गांधी के प्रपौत्र को चंपारणवालों ने बैरंग लौटाया,फजीहत हुई सो अलग

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बेतिया । चंपारण में महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी को एक सभा से बाहर कर दिया गया, जब कार्यक्रम के दौरान उनके साथ आए वक्ता ने महागठबंधन को वोट देने की अपील की। इस बात ने आयोजकों में शामिल मुखिया विनय सिंह को निराश किया। उनके साथ मौजूद ग्रामीणों को भी यह बात पसंद नहीं आई। विनय सिंह ने तुषार गांधी को सभा के बीच में ही कहा — ”आप गांधी जी के नाम को ढो रहे हैं, यह गांधीवाद नहीं है। आपको शर्म आनी चाहिए। आप गांधी जी के वंशज नहीं हो सकते।”

महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी इन दिनों बिहार यात्रा पर हैं। अपनी बिहार यात्रा की शुरुआत उन्होंने भितिहरवा (चंपारण) से की है। वे पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) पहुंचने के रास्ते में थे। स्वाभाविक रूप से इस यात्रा में वे उन जगहों से गुजरना चाहते थे, जहां चम्पारण सत्याग्रह के दौरान गांधी गए थे। इस क्रम में तुषार गांधी अपने साथियों के साथ तुरकौलिया पहुंचे। वहां से उन्हें जसौली पट्टी जाना था। तुरकौलिया वह जगह है जहां निलहे अंग्रेज जमींदार चंपारण के किसानों को खुलेआम एक नीम के पेड़ से टांग देते थे। नीम का वह पेड़ आज भी तुरकैलिया में खड़ा बताया जाता है।

तुषार गांधी ने वहां गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। चम्पारण के समाज ने उनका स्वागत महात्मा गांधी के प्रपौत्र के रूप में किया। इसीलिए उनके संवाद की व्यवस्था ग्राम कचहरी परिसर में रखी गई थी। इस तरह सभी ग्राम कचहरी गए और संवाद शुरू हुआ लेकिन इस बात से चंपारण वाले बेहद निराश हुए कि जिसे उन्होंने मंच और सम्मान गांधी का प्रपौत्र समझ कर दिया था, वह तो चंपारण में इंडि गठबंधन का प्रचारक बन कर आया था। वह गांधी की बात नहीं बल्कि चुनाव प्रचार कर रहा था। गांधीजी के लिए असीम प्रेम लिए इकट्ठे हुए लोगों को तुषार ने अपना चुनावी दीमक वाला रूप दिखाकर निराश किया।

क्या था मामला

चंपारण के लोगों ने तुषार का स्वागत गांधीजी के प्रपौत्र के रूप में किया। आयोजक को यह बात पसंद नहीं आई कि वे गांधीजी के नाम पर आकर वहां तेजस्वी यादव और राहुल गांधी का प्रचार करने लगे। स्थानीय आयोजक का वीडियो वायरल है, जिसमें वे तुषार गांधी से कहते हुए दिखाई दे रहे हैं, नीतीश कुमार की सरकार बहुत अच्छी है और आप कह रहे हैं कि बहुत खराब है। मोदी सरकार बहुत अच्छी, उनकी सरकार में गरीबों का कल्याण हुआ है। स्थानीय आयोजक अपना अनुभव बता रहा है और उसने तुषार गांधी को गंदी राजनीति के लिए रगेद दिया। उनका सारा सम्मान गांधीजी के प्रपौत्र होने के लिए था। तेजस्वी यादव और राहुल गांधी का एजेन्ट बनकर आए व्यक्ति को चंपारण के लोग क्यों सम्मान देंगे? तुषार समाज से इस प्रतिक्रिया के लिए तैयार नहीं थे। उन्हें उलटे कदम बिना अपना झूठ फैलाए वापस लौटना पड़ा।

गांधी के प्रपौत्र का विरोध नहीं हुआ

यहां समझने वाली बात यह है कि चम्पारण में गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी का विरोध नहीं हुआ है। वहाँ महागठबंधन के लिए वोट माँग रहे तुषार गांधी का विरोध हुआ। ये मामला राजनीतिक विरोध का है, गांधी विरोध का नहीं। तुषार अगर महागठबंधन के लिए वोट माँगेंगे तो उनके गांधीवाद पर सवाल खड़ा तो होगा।

