भाषायी विवादों के पीछे विभाजनकारी षड्यंत्र

images.jpeg

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

संत ज्ञानेश्वर और हिंदवी स्वराज्य प्रणेता छत्रपति शिवाजी महाराज की पुण्यभूमि में राजनीतिक वितंडावादियों ने ‘भाषा’ के नाम पर जिस अराजकता का परिचय दिया।हिंसा का मार्ग अपनाते हुए विभाजनकारी सोच का उत्पात मचाया। वह हर किसी को अंदर से झकझोर देने वाला षड्यंत्र है। वस्तुत: ऐसा करने वालों के मूल में ‘मराठी अस्मिता’ का भाव नहीं है। बल्कि वे भारत की विराट पहचान को मिटाने की कुत्सित सोच से ग्रसित हैं। आप सोचिए कि जिस महान महाराष्ट्र की भूमि में – संत नामदेव , संत एकनाथ, संत तुकाराम महाराज, संत बहिणाबाई,संत जनाबाई, संत कान्होपात्रा और समर्थ रामदास, संत गाडगे जैसी महान विभूतियों ने राष्ट्रीय एकता और एकात्मता को स्थापित किया हो। मूल्यों, संस्कारों और आदर्शों का मार्ग दिखाया हो। उस भूमि से अगर अलगाव के उत्पाती कृत्य आ रहे हों तो यह निश्चित तौर पर महाराष्ट्र की छवि को धूमिल करने का षड्यंत्र ही सिद्ध होता है।‌ जो ‘मराठी अस्मिता’ के नाम पर समाज में विभाजन फैला रहे हैं। विराट हिंदू समाज को बांटने का षड्यंत्र कर रहे हैं। वे महाराष्ट्र के आदर्शों की कही या लिखी गई — ऐसी एक पंक्ति लाकर समाज के मध्य दिखला दें। जो किसी भी प्रकार के विभाजन की बात करती हो। ऐसे में क्या यह अक्षम्य अपराध नहीं है? क्या महाराष्ट्र की महान परंपरा को आघात पहुंचाने वालों को समाज स्वीकार करेगा?

ईश्वरीय निमित्त वश मुझे छत्रपति शिवाजी महाराज द्वारा स्थापित हिंदवी स्वराज्य स्थापना के 350 वें वर्ष पर एक ग्रंथ के संपादन का सौभाग्य मिला। उस समय मैंने छत्रपति शिवाजी महाराज से जुड़े कई ग्रंथों का अध्ययन किया।‌विभिन्न विद्वानों के विचारों को पढ़ा और सुना। लेकिन एक भी अंश ऐसा नहीं पाया जब छत्रपति शिवाजी महाराज ने स्थानीयता, प्रांतीयता की परिधि में स्वयं को समेटा हो। उनके कार्यों और विचारों की दृष्टि सर्वदा अखिल भारतीय-अखंड भारत वर्ष पर ही केंद्रित रही।‌ शिवाजी महाराज ने जब स्वराज्य की स्थापना की तो उसका नाम उन्होंने ‘महाराष्ट्र’ या मराठी राज्य नहीं किया। अपितु उन्होंने उसका नामकरण’हिंदवी स्वराज्य’ किया। उन्होंने स्वराज्य के संचालन के लिए जब ‘राज व्यवहार कोश’ का निर्माण कराया।‌उस समय उन्होंने अरबी फ़ारसी के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ और मराठी के शब्दों का शब्दकोष बनवाया। इसी प्रकार शिवाजी महाराज की राजमुद्रा में ‘संस्कृत’ का प्रयोग किया गया। उनकी राजमुद्रा में लिखा रहता था—
“प्रतिपच्चन्द्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववन्दिता ।
शाहसूनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते ।।”

