विकसित देशों के सम्पन्न नागरिक भारत में बसने के बारे में कर रहे हैं गम्भीर विचार

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ग्वालियर : वैश्विक पटल पर अचानक परिस्थितियां बहुत तेजी के साथ बदलती हुई दिखाई दे रही हैं। अभी तक कुशल युवा भारतीय अपना सपना साकार करने के उद्देश्य से अमेरिका में रोजगार के अवसर तलाशने के लिए जाते रहे हैं। परंतु, अब कुछ अलग प्रकार का माहौल बनता हुआ दिखाई दे रहा है। अमेरिका सहित अन्य कई विकसित देशों में रहन सहन (जीवन निर्वहन) के खर्चे असहनीय स्तर पर पहुंच गए हैं क्योंकि मुद्रा स्फीति की समस्या इन देशों में लम्बे समय से चल रही है, और, इन देशों द्वारा इस संदर्भ में अथक प्रयास करने के बावजूद, इसका हल नहीं निकल पा रहा है। विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बहुत ही भयावह स्थिति में पहुंच गई हैं। विकसित देशों में किसी भी नागरिक को स्वास्थय इंशोरेंस की सुविधा यदि उपलब्ध नहीं हैं तो उसके लिए इलाज करना असम्भव सा ही है। स्वास्थ्य सेवाओं की लागत इन देशों में इतनी बढ़ चुकी है कि आम नागरिक के लिए यहां अपना इलाज करना सम्भव ही नहीं हैं। अमेरिका से तो युवाओं के साथ साथ सेवानिवृत्त नागरिक भी अब भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं। अमेरिका के न्यूयॉर्क, टेकसास, वाशिंगटन, लासअंजेल्स, सिलिकन वेल्ली, आदि शहरों से इंजीनियर, सृजक (क्रीएटर), युवा उद्यम, बुजुर्ग नागरिक, आदि निकलकर भारत के मुंबई, पुणे, गोवा, हैदराबाद, बैंगलोर, केरल, पोंडिचेरी, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश आदि शहरों/राज्यों में आकर भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं।

भारत की तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था, भारत में तुलनात्मक रूप से सस्ती दरों पर विभिन्न उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता, अति सस्ती दरों पर सेवा भावना के साथ उच्च स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं भारत की महान संस्कृति के साथ साथ साकार अवसर अमेरिका सहित विकसित देशों के नागरिकों को भारत की ओर आकर्षित कर रहे हैं। आज भारत का फलता फूलता तकनीकी उद्योग उच्च स्तर की तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है जो किसी भी तरह विकसित देशों में उपलब्ध कराई जा जा रही तकनीकी सुविधाओं से कम नहीं हैं। भारत में नागरिकों को मानसिक शांति उपलब्ध है क्योंकि भारतीय नागरिक, सनातन संस्कृति का अनुपालन करते हैं। जबकि विकसित देशों के नागरिकों में मानसिक शांति का पूर्णत: अभाव है। विकसित देशों के नागरिक पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करते हैं जिसके चलते संयुक्त परिवारों का पूर्णत: अभाव है। इन देशों में पश्चिमी संस्कृति का अनुसरण करते हुए परिवारों में बच्चे 18 वर्ष की आयु प्राप्त करते ही वे अपना अलग घर बसा लेते हैं और माता पिता अकेले रह जाते हैं। जिससे, माता पिता अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं और इनकी देखभाल के लिए सरकार को व्यवस्था करनी होती है। इसके ठीक विपरीत भारतीय संस्कृति नागरिकों को आपस में जोड़ती है एवं संयुक्त परिवार भारतीय समाज की विशेषता है। बुजुर्ग नागरिकों को अपने संयुक्त परिवार में ही रहना होता है। अतः भारत में बुजुर्गों की देखभाल के लिए सरकार को अलग से कोई व्यवस्था नहीं करनी होती है।

