड़ में ‘वैचारिक दलाली’ इतनी शर्मनाक है कि निष्पक्षता का दम भरने वाले इस शख्स का असली चेहरा अब जगज़ाहिर है।

सवाल यह है कि अगर एबीपी को अपनी विश्वसनीयता बचानी है, तो ऐसे पत्रकारों को क्यों बर्दाश्त किया जा रहा है? चौधरी जैसे लोग पत्रकारिता को नहीं, बल्कि अपने आकाओं के एजेंडे को बेच रहे हैं।

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