Dramatic rise in the number of journalists killed in six months

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Nava Thakuria

Geneva, 11 July 2025: The number of journalists killed rose dramatically in the first six months of this year. Since January, 86 media workers have been killed in 26 countries, more than 16% compared to last year, said the Press Emblem Campaign (PEC). The continuing hostilities in the Gaza Strip largely explain this very high toll, where at least 31 Palestinian journalists were killed in six months by the Israeli army (more than a third of the six-month total).

“The Israeli government is directly responsible for this tragedy, which targets civilians reporting on the situation in Gaza. The Israeli soldiers involved in these war crimes must be identified and prosecuted. This is a massacre on an unprecedented scale, with nearly 200 Palestinian journalists killed since October 2023,” said PEC President Blaise Lempen, adding that the ‘fighting must absolutely stop’.

Hostilities in Sudan have also been deadly for journalists on the ground, with six killed since January. In Mexico, six journalists were murdered, one per month. Fighting between Ukraine and Russia also claimed victims, 6 in all, including 5 in Ukrainian areas claimed by Moscow and in Russia. Another conflict led to the death of 4 media employees in Teheran, during Israeli bombardments in Iran during June.

Four journalists have been killed in India since 1 January, and 3 in Pakistan. Colombia, Honduras, Iraq, the United States of America, Peru, Somalia, Syria and Yemen follow with 2 victims in each country. One fatality was reported in Brazil, the Democratic Republic of Congo, Ecuador, Guatemala, Haiti, Lebanon, Nepal, the Philippines, Saudi Arabia and Zimbabwe. By region, the Middle East was the deadliest, with 43 victims, followed by Latin America with 16, Africa with 10, Europe with 6 and North America with 2. Last year, a record 179 media workers were killed (including 80 in Gaza), 74 during the first half of the year.

PEC’s south & southeast Asia representative Nava Thakuria informed that India lost Mukesh Chandrakar, Raghavendra Vajpayee, Sahadev Dey and Dharmendra Singh Chauhan to assailants in the first half of 2025. Pakistan witnessed the murder of Allah Dino Shar, Abdul Latif Baloch and Syed Mohammed Shah, whereas Nepal saw one journalist (Suresh Rajak) murdered in this period. Trouble-torn nations Bangladesh and Myanmar have however evaded any journo-murder till date this year. The PEC condemns all these crimes and demands thorough investigations, in the hope that the second half of 2025 will be calmer.

बिहार में बीजेपी की सोशल मीडिया रणनीति: राजद और कांग्रेस से पिछड़ने के कारण

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बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियां जोरों पर हैं, और इस बार का चुनावी माहौल पहले से कहीं अधिक डिजिटल हो चुका है। सोशल मीडिया अब केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि एक ऐसा युद्धक्षेत्र बन चुका है, जहां पार्टियां अपनी छवि, नीतियों और नेताओं को जनता तक पहुंचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं। इस डिजिटल युद्ध में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस की आईटी सेल ने बिहार में प्रभावी उपस्थिति दर्ज की है, जबकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और उसके सहयोगी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) सोशल मीडिया के इस खेल में पिछड़ते दिख रहे हैं। आइए, इसके कारणों और बिहार के डिजिटल चुनावी परिदृश्य का विश्लेषण करें।

राजद की सोशल मीडिया रणनीति: मजबूत और प्रभावी

राजद ने बिहार में सोशल मीडिया पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए सुनियोजित रणनीति अपनाई है। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं, विशेष रूप से यादव और मुस्लिम समुदायों के समर्थकों को, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने और वीडियो कंटेंट बनाने का निर्देश दिया है। यह रणनीति खास तौर पर ग्रामीण और छोटे शहरों के मतदाताओं को प्रभावित करने में कारगर साबित हो रही है। राजद समर्थकों की एक खास रणनीति यह भी देखी गई है कि वे छद्म नामों से कई सोशल मीडिया अकाउंट्स संचालित करते हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि उनके समर्थन में व्यापक जनमत है। कई बार दो विरोधी दिखने वाली बहसें भी वास्तव में राजद समर्थकों द्वारा ही संचालित होती हैं, जो उनकी डिजिटल उपस्थिति को और मजबूत करती हैं।