हाल ही के वर्षों में अमेरिकी नागरिकों द्वारा भारत के लिए वीजा प्राप्त करने वालों की संख्या वर्ष 2021 के बाद से दुगुनी हो गई है। अमेरिकी नागरिक अब भारत में शांति की तलाश में आ रहे हैं। अमेरिका सहित विकसित देशों में अधिकतम नागरिकों को मानसिक बीमारियों ने घेर रखा है। इन मानसिक बीमारियों से मुक्ति पाने के उद्देश्य से कई विदेशी नागरिक तो भारत के हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे राज्यों के हिमालय क्षेत्र में बस्ते जा रहे हैं। उन्हें वहां पर आध्यात्म का सुख प्राप्त हो रहा है। भारत की तेजी से बढ़ रही डिजिटल अर्थव्यवस्था से भी अमेरिका का पढ़ा लिखा वर्ग आकर्षित हो रहा है, क्योंकि उन्हें अमेरिका जैसी ही उच्चस्तरीय सुविधाएं भारत में भी उपलब्ध हो रही हैं। भारत का स्टार्टअप इको सिस्टम भी भारत में नित नए नवाचार उपलब्ध करा रहा है इससे अमेरिका में पूर्व से ही सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों को भी भारत में रोजगार के नए अवसर दिखाई दे रहे हैं।

साथ ही, भारत में प्रतिभावान इंजीनीयरों की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता है जिससे अमेरिका की कई कम्पनियां अब अपने तकनीकी कार्य को भारत में स्थानांतरित कर रही हैं। कई अमेरिकी कम्पनियां अब यह महसूस करने लगी हैं कि भारत में कम खर्चों में अधिक उत्पादकता मिल सकती है, क्योंकि भारत में उत्पादों की लागतें एवं कार्यबल की लागतें बहुत कम हैं, जिससे तुलनात्मक रूप से इन कम्पनियों की लाभप्रदता में सुधार दिखाई दे रहा है। अमेरिका में उत्पादों की लागतें बहुत ऊंचें स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जो कम्पनियों की लाभप्रदता को विपरीत रूप से प्रभावित कर रही हैं। और फिर, भारतीय महानगरों में अमेरिकी महानगरों की तुलना में बेहतर एवं टक्कर की सुविधाएं उपलब्ध हैं। भारत में विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार भी उपलब्ध है जिससे उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में उत्पादन करने वाली विश्व की लगभग समस्त बड़ी कंपनियां अब भारत में अपनी विनिर्माण इकाईयों की स्थापना करने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रही हैं। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में सस्ती उत्पादन लागत पर उत्पादों का निर्माण कर भारत में ही इन उत्पादों को बेच सकती हैं क्योंकि स्थानीय स्तर पर ही इन उत्पादों के लिए विशाल बाजार उपलब्ध है। अन्य कई कम्पनियां तो भारत में स्थापित विनिर्माण इकाईयों में उत्पादों का निर्माण कर अन्य देशों को निर्यात भी करने लगी हैं।

भारत में आधुनिकतम तकनीकी उपलब्ध है, रहन सहन की लागतें बहुत कम हैं, युवा एवं प्रतिभावान कार्यबल सस्ती दरों पर उपलब्ध है, भारत में मुद्रा स्फीति की दर सबसे कम है, उत्पादों का बड़ा बाजार उपलब्ध है, इन उपलब्धियों की चलते अब विदेशी निवेशक भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। अमेरिका सहित विकसित देशों में आज मुद्रा स्फीति की समस्या विकराल रूप धारण किए हुए है एवं इसका हल ये देश निकाल नहीं पा रहे हैं इससे इन देशों में पेंशन पाने वाले नागरिक इन देशों में रहन सहन की उच्च लागत को वहन नहीं कर पा रहे हैं। जबकि भारत में इन देशों के नागरिकों का गुजारा बहुत आसानी से हो सकता है। साथ ही, भारत में हाल ही के समय में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धि में अकल्पनीय सुधार हुआ है। भारत में ही अब विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं तुलनात्मक रूप से बहुत ही सस्ती दरों पर उपलब्ध हैं। अन्य देशों की तुलना में केवल 25/30 प्रतिशत खर्च पर भारत में अत्याधुनिक तकनीकी आधारित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। अतः आज न केवल विकसित देशों बल्कि अरब देशों से भी नागरिक भारत में अपना इलाज कराने के लिए बहुत बड़ी संख्या में आने लगे हैं।