अभिप्रायत: छत्रपति शिवाजी महाराज ने जिस महान हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की। राष्ट्रीय एकता और एकात्मता को स्थापित किया। अब उस पर ‘मराठी अस्मिता’ के नाम पर आघात किया जा रहा है। विराट हिंदू पहचान को संकुचित और संकीर्ण दायरों में समेटने का अक्षम्य अपराध किया जा रहा है। ऐसा करने वाले ये वही लोग हैं जिन्हें ‘मराठी मानुष’ ने चुनावों में सिरे से खारिज़ कर दिया है। क्योंकि महाराष्ट्र की जनता अपनी महान विरासत के साथ राष्ट्रीय विचारों के साथ एकात्म है।उसे किसी भी हाल में विभाजन स्वीकार नहीं है। ऐसे में विभाजनकारी मानसिकता से ग्रस्त लोग और राजनेता; समाज की एकता को खंडित करने में जुट गए हैं। चाहे हिंदी हो, मराठी हो, तमिल, तेलुगू, कन्नड़ हो या बंगाली हो। संस्कृत हो मलयालम हो, कोंकणी,संथाली या उड़िया हो चाहे पंजाबी हो। याकि कश्मीरी, असमिया, बोडो या डोगरी हो। संथाली, सिंधी, नेपाली हो। सभी भारतीय भाषाएं हमारी हैं। भारत की कोख से जन्मी हर भाषा, बोली और परंपराएं हमारी अमूल्य विरासत हैं। ये किसी व्यक्ति विशेष या राज्य विशेष की संपत्ति नहीं हैं बल्कि हर भारतीय का जीवन मूल्य और संस्कार हैं। इनमें राष्ट्र की महान परंपरा और संस्कृति का अविरल और अक्षुण्ण प्रवाह अंतर्निहित है। जो एक ही धुन सुनाता है जय-जय जय भारत।‌

ऐसे में भला कोई ये दावा कैसे कर सकता है कि— ये मेरी भाषा है-ये तुम्हारी भाषा है? क्या हमारे महापुरुषों और भाषाओं ने किसी भी व्यक्ति, दल या समूह को ऐसे कोई अधिकार दिए हैं? क्या समाज ने कभी भी ऐसे विभाजन को स्वीकार किया है? क्या हमारे संविधान ने ऐसे किसी भी प्रकार के भेदभाव का प्रावधान किया है? इन सबका उत्तर है— नहीं। भारत के कोने-कोने में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपनी हर भाषा, बोली, परंपराओं के प्रति गहरा आदर और श्रद्धा रखता है। उसे अपनी सभी भाषाओं और सभी परंपराओं से प्रेम है। उसके लिए कुछ भी अपना या पराया नहीं है। हमारे सभी श्रद्धा के केंद्र, आदर्श, महापुरुष और भाषाएं हमें एकता के सूत्रों से गुंफित किए हुए हैं।‌हम सबका मस्तक अपनी महान परंपरा के हर मानबिंदु के समक्ष श्रद्धा से नत होता है। यही तो भारतीय मूल्य और संस्कार हैं। हो सकता है सभी को हर भाषा नहीं आती हो। किसी को सभी भारतीय भाषाएं आती हों। किसी को दो-चार या उससे अधिक भाषाएं आती हों।‌लेकिन इसका अर्थ तो ये नहीं कि — इस आधार पर कोई अपनी श्रेष्ठता का दावा करेगा? किसी के साथ अत्याचार या भेदभाव करेगा। यह तो असह्य है। इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।‌

