हजार साल बाद हिंदू पुनर्जागरण का दौर: सिर्फ हिन्दू राष्ट्र की घोषणा शेष

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आज दक्षिण भारत के एक शहर में RSS के गुरु सम्मान कार्यक्रम में भाग लेने का मौका मिला। बड़ी संख्या में डॉक्टर्स, व्यापारी, प्रबुद्ध नागरिकों द्वारा हिन्दू संस्कृति, गौरव और राष्ट्र के प्रति निष्ठा का प्रदर्शन उत्साहित कर रहा था।

विचार विमर्श के दौरान आभास हुआ कि 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस ने हिंदुस्तान के सियासी, समाजी और मज़हबी तस्वीर को हमेशा के लिए बदल दिया है। यह ऐतिहासिक वाक़या, जिसमें विश्व हिंदू परिषद (VHP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे संगठनों ने अहम भूमिका निभाई, एक मुकम्मल आंदोलन की शुरुआत थी। इस आंदोलन का मकसद न सिर्फ़ हिंदू पहचान को मज़बूत करना था, बल्कि समाज के दबे-कुचले तबकों को मुख्यधारा में लाना, मंदिर प्रबंधन को जन-जन से जोड़ना और हिंदू संस्कृति की रौनक़ बढ़ाना भी था। दरअसल, यह सिर्फ़ एक धार्मिक आंदोलन नहीं, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक क्रांति का इंजन बन गया।

हिंदू धर्म में जाति की दीवारें सदियों से मज़बूत रही हैं, जिसने दलितों और पिछड़ों को मंदिरों और धार्मिक रस्मों से दूर रखा। इसी वजह से कई लोगों ने बौद्ध, इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लिया। लेकिन अब RSS और BJP ने इस फ़र्क़ को मिटाने की कोशिश शुरू की है। मिसाल के तौर पर, 2024 में उत्तर प्रदेश के 60 से ज़्यादा मंदिरों में दलित पुजारियों की नियुक्ति हुई, जो एक इतिहासी क़दम था। तमिलनाडु के श्री मुथु मरिअम्मन मंदिर में दलितों को पूजा का हक़ मिला, हालांकि कुछ उच्च जाति के लोगों ने इसका विरोध भी किया। मगर, ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के साथ यह कोशिश हिंदुओं को जोड़ने और धर्मांतरण रोकने की दिशा में अहम कदम था।

पिछले कुछ वर्षों में मंदिर प्रबंधन को लोकतांत्रिक बनाने की कोशिशें तेज़ हुई हैं। सरकार ने कई प्रसिद्ध मंदिरों का प्रशासन अपने हाथ में लेकर पारदर्शिता बढ़ाई है। 2023-25 के बीच, केंद्र और राज्य सरकारों ने 3,500 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च कर काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे मंदिरों की शान बढ़ाई। वाराणसी का काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, उज्जैन का महाकाल कॉरिडोर और अब वृंदावन में बांके बिहारी मंदिर का कॉरिडोर सिर्फ़ धार्मिक ही नहीं, बल्कि पर्यटन और आर्थिक विकास के केंद्र भी बन रहे हैं। 2025 के प्रयागराज कुंभ मेले के लिए 7,500 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था, करोड़ों लोगों ने कुंभ स्नान किया। इसके अलावा, कांवर यात्रा और चारधाम यात्रा को बढ़ावा देने के लिए ख़ास रेल और सड़क सुविधाएं शुरू की गई हैं, जो हिंदू तीर्थों को वैश्विक पहचान दिला रही हैं।

इस हिंदू पुनर्जागरण में सामाजिक बदलाव भी शामिल है। सरकार ने दहेज मुक्त सामूहिक विवाह को बढ़ावा दिया है, जैसे उत्तर प्रदेश की ‘मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना’, जिसके तहत 2024 में 1.5 लाख से ज़्यादा जोड़ों की शादी हुई। कन्यादान और मुफ्त बस यात्रा जैसी योजनाएँ महिलाओं को सशक्त बना रही हैं। पिछड़ों के लिए 27% आरक्षण और दलितों के लिए ख़ास योजनाएँ समानता की दिशा में क़दम हैं। साथ ही, हिंदू संगठनों ने लंगर और भंडारों के ज़रिए मुफ्त भोजन वितरण बढ़ाया है। हरिद्वार में सिर्फ़ 2024 में ही 12 लाख से ज़्यादा लोगों ने इन भंडारों से भोजन पाया, जो हिंदू समाज की सेवा भावना को दिखाता है। अमर नाथ यात्रा को सुगम और सुरक्षित बनाया गया है और कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से प्रारंभ हुई है।