भारतीय संस्कृति भी विदेशी नागरिकों को अपनी ओर आकर्षित करती हुई दिखाई दे रही है। मन की शांति तो भारत के आध्यात्म में अंतर्निहित है। “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना, “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” एवं “सर्वे भवंतु सुखिन:” जैसी भावना तो केवल और केवल भारत में ही पाई जाती है। भारत में योगा एवं आयुर्वेदिक जैसी सुविधाएं भी स्वास्थ्य को ठीक बनाए रखने में सहयोग करते हुए दिखाई दे रही हैं। पश्चिम के केवल “मैं” के भाव से भी नागरिक अब ऊब चुके हैं एवं वहां पर छिन्न-भिन्न हुए सामाजिक ताने-बाने से भी बहुत परेशान हैं अतः वे आत्मिक सुख की तलाश में भारत के सामाजिक ताने बाने में रचना बसना चाह रहे हैं। अमेरिका एवं अन्य देशों के नागरिक महाकुम्भ के समय लाखों की संख्या में भारत में प्रयागराज में पवित्र त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाने के उद्देश्य से आए थे, यहां का धार्मिक माहौल देखकर ये लोग अब भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं। विकसित देशों की तुलना में भारत में उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त होती हुई दिखाई दे रहे हैं। आज भारत पूरे मनोयोग एवं आत्म विश्वास के साथ अपने पैरों पर खड़ा है।

भारत में समाज बहुत लचीला है एवं अन्य देशों से भारत आ रहे नागरिकों का स्वागत करता हुआ दिखाई दे रहा हैं। अतः भारत में उनका हार्दिक स्वागत हो रहा है तथा भारत में इनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। इस प्रकार इन विदेशी नागरिकों को भारत में स्थापित होने में किसी भी प्रकार की परेशानी दिखाई नहीं दे रही है। भारतीय समाज उन्हें न केवल स्वीकार रहा है बल्कि समस्त प्रकार की सुविधाएं एवं सहयोग भी उपलब्ध करा रहा है।

भारत में बुजुर्गों को दिए जाने वाले आदर सत्कार से भी अमेरिका का बुजुर्ग नागरिक अत्यधिक प्रभावित हैं। अमेरिका में इस प्रकार का माहौल उन्हें नहीं मिलता है। वहां तो बुजुर्गों को सामान्यतः उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है तथा इन बुजुर्गों की देखरेख सरकार को करनी होती है। आज अमेरिका में लगभग 6 लाख बुजुर्ग खुले में, पार्कों में, अपना जीवन जीने को मजबूर हैं। संयुक्त परिवार तो केवल भारत में सम्भव है अमेरिका में तो संयुक्त परिवार दिखाई ही नहीं देते हैं। भारत के केरल, गोवा, पोंडिचेरी, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड राज्य अमेरिका में सेवानिवृत्त हुए नागरिकों के लिए किसी स्वर्ग से कम सिद्ध नहीं हो रहे हैं।

“भारतीय पर्यावरण चिंतन” — विमोचन का सार्थक क्षण | भारत बोध कार्यक्रम

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बिरेन्द्र पांडेय

जयपुर : भारत बोध कार्यक्रम में “भारतीय पर्यावरण चिंतन” पुस्तक का विमोचन हम सभी के लिए एक विचारात्मक उत्सव रहा। आदरणीय श्री सुनील आंबेकर जी (अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख) के करकमलों से इस ग्रंथ का लोकार्पण हुआ, मेरे लिए संपादक के रूप में विशेष संतोष और हर्ष का विषय है। पिछले 6 माह के सतत साहित्यिक परिश्रम की यह सार्थक परिणति है।


आज जब विश्व पर्यावरण को संकट के रूप में देखता है, तब भारत की दृष्टि हमें स्मरण कराती है कि पर्यावरण हमारे लिए संस्कार, संस्कृति और सहजीवन का विषय रहा है—प्रकृति संसाधन नहीं, माता और सहचर है। संघ के शताब्दी वर्ष और पंच परिवर्तन की पृष्ठभूमि में इस पुस्तक का प्रकाशन इस दृष्टि को वैचारिक आधार देता है—वैदिक काल से आधुनिक काल तक समग्र भारतीय पर्यावरण चिंतन को एक सूत्र में पिरोते हुए।