दूजे जहां तक बात रही ‘हिंदी’ के विरोध की — तो ये कोई नई बात नहीं है। भारत विभाजनकारी शक्तियां ‘हिंदी और हिंदू’ के विरोध से अपना षड्यंत्र शुरू करते हैं और फिर हिंदुस्तान के विरोध में उतर जाते हैं। भारत विभाजनकारी शक्तियों का एक और अंतिम लक्ष्य है भारत राष्ट्र का खंडन करना। इसके लिए वो कभी समाज को भाषा के आधार पर लड़ाएंगे। कभी जाति और महापुरुष के नाम पर लड़ाएंगे।‌कभी क्षेत्रवाद, बोली, पहनावों और परंपराओं के नाम पर समाज के मध्य विभाजन की दीवार खड़ी करेंगे। क्योंकि उन्हें ये पता है कि विराट हिंदू समाज को छोटे-छोटे विभाजनों में फंसाकर आसानी से तोड़ा जा सकता है।लेकिन अगर एक और अंतिम पहचान ‘हिंदू’ है तो वे मुंह की खाएंगे।वे कभी भी हिंदू समाज को कमजोर नहीं कर पाएंगे। बस इसी के निमित्त वो कोई न कोई ऐसा भावनात्मक मुद्दा उठाएंगे जो हिंदू समाज को आपस में ही लड़ा देने वाला हो। वो भावनाओं को उद्वेलित करेंगे। मुद्दा बनाएंगे और समाज में विभाजन के विष फैलाने में जुट जाएंगे। अक्सर जो राजनीतिक दल, नेता या समूह हिंदी या संस्कृत का विरोध करते दिखते हैं। वो क्या कभी विदेशी विशेषकर ‘अंग्रेजी’ भाषा का विरोध करते नज़र आए हैं? क्या कभी आपने ऐसा देखा है कि — वे अंग्रेजी के बायकॉट का अभियान चलाते दिखे हों। आप एक भी उदाहरण नहीं देखेंगे। क्योंकि भाषायी आधार पर समाज में अलगाववाद फैलाने वालों का एजेंडा भारतीय भाषाओं-स्थानीय भाषाओं को बढ़ावा देना नहीं है। बल्कि हिंदी विरोध के नाम पर समाज में विभाजन उत्पन्न करना और ध्रुवीकरण करना है। ताकि उनकी राजनीतिक सत्ता बनी रहे और संपूर्ण हिंदू समाज एकजुट न हो पाए। इतना ही नहीं भाषायी या क्षेत्रीय आधार पर अलगाववाद फैलाने वालों के पीछे कई सारी भारत विरोधी शक्तियां काम करती हैं। जो कभी राजनेताओं के माध्यम से,कभी समूहों के माध्यम से — विभाजन उत्पन्न करती रहती हैं।‌ प्रायः चुनावों के समय इसकी गति बढ़ जाती है। क्या आप ये सब अनुभव करते हैं? अगर हां तो तय मानिए कि ये सब बिल्कुल योजनाबद्ध ढंग से किया जाता है। आपने ध्यान दिया होगा कि—
असमय ही हिंदी विरोध की ये मुहिम कभी इस राज्य से तो कभी उस राज्य से दिखाई देती है। ये सब इसलिए होता है क्योंकि राष्ट्र की अधिसंख्य जनता हिंदी में एकता और राष्ट्रीयता का बोध पाती है। ऐसे में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को व्यक्त करने वाले जितने भी प्रतीक, आदर्श और व्यवहार होंगे। उनके विरोध में अलगाववाद का वातावरण तैयार करना— राष्ट्रद्रोही शक्तियों का उद्देश्य है।‌

इसीलिए हम सबकी सतर्कता और सजगता की महती आवश्यकता है।‌ हम देश के किसी भी हिस्से में रहें। जहां भी पृथकता और अलगाववाद के ये कुकृत्य हों। उनका हमें मुखरता के साथ प्रतिकार करना चाहिए।क्योंकि हम सब भारतवासी — भारत माता की संतान हैं। जो हमारी माता का अपमान करेगा। भारत माता को पीड़ा देने का अपराध करेगा। हम भला उसे कैसे छोड़ सकते हैं? हमारी परंपरा तो यही कहती है न कि— न्यायार्थ अपने बंधु को भी, दंड देना धर्म है।