इसके अलावा, राजद का एक प्रमुख समाचार चैनल, आज तक के एक उपक्रम बिहार तक, के साथ गठजोड़ होने की चर्चा है, जो उनके पक्ष में कवरेज देता दिखता है। यह चैनल बिहार के ग्रामीण और शहरी दर्शकों तक पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। राजद का हाल ही में लॉन्च किया गया थीम सॉन्ग, जिसमें तेजस्वी यादव को केंद्र में रखा गया है, युवाओं और विकास के मुद्दों पर जोर देता है। यह सॉन्ग सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिससे राजद की डिजिटल रणनीति को और बल मिल रहा है।

कांग्रेस की आईटी सेल: पत्रकारों का प्रभाव और सोशल मीडिया की ताकत

कांग्रेस की सोशल मीडिया रणनीति भी बिहार में प्रभावी रही है। पार्टी ने अपने आईटी सेल में बड़े, मध्यम और छोटे स्तर के पत्रकारों को शामिल किया है, जो विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय हैं। उदाहरण के लिए, संदीप सिंह जैसे बड़बोले सोशल मीडिया एक्टिविस्ट और अजीत अंजुम जैसे वरिष्ठ पत्रकारों की मौजूदगी कांग्रेस की सोशल मीडिया उपस्थिति को विश्वसनीयता और आक्रामकता दोनों प्रदान करती है। एबीपी न्यूज के प्राइम टाइम एंकर संदीप चौधरी भी कांग्रेस आईटी सेल की भाषा ही अपने शो में बोलते हुए दिखाई देते हैं। यह संयोग है कि दोनों पत्रकारों का कॅरियर कांग्रेसी नेता राजीव शुक्ला चैनल के न्यूज 24 में बना और संवरा है।

कांग्रेस ने बिहार में उम्मीदवारों के चयन के लिए एक अनोखी शर्त रखी है: सोशल मीडिया पर न्यूनतम फॉलोअर्स की संख्या। यह रणनीति यह दर्शाती है कि पार्टी डिजिटल प्रभाव को कितना महत्व दे रही है। हालांकि, यह शर्त कई मौजूदा विधायकों के लिए चुनौती बन सकती है, लेकिन यह कांग्रेस की सोशल मीडिया रणनीति की गंभीरता को दर्शाता है। पार्टी ने व्हाट्सएप ग्रुप्स और फेसबुक पेजों के जरिए स्थानीय स्तर पर नेटवर्क तैयार किया है, जिससे वह ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अपनी पहुंच बढ़ा रही है।

बीजेपी और जदयू की कमजोरियां: सोशल मीडिया में पिछड़ने के कारण

दूसरी ओर, बीजेपी और जदयू की सोशल मीडिया रणनीति अभी तक उतनी प्रभावी नहीं दिख रही। बीजेपी, जो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत आईटी सेल के लिए जानी जाती है, बिहार में स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में असफल रही है। पार्टी का सोशल मीडिया बजट बड़े मीडिया हाउसेज और कुछ नेताओं की निजी कंपनियों तक सीमित रहता है, जिससे जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं और छोटे यूट्यूबर्स को प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा।

बीजेपी के कुछ समर्थक यूट्यूबर्स, जैसे अदिति त्यागी और अभिषेक तिवारी, बिहार की जनता की नब्ज को पूरी तरह समझ नहीं पा रहे। अदिति, जो पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हैं, बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों की भावनाओं और मुद्दों से पूरी तरह जुड़ नहीं पा रही हैं। वहीं, अभिषेक तिवारी के शो के विषय अक्सर सामान्य और हल्के-फुल्के होते हैं, जो बिहार के मतदाताओं के गंभीर मुद्दों को संबोधित करने में नाकाम रहते हैं।