इस ग्रंथ में देश के 25 से अधिक विद्वानों और चिंतकों के लेख संकलित हैं—लगभग 140 पृष्ठों में भारतीय परंपरा की आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यवहारिक पर्यावरण दृष्टि का सशक्त प्रस्तुतीकरण। आयरलैंड में भारत के राजदूत श्री अखिलेश मिश्र जी, श्री श्री रविशंकर जी, श्री स्वामी अवधेशानंद गिरी जी, श्री सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी, प्रो. दयानंद भार्गव जी, प्रो. बजरंग लाल गुप्त जी, श्री गोपाल आर्य जी, वैद्य राजेश कोटेचा जी, श्री प्रशांत पोल जी, प्रो भगवती प्रकाश शर्मा जी, श्री हनुमान सिंह राठौड़ जी और डॉ इंदुशेखर तत्पुरुष जी जैसे प्रतिष्ठित लेखकों के योगदान से यह ग्रंथ विशेष बना है।

यह पुस्तक स्मरण कराती है कि भारतीय दृष्टि में विकास और प्रकृति विरोधी नहीं, पूरक हैं— संरक्षण कानून से नहीं, चेतना से आता है; और चेतना संस्कृति से जन्म लेती है।
इसी भाव से शीर्षक है—“विमर्श: भारत बोध का”। आशा है कि “भारतीय पर्यावरण चिंतन” केवल पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं, जीने की दृष्टि बने—क्योंकि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही भारत की शाश्वत पहचान है।

भारतीय बैंक भ्रष्टाचार के सब से बड़े कम्युनिकेशन सेंटर

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दयानंद पांडेय
लखनऊ : वर्ष 1985 में जब दिल्ली से लखनऊ आया था तो एक बैंक में यूनियन के एक नेता पर नज़र गई। थे तो वह क्लर्क ही लेकिन रहते ख़ूब ठाट -बाट से थे । बड़े-बड़े बैंक मैनेजर उन के आगे-पीछे घूमते थे । बैंक मैनेजर तो छोड़िए कई आई ए एस , आई पी एस , पी सी एस अफ़सर भी उन की मुट्ठी में रहते थे । उन की कोई बात टालते नहीं थे । टेढ़े से टेढ़े मामले भी वह चुटकी बजाते ही संभव बनवा देते थे । इंजीनियर , ठेकेदार , व्यवसायी भी उन की छांव खोजते थे । गज़ब जलवा था । फिर हम ने इन को अपने राडार पर लिया । बैंक में तो जल्दी यह जनाब मिलते नहीं थे । किसी अफ़सर , किसी ठेकेदार , किसी व्यवसायी के यहां वह मिलते थे । या फिर यह लोग इन के यहां । मोबाइल का ज़माना नहीं था तब लेकिन एक फ़ोन पर यह अपने ज़रूरी काम करवा लेते । वह लगातार मोबाइल रहते । कुछ ख़ास अड्डे इन के तय थे । अलग-अलग समय पर । दोपहर का ,कहीं शाम का कहीं । लंच और डिनर भी अकसर पांच सितारा होटलों में । या उन होटलों से लोग पैक करवा लाते ।