अतएव हम सबकी जितनी भी भिन्न-भिन्न पहचाने हैं वो सब ‘राष्ट्रीयता’ और हिंदुत्व की छतरी के नीचे ही समवेत होनी चाहिए। एकाकार और एकात्म होनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो हम नि:संदेह यह मान लें कि हम किसी बहुत बड़े विभाजनकारी ‘ट्रैप’ का टूल बनते जा रहे हैं।
हमारी सभी भाषाएं, बोलियां, प्रांत, स्थानीयता वेशभूषा सबकुछ राष्ट्र की एकता-अखण्डता को अभिव्यक्त करने वाली हैं। भारत की संस्कृति इतनी विविधवर्णी है कि वह अपने संयोजन में संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती है। अनंत कलाएं, अनंत परंपराएं और शैलियां आपको मिलेंगी। लेकिन सबके केन्द्र में सर्वसमावेशी दृष्टि और सृष्टि का दर्शन मिलेगा। आप किसी भी भाषा, बोली या क्षेत्र में जाइए वहां एकता के सूत्र एक मिलेंगे। हमारे आदर्श, मूल्य और संस्कार एक मिलेंगे। कहीं कोई विभाजन नहीं मिलेगा। हां ये ज़रूर हो सकता है कि इनके रुप और अभिव्यक्तियां अलग-अलग हों। लेकिन मूल और ध्येय आपको एक ही मिलेगा जो राष्ट्र को अभिव्यक्त करेगा। अपनी-अपनी परंपराओं, क्षेत्रों , बोलियों और भाषाओं के प्रत्येक आदर्शों को देख लीजिए। कहावतों, मुहावरों और सूक्तियों को देख लीजिए। संतों और विद्वानों को देख लीजिए। उनके विचारों और कार्यों में ‘विराट राष्ट्र’ और एकता, समरसता, बंधुता और प्राणि मात्र के कल्याण की ही भावना मिलेगी। सबमें राष्ट्र की परंपरा का अविरल प्रवाह मिलेगा जो सबको सत्मार्ग की ओर ले जाने वाला है। यही हमारा वैशिष्ट्य है। यही हमारी शक्ति और सामर्थ्य है।‌ लेकिन भारत की यही शक्ति और सामर्थ्य भारत विरोधियों को रास नहीं आ रही है। दुराग्रही कुंठित राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को राष्ट्रीयता का यह विराट स्वरूप पच नहीं पा रहा है। क्योंकि अलगाववाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद के नाम पर बने राजनीतिक दलों को जनता ने बारंबार ख़ारिज कर दिया है। ऐसे में राष्ट्रीयता के समस्त मूल्य और आदर्श उनके लिए बाधक सिद्ध हो रहे हैं। इसीलिए वो अपनी खीझ उतारने के लिए किसी भी स्तर तक नीचे गिरते चले जा रहे हैं। लेकिन क्या राष्ट्र और समाज उन्हें देख और समझ नहीं रहा है? अगर उन्हें ये भ्रम है तो वो जितना जल्दी हो उसे दूर कर लें। क्योंकि ये राष्ट्र अपने महान आदर्शों और परंपराओं के साथ आगे बढ़ चला है। जो हर विभाजन का मुखर प्रतिकार कर रहा है। एकता की बांसुरी बजाता हुआ—हर भाषा और परंपराओं को अपनाता हुआ नित निरंतर आगे बढ़ रहा है। ये राष्ट्र पाञ्चजन्य का शंखनाद करते हुए समरसता का जीवन जीते हुए नई लीक बनाते की ओर बढ़ चला है।
~कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
(‌साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)

शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की योजना पर विस्तृत चर्चा होगी

unnamed-1.jpg

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक का आयोजन केशव कुंज (दिल्ली) में 04 से 06 जुलाई तक होने वाला है। बैठक में मुख्यतः संगठनात्मक विषयों पर चर्चा होगी। यह बैठक कोई निर्णय लेने वाली बैठक नहीं है। प्रांतों में संगठन के कार्य की प्रगति व अनुभवों पर चर्चा होती है। कार्य विभागों के कार्य को लेकर भी चर्चा होती है। बैठक में पूजनीय सरसंघचालक, माननीय सरकार्यवाह की उपस्थिति रहती है। उनका मार्गदर्शन सभी कार्यकर्ताओं को प्राप्त होता है। बैठक में सभी सह सरकार्यवाह, कार्य विभाग प्रमुख और संघ प्रेरित 32 विविध संगठनों के अखिल भारतीय संगठन मंत्री उपस्थित रहेंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने आज केशव कुंज में पत्रकारों से बातचीत के दौरान बैठक में आने वाले विषयों के संबंध में जानकारी प्रदान की। इस अवसर पर उनके साथ सह प्रचार प्रमुख नरेंद्र ठाकुर, प्रदीप जोशी भी उपस्थित रहे।

उन्होंने बताया कि मार्च के पश्चात देशभर में अब तक 100 प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन हुआ है। जिसमें 40 वर्ष से कम आयु वर्ग के स्वयंसेवकों के 75 तथा 40 से 60 वर्ष की आयु वर्ग के स्वयंसेवकों के 25 वर्ग आयोजित हुए हैं। प्रशिक्षण वर्गों के दौरान सेवा विभाग सहित विभिन्न कार्य विभागों का प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। स्वयंसेवक स्थायी प्रकल्पों में भी लगते हैं, और आपदा के समय भी स्वयंसेवक सेवा कार्य में जुटते हैं। पुरी जगन्नाथ रथ यात्रा, अहमदाबाद विमान हादसे के दौरान भी स्वयंसेवक सेवा कार्य में लगे।

उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष इस बैठक का मुख्य विषय है। सभी प्रांतों ने तैयारी की है, अपनी-अपनी योजना बनाई है। उस पर बैठक में चर्चा होगी, बैठक के पश्चात इस संबंध में जानकारी प्रदान की जाएगी।

शताब्दी वर्ष का शुभारंभ नागपुर में 02 अक्तूबर को विजयादशमी उत्सव के साथ होगा। जिसमें पूजनीय सरसंघचालक जी उपस्थित रहेंगे। इसके पश्चात अगले एक वर्ष तक शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम चलेंगे। उसी दिन देशभर में शाखा/मंडल/बस्ती के स्तर पर उत्सव आयोजित होंगे। एक अन्य विशेष अभियान के तहत स्वयंसेवक घर-घर जाकर संपर्क करेंगे। गृह संपर्क अभियान के दौरान स्वयंसेवक संघ साहित्य देकर वार्ता करेंगे।

देशभर में नगर/खंड स्तर पर सामाजिक सद्भाव बैठकों का आयोजन होगा। इसमें विभिन्न वर्गों के प्रमुख लोग एकत्रित आकर समाज से कुरीतियों को दूर करने, सद्भाव व समरसता को बढ़ाने के लिए चर्चा करेंगे। साथ ही जिला केंद्रों पर प्रमुख नागरिक गोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा। गोष्ठियों में हिन्दुत्व, राष्ट्रहित, भविष्य के भारत के संकल्प को लेकर चर्चा होगी। शताब्दी के निमित्त युवाओं की सहभागिता की दृष्टि से विशेष कार्यक्रमों का आयोजन होगा।

उन्होंने बताया कि शताब्दी वर्ष के दृष्टिगत पूजनीय सरसंघचालक जी के प्रवास योजना पर भी चर्चा होगी। शताब्दी वर्ष के निमित्त सरसंघचालक जी के साथ विशेष संवाद कार्यक्रम देश के चाऱ प्रमुख शहरों दिल्ली, मुंबई, कोलकता, बैंगलुरु में आयोजित होंगे। जिसमें समाज के प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि समाज में संघ को जानने व संघ से जुड़ने के लिए विशेष उत्साह देखा जा रहा है। युवा वर्ग भी बड़ी संख्या में संघ से जुड़ने का इच्छुक है। इस वर्ष आयोजित प्रशिक्षण वर्गों में युवाओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया है। साथ ही, अप्रैल से जून के बीच ज्वाइन आरएसएस के माध्यम से 28,571 लोगों ने संघ से जुड़ने के लिए ऑनलाइन पंजीकरण करवाया है।

उन्होंने कहा कि शताब्दी वर्ष के निमित्त संघ ने समाज के समक्ष पंच परिवर्तन का विचार रखा है, इसके अंतर्गत संपूर्ण समाज की सहभागिता से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना लक्ष्य है। सामाजिक समरसता के तहत समाज में सद्भाव बढ़े, परिवारों की पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली बने, स्व-बोध का गौरव, कुटुंब में आत्मीयता व संस्कारों का वर्धन, नागरिक कर्तव्यों के पालन के प्रति जागरूकता बढ़े। इसके लिए संघ के स्वयंसेवक समाज की सहभागिता से आगे बढ़ेंगे।

भविष्य के युद्धों के लिए तैयार होती भारतीय सेना

indian-army-3.jpg.webp

दिल्ली । वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से ही भारत अपनी सेनाओं को आत्मनिर्भर, स्वदेशी तकनीक से समृद्ध, सुदृढ़ व सशक्त बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। भारतीय सेना को भविष्य की रक्षा चुनौतियों लिए इस प्रकार तैयार किया जा रहा है कि भूमि से लेकर वायु और समुद्र की गहराई से लेकर अंतरिक्ष की ऊंचाईयों तक अपनी सुरक्षा के लिए किसी अन्य पर निर्भर न रहना पड़े। आज अति आधुनिक ड्रोन से लेकर अविश्वसनीय मारक क्षमता वाली मिसाइलों तक का निर्माण भारत में किया जा रहा है।