तुषार समर्थकों में तकलीफ किस बात की

बिहार राज्य चुनाव 2025: भारत निर्वाचन आयोग राज्य चुनावों से पहले बिहार मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कर रहा है। इस मामले में तुषार जिन लोगों की पैरवी चंपारण में कर रहे थे, उनकी सारी चालें पीट चुकी हैं। उन्होंने न्यायालय से लेकर जनता की अदालत तक में मुंह की खाई है। अब तक अस्सी फीसदी फॉर्म भरे जा चुके हैं। ऐसी स्थिति में वे बौखला गए हैं।

चंपारण में तो एक साधारण गाँव के प्रधान ने गठबंधन की राजनीति की हवा निकाल कर रख दी है। गांधी के प्रपौत्र को वे बिहार चुनाव की शतरंज पर इंडि गठबंधन का प्यादा बनाकर पेश करना चाहते थे लेकिन गांधी के वेश में बिहार में घूम रहे राहुल और तेजस्वी के दूत को चंपारण के एक गांव के प्रधान ने पहचान लिया और उन्हें ससम्मान उलटे पांव लौटने को मजबू​र ​कर दिया। इस फजीहत से तुषार गांधी कम और जिनके हाथों वे कटपुतली बने चंपारण में घूम रहे थे, वह गिरोह अधिक आहत है।

फजीहत का असर

तुषार गांधी को फजीहत होने के बाद अपना एजेंडा बिहार में साफ करना पड़ा। उन्होंने अपने सोशल मीडिया पर लिख दिया है कि वे बिहार में राजनीतिक यात्रा पर हैं। जिसका नाम है, बदलो बिहार, बनाओं नई सरकार। थोड़ा और स्पष्ट करेंगे तो लिखना पड़ेगा कि तेजस्वी यादव की सरकार।

पार्टी वर्कर बनकर तुषार, आएं हैं बिहार

तुषार गांधी के संबंध में सोशल मीडिया पर लोग लिख और बोल रहे हैं कि वे बिहार में राजद और कांग्रेस के टूलकिट बनकर घूम रहे हैं। उनकी महिलाओं को लेकर सोच निन्दनीय है। ​जिसकी ​सोशल मीडिया पर खूब आलोचना हुई है। तुषार को समझना चाहिए कि गांधी का प्रपौत्र होने भर से कोई गांधीजी का किरदार हासिल नहीं कर लेता। यदि वे राजनीतिक दल के कल पूर्जे बनकर बिहार में घूमेंगे तो उन्हें एक्टिविस्ट नहीं पार्टी वर्कर समझ कर ही लोग मिलेंगे। उनकी बिहार की इस राजनीति​क यात्रा में उन्हें गांधीजी के प्रपौत्र होने की वजह से सम्मान मिलेगा यह मुश्किल है। राजद और कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता उन्हें अपनी पार्टी का आदमी होने की वजह से थोड़ा सम्मान दे दें तो बात अलग है।

शब्दों की सुनामी में अर्थ का अकाल सूचना की ओवरलोडता से संप्रेषण की

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दिल्ली । शब्द बाण की तरह होते हैं, जो एक बार चल जाएँ, तो वापस नहीं आते — आज के डिजिटल दौर में हम सूचना के महासागर में गोते तो खूब लगा रहे हैं, पर ज्ञान का मोती शायद ही किसी के हाथ आता है। सोशल मीडिया, डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स, रील्स और शॉर्ट्स की चकाचौंध में संवाद की गरिमा, सुकून और विचारों की गहराई कहीं पीछे छूटती जा रही है। कभी जिसे ‘वाक्-संयम’ कहा जाता था, आज वही बड़बोलापन बनकर हर स्क्रीन पर नाच रहा है।