एक अहम पहल narratives को सही करना और इतिहास लेखन में जान बूझकर की गई विकृतियों को दूर करने की भी हुई है। अंग्रेज़ों, मुस्लिम शासकों, कांग्रेस और वामपंथियों द्वारा बिगाड़े गए इतिहास को सुधारने के लिए NCERT की किताबों में बदलाव किए गए हैं। हिंदी, संस्कृत और क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है। योग और आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर पहुँचाया गया है, जहाँ 2025 के अंतरराष्ट्रीय योग दिवस में 100 से ज़्यादा देशों ने हिस्सा लिया। वाराणसी की गंगा आरती अब एक वैश्विक आकर्षण बन चुकी है, जो हिंदू संस्कृति की शान को प्रदर्शित करता है। यमुना समेत कई अन्य पवन नदियों के घाटों पर भी आरती का आयोजन हो रहा है।
बीजेपी का खुला एजेंडा धर्मनिरपेक्षता को नया रूप दे रहा है। आलोचक कहते हैं कि यह संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को कमज़ोर करता है, जबकि समर्थक इसे तुष्टिकरण की राजनीति का अंत मानते हैं। 2024 में अयोध्या में राम मंदिर का अभिषेक, जो बाबरी मस्जिद की जगह बना, इस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे राम राज्य’ की शुरुआत बताया।
यह हिंदू पुनर्जागरण कई रंगों वाला आंदोलन है, जो पुरानी परंपराओं को नए ज़माने से जोड़ रहा है। यह हिंदुओं को एकजुट करने और सशक्त बनाने की कोशिश है, लेकिन भारत की विविधता पर इसके असर को लेकर बहस अब भी जारी है। क्या यह देश को एक नए युग में ले जाएगा, या फिर समाज में नए तनाव पैदा करेगा-यह वक़्त ही बताएगा।

संक्षिप्त में, निम्न उदाहरण संकेत देते हैं कि इंडिया किस दिशा में बढ़ रहा है।

1. राम मंदिर निर्माण का समर्थन और भूमि पूजन में प्रधानमंत्री की भागीदारी (2020)
2. धारा 370 हटाना (2019)
3. सीएए (Citizenship Amendment Act) 2019
4. संवेदनशील धार्मिक स्थलों का पुनर्प्रस्ताव: काशी और मथुरा विवाद
5. ‘लव जिहाद’ विरोधी कानूनों का प्रस्ताव और पारित करना (उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि में)
6. संस्कृत और वैदिक शिक्षा को बढ़ावा
नई शिक्षा नीति (NEP 2020) में संस्कृत को विशेष दर्जा मिला।
7. गौरक्षा कानूनों और ‘बीफ बैन’ को बढ़ावा
8. NCERT और इतिहास की पुस्तकों में बदलाव
9. ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ जैसे नारों को राष्ट्रवाद से जोड़ना
10. हिंदू प्रतीकों और रीति-रिवाज़ों का राजनीतिक मंचों पर उपयोग

इन उदाहरणों से यह तर्क दिया जाता है कि मोदी सरकार “धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र” की अवधारणा से हटकर एक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित “हिंदू राष्ट्र” के विचार की ओर बढ़ रही है। सरकार इसे “भारतीयता” या “सनातन मूल्यों की वापसी” कहती है, वहीं आलोचक इसे धर्मनिरपेक्ष संविधान के विरुद्ध एक रणनीतिक बदलाव मानते हैं।

भारत में शिक्षा का संकट: परख सर्वे ने उजागर की चिंताजनक खामियां

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आगरा। गांव के बुजुर्ग राम नाथ, रिटायर्ड मास्साब कहते हैं, ‘क्लास रूम’ में दीवारें हैं, पर दिशा नहीं। ब्लैकबोर्ड है, पर बुनियादी समझ नदारद। भारत की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था गहरे संकट में है। हर साल करोड़ों बच्चे स्कूल तो जाते हैं, पर सीखते क्या हैं – यह एक राष्ट्रीय आपदा से कम नहीं!”