विगत दिनों ईरान- इजराइल के मध्य संघर्ष के बीच ईरान के शक्तिशाली व मजबूत परमाणु संयंत्रो को नष्ट करने की क्षमता न होने के कारण इजराइल को भी अमेरिका की शरण में जाना पड़ा था। ऐसी ही परिस्थतियों से बचने के लिए भारत अब बंकर ब्लस्टर बम बनाने की दिशा में भी अग्रसर है। वर्तमान समय में कुछ ही राष्ट्रों के पास बंकर ब्लस्टर जैसी सुविधा उपलब्ध है और जब भारत भी उस श्रेणी में आ जाएगा। जब भारत का यह स्वदेशी बंकर ब्लस्टर बम बनकर तैयार हो जाएगा तब हमारी अग्नि -5 मिसाइल दुश्मन के मजबूत ठिकानों और तहखानों को मिनटों में ध्वस्त करक वापस चली आएगी।

भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं संगठन अग्नि 5 मिसाइल के दो नये एडवांस प्रारूप विकसित कर रहा है जिसमें प्रथम प्रारूप बंकर ब्लस्टर वॉरहेड या विस्फोटक ले जाने वाला होगा जो जमीन के भीतर 80 से 100 मीटर तक जाकर दुश्मन के ठिकानों को ध्वस्त करेगा जबकि दूसरा प्रारूप विस्फोटक ले जाने वाला होगा।ये दोनों ही प्रारूप दुश्मन के डिफेंस सिस्टम, न्यूक्लियर सिस्टम, रडार सिस्टम, कमांड एंड कंट्रोल सेंटर और हथियार डिपो को ध्वस्त करके वापस लौट आएंगे। अग्नि -5 बंकर ब्लस्टर मिसाइल जमीन, सड़क और मोबाइल लांचर से दागी जाएगी।अग्नि -5 भारत की एक ऐसी मिसाइल है जो एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक निशाना लगा सकती है।इसकी रेंज 5 से 7 हजार किमी तक हैं ये परमाणु हथियार भी ले जा सकती है। भारत का बंकर ब्लस्टर बम अमेरिकी बम से भी अधिक क्षमतावान बनाया जा रहा है।भारत की बंकर ब्लस्टर मिसाइल अमेरिकी बम से अधिक गहराई तक निशाना लगा सकती है।भारत को चीन और पाकिस्तान से पैदा हुए खतरे को देखते हुए ही इस प्रकार की मिसाइल का निर्माण किया जा रहा है।

भारतीय नौसेना को मिला तमाल – इसी प्रकार ब्रहमोस मिसाइलों से लैस अब तक का सबसे घातक आधुनिक स्टील्थ युद्धपोत आईएनएस तमाल अब भारतीय नौसेना में शामिल हो गया है जिसके कारण अब समुद्र में भी भारत की ताकत बढ़ गई है।इस बहुददेशीय अतिआधुनिक युद्धपोत का जलावतरण रूस के केलिनिनग्राद में हुआ। नौसेना के पश्चिमी बेड़े में शामिल यह युद्धपोत हिंद सागर में तैनात होगा और पाकिस्तान से लगती सीमा पर निगरानी में भारत की सबसे बड़ी ताकत बन जायेगा। तमाल युद्धपोत विगत दो दशकों में रूस से प्राप्त क्रियाक श्रेणी के युद्धपोतों की श्रृंखला में आठवां युद्धपोत है। यह पूर्ववर्ती संस्करणों की तुलना में अधिक उन्नत है। इसमें लंबवत प्रक्षेपित सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें उन्नत 100 मिलीमी की तोप , मानक 30 मिलीमीटर गन क्लोज -इन हथियार प्रणाली के अलावा आधुनिक समय की प्रणाली अत्यधिक भार वाले टारपीडो तत्काल हमला करने वाले पनडुब्बी रोधी, रॉकेट और अनेक निगरानी एवं अग्नि नियंत्रण रडार तथा अन्य प्रणालियां शामिल हैं।