हर ओर शब्दों की ओवरलोडता है—content overload—मगर उनमें न रस है, न राग, न रचना। एक समय था जब ऋषि-मुनियों की वाणी में गागर में सागर समा जाता था। आज हमारे पास सागर भर डेटा है, पर गागर भर भी दृष्टि नहीं। साहित्यिक विमर्श अब बुक लॉन्च इवेंट्स और ट्रेंडिंग हैशटैग्स के नीचे दब चुका है।आजकल, लिटरेचर फेस्टिवल्स की धूम है। जिन लेखकों की किताबों को कोई खरीद कर पढ़ता नहीं है, वो इन उत्सवों में ज्ञान के नाम पर भड़ास उगलते हैं। अभी पिछले हफ्ते मैसूर में हुए फेस्टिवल में लेखकों की भाषण प्रवीणता से high society, page three crowd, बेहद प्रभावित हुआ।

सोशल मीडिया की वजह से पत्रकारों से ज्यादा महत्व influencers को मिल रहा है। प्रसिद्ध अंग्रेज़ चिंतक फ्रांसिस बेकन ने कहा था, “Knowledge is power.” आज इस गूढ़ सत्य की जगह ले ली है “कैप्शन मारो और वायरल हो जाओ” की सोच ने।

हर क्षण, हर मिनट, लाखों ट्वीट्स, इंस्टा स्टोरीज़ और वीडियोस अपलोड हो रहे हैं। पर क्या उनमें किसी नयी दृष्टि की झलक है? प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का कथन यहाँ बिल्कुल सटीक बैठता है— “विस्फोट से बुद्धि कुंद और विवेक शून्य हो रहा है।”

आज का पाठक जानकारी से तो लबालब है, मगर ज्ञान से अनाथ। “अति कथन” का यह काल तर्कहीनता की महामारी बन चुका है। एक समय तुलसीदास ने केवल एक चौपाई में सम्पूर्ण जीवन-दर्शन कह डाला था— “परहित सरिस धर्म नहि भाई, पर पीड़ा सम नहि अधमाई।” पर आज की पीढ़ी को 15 सेकंड में समझाया न जाए तो उसे बोरियत लगती है।

भाषा अब केवल संवाद का माध्यम नहीं रही, वह एक सोशल स्टेटस बन गई है। वायरल होने की भूख ने सृजन की आत्मा को निगल लिया है। युवा लेखिका मुक्ता गुप्ता ने सटीक कहा— “सड़क की भाषा में साहित्य लिखकर अच्छे PR से अवार्ड्स मिल जाते हैं। फिर जरूरत क्या कि जंगल या हिमालय की कंदराओं में जाकर मनन करो, तप करो, तब जाकर मां सरस्वती प्रसन्न हों।”

सही में, आज साहित्य भी बाजार का उत्पाद बन गया है, जहाँ कंटेंट की गुणवत्ता नहीं, बल्कि उसकी बिक्री मायने रखती है।भारतीय ऋषियों से लेकर सुकरात और अरस्तू तक, सभी ने गूढ़ चिंतन को छोटे सूत्रों में पिरोया। “देह को ढँको ताकि आत्मा उघड़ सके”। जैसी उक्ति सम्पूर्ण जीवन-दर्शन को समेटे हुए है।

लेकिन आजकल लेखक “शब्दजाल” में फँसे हैं—जहाँ शब्द तो हैं, पर अर्थ नहीं, भावनाएँ हैं, पर अनुभूति नहीं। अध पके ज्ञान को आज का सोशल मीडिया memes में बदल चुका है। साहित्य की सफलता उसकी “शेल्फ लाइफ” से आँकी जाती है। लेखक बुक लॉन्च के मंचों पर तो हैं, पर विचारों की प्रयोगशाला में नहीं। प्रकाशक को “बेस्टसेलर” चाहिए—ऐसा नहीं जो समय को पार कर जाए, बल्कि जो समय के साथ बिक जाए।

किसी लेखक ने बहुत सुंदर कहा— “शेक्सपियर या तुलसीदास आज होते तो उन्हें भी बुक ट्रेलर और ट्विटर पर रील्स बनाने को कहा जाता।”

आज के लेखकों, पाठकों और समाज को यह निर्णय करना है कि वे रील्स की चमक में खो जाना चाहते हैं, या शब्दों की लौ से आत्मा को प्रकाशित करना। वरना इस “सूचना विस्फोट” में कहीं ऐसा न हो कि शब्द तो रह जाएँ, पर उनका अर्थ खो जाए।

