केरल से मिला भाजपा के लिए शुभ संकेत

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तिरुवनंतपुरम: भारतीय जनता पार्टी के लिए लम्बे संघर्ष के बाद दक्षिणी राज्य केरल से एक सुखद समाचार आया है । केरल के नगर निकाय चुनावों में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए राजग गठबंधन तीसरी शक्ति के रूप प्रवेश कर चुका है। यह नया राजनीतिक समीकरण मात्र केरल में ही नही अपितु पूरे दक्षिण भारत में कांग्रेस तथा वामपंथियो को सावधान होने को कह रहा है। केरल की राजधानी और कांग्रेस सांसद शशि थरूर के संसदीय क्षेत्र तिरुवनंतपुरम के नगर निगम चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 101 में से 50 सीटों पर विजय प्राप्त कर इतिहास रच दिया और वाममोर्चे का 45 वर्ष पुराना किला ढहा दिया। माकपा के नेतृत्व वाला गठबंधन यहा 29 और कांग्रेस नेतृत्व वाला गठबंधन मात्र 19 सीटों पर ही सिमट गया। तिरुवनंतपुरम ही नहीं केरल के त्रिशूर नगर निगम पर भी भाजपा गठबंधन का नियंत्रण हो गया है। इसके अतिरिक्त भाजपा ने लगातार तीसरी बार पलक्काड नगर पालिका पर भी अपना नियंत्रण बनाए रखा और त्रिपुनिथुरा नगरपालिका में सत्तारूढ़ गठबंधन के 20 वार्डों के मुकाबले 21 वार्ड जीतकर एडीएफ गठबंधन को एक और तगड़ा झटका देने में सफलता प्राप्त कर ली।

तिरुवनंतपुरम के परिणाम राजनैतिक गलियारे में चर्चा का विषय बन गए हैं क्योंकि यहां से शशि थरूर वर्ष 2009 से कांग्रेस के सांसद हैं और कांग्रेस आलाकमान से उनकी अनबन चल रही है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जो भारतीय प्रतिनिधिमंडल विदेशी दौरे पर भेजे गए थे उसमें शशि थरूर भी शामिल थे। शशि थरूर समय समय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसी न किसी रूप में सराहना कर रहे हैं । मोदी की नीतियों पर थरुर के लेख भी चर्चा का विषय बने रहते हैं।

केरल नगर निकाय के चुनाव परिणामों के आंकड़ों के अनुसार राजग गठबंधन ने राज्यभर में 1900 से अधिक वार्ड जीते हैं जो पिछली बार की तुलना में 300 से अधिक हैं। यद्यपि अब कहा जा सकता है कि अब केरल में भाजपा की उपस्थिति नगण्य नहीं रह गई है, वह धीरे -धीरे बढ़त पर निकल पड़ी है तथापि केरल में भाजपा को अभी बहुत काम करना है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी उसकी पकड़ नही बनी है।

केरल नगर निकाय चुनाव परिणामों से संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा ने तिरुवनंतपुरम में 45 वर्ष से चले आ रहे वामपंथी गढ को ढहा दिया। कोझिकोड ओैर कन्नूर जैसे कट्टर वामपंथी गढ़ों में भी अपनी उपस्थिति दिखाने में सफलता प्राप्त की जहां उसने 13 और 4 सीटें जीतकर सत्ता के समीकरण गड़बड़ा दिए। एनडीए ने पहली बार 26 ग्राम पंचायतों में सफलता प्राप्त की है। स्पष्ट है कि अब भाजपा केरल में तीसरी ताकत बन रही है और वहां की राजनीति में मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। 2020 के नगर निकाय चुनावों में भाजपा गठबंधन को 15 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे जो अब बढ़ कर 20 प्रतिशत हो गए हैं।

भाजपा के लिए सबसे चौंकाने वाला परिणाम कन्ननकुलंगरा वार्ड जिसे हिंदुओ का गढ़ कहा जाता है का रहा जहां पर भाजपा की मुस्लिम महिला उम्मीदवार मुमताज ने ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है। मुमताज विगत दो वर्षों से अल्पसंख्यक मोर्चा की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। मुमताज एक राजनेता के अतिरिक्त उद्यमी भी हैं।

चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भाजपा को बधाई देते हुए इसे लोकतंत्र की खूबसूरती बताया। केरल की जीत से प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा नेतृत्व गदगद है और इस विजय का उत्सव भी मना रहा है। केरल विजय पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह केरल में कार्यकर्ताओं की पीढ़ियों के कार्य और संघर्ष को याद करने का दिन है जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया। हमारे कार्यकर्ता ही हमारी ताकत हैं हमें उन पर गर्व है।
भारतीय जनता पार्टी केरल में अपने पैर जमाने के लिए लगातार कड़ी मेहनत कर रही है और हर बार नये -नये चेहरों के साथ प्रयोग कर रही है। 2014 में केंद्र में भाजपा गठबंधन की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद से केरल में भाजपा विशेष ध्यान दे रही है जिसका प्रतिफल अब दिखाई दे रहा है। अब केरल में ईसाई समुदाय भी भाजपा की ओर आकर्षित हो रहा हैं और उस समुदाय मे बीजेपी की पैठ बढ़ी है।
इन सब के पीछे केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बढ़ता प्रभाव भी है। स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों तक की चिंता छोड़कर संघ का विस्तार किया है। अब युवा भी संघ की शाखाओं में आ रहे हैं। स्वाभाविक रूप से केरल में संघ के विस्तार का लाभ भाजपा को मिलेगा।

मन्नू भंडारी ने लिखा कि राजेंद्र यादव किसी के साथ छ्लात्कार तो कर सकते हैं , बलात्कार नहीं

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दयानंद पांडेय

लखनऊ। एक बार किसी ने राजेंद्र यादव द्वारा बलात्कार की चर्चा की तो मन्नू भंडारी ने लिखा कि राजेंद्र यादव किसी के साथ छ्लात्कार तो कर सकते हैं , बलात्कार नहीं । और बात खत्म हो गई थी । सच यह है कि राजेंद्र यादव छ्लात्कार में बहुत निपुण थे । तमाम स्त्रियों के साथ उन्हों ने छल किया । अपनी व्याहता मन्नू भंडारी के साथ बेशुमार छल । असल में मोहन राकेश के नेतृत्व वाली यह तिकड़ी अपने स्त्री प्रसंगों के लिए बहुत ज्यादा जानी गई । मोहन राकेश , कमलेश्वर , राजेंद्र यादव । मोहन राकेश ने तो चार विवाह किए । मोहन राकेश की चौथी पत्नी अनीता औलक जो मोहन राकेश से विवाह के बाद अनीता राकेश हो गई थीं , ने मोहन राकेश पर संस्मरण के बहाने अपनी कथा कहिए , आत्मकथा कहिए लिखी है , चंद सतरें और । चंद सतरें और में अनीता राकेश ने पर्याप्त संकेत दिए हैं कि उन की मां भी मोहन राकेश पर आसक्त थीं । और कि उन से सौतिया डाह रखते हुए उन्हें बहुत मारती-पीटती थीं । उन्हों ने लिखा है कि उन की मां से मिलने और भी लेखक आते थे । पहले जैनेंद्र कुमार आते थे । फिर अज्ञेय भी आए । मोहन राकेश भी ।

अनीता की मां चंद्रा औलक भी लेखिका थीं । मोहन राकेश से अनीता औलक भी प्रेम में पड़ गईं । मोहन राकेश ने भी उन्हें निराश नहीं किया । अनीता की मां द्वारा आए दिन की पिटाई कहिए या मोहन राकेश से उन के प्यार की प्रगाढ़ता अनीता अंततः घर छोड़ कर मोहन राकेश के साथ मुम्बई भाग गईं । दिल्ली से भगाने में कमलेश्वर ने मदद की । एयरपोर्ट तक पहुंचाया। मुम्बई में राजेंद्र सिंह बेदी ने होटल वगैरह की व्यवस्था की । लंबी कथा है । अनीता उस समय बी ए में पढ़ती थीं । इस का लंबा विवरण बहुत ही रोमांचक ढंग से अनीता जी ने चंद सतरें और में लिखा है । बाद के दिनों में कमलेश्वर ने भी इस बाबत अपने संस्मरण में लिखा । कमलेश्वर का यह संस्मरण एक समय संडे मेल में धारावाहिक रूप से छपा था ।