जदयू की स्थिति और भी कमजोर है। पार्टी ने सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करने में देरी की है। हालांकि, जदयू ने हाल ही में कुछ प्रयास शुरू किए हैं, जैसे भाषणों के प्रसारण के लिए वेबसाइट शुरू करना, लेकिन यह अभी तक राजद और कांग्रेस की तुलना में कम प्रभावी है।

प्रशांत किशोर और मनीष कश्यप की नई रणनीति

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करने के लिए कदम उठाए हैं। मनीष कश्यप जैसे प्रभावशाली यूट्यूबर, जिन्होंने हाल ही में जन सुराज में शामिल होकर बिहार के 400 यूट्यूबर्स को पटना में एकत्र किया, ने डिजिटल क्षेत्र में नया उफान ला दिया है। यह उपलब्धि छोटे शहरों और गांवों के यूट्यूबर्स को एकजुट करने में महत्वपूर्ण है, जो बिहार के मतदाताओं को प्रभावित करने में सक्षम हैं।

बिहार का चुनावी गणित और सोशल मीडिया की भूमिका

बिहार की राजनीति हमेशा से जातिगत समीकरणों और गठबंधनों पर निर्भर रही है। राजद ने अपने MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण को मजबूत करने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लिया है, जबकि बीजेपी और जदयू ने अभी तक इस क्षेत्र में समान उत्साह नहीं दिखाया। 2024 के लोकसभा चुनाव में राजद ने 22.14% वोट शेयर हासिल किया, जो बीजेपी (20.52%) और जदयू (18.52%) से अधिक था। यह दर्शाता है कि राजद की डिजिटल रणनीति पहले से ही मतदाताओं को प्रभावित कर रही है।

सोशल मीडिया का प्रभाव केवल प्रचार तक सीमित नहीं है। यह मतदाताओं के बीच नैरेटिव सेट करने और विरोधी दलों के खिलाफ माहौल बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राजद और कांग्रेस ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत की है, जबकि बीजेपी और जदयू अभी तक अपनी रणनीति को प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर पाए।

बीजेपी के लिए चुनौतियां और संभावनाएं

बिहार में बीजेपी और जदयू को सोशल मीडिया पर अपनी रणनीति को और आक्रामक और जमीनी स्तर पर लागू करने की आवश्यकता है। जहां राजद और कांग्रेस ने स्थानीय कार्यकर्ताओं और छोटे यूट्यूबर्स को सक्रिय कर अपनी पहुंच बढ़ाई है, वहीं बीजेपी का फोकस बड़े मीडिया हाउसेज और कुछ चुनिंदा नेताओं तक सीमित है। छोटे यूट्यूबर्स और स्थानीय कार्यकर्ताओं की शक्ति को नजरअंदाज करना बीजेपी के लिए महंगा साबित हो सकता है।हालांकि, बीजेपी और जदयू के पास अभी भी समय है कि वे अपनी रणनीति में सुधार करें। ऑपरेशन सिंदूर और नीतीश कुमार के प्रति सहानुभूति जैसे मुद्दों पर जोर देकर बीजेपी मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है।

यदि बीजेपी और जदयू छोटे यूट्यूबर्स और कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में सफल हो जाते हैं, तो वे इस डिजिटल युद्ध में राजद और कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। बिहार का चुनावी गणित अब केवल जातिगत समीकरणों पर नहीं, बल्कि डिजिटल रणनीति की ताकत पर भी निर्भर करेगा

‘थुलथुल’ नहीं रहे थानवी

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वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी का नाम भारतीय पत्रकारिता में एक जाना-पहचाना नाम है। उनकी लेखनी, बेबाक राय और विवादों से पुराना नाता रहा है। चाहे वह भाजपा नेता कल्याण सिंह के हाथों सम्मान लेने का मामला हो या फिर कांग्रेस सरकार के करीब रहकर राजस्थान में विश्वविद्यालय के उपकुलपति का पद हासिल करने का आरोप, थानवी हमेशा चर्चा में रहे। लेकिन इन दिनों वह एक अलग वजह से सुर्खियों में हैं। उनके विरोधी उन्हें व्यंग्य में “थुलथुल थानवी” कहकर पुकारते थे, मगर हाल ही में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आईआईसी) में उनकी बदली हुई छवि ने सबका ध्यान खींचा। न तो उनका पेट अब बाहर निकला दिखता है, न ही वे पहले की तरह 90 किलो के लगते हैं। यह बदलाव उनके खान-पान में सुधार का नतीजा है या कोई और राज? यह सवाल हर किसी के मन में कौंध रहा है।