वर्तमान दौर में, “अति-कथन” संप्रेषण का एक प्रमुख लक्षण बन गया है। गुजरे युग के मनीषियों ने सूत्रों और दोहों में गहन विचार व्यक्त किए, जिन पर आज शोधकर्ता ग्रंथ लिखते हैं। तुलसीदास की रामचरितमानस या कबीर के दोहे इसका जीवंत उदाहरण हैं। इन रचनाओं में संक्षिप्तता के साथ गहन दार्शनिक और नैतिक संदेश समाहित हैं। इसके विपरीत, आज का साहित्य अक्सर सनसनीखेज कथानकों और सतही भावनाओं पर निर्भर करता है। इसका प्रमुख कारण त्वरित ख्याति और लोकप्रियता की चाह है, जो लेखकों को गहन चिंतन-मनन के बजाय बाजार की मांगों के अनुरूप लिखने के लिए प्रेरित करती है।

भारत और चीन को एकजुट होकर ट्रम्प की हथियार बिक्री की विभाजनकारी नीति का मुकाबला करना चाहिए

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गुवाहाटी । जब दक्षिण एशिया की सियासी ज़मीन डोनाल्ड ट्रम्प की बेतुकी और खुदगर्ज़ नीतियों से हिल रही है—कभी कश्मीर पर मध्यस्थता के झूठे दावे, तो कभी युद्धविराम की आड़ में हथियारों की बिक्री का सौदा—तो भारत और चीन को अब आपसी तनातनी छोड़कर साझा डिप्लोमेसी यानी सहयोग आधारित कूटनीति की राह पर बढ़ना चाहिए।
ट्रम्प का लेन-देन पर आधारित (transactional) रवैया, जिसमें टैरिफ और संरक्षणवादी मांगें शामिल हैं, दक्षिण एशिया को फायदे के लिए जंग का मैदान बना सकता है। पाकिस्तान और चीन पर उनकी लगातार बदलती बयानबाज़ी ने पहले ही तनाव की आग को हवा दी है।

नई दिल्ली और बीजिंग को चाहिए कि वे $135 बिलियन डॉलर के व्यापारिक रिश्तों और इलाके में अमन व स्थिरता की साझा दिलचस्पी को मज़बूत बनाकर बाहरी ताकतों की दखलअंदाज़ी को रोकें। आतंकवाद के खिलाफ साझा कार्यनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, और व्यापार में सहयोग जैसे कदम अमेरिकी दखल और फूट डालो, राज करो की साजिश को बेअसर कर सकते हैं।

पब्लिक टिप्पणीकार प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “भारत-चीन के बीच सीमा विवाद, खासकर LAC (Line of Actual Control) पर, आज भी आपसी संबंधों में एक सीरियस जख्म की तरह मौजूद है। 1962, 1967, डोकलाम और 2020 के गलवान संघर्ष जैसी घटनाएं बताती हैं कि लंबे समय तक टकराव किसी के हक़ में नहीं है। सीमा विवाद का शांति पूर्ण समाधान ही इलाके में पायदार अमन और बाहरी हस्तक्षेप से आज़ादी की राह खोल सकता है—खासकर अमेरिका जैसी ताक़तों से, जो क्षेत्रीय अस्थिरता से अपने फायदे के रास्ते तलाशती हैं।”

सेना के पूर्व अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल (डॉ.) राजेश चौहान, जो कई सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभा चुके हैं, कहते हैं, “भारत और चीन के बीच पूर्ण युद्ध दोनों मुल्कों के लिए तबाही का पैग़ाम होगा। भारत जो वैश्विक शक्ति बनने की राह पर है, वो रास्ता पटरी से उतर जाएगा। चीन, जिसकी आर्थिक और सैन्य ताकत मज़बूत है, वह भी ताइवान जैसे मुद्दों और पड़ोसी मुल्कों से टकरावों के चलते खुद मुश्किल में है। जंग सिर्फ इंसानी जानें ही नहीं लेगी, बल्कि मुल्कों की तरक्की को दशकों पीछे धकेल देगी।”