एक व्यवसायी ने तो उन्हें हज़रतगंज जैसी जगह में ऊपरी मंजिल का एक बड़ा सा फर्निश घर ही दे रखा था । नीचे आलीशान शोरुम , ऊपर आलीशान घर । बहुत सुरागरसी की पर जनाब की असल कुंजी नहीं मिल पा रही थी । ताकि ख़बर निकल सके । बहुत दिनों तक फॉलो करता रहा । फिर अंतत: राज का पता चल गया । होता क्या था कि रिश्वत के लेन-देन में उन दिनों रिश्क बहुत बढ़ गया था । लोग रंगे हाथ पकड़े जाने से भयभीत रहते । ठीक वैसे ही जैसे औरतें संभोग से सिर्फ़ इस लिए डरती फिरती हैं कि कहीं गर्भवती न हो जाएं । तो यह जनाब बैंक कर्मचारियों के नेता जी , निरोध कहिए , कापर टी कहिए , कोई गोली कहिए , का काम करते थे । होता यह था कि किसी नाम से किसी बैंक में एक खाता खुल जाता । करोड़ , लाख किसी भी रकम में । फिर संबंधित व्यक्ति को एक चेक बुक दे दी जाती । दस्तखत कर के । लिमिट बता दी जाती । अब अगला आदमी किस नाम से , किस अकाउंट में , किस धनराशि में , बियरर या अकाउंट पेयी जैसे , जिस तरह से चाहे , जब चाहे निकाल ले । न कोई रिश्क , न कोई झंझट । किस ने दिया , किस को दिया , किसी को पता नहीं । और कार्य सुगमता से संपन्न हो जाता । हफ्ते , महीने में पैसा खत्म होते ही वह अकाउंट बंद हो जाता । सूत्रधार होते यह बैंक नेता जी । बैंक मैनेजर से लगायत हर किसी का अनुपात उस को मिल जाता । बस सूत्रधार होते यह बैंक नेता जी । हर किसी का राज इन को मालूम होता । हर किसी को इन पर विश्वास होता ।

आंख मूंद कर लोग नेता जी के एक फोन पर लाखों करोड़ों की डील कर लेते थे । छोटे-मोटे काम में नेता जी हाथ भी नहीं लगाते थे । ऐसे मामलों के कोई सुबूत भी नहीं मिलते । कहते ही हैं कि घूस और भूत के सुबूत नहीं होते । कई व्यवसायियों के खाते में पैसे नहीं होते लेकिन लाखों की डिमांड ड्राफ्ट नेता जी बनवा देते । हफ्ते दस दिन में माल आते ही खाते में पैसा पहुंच जाता । कुछ मामले हम ने निकाले । ख़बर लिखी । पर छपी नहीं । पता चला कि इस पूरे रैकेट में अख़बार के मालिकान भी शामिल थे । उन को भी पचास काम इसी पुल से गुज़र कर करवाने होते थे । नौकरी जाते-जाते बची । खैर , मजा तब आया जब इन नेता जी के एक बेटे की शादी हुई । नेता जी मुझे भी बुलाना नहीं भूले । गया भी मैं । देखा कि एक से एक अफसर , व्यवसायी , ठेकेदार , इंजीनियर उपस्थित थे । कुछ राजनीतिज्ञ भी । एक दूसरे से आंख छुपाते , बचते-बचाते । लेकिन कब तक और कितना बचते ? बैंक नेता के हमाम में सभी नंगे हो चुके थे । सब एक दूसरे की नस पकड़ चुके थे । और तो और कुछ अफ़सर तो ऐसे भी दिखे जो अपने इमानदार होने का डंका पीटते नहीं थकते थे । एक बैंक क्लर्क के बेटे की शादी में राजनीतिज्ञों , आला अफसरों , ठेकेदारों , इंजीनियरों और व्यवसायियों की उपस्थिति लेकिन किसी अख़बार की सुर्खी नहीं बनी । बनती भी कैसे भला कुछ अख़बारों के मालिकान भी तो इस हमाम में चहक और महक रहे थे । कुछ दल्ले पत्रकार भी उपस्थित थे ।

मैं अभिशप्त था यह और ऐसा नज़ारा देखने के लिए । देख कर भी खामोश था । तब मोबाइल भी नहीं होते थे कि कुछ फ़ोटो ही खींच लेता । ख़बर भी नहीं लिखी । फ़ेसबुक , ट्विटर या ब्लॉग भी नहीं था कि यह सब लिख देता । बाद के दिनों में तो सब कुछ आन लाइन होने लगा । चेक तो अब भी है ही , क्रेडिट कार्ड भी थमा देते हैं लोग । लेकिन बैंक अकाऊंट खोलने और रिश्वत लेने और देने वालों का लिंक जोड़ने वाले बैंक कर्मियों की सर्वदा ज़रुरत रही है इस सिस्टम को , सर्वदा रहेगी । बेवजह लोगों की आंखें चौंधिया गई हैं बैंक के मार्फ़त करोड़ों के गुलाबी रुपए की खेप दर खेप देख कर । यह सब तो होना ही था , सर्वदा होता रहेगा । यह जन धन खाते , खातों का इंश्योरेंस वगैरह में भी बैंक वालों ने कितना जय हिंद किया है , यह बात भी भला कितने लोग जानते हैं ? तो मित्रों जानिए कि भारत एक कृषि प्रधान देश है , यह ग़लत अवधारणा है । सच यह है कि भारत एक भ्रष्टाचार प्रधान देश है । और भारतीय बैंक इस भ्रष्टाचार के सब से बड़े कम्युनिकेशन सेंटर । केंद्र बिंदु । धुरी । भ्रष्टाचार के सूत्रधार । देश में भ्रष्टाचार की सारी ट्रैफिक बैंक की रेल , नाव और जहाज से ही गुज़रती है ।