एक बार क्या हुआ कि लखनऊ से एक पत्रकार दिल्ली गए । यू पी भवन में ठहरे । शराब पी कर उन्हों ने कमलेश्वर को फोन किया कि और पूरा मजा लेते हुए बोले कि सुना है आप लड़की भगाने में बड़े एक्सपर्ट हैं । तो हमारे लिए भी एक लड़की भगा दीजिए । कमलेश्वर ने भी मजा लिया और पूछा कि अपना अता-पता दीजिए , आता हूं । अब पत्रकार को फिर शरारत सूझी । यू पी भवन में उस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक माफ़िया हरिशंकर तिवारी भी ठहरे हुए थे । बतौर विधायक । पत्रकार ने तिवारी के कमरे का नंबर बता दिया । कमलेश्वर आए भी यू पी भवन । पुलिस ले कर आए । उस आदमी को सबक सिखाने । तिवारी से मिले भी । तिवारी को वाकया बताया । तिवारी ने विनम्रता से बताया कि क्या इस उम्र में मुझे यही काम रह गया है ? कुछ और आरोप लगाते आप तो एक बार सुनता भी । आप के साथ किसी ने मजाक कर दिया है । कमलेश्वर चुप रह गए और चले गए ।
इस पूरी कथा की बड़ी परिणति यह थी कि तीन विवाह भले असफल रहे मोहन राकेश के पर अनीता से उन का यह विवाह सफल रहा था । अलग बात है कि दो बच्चे पैदा कर मोहन राकेश दुनिया से विदा हो गए । कुछ समय बाद अनीता राकेश ने भी दूसरा विवाह कर लिया । मोहन राकेश जितने शानदार लेखक हैं , उन की जिंदगी के पन्ने भी उतने अंतर्विरोधी । अंधेरे बंद कमरे , आधे अधूरे , अंतराल और आषाढ़ का एक दिन में उन का जीवन और उस का संत्रास भी खूब दीखता है । बाक़ी रचनाओं में भी । मन्नू भंडारी लिखित आप का बंटी जिस भी किसी ने पढ़ा है , उसे जान लेना चाहिए कि वह बंटी मोहन राकेश की ही जिंदगी पर आधारित है ।

मोहन राकेश मंडली के कमलेश्वर की ज़िन्दगी के पन्ने भी औरतबाजी से रंगे पड़े हैं और राजेंद्र यादव के भी । तय कर पाना मुश्किल है कि कमलेश्वर बड़े औरतबाज कि राजेंद्र यादव । दोनों ही ने अपनी औरतबाजी को छुपाया नहीं है । कमलेश्वर ने दो, तीन मामले छुपाए ज़रूर जिन्हें मन्नू भंडारी ने लिख कर बेपर्दा कर दिया। बताया कि उन औरतों से कमलेश्वर के बच्चे भी हैं । (सोशल मीडिया से)

बिहार में प्रेस क्लब कब तक, दिल्ली पीसीआई ध्यान दे

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अंजान

दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की कमान संगीता बरुआ को मिली और बिहार के पड़ोसी राज्य झारखंड में रांची प्रेस क्लब का अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ चौधरी निर्वाचित हुए। दोनों खबरें सामान्य लग सकती हैं, लेकिन बिहार के पत्रकारों को आईना भी दिखा रही हैं, जिनकी पीठ पर पटना प्रेस क्लब से जुड़ी असफलताओं की बड़ी गठरी है।

बिहार का दुर्भाग्य है कि आज़ादी से पहले और बाद में देश को दिशा देने वाली पत्रकारिता के बावजूद आज तक राज्य का अपना कोई प्रेस क्लब नहीं है। यह तकलीफ तब और गहरी हो जाती है जब याद आता है कि 2019 में नीतीश कुमार की सरकार ने पटना के गोलघर के पीछे डेढ़ एकड़ जमीन पर आधुनिक प्रेस क्लब भवन बनाकर पत्रकारों को सौंपा था। यह बिहार और खासकर पटना के पत्रकारों के लिए ऐतिहासिक अवसर था। भवन पर कब्जा हो गया, चुनाव की तैयारी शुरू हुई और छह सौ से अधिक सदस्य भी बना लिए गए। सदस्यता फीस के रूप में छह लाख रुपये जमा हो गए और राज्य सरकार ने भी मोटी रकम आवंटित कर दी।