युद्धपोत का नाम तमाल देवताओं के राजा इंद्र की पौराणिक तलवार से लिया गया है। इसकी मारक क्षमता भी उसी तरह तेज, आक्रामक और निर्णायक है। इसका शुभंकर भारतीय पौराणिक कथाओं के अमर भालू जाम्बवंत और रूसी राष्ट्रीय पशु यूरेशियन भूरे भालू की समानता से प्रेरित है।तमाल युद्धपोत का निर्माण रूस के कैलिनिनग्राद स्थित यांतर शिपयार्ड में हुआ है और इसमें 26 प्रतिशत स्वदेशी उपकरण हैं।सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आखिरी युद्धपोत है जो विदेश में बना है अब ऐसा कोई भी युद्धपोत भारत में ही बनेगा जिसके बाद भारत की नौसेना की शक्ति और बढ़ जाएगी। इस युद्धपोत के कुशल संचालन व रखरखाव के लिए 250 नौसेना कर्मियों ने रूस में प्रशिक्षण प्राप्त किया है। यह बहु मिशन युद्धपोत भारत के समुद्री हितों के क्षेत्र में पारंपरिक और गैर पारंपरिक दोनों तरह के खतरों से निपटने में सक्षम है।

भारत की नोसेना को एक और स्वदेशी युद्धपोत उदयगिरि का उपहार भी मिला है। इस युद्धपोत में सुपरसोनिक सतह से सतह से मार करने वाली प्रणाली लगी है। इसमें 76मिमी गन, 30 मिमी और 12.7 मिमी की रैपिड फायर गन सहित डीजल इंजन और गैस टर्बाइन युक्त सीओडीजी प्रणाली है। इस 3900 टन वजनी और 125 मीटर लंबे युद्धपोत में सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें लैस हैं।यह देनों ही युद्धपोत भारत की समुद्री सीमा की सुरक्षा में प्रमुख भूमिका निभाने वाले हैं।

बिहार में आसान नहीं है, गलत को गलत बोलना

Bihar-700x525.png.webp


कोई भी आरटीआई कार्यकर्ता यह जानना चाहे कि उसके घर के सामने बनी सड़क के लिए कितना पैसा खर्च हुआ, वह धन विधायक फंड से आया या किसी अन्य स्रोत से, और उसे किस कंपनी के माध्यम से खर्च किया गया-यह सारी जानकारी आरटीआई के जरिए मांगी जा सकती है। लेकिन इस प्रक्रिया में समय, मेहनत और संसाधनों की जरूरत होती है। दुर्भाग्यवश, बिहार में आरटीआई कार्यकर्ताओं का यह समूह धीरे-धीरे थक रहा है। जब समाज में भ्रष्टाचार को सामाजिक मान्यता मिल चुकी हो, तो कोई कितने दिन अपनी जमा-पूंजी और ऊर्जा लगाकर परिवर्तन की लड़ाई लड़े? यह स्थिति और भी जटिल हो जाती है, जब समाज के लिए लड़ने वाला व्यक्ति अपने ही मोहल्ले में दर्जनों दुश्मन बना लेता है। विडंबना यह है कि जिनके लिए वह लड़ रहा होता है, वे अक्सर अपराधियों और भ्रष्ट लोगों के साथ उठते-बैठते हैं और उसी कार्यकर्ता को दलाल या गलत ठहरा देते हैं।

पटना। बिहार में एक आरटीआई कार्यकर्ता ने पूरे राज्य की पंचायतों में किए गए विकास कार्यों की जानकारी जुटाने का बीड़ा उठाया। इस कार्यकर्ता ने आरटीआई के माध्यम से हर पंचायत के विकास कार्यों का ब्योरा मांगा, जो स्थानीय मुखिया द्वारा पंचायती फंड से किए गए थे। बिहार का कोई भी नागरिक इस तरह की जानकारी आरटीआई के जरिए प्राप्त कर सकता है। आप भी अपने पंचायत में कितना अैर किस किस मद में खर्च हुआ है, इसका ब्यौरा मंगा सकते हैं?

लेकिन यह कार्य उतना आसान नहीं था। कार्यकर्ता के लिए ऐसी पंचायत ढूंढना चुनौतीपूर्ण रहा, जहां आवंटित धनराशि के अनुरूप वास्तव में काम हुआ हो। कई जगह कागजों पर सड़कें बन गईं, लेकिन गांव में उनकी मौजूदगी तक नहीं थी। यह आपके गांव का हाल भी हो सकता है? आपने जानकारी इकट्ठी की है क्या?