जिस बंगलादेश देश के लिये भारतीय जवानों ने बलिदान दिया वह अब पाकिस्तान के साथ

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दिल्ली । पाकिस्तान कभी भारत का ही हिस्सा था, उसका जन्म भारत की भूमि पर हुआ । वहां रहने वाले लोग भी भारतीय पूर्वजों के वंशज हैं । फिर भी वे लोग दिन रात भारत के विरुद्ध विष वमन और भारत को मिटाने का दंभ भरते हैं । पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो अपने जन्म के बाद से नहीं, अपितु अपने गर्भ काल से जन्मदाता भारत की धरती पर रक्तपात का षडयंत्र कर रहा है । पाकिस्तान के इन्हीं षडयंत्रों का परिणाम था 1971 का युद्ध । जो भारत पर थोपा था। इसी युद्ध में जन्म हुआ था संसार में एक नये बंगलादेश का । लेकिन यह विचारणीय है जिस भारत के जवानों के बलिदान से बंगलादेश का जन्म हुआ था वही बंगलादेश, पाकिस्तान से मिलकर भारत के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहा है ।

1971 का वह युद्ध कुल तेरह दिन तक चला था । दुनियाँ के इतिहास में यह सबसे छोटा निर्णायक युद्ध माना जाता है । इस युद्ध समापन के साथ एक नये देश का उदय हुआ जो बंगलादेश के नाम से जाना जाता है । बंगलादेश की धरती भी कभी भारत भूभाग बंगाल प्राँत का अंग रही है । लेकिन 1947 में भारत की धरती के इस हिस्से ने भी भारत से अलग होकर पाकिस्तान का नाम स्वीकार कर लिया था और यह प्रक्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान कहलाया । लेकिन भाषा को लेकर मतभेद पहले दिन से था । सल्तनत काल में चले बलपूर्वक धर्मांतरण अभियान में बंगाल के निवासियों की पूजा उपासना पद्धति तो बदल गई थी पर भाषा के प्रति लगाव कम न हुआ। बंगाली समाज ने अपना धर्म और राष्ट्रीयता बदलकर पाकिस्तानी नाम तो स्वीकार कर लिया था लेकिन अपनी मातृभाषा से लगाव न छोड़ा। वे चाहते थे कि उनकी भाषा बंगाली ही रहे । जबकि पाकिस्तानी शासक उनकी यह बंगाली पहचान भी बदलना चाहते थे । पाकिस्तान की सरकार बलपूर्वक उर्दू और अरबी का दबाव बना रहे थे । संघर्ष यहीं से शुरू हुआ । इसको लेकर 1948 से आंदोलन आरंभ हो गये थे । जिसका दमन पाकिस्तान की सरकार और सेना करती रही थी । 1950 में बंगाली भाषा के लिये एक बड़ा आंदोलन और उसके सैन्य दमन ने पूर्वी पाकिस्तान में निवासरत बंगालियों के मन में विभाजन की एक धारा खींच दी थी । यह अंतर्धारा और इसका दमन 1968 के बाद तेज हुआ । दमन के विरुद्ध संघर्ष केलिये पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी अस्तित्व में आयी और शेख मुजीबुर्रहमान नेता के रूप में उभरे । 1970 आते आते सैनिकों के जुर्म और बंगालियों का दमन और पलायन दोनों बढ़ गया । पाकिस्तानी सैनिक सामूहिक जुर्म ढाने लगे । पाकिस्तानी सैनिकों ने बंगाली महिलाओं के साथ जैसी बर्बरता की, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। बड़ी संख्या में बंगाली लोग भारत आकर शरण लेने लगे । 25 मार्च 1971 को बंगला अभियान के नेता शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया । जिसका भारत ने विरोध जताया । और मुक्ति वाहनी को नैतिक समर्थन देने की घोषणा भी कर दी । भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आंदोलन को खुला समर्थन दिया और जो लोग भारत आ रहे थे उन्हे भी पर्याप्त संरक्षण दिया ।
पाकिस्तान ने अपनी समस्या का ठीकरा भारत के सिर फोड़ा और दुनियाँ में यह प्रचार किया कि भारत अशांति फैला रहा है । इसको लेकर पाकिस्तान में भारत के खिलाफ जुलूस निकलने लगे और नारे लगते “क्रश इंडिया” ऐसे जुलूसों को सत्तारूढ़ दल के नेता संबोधित करते और भारत को मिटाने का दंभ भरते ।