लेकिन दुर्भाग्य ने यहीं करवट ली। चुनाव से पहले ही कुछ मठाधीश पत्रकारों की खींचतान, अहंकार और लालच ने प्रेस क्लब को राजनीति की भेंट चढ़ा दिया। नतीजा हुआ कि बहुप्रतीक्षित पटना प्रेस क्लब धरातल पर आने से पहले ही बिखर गया। हालात से आजिज आकर कुछ ही महीने बाद राज्य सरकार ने वह भवन वापस ले लिया और बिजली विभाग को सौंप दिया। यह केवल एक भवन का खोना नहीं था, बल्कि बिहार के पत्रकारों की सामूहिक साख और अवसर की भी भारी क्षति थी।

इसके ठीक उलट तस्वीर रांची में दिखाई देती है। अपेक्षाकृत नवोदित राज्य झारखंड के पत्रकारों ने रघुवर दास सरकार के समय न सिर्फ अपना प्रेस क्लब खड़ा किया, बल्कि पिछले सात वर्षों से वहां नियमित, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक चुनाव भी हो रहे हैं। रांची प्रेस क्लब के पहले अध्यक्ष राजेश सिंह बने और इस बार यह जिम्मेदारी शंभुनाथ चौधरी को मिली है। उपाध्यक्ष विपिन उपाध्याय, सचिव अभिषेक सिन्हा और कोषाध्यक्ष कुबेर सिंह निर्वाचित हुए हैं। यह निरंतरता और संस्थागत मजबूती का प्रमाण है।

रांची प्रेस क्लब के पूर्व सचिव अमरकांत द्वारा अपने कार्यकाल की उपलब्धियों का दिया गया ब्योरा पटना के पत्रकारों के लिए सबक है। उनके कार्यकाल में रांची प्रेस क्लब ने वरिष्ठ पत्रकारों को मतदान अधिकार देकर उनका सम्मान लौटाया, क्लब का फंड आठ लाख से बढ़ाकर 28 लाख रुपये किया, ढाई दशक की पत्रकारिता कर चुके साथियों को आजीवन निःशुल्क सदस्यता दिलाई। सदस्यता शुल्क भी छह सौ से घटाकर 250 रुपये किया। सरकारी मदद से 48 लाख रुपये में क्लब का जीर्णोद्धार कराया। जाहिर है, यह उपलब्धि बताती है कि रांची का मीडिया समूह उत्कर्ष की ओर अग्रसर है।

रांची प्रेस क्लब की यह उपलब्धि गाथा बिहार के हर पत्रकार को पढ़नी चाहिए। साथ ही उन चंद मठाधीशों पर आत्ममंथन भी होना चाहिए, जिनके स्वार्थ और दंभ ने पटना प्रेस क्लब के सपने तोड़ दिए। जब तक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर सामूहिक हित को नहीं समझेंगे, तब तक रांची प्रेस क्लब जैसे उदाहरण उन्हें आईना दिखाते रहेंगे।

(लेखक का नाम उपलब्ध नहीं)

दुनिया को डरा रहा है इस्‍लाम का जिहाद

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । दुनिया एक बार फिर ऐसे प्रश्नों के सामने खड़ी है, जिनसे मुँह मोड़ना अब संभव नहीं। 14 दिसंबर को ऑस्ट्रेलिया की राजधानी सिडनी के बॉन्डी बीच पर हनुक्का उत्सव मना रहे यहूदियों पर हुआ घातक हमला सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं कहा जा सकता है । यह तो उस वैचारिक संकट का प्रतीक है जो बीते दशकों से लगातार गहराता जा रहा है। साजिद और उसके बेटे नवीद द्वारा की गई इस अंधाधुंध गोलीबारी में 15 निर्दोष लोगों की मौत और कई के घायल होने के बाद यह सवाल फिर उभरा है कि आखिर वह कौन-सी सोच है जो धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा को सही ठहराती है। जिसमें कि यह घटना ऐसे देश में घटी है , जहाँ न मुसलमानों पर कोई अत्याचार हो रहा था और न ही धार्मिक स्वतंत्रता पर कोई संकट है। इसके बावजूद गैर-मुसलमानों को निशाना बनाया गया।