थानवी की यह शारीरिक बदलाव की कहानी केवल उनकी सेहत तक सीमित नहीं है; यह उनके व्यक्तित्व और अनुशासन की भी कहानी बयां करती है। पत्रकारिता जैसे क्षेत्र में, जहां तनाव और अनियमित जीवनशैली आम है, इस तरह का परिवर्तन आसान नहीं। दिल्ली के पत्रकारिता जगत में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या थानवी ने अपनी दिनचर्या में कोई खास बदलाव किया? क्या यह योग, व्यायाम, या संतुलित आहार का कमाल है? कुछ लोग अनुमान लगा रहे हैं कि शायद उन्होंने किसी विशेषज्ञ की सलाह ली हो। लेकिन इस रहस्य का जवाब केवल उनके करीबी ही दे सकते हैं।

थानवी का यह परिवर्तन एक प्रेरणा भी है। पत्रकारिता में व्यस्तता और तनाव के बीच स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना आसान नहीं। फिर भी, उनकी यह उपलब्धि दिखाती है कि दृढ़ संकल्प और अनुशासन से कुछ भी संभव है। उनके विरोधी, जो उन्हें “थुलथुल” कहकर चिढ़ाते थे, अब शायद उनकी इस नई छवि से प्रभावित हों। यह बदलाव न केवल शारीरिक, बल्कि सामाजिक और पेशेवर स्तर पर भी उनकी छवि को नया आयाम दे सकता है।

अब सवाल यह है कि क्या थानवी इस बदलाव की कहानी को सार्वजनिक करेंगे? उनके प्रशंसक और सहकर्मी इस राज को जानने को उत्सुक हैं।

उदयपुर फाइल्स: अभिव्यक्ति की आजादी और सामाजिक संवेदनशीलता का टकराव

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2022 में उदयपुर के कन्हैया लाल तेली की निर्मम हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। एक साधारण दर्जी, जिसने सोशल मीडिया पर तत्कालीन बीजेपी प्रवक्ता नूपुर शर्मा के समर्थन में एक पोस्ट साझा की थी, उसे दो व्यक्तियों—मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद—ने दिनदहाड़े अपने दुकान में घुसकर मार डाला। इस घटना ने न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए, बल्कि अभिव्यक्ति की आजादी और सामुदायिक संवेदनशीलता के बीच जटिल रिश्ते को भी उजागर किया। इस हत्याकांड पर आधारित फिल्म उदयपुर फाइल्स, जिसमें अभिनेता विजय राज मुख्य भूमिका में हैं, इसी संवेदनशील मुद्दे को सिल्वर स्क्रीन पर लाने का प्रयास है। लेकिन यह फिल्म रिलीज से पहले ही विवादों के घेरे में आ गई है। दिल्ली हाई कोर्ट ने 10 जुलाई 2025 को इसकी रिलीज पर अंतरिम रोक लगा दी, जिसने इस मामले को और जटिल बना दिया है।