इन तमाम कारणों से आरंभ हुये युद्ध की तिथि भले तीन दिसम्बर 1971 मानी जाती हो पर पाकिस्तान ने अपनी ओर से यह युद्ध 25 नवम्बर 1971 को ही आरंभ कर दिया था जब लाहौर में ऐसी ही “क्रश इंडिया” रैली को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भुट्टो ने बाकायदा युद्ध की घोषणा की थी और उसकी तीनों सेनाओं ने मोर्चाबंदी शुरु कर दी थी । पाकिस्तान ने जहाँ करांची बंदरगाह पर नौ सेना बेड़े तैनात किये वहीं सीमा पर फौज बढ़ा कर घुसपैठ शुरू करदी थी । यह वही कूटनीति थी जो पाकिस्तान ने 1948 और 1965 में युद्ध के पूर्व अपनाई थी । तब उसे सफलता मिल गई थी ।लेकिन इस बार भारत सतर्क था भारत युद्ध तो नहीं चाहता था पर युद्ध से निबटने के लिये पूरी तरह तैयार था । भारत ने लगभग दस दिनों तक पाकिस्तान की घुसपैठ पर नजर रखी और स्वयं को मजबूत किया । दूसरी तरफ पाकिस्तान को लगा कि उसकी घुसपैठ सफल हो रही है । इससे उत्साहित होकर उसने दो और तीन दिसम्बर 1971 की रात भारत पर हवाई हमला बोल दिया । पाकिस्तान की वायुसेना ने एक साथ एक रात में भारत के कुल 11 स्थानों पर बम गिराये । यह बम उसने केवल सीमावर्ती क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि भारत की सीमा में चार सौ अस्सी किलोमीटर दूर तक निशाना साधा । पाकिस्तान ने इस अभियान का नाम “आपरेशन चंगेज” दिया था । इसमें पाकिस्तान के 41 युद्धक विमानों ने हिस्सा लिया था

इस बमबारी से पूरा भारत सकते में आ गया । तीन दिसम्बर को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया और सेना को आदेश दिया कि वह पाकिस्तान को मुँह तोड़ जबाब दे । भारतीय सेना ने तब तीनों प्रकार की रणनीति अपनाई । जल, थल और हवाई युद्ध की । भारतीय थल सेना जहाँ पूर्वी पाकिस्तान के हिस्से में घुसी और वहां संघर्षरत बंगलादेश मुक्ति वाहिनी की खुली मदद करने लगी भारतीय नौ सेना की पनडुब्बी ने बंगाल की खाड़ी में तैनात पाकिस्तान के उस एयर बेस को उड़ा दिया जिससे पाकिस्तान के युद्धक विमान उड़ान भर रहे थे । तीसरे वायुसेना ने पाकिस्तान के उन मिलिट्री कैंपो पर धावा बोला जो उसकी थल सेना के आश्रय स्थल थे । यह सब काम केवल आरंभिक चार दिनों में हो गया । नौ दिसम्बर से पाकिस्तान की फौज डिफेन्स में आई । दस दिसम्बर को भारत ने उसका सैन्य संचार तंत्र बिखेर दिया । हालत यह हुई कि पाकिस्तान के किस कैंप में कितनी सेना है, उसकी हालत क्या है, वह जीवित भी है या नहीं यह सब सूचनाएं बंद हो गयीं । पाकिस्तान की सेना का सारा ताना बाना बिखर गया । भारतीय फौज ने 14 दिसम्बर को ढाका पर कब्जा कर लिया । पूर्वी पाकिस्तान में तैनात पाकिस्तानी सैनिक या तो वर्मा(म्यांमार) भाग गये या सिरेन्डर करके जान की भीख मांगने लगे । 15 दिसम्बर को भारत ने ढाका पर आधिपत्य होने की अधिकृत घोषणा की । इसी के साथ वहां तैनात पाकिस्तान कमांडर ने फौज के आत्म समर्पण का प्रस्ताव दिया जिसे 16 दिसम्बर को माना गया । और भारत ने अपनी ओर से युद्ध विराम की घोषणा कर दी ।