राजनीतिक विश्लेषक वेंक सुब्रमण्यम चेताते हैं, “यूक्रेन-रूस युद्ध से सबक लेना चाहिए। पश्चिमी वादों के भरोसे यूक्रेन ने अपने हाथ जलाए और आज बर्बादी के अंधेरे में है। अगर भारत को भी बाहरी ताकतें चीन से टकराने को उकसाएं, तो क्या होगा—दो एशियाई ताक़तें एक-दूसरे को तबाह करती रहेंगी, और अमेरिका अपनी हथियार इंडस्ट्री के मुनाफे गिनता रहेगा।”

एक इंटरव्यू में डॉ. चौहान ने कहा, “अमेरिका को चीन के उदय से खतरा है, खासकर इंडो-पैसिफिक में जहां दक्षिण चीन सागर और ताइवान का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। भारत को चीन के खिलाफ भड़काकर अमेरिका प्रॉक्सी वॉर की पटकथा लिख सकता है, जैसा उसने यूक्रेन में किया। अमेरिका हथियार देगा, जानकारी बांटेगा, लेकिन सीधे युद्ध में नहीं उतरेगा। नतीजा? भारत पर युद्ध का पूरा बोझ।”

हाल ही में चीन की यात्रा पर गए भारत के रक्षा मंत्री राज नाथ सिंह ने भी माना कि LAC का निर्धारण वक्त की ज़रूरत है। यही सीमा विवाद भारत-चीन रिश्तों की सबसे बड़ी रुकावट है।

भारत ने 1967, डोकलाम और गलवान जैसी झड़पों में साहस दिखाया है, लेकिन स्थायी समाधान ही दीर्घकालिक हितों की रक्षा करेगा। एक मजबूत भारत-चीन रिश्ता अमेरिकी प्रभाव को संतुलित कर सकता है और एशिया को बहुध्रुवीय शक्ति संतुलन (multipolarity) की दिशा में ले जा सकता है।

चीन की सीमांकन पर अनिच्छा हैरान करती है। अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो यह मसला कुछ घंटों में बातचीत से सुलझाया जा सकता है। देरी से सिर्फ अविश्वास बढ़ता है और बाहरी ताक़तों को खेलने का मौका मिलता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पास एक ऐतिहासिक मौका है—बाहरी उकसावे से ऊपर उठकर अमन का रास्ता चुनने का। सीमा विवाद का शांतिपूर्ण समाधान अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि रणनीतिक ज़रूरत बन चुका है, ताकि अमेरिका जैसी बाहरी शक्तियों को दूर रखा जा सके और दोनों मुल्कों के लिए एक उज्जवल भविष्य सुनिश्चित किया जा सके।

आगरा की सड़कों पर पार्किंग का तमाशा: क्या है इसका हल?

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आगरा । क्या आपने कभी आगरा की सड़कों पर गाड़ी पार्क करने की कोशिश की है और खुद को एक बदहाल व्यवस्था, भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी के कुचक्र में फंसा पाया है? यदि हां, तो आप अकेले नहीं हैं। यह आज आगरा की पहचान बनती जा रही है—अव्यवस्थित, अराजक और आम नागरिकों की उपेक्षा करती हुई एक पार्किंग व्यवस्था।
पार्किंग का मसला: बदइंतजामी और बेलगाम वसूली का अड्डा आगरा का संजय प्लेस, जिसे कभी उत्तर भारत के प्रमुख व्यावसायिक केंद्रों में गिना जाता था, आज पार्किंग के मुद्दे को लेकर सुर्खियों में है। नगर निगम की अधिकृत पार्किंग में ठेकेदारों की मनमानी, जबरन वसूली, और कर्मचारियों की बदसलूकी ने व्यापारियों और आम जनता को उग्र कर दिया है। हाल ही में व्यापारियों ने अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी, जिससे साफ जाहिर होता है कि जनाक्रोश गहराता जा रहा है। दस दिन हो गए, आगरा नगर निगम वैकल्पिक कार्य योजना, व्यवस्था की रूप रेखा नहीं बना पाया है।