तमाम रिपोर्ट बार-बार चीख-चीख कर कह रही है कि आठवीं क्लास के बच्चे तीसरी की किताब भी नहीं पढ़ पाते। सरकारी स्कूलों में शिक्षक तो हैं, पर पढ़ाने की लगन नहीं। निजी स्कूलों में फीस है, लेकिन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का घोर अभाव। पाठ्यक्रम रटंत विद्या को बढ़ावा देते हैं, सोचने-समझने की क्षमता को कुचलते हैं।

बुनियादी गणित और भाषा कौशल की भारी कमी से ये पीढ़ी एक ऐसे भविष्य की ओर बढ़ रही है जहाँ न नौकरी मिलेगी, न समझदारी से फैसले लेने की योग्यता। यह सिर्फ शिक्षा का नहीं, देश की आत्मा का संकट है। अगर अब नहीं जागे, तो एक “डिग्रीधारी परंतु दिशाहीन भारत” तैयार हो रहा है — और यह त्रासदी किसी महामारी से कम नहीं होगी, कहते हैं प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी।

हाल ही में, शिक्षा मंत्रालय के तहत एनसीईआरटी द्वारा आयोजित परख राष्ट्रीय सर्वेक्षण 2024 ने भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था की गंभीर स्थिति को उजागर किया है। इस सर्वे में 781 जिलों के 74,229 स्कूलों में तीसरी, छठी और नौवीं कक्षा के 21.15 लाख से अधिक छात्रों का मूल्यांकन किया गया। नतीजे बताते हैं कि बुनियादी साक्षरता, गणित और तार्किक सोच में छात्रों की कमी चिंता का सबब है।
परख सर्वे, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत है, ने भाषा, गणित, पर्यावरण अध्ययन (तीसरी और छठी कक्षा) और विज्ञान व सामाजिक विज्ञान (नौवीं कक्षा) में छात्रों का आकलन किया। नतीजों से पता चलता है कि जैसे-जैसे छात्र ऊपरी कक्षाओं में जाते हैं, उनकी योग्यता कम होती जाती है। गणित सबसे कमजोर विषय रहा। तीसरी कक्षा में केवल 55% छात्र 99 तक की संख्याओं को क्रम में लगा पाते हैं, और 58% ही दो अंकों की जोड़-घटाव कर पाते हैं। छठी कक्षा में सिर्फ 53% छात्र 10 तक का पहाड़ा जानते हैं, और केवल 29% साधारण भिन्नों को समझ पाते हैं। नौवीं कक्षा में हालात और खराब हैं, जहां गणित में राष्ट्रीय औसत स्कोर 37% है, और 63% छात्र भिन्न और पूर्णांक जैसे बुनियादी अवधारणाओं को नहीं समझ पाते।

भाषा में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। छठी कक्षा में 43% छात्र पाठ की मुख्य बातें समझने या निष्कर्ष निकालने में असमर्थ हैं। नौवीं कक्षा में विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में स्कोर 40% के आसपास है, जिसमें छात्र बिजली, ज्यामिति और वैज्ञानिक तर्क जैसी चीजों को समझने में कमजोर दिखे। ये कमियां बताती हैं कि शुरुआती कक्षाओं में बुनियादी कौशल मजबूत नहीं हो पा रहे, जो बाद में और बिगड़ता है।
सर्वे में असमानताएं भी सामने आईं। तीसरी कक्षा में ग्रामीण छात्र शहरियों से भाषा और गणित में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, शायद निपुण भारत मिशन जैसे प्रयासों के कारण। लेकिन छठी और नौवीं कक्षा में शहरी छात्र ग्रामीणों से आगे निकल जाते हैं। लिंग के आधार पर अंतर कम है, लेकिन लड़कियां भाषा में थोड़ा बेहतर (तीसरी कक्षा में 65% बनाम 63%) हैं, जबकि गणित में दोनों बराबर हैं। केंद्रीय स्कूल, जैसे केंद्रीय विद्यालय, नौवीं कक्षा में भाषा में बेहतर हैं, लेकिन तीसरी कक्षा में गणित में पीछे हैं। सरकारी स्कूल शुरुआती कक्षाओं में अच्छे हैं, जबकि निजी स्कूल विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में बेहतर हैं, लेकिन गणित में कमजोर हैं।

पंजाब, केरल, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़ और दादरा व नगर हवेली जैसे राज्य शीर्ष पर हैं, जबकि झारखंड, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश के जिले सबसे नीचे हैं। ये अंतर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण की कमी को दर्शाते हैं।