फिल्म उदयपुर फाइल्स कन्हैया लाल की हत्या की कहानी को एक सिनेमाई रूप देने का दावा करती है। ट्रेलर के अनुसार, यह फिल्म उस क्रूर घटना को पुनर्जनन करती है, जिसमें कन्हैया लाल का सिर कलम कर दिया गया था। निर्माताओं का कहना है कि यह फिल्म किसी समुदाय विशेष को निशाना नहीं बनाती, बल्कि एक अपराध की कहानी कहती है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) ने भी दावा किया कि फिल्म के 55 हिस्सों में बदलाव या कटौती की गई है, जो लगभग 11 मिनट के हिस्से को प्रभावित करता है। फिर भी, जमीयत उलेमा-ए-हिंद और अन्य याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि यह फिल्म मुस्लिम समुदाय को नकारात्मक रूप में चित्रित करती है और सांप्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा दे सकती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि फिल्म में नूपुर शर्मा के विवादास्पद बयानों को शामिल किया गया है, जो धार्मिक भावनाओं को भड़का सकता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर सुनवाई करते हुए फिल्म की रिलीज पर रोक लगाई और याचिकाकर्ताओं को केंद्र सरकार से संपर्क करने का निर्देश दिया, ताकि सीबीएफसी द्वारा दिए गए प्रमाणन की समीक्षा की जा सके। कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि इस बीच कोई अपूरणीय नुकसान न हो। इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया था और मौखिक रूप से कहा था, “फिल्म को रिलीज होने दें।” हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने बाद में स्पष्ट किया कि उसने कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया था, जिससे दिल्ली हाई कोर्ट में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई।

यह विवाद अभिव्यक्ति की आजादी और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच एक गहरे टकराव को दर्शाता है। कन्हैया लाल की हत्या को एक ऐसी घटना के रूप में देखा जाता है, जिसने अभिव्यक्ति की आजादी पर सवाल खड़े किए। ठीक वैसे ही, जैसे 2015 में फ्रांस के शार्ली हेब्दो पत्रिका के कार्यालय पर हुआ आतंकी हमला, जिसमें कार्टूनिस्टों को केवल इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उनके कार्टून कुछ लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करते थे। दोनों ही घटनाएं यह सवाल उठाती हैं कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी की कोई सीमा होनी चाहिए? शार्ली हेब्दो हमले के बाद वैश्विक स्तर पर “Je Suis Charlie” आंदोलन ने अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन किया, लेकिन भारत में कन्हैया लाल के मामले में ऐसी कोई एकजुटता नहीं दिखी। बल्कि, जैसा कि कुछ लोग तंज कसते हैं, अभिव्यक्ति की आजादी के तथाकथित चैंपियन मौन रहे, क्योंकि यह मामला उनके “चुनिंदा प्रेम” के दायरे में नहीं आता था।

उदयपुर फाइल्स के निर्माता, जिनमें हिंदुत्व कार्यकर्ता अमित जानी शामिल हैं, दावा करते हैं कि यह फिल्म सच्चाई को सामने लाने का प्रयास है। लेकिन याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह फिल्म न केवल चल रहे मुकदमे को प्रभावित कर सकती है, बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी नुकसान पहुंचा सकती है। विशेष रूप से, यह आरोप लगाया गया है कि फिल्म में मुस्लिम समुदाय को आतंकवाद और अन्य नकारात्मक छवियों से जोड़ा गया है, जो सांप्रदायिक तनाव को बढ़ा सकता है।

इस पूरे प्रकरण में एक और दिलचस्प पहलू यह है कि फिल्म को लेकर सोशल मीडिया पर भी ध्रुवीकरण देखने को मिल रहा है। कुछ लोग इसे साहसी कदम मानते हैं, जो एक क्रूर अपराध को उजागर करता है, जबकि अन्य इसे सांप्रदायिक नफरत फैलाने का हथियार मानते हैं। एक्स पर कुछ पोस्ट्स में फिल्म के ट्रेलर को साझा करते हुए इसे “आतंकवाद के खिलाफ आवाज” बताया गया, वहीं अन्य ने इसे “मुसलमानों के खिलाफ नफरत” फैलाने वाला करार दिया।

यह विवाद हमें एक बार फिर उस जटिल रेखा पर लाकर खड़ा करता है, जहां कला, अभिव्यक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी का टकराव होता है। उदयपुर फाइल्स केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक दर्पण है, जो समाज के उन घावों को उजागर करता है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। सवाल यह है कि क्या यह फिल्म सच्चाई को सामने लाएगी या फिर समाज में पहले से मौजूद दरारों को और गहरा करेगी? इसका जवाब शायद तभी मिलेगा, जब केंद्र सरकार इस मामले पर अंतिम फैसला लेगी।

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