मामला केवल संजय प्लेस तक सीमित नहीं। राजा की मंडी, एमजी रोड, बल्केश्वर, कमला नगर और हॉस्पिटल रोड जैसे प्रमुख इलाकों में भी सड़कें गाड़ियों से अटी पड़ी हैं। आगरा में अब तक करीब 21 लाख पंजीकृत वाहन हैं, जिनमें दो-तिहाई दोपहिया वाहन हैं, लेकिन पार्किंग की व्यवस्था मानो 20 साल पुरानी जनसंख्या के लिए हो। हर साल लगभग 5-7% की दर से वाहनों की संख्या में इज़ाफा हो रहा है, पर पार्किंग स्पेस उसी अनुपात में नहीं बढ़ रहा।

गाड़ियों के फुटपाथों और सड़क किनारे अवैध कब्जे से न सिर्फ ट्रैफिक की रफ्तार थमती है, बल्कि पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और खासकर दिव्यांग जनों को भी भारी परेशानी होती है। संजय प्लेस के दुकानदार चतुर्भुज तिवारी बताते हैं, “कई बार एम्बुलेंस फंसी रह जाती हैं, पर ठेकेदारों को कोई फर्क नहीं पड़ता।”
सेंट पीटर्स कॉलेज के टीचर डॉ. अनुभव खंडेलवाल कहते हैं, “जब एक ड्राइवर पार्किंग खोजने में 15-20 मिनट तक वाहन को घुमाता है, तो यह सिर्फ ईंधन और समय की बर्बादी नहीं, बल्कि प्रदूषण और तनाव का भी कारण बनता है।”

2024 में एक स्थानीय सर्वे के अनुसार, 60% आगरा निवासियों को औसतन 10-15 मिनट सिर्फ पार्किंग की तलाश में लगते हैं, और 35% मानते हैं कि उन्होंने कहीं जाना सिर्फ इसलिए टाल दिया क्योंकि पार्किंग का झंझट था।

अधिवक्ता राजवीर का मानना है कि “पार्किंग ठेकों पर स्थानीय राजनीतिक संरक्षण प्राप्त गुर्गों का कब्जा है, जो पार्किंग शुल्क की मनमानी वसूली करते हैं और विरोध करने पर धमकी तक दे डालते हैं।”

नगर निगम और ट्रैफिक पुलिस कभी-कभार मुहिम चलाकर मीडिया में फोटो खिंचवा लेते हैं, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकलता। अवैध पार्किंग, अतिक्रमण और वाहनों की अनियंत्रित वृद्धि ने शहर को एक असहनीय स्थिति में ला खड़ा किया है।

समाधान आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं है। कुछ सुझाव इस प्रकार हैं:
1. शहर में मल्टी-लेवल पार्किंग का निर्माण: एमजी रोड, बल्केश्वर, और दयालबाग में मल्टी-लेवल पार्किंग बनाने की परियोजनाएं वर्षों से अटकी हुई हैं। उन्हें पुनर्जीवित करना होगा।
2. डिजिटल पार्किंग ऐप: दिल्ली और मुंबई की तर्ज पर एक स्मार्ट पार्किंग ऐप विकसित किया जाए जिससे रियल-टाइम पार्किंग डेटा मिले।
3. पार्किंग नीति में पारदर्शिता: ठेकेदारी व्यवस्था की समीक्षा हो, और आरटीआई के तहत जनता को जानकारी दी जाए कि वसूली कैसे हो रही है और पैसे कहाँ जा रहे हैं।
4. सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा: बीआरटी, ई-रिक्शा और साइकिल लेन जैसी योजनाओं को प्राथमिकता मिले ताकि निजी वाहनों पर निर्भरता कम हो।
5. लोगों को जागरूक करना: “मेरी गाड़ी, मेरी जिम्मेदारी” जैसे अभियान चलाकर नागरिकों में जिम्मेदारी का भाव जगाना होगा।
पर्यावरणविद डॉ देवाशीष भट्टाचार्य के मुताबिक, “अगर आगरा को स्मार्ट सिटी, पर्यटन नगरी और विश्व धरोहर शहर के रूप में स्थापित करना है, तो सड़कों पर गाड़ियों की बेतरतीब भीड़ को हटाना होगा।”
सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “यह सिर्फ एक ट्रैफिक या पार्किंग का मसला नहीं है—यह नागरिक संस्कृति, प्रशासनिक जिम्मेदारी और शहरी नियोजन की असल परीक्षा है।”

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