शिक्षाविदों ने एनईपी के अनुरूप नई शिक्षण विधियों और डिजिटल लर्निंग पर जोर दिया है।
भारत अगर डेटा-आधारित शिक्षा सुधार चाहता है, तो परख सर्वे एक बड़ा अलार्म है। यह न केवल नीतिगत सुधारों की मांग करता है, बल्कि परीक्षा-केंद्रित शिक्षा के बजाय समग्र सीखने की संस्कृति की जरूरत को रेखांकित करता है। तत्काल हस्तक्षेप के बिना, समान और योग्यता-आधारित शिक्षा का सपना अधूरा रहेगा।

वृंदावन की आत्मा बुलडोजर के निशाने पर: वृंदावन धाम को टूरिस्ट स्पॉट क्यों बनाया जा रहा है?

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मथुरा। वृंदावन की आत्मा हौले हौले मर रही है। श्री कृष्ण की पावन लीला भूमि, जहाँ कभी बाँसुरी की तान गूँजती थी, आज कंक्रीट के जंगल और भ्रष्टाचार की चीखों में दम तोड़ रही है। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश लगती है-सरकार की वह नीति, जो वृंदावन को आध्यात्मिक धाम से चकाचौंध भरे टूरिस्ट स्पॉट में बदलने पर तुली है। यह प्रगति नहीं, बल्कि पवित्रता का निर्मम विनाश है। सवाल यह नहीं कि वृंदावन क्यों बदल रहा है-सवाल यह है कि सरकार इस पवित्र धरती की आत्मा को कुचलने पर क्यों आमादा है?

वह वृंदावन कहाँ गया, जिसे भागवत पुराण में कृष्ण की लीला भूमि कहा गया? वह धरती जहाँ यमुना की लहरें भक्तों के पाप धोती थीं, जहाँ कदम्ब के वृक्षों की छाँव में गोपियाँ नाचती थीं, जहाँ ब्रज की धूल को माथे पर लगाना तीर्थयात्रियों का गर्व था? आज वह सब खतरे में है। यमुना, जो कभी देवी कहलाती थी, अब एक जहरीली नाली बनकर रह गई है। उसका जल काला पड़ चुका है, औद्योगिक कचरे और सीवेज से भरा हुआ। घाट, जहाँ संध्या आरती की धुन गूँजती थी, अब टूटे-फूटे हैं या बिल्डरों के कब्जे में। बाढ़ के मैदानों पर अवैध कॉलोनियाँ और सरकारी मंजूरी वाले होटल खड़े हो गए हैं। वृंदावन की हरियाली-वो वन, वो उपवन—अब कंक्रीट के टावरों और पाँच सितारा आश्रमों की चपेट में हैं।
आकाश, जो कभी मंदिरों के शिखरों से सजा था, अब ऊँची-ऊँची इमारतों की भेंट चढ़ चुका है। ब्रज की वह पवित्र धूल, जिसे देवता भी पूजते थे, अब प्लास्टिक, मलबे और गंदे पानी से दब गई है। हर गली-नुक्कड़ पर कूड़े के ढेर और दिखावटी सौंदर्यीकरण की परियोजनाएँ—नियॉन लाइट्स, पत्थर की पट्टियाँ, फव्वारे—भ्रष्टाचार की गंध फैलाती हैं। यह वृंदावन नहीं, बल्कि एक व्यावसायिक जाल है, जो भक्तों की आस्था को लूटने के लिए बिछाया गया है।

सबसे बड़ा घाव है तथाकथित “वृंदावन कॉरिडोर”। यह कॉरिडोर किसके लिए? भक्तों ने तो इसकी माँग नहीं की थी। स्थानीय मंदिर समुदायों से सलाह तक नहीं ली गई। वाराणसी और उज्जैन की तर्ज पर बन रही इस परियोजना के नाम पर सदियों पुराने मंदिरों को ध्वस्त करने की योजनाएं बताई जा रही हैं। उनकी संपत्ति हड़पने की धमकी दी जा रही है। क्या यह विकास है, या वृंदावन की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का चुपके से विनाश? स्थानीय लोग, संत और मंदिर संगठन सड़कों पर हैं। विरोध प्रदर्शन गूँज रहे हैं। यहाँ तक कि भाजपा सांसद हेमा मालिनी, जो पहले इस परियोजना की समर्थक थीं, अब खुद को शक्तिशाली लॉबी के जाल में फँसा पा रही हैं।