ऑस्ट्रेलिया की इस घटना के बाद नवीद अकरम का छह वर्ष पुराना एक वीडियो सामने आया है जो उसकी मानसिक संरचना को समझने में मदद करता है। वीडियो में वह कहता है कि “अल्लाह का कानून हर पढ़ाई और हर काम से ऊपर है और उसे हर किसी तक पहुँचाया जाना चाहिए।” यह वाक्य साधारण नहीं है। यह उस सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें सांसारिक शिक्षा, आधुनिक कानून और नागरिक कर्तव्यों से ऊपर एक धार्मिक (मजहबी) कानून को स्थापित किया जाता है। यही वह बिंदु है, जहाँ समस्या केवल व्यक्ति की नहीं रह जाती है, वह विचारधारा की बन जाती है।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि “अल्लाह का कानून” आखिर है क्या। इस्लाम में इसे व्यापक रूप से शरिया के रूप में जाना जाता है। मुसलमानों के लिए यह धार्मिक आस्था से अधिक जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति मानी जाती है। इसी क्रम में सीरा, यानी पैगंबर मुहम्मद की जीवनी को आदर्श जीवन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस्लामी ग्रंथों की कुछ व्याख्याएँ ऐसी भी हैं, जिनमें दुनिया को मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया है। गैर-मुस्लिम क्षेत्रों को ‘दारुल-हरब’ कहा गया है, यानी युद्ध का क्षेत्र। ऐसी व्याख्या में प्रमुखता से जिहाद शामिल है, जिसमें यह मान लिया गया है कि जो इस्लाम को स्वीकार नहीं करता, वह ‘शिर्क’ और ‘बुतपरस्ती’ के ज़ुल्म में लिप्त है और उस ज़ुल्म को समाप्त करना हर मुसलमान का मजहबी कर्तव्य है। इस दृष्टिकोण में हिंसा आत्मरक्षा नहीं रहती, वह आक्रामक मजहबी अभियान बन जाती है।

यही कारण है कि इतिहास से लेकर वर्तमान तक, जिहाद शब्द का प्रयोग अक्सर हथियारबंद संघर्ष के अर्थ में हुआ है। कुरान का नौवां अध्याय, जो जिहाद पर केंद्रित माना जाता है, युद्ध और संघर्ष के संदर्भों से भरा है। कुरान (9:111) में ‘अल्लाह के काम’ के लिए ‘कत्ल करना और कत्ल होना’ का उल्लेख मिलता है। इसी अध्याय की आयतें—9:5, 9:29, 9:41, 9:73, 9:123 आक्रामक संघर्ष के आह्वान के रूप में उद्धृत की जाती रही हैं। हदीस-साहित्य में भी ऐसे कथन मिलते हैं, जिनका उपयोग वर्चस्ववादी दृष्टि को पुष्ट करने में किया गया है। उदाहरण के तौर पर सहीह बुखारी (4:53:392) में उद्धृत कथन, “तुम सुरक्षित रहोगे, अगर इस्लाम कबूल कर लो। यह पूरी दुनिया अल्लाह की और मेरी है” को इतिहास में यहूदियों और अन्य गैर-मुसलमानों पर दबाव के औचित्य के रूप में पढ़ा गया है।