अब बंगलादेश की भूमिका विचारणीय

पाकिस्तान का अंग बने बंगाल के निवासियों की सहायता करने में भारत ने अपने लगभग चार हजार सैनिकों का बलिदान दिया । दस हजार से अधिक घायल हुये । लगभग एक करोड़ शरणार्थी भारत आये । उन दिनों भारत की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि भारत इतने शरणार्थियों का भार उठा सके । फिर भी भारत ने हिम्मत की और शरण दी । इनमें से अधिकांश लौटकर ही नहीं गये । यहीं बस गये । इस युद्ध को आज 53 वर्ष बीत गये । आधी शताब्दी से भी अधिक इस अवधि में ऐसा कोई वर्ष नहीं बीता जब भारत ने बंगलादेश को सहायता न दी हो । बदले में क्या मिला ? बंगलादेश चीन की गोद में बैठ गया । पाकिस्तान के इशारे पर काम करने लगा । भारत में होने वाली आतंकवादी गतिविधियों का एक केन्द्र बन गया । इन दिनों बंगलादेश में केवल मंदिर ही तोड़े जा रहे बल्कि भारत विरोधी नारे भी लग रहे हैं। कट्टरपंथियों द्वारा यह खुली चेतावनी दी जा रही है कि यदि बंगलादेश के हिन्दुओं की सहायता केलिये भारत ने कदम बढ़ाये तो भारत से बंगाल उड़ीसा और असम भी छीन लेंगे। आज भले बंगलादेश के कट्टरपंथियों की यह धमकी हास्यास्पद लगे पर यदि हम इतिहास की घटनाओं को देखे और पाकिस्तान के षड्यंत्र को समझे तो विचार करना ही पड़ेगा। बंगलादेश बनने के बाद से कट्टरपंथी जैसी भारत की डेमोग्राफी बदल रहे हैं वह चौंकाने वाली हैं। असम, बंगाल और झारखंड के अनेक गांव ऐसे हैं जहाँ से हिन्दू पलायन कर गये और बंगलादेशी आकर बस गये । यह भी चिंताजनक है कि उनके वे सब दस्तावेज भी तैयार हो गये जिनसे उन्हे भारतीय माना जा सके। मीडिया में तो ऐसे समाचार भी आये कि बंगलादेशी घुसपैठिये अब असम और बंगाल में विधायक भी बन गये हैं

युद्ध की कुछ मुख्य बातें

*युद्ध में पाकिस्तान के कुल 97368 युद्ध बंदी बनाये गये इसमें 91 हजार वर्दीधारी सैनिक, दो हजार अर्धसैनिक और चार हजार अन्य सहयोगी थे

* युद्ध में 3843 भारतीय सैनिक बलिदान हुये जबकि पाकिस्तान के नो हजार सैनिक मारे गये

* युद्ध में भारतीय वायु सेना ने कुल 5878 उड़ाने भरी इसमें 4000 लगभग पश्चिमी मोर्चों पर बाकी पूर्वी मोर्चा पर

* शिमला समझौता 2 जुलाई 1972 को हुआ जिसमें भारत ने युद्ध बंदी लौटाये और जीती हुई जमीन भी

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