विडंबना यह है कि जो सरकार वृंदावन की विरासत को बचाने का दावा करती है, वही उसे रौंद रही है। अगर सरकार को सचमुच इस धाम की परवाह होती, तो वह यमुना को साफ करती। वनों को पुनर्जनन देती। घाटों को पुनर्जनन देती। वृंदावन को वाहन-मुक्त क्षेत्र बनाती, गोल्फ कार्ट जैसे पर्यावरण-अनुकूल साधनों को बढ़ावा देती। स्थानीय लोगों को उनके भविष्य का फैसला करने का हक देती। लेकिन इसके बजाय, हम एक धीमी हत्या देख रहे हैं। लालच और अदूरदर्शिता का कालिया नाग फिर से सिर उठा रहा है।

वृंदावन की आत्मा आज रो रही है। कृष्ण के पदचिह्नों वाली माटी, यमुना की लहरों में गूँजती मुरलियाँ, भक्तों के जयकारे—सब कुछ दम तोड़ रहा है। सरकारी फाइलों में इसे “विकास” का नाम दिया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत में यह ब्रज की आत्मा पर हमला है। सवाल उठता है: क्या सरकार वृंदावन को बचाना चाहती है, या व्यवसाय के लिए बेचना? क्या कृष्ण की इस लीला भूमि को कंक्रीट के जंगल में तब्दील करना ही हमारा भाग्य है? यह सिर्फ वृंदावन का सवाल नहीं—यह हमारी आस्था, हमारी संस्कृति और हमारे इतिहास का सवाल है। अगर आज हम चुप रहे, तो कल वृंदावन सिर्फ एक टूरिस्ट स्पॉट बनकर रह जाएगा— क्या यही ब्रज मंडल की नियति है?

वो रेडियो का ज़माना: यादों का सुरीला सफर

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दिल्ली। रेडियो की दुनिया एक जादुई दरवाज़ा थी, जहाँ आवाज़ें सपने बुनती थीं और गीत दिलों को छू लेते थे। बिनाका गीतमाला उस दौर का सबसे चमकता सितारा था, जिसने 1952 से हर बुधवार की शाम को लाखों श्रोताओं को अमीन सयानी के मधुर स्वर और फिल्मी गीतों के जादू में बाँध दिया। “जाएँ तो जाएँ कहाँ…” जैसे गीतों ने लोकप्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित किए, और श्रोताओं के वोट से तय होता था कौन सा गीत “सरताज” बनेगा । यह कार्यक्रम सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि एक सामूहिक भावनात्मक अनुभव था, जिसमें रेडियो सीलोन से विविध भारती तक का सफर शामिल था।

विविध भारती के फरमाइशी कार्यक्रम तो दिलों की धड़कन थे। श्रोताओं के पत्र खासतौर से झुमरी तलैया से पढ़कर उनकी पसंद के गीत बजाने का यह अनूठा तरीका रिश्तों को गीतों से जोड़ देता था। समाचारों की दुनिया में मेलविल डिमेलो और पांडे जी जैसे आइकॉनिक न्यूज़ रीडर्स की गंभीर और स्पष्ट आवाज़ें लोगों के दिन की शुरुआत और अंत तय करती थीं। उनकी प्रस्तुति में एक ऐसा विश्वास था जो आज भी याद किया जाता है।

उस ज़माने का रोमांटिसिज़्म सिर्फ गीतों में नहीं, बल्कि उस इंतज़ार में था जब रेडियो पर कोई खास कार्यक्रम प्रसारित होता था। यह वह दौर था जब आवाज़ें इतिहास रचती थीं और शब्दों में जादू बसता था — एक ऐसा जादू जो आज भी हमारी यादों में जिंदा है।

1936 में शुरू हुआ एआईआर भारत के सामाजिक-संस्कृतिक और राजनीतिक ढांचे का आधार रहा है, जिसने राष्ट्रीय विकास, संस्कृति संरक्षण, और संकटकाल में संचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन इंटरनेट, मल्टीमीडिया प्लेटफॉर्म्स, और सोशल मीडिया के आगमन के साथ, एआईआर की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि प्राइवेट एफएम चैनल और डिजिटल मीडिया का दबदबा बढ़ गया है।
एआईआर ने भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति को संरक्षित करने में जबरदस्त योगदान दिया है। डिजिटल युग से पहले, एआईआर हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत को बढ़ावा देने का मुख्य मंच था, जहां पंडित रवि शंकर, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, और एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी जैसे उस्तादों को मंच मिला। नेशनल प्रोग्राम ऑफ म्यूजिक और एआईआर संगीत सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों ने शास्त्रीय संगीत को आम लोगों तक पहुंचाया, जिससे इसकी सराहना बढ़ी। एआईआर के आर्काइव्स, जिसमें हजारों घंटों की रिकॉर्डिंग्स हैं, भारत की संगीतमय विरासत का अनमोल खजाना हैं, जो दुर्लभ रचनाओं और प्रदर्शनों को संरक्षित करते हैं। संगीत के अलावा, एआईआर ने युवा वाणी और विविध भारती जैसे कार्यक्रमों के जरिए क्षेत्रीय साहित्य, लोक परंपराओं, और भाषाओं को बढ़ावा दिया, जिससे भारत की सांस्कृतिक विविधता मजबूत हुई।