इसी प्रकार कुरान के दूसरे अध्याय की कुछ आयतों की व्याख्याएँ गैर-मुसलमानों को अधीन करने, धर्मांतरण या जजिया के लिए मजबूर करने के रूप में प्रस्तुत की गई हैं। यही कारण है कि सदियों के इस्लामी इतिहास में ‘हथियारबंद लड़ाई’ और ‘जिहाद’ को अक्सर समानार्थी की तरह समझा गया। इन आयतों की व्याख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं, किंतु यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि कट्टरपंथी समूह इन्हीं व्याख्याओं को आधार बनाकर हिंसा को धार्मिक वैधता प्रदान करते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में भारत में जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी द्वारा दिए गए हालिया जिहाद संबंधी वक्तव्य को जरूर देखना चाहिए, उनका कहना है कि “जब-जब ज़ुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा” और यह कि जिहाद का मूल अर्थ आत्मसंघर्ष, बुराइयों से मुक्ति और अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध है। वे इसे एक पवित्र शब्द बताते हैं और यहां तक प्रस्ताव रखते हैं कि जिहाद के वास्तविक अर्थ को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। सिद्धांत रूप में यह बात आकर्षक लग सकती है, किंतु व्यवहार की धरातल पर जो हो रहा है, वह इन दावों से मेल नहीं खाता। न भारत में और न ही ऑस्ट्रेलिया में ऐसी कोई स्थिति थी, जिसे जुल्म कहकर हिंसा को जायज ठहराया जा सके। फिर भी निर्दोष गैर-मुसलमानों की हत्या का सिलसिला पूरी दुनिया में चल रहा है!

कहना होगा कि इस वैचारिक ढांचे का परिणाम आज पूरी दुनिया झेल रही है। जम्मू-कश्मीर में लगातार हिंदू यात्रियों और सुरक्षा बलों पर हमले हों, यूरोप में चर्चों, यहूदी केंद्रों और स्कूलों को निशाना बनाया जाए, रूस के मॉस्को कॉन्सर्ट हॉल में सामूहिक हत्या हो या अफ्रीका में गैर-मुस्लिम गांवों पर धावा बोलना रहा है, हर जगह देख सकते हैं कि आतंकियों की धार्मिक (मजहबी) पहचान अक्सर एक जैसी ही रही है। यह कहना अब कठिन हो गया है कि ये सब अलग-थलग घटनाएँ हैं।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस आलोचना का उद्देश्य पूरे मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा करना नहीं है। दुनिया भर में करोड़ों मुसलमान शांति से रहते हैं और हिंसा के विरोधी हैं। किंतु यह भी उतना ही सच है कि जब तक इस्लाम के भीतर मौजूद कट्टर और आक्रामक व्याख्याओं पर खुली बहस और आत्मालोचना नहीं होगी, तब तक यह समस्या समाप्त नहीं होगी। हर हिंसक घटना के बाद सिर्फ यह कह देना कि “इस्लाम शांति का धर्म (मजहब) है” अब पर्याप्त नहीं है, क्योंकि सवाल धर्म के मूल संदेश का नहीं, उसकी राजनीतिक और हिंसक व्याख्या का है। इसलिए वास्तविक संकट हथियारों से कहीं अधिक आगे उस सोच का है जो यह मानती है कि पूरी दुनिया किसी एक धार्मिक (मजहबी) पहचान के अधीन होनी चाहिए। यही सोच युवाओं को यह सिखाती है कि हिंसा पुण्य (सवाब) या अमल-ए-सालिह है और हत्या मजहबी कर्तव्य। यदि इस मानसिकता की जड़ों पर प्रहार नहीं किया गया तो कोई भी सुरक्षा तंत्र, कोई भी कानून और कोई भी सैन्य कार्रवाई स्थायी समाधान नहीं दे सकती है।

अब निर्णय दुनिया के धार्मिक नेताओं, सरकारों और बौद्धिक वर्ग को लेना है। आखिर वे क्‍या चाहते हैं ? क्या वे इस समस्या को कानून-व्यवस्था का मामला मानते रहेंगे या उस वैचारिक खाद को भी चिन्हित करेंगे, जिससे यह हिंसा जन्म लेती है। गैर-मुसलमानों पर हिंसा हर हाल में रुकनी चाहिए। यह किसी एक देश या एक समुदाय तक सीमित समस्‍या नहीं है, आज प्रश्‍न संपूर्ण मानवता का है। यदि आज भी इस पर गंभीर, ईमानदार और साहसी हस्तक्षेप नहीं हुआ तो तय मानिए कल इसकी कीमत और अधिक निर्दोष लोगों को जान एवं हिंसा से चुकानी पड़ेगी।

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