ऐसे में सवाल उठता है कि जब कागजों पर विकास हो रहा हो और जमीनी हकीकत कुछ और हो, तो न्याय की लड़ाई कौन लड़ेगा? भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाला व्यक्ति न केवल अपनी जेब से खर्च करता है, बल्कि स्थानीय नेताओं और मुखियाओं की दुश्मनी भी मोल लेता है। कई बार वह अपनी लड़ाई में इतना अकेला पड़ जाता है कि सड़क पर चलते चलते कोई ट्रक उसे रौंद कर एक दिन चली जाती है और उसके आस पास के समाज को इससे फर्क तक नहीं पड़ता। या फिर दो चार दिन समाचार पत्रों में चर्चा होती है फिर सब भूल जाते हैं।
जो लोग गलत रास्ते पर होते हैं, वे अक्सर भ्रष्टाचार में हिस्सेदारी ले कर चुप्पी साध लेते हैं। यह रास्ता अब लाइजनिंग और वसूली गिरोहों में सबसे प्रचलित है इन दिनों। बिहार के एक चर्चित यू ट्यूबर से जुड़ी ऐसी दर्जनों कहानियां बिहार के लोगों को पता है।

अब उसके समर्थक ही कहते हैं कि ईमानदारी से बिहार के लोगों के लिए लड़ता तो किसी दिन कोई शूटर ठोक कर चला जाता। क्रांतिकारी की इमेज भी बचा ली और दलाली की दूकान भी चल रही है। यही नए दौर की राजनीति है। यह जिसने नहीं सीखा वह राजनीति कर नहीं पाएगा।

बिहार में सुधार की शुरुआत कहां से हो? पंचायतों से, या नगर निगम से जहां एक साल के कार्यकाल में ही मुखिया हो या पार्षद घर के सामने स्कॉर्पियो खड़ी कर लेता है। गांव वाले हों या वार्ड वाले वे सब देखते हैं, लेकिन इस मुद्दे को अपनी बातचीत में शामिल करने से बचते हैं। इसके बजाय, वे राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मुद्दों—जैसे मोदी, राहुल गांधी या ट्रंप की विदेश नीति—पर चर्चा करना पसंद करते हैं। आप समझते हैं, वे ऐसा क्यों करते हैं?

बिहार को राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश माना जाता है, लेकिन यह जागरूकता अक्सर सुरक्षित मुद्दों तक सीमित रहती है। कोई भी स्थानीय स्तर पर मुखिया हो या वार्ड सदस्य की आलोचना करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता, क्योंकि इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।

बिहार ही नहीं, पूरे देश में लोग भ्रष्टाचार और सामाजिक बुराइयों के साथ जीना सीख रहे हैं। परिवर्तन की उम्मीद धूमिल हो चुकी है। परिवर्तन की कहानी सुनाकर कोई केजरीवाल अपनी फैमिली का फ्यूचर बनाने में लग जाता है। अपने परिवार के हेल्थ पर लाखों रुपए साल में खर्च कर रहा है और दिल्ली वालों को मोहल्ला क्लिनिक देकर कहना कि यह विश्वस्तरीय है। यह ठगी ठीक नहीं है।

लोग मानते हैं कि उपलब्ध विकल्पों में मौजूदा नेतृत्व ही सर्वश्रेष्ठ है, और इसलिए वे उसी के साथ खड़े रहते हैं। धीरे-धीरे समाज में आत्मकेंद्रित लोगों की संख्या बढ़ रही है, जहां ‘स्व’ का मतलब केवल व्यक्ति, उसकी पत्नी और बच्चे तक सीमित हो गया है। स्व का विकास का अर्थ है, मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चों का विकास।
देश और समाज की चिंता अब उनके लिए प्राथमिकता नहीं रही। इस स्थिति में सवाल यह है कि क्या बिहार में बदलाव संभव है? इसके लिए न केवल जागरूकता, बल्कि सामूहिक इच्छाशक्ति और साहस की जरूरत है।

आरटीआई जैसे उपकरण सशक्त हो सकते हैं, लेकिन जब तक समाज भ्रष्टाचार को सामान्य मानना बंद नहीं करता, तब तक कार्यकर्ताओं की मेहनत रंग लाएगी, यह कहना मुश्किल है।

scroll to top