एआईआर ने राष्ट्र-निर्माण में भी अहम भूमिका निभाई। 1960 और 1970 के दशक की हरित क्रांति के दौरान, कृषि दर्शन जैसे प्रसारणों ने किसानों को उच्च-उपज वाली बीजों, खाद, और सिंचाई तकनीकों, खासकर “रेडियो राइस” जैसे IR8 की जानकारी दी। स्वास्थ्य और परिवार नियोजन जागरूकता अभियानों ने कम साक्षरता वाले ग्रामीण क्षेत्रों में लाखों लोगों तक पहुंच बनाई। एआईआर ने सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों को प्रसारित करके दूरदराज के समुदायों को विकास योजनाओं से जोड़ा।

चीन (1962) और पाकिस्तान (1965, 1971) के साथ युद्धों के दौरान, एआईआर ने राष्ट्रीय एकता और मनोबल को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। इसके प्रसारणों ने दुश्मन के प्रचार का मुकाबला किया, रीयल-टाइम अपडेट्स दिए, और देशभक्ति गीतों व भाषणों के जरिए नागरिकों को प्रेरित किया। एक सरकारी प्रसारक के रूप में इसकी विश्वसनीयता ने इसे संकटकाल में देश की आवाज बनाया।
मास कम्युनिकेशन एक्सपर्ट मुक्ता बेंजामिन के मुताबिक इन उपलब्धियों के बावजूद, तकनीकी प्रगति ने एआईआर की प्रासंगिकता को कम किया है। इंटरनेट, ऑन-डिमांड कंटेंट, स्ट्रीमिंग सेवाएं, और सोशल मीडिया ने मीडिया खपत को बदल दिया है। प्राइवेट एफएम चैनल्स, अपने जीवंत और युवा-केंद्रित कंटेंट के साथ, एआईआर के पुराने प्रारूपों पर भारी पड़ रहे हैं। स्पॉटिफाई, यूट्यूब, और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स वैश्विक संगीत, समाचार, और मनोरंजन तक तुरंत पहुंच प्रदान करते हैं, जिससे एआईआर की कठोर समय-सारिणी और सीमित क्षेत्रीय पहुंच कम आकर्षक हो गई है। आलोचक कहते हैं कि टैक्सपेयर के पैसे से चलने वाला एआईआर अब संसाधनों की बर्बादी है, जो बाजार-आधारित मीडिया इकोसिस्टम में टिक नहीं पा रहा।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “प्रासंगिक बने रहने के लिए, एआईआर को तकनीक का इस्तेमाल करके और अपनी मिशन को फिर से परिभाषित करके खुद को नया करना होगा। एआईआर को अपने विशाल आर्काइव्स को डिजिटाइज करना चाहिए, शास्त्रीय संगीत और सांस्कृतिक रिकॉर्डिंग्स को ऐप्स या स्ट्रीमिंग सेवाओं पर उपलब्ध कराना चाहिए। स्पॉटिफाई जैसे वैश्विक प्लेटफॉर्म्स के साथ साझेदारी या एक समर्पित एआईआर ऐप युवा दर्शकों को आकर्षित कर सकता है। एआईआर को हाइपर-लोकल कंटेंट पर ध्यान देना चाहिए ताकि एफएम की शहरी अपील का मुकाबला किया जा सके। अपने नेटवर्क के तहत सामुदायिक रेडियो स्टेशनों को सशक्त करके, एआईआर जलवायु परिवर्तन से लेकर शिक्षा तक स्थानीय मुद्दों को स्थानीय भाषाओं में संबोधित कर सकता है। साथ ही युवा इन्फ्लूएंसर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के साथ समन्वय करते हुए, रेडियो प्रासंगिक हो सकता है।”

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