पौष शुक्ल पंचमी (9 दिसम्बर) 1915 : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहब देवरस का जन्म

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भोपाल । निरंतर हमलों के बीच भी यदि अपनी शताब्दी यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वरूप और कार्य में निरंतर निरंतर विस्तार हुआ है तो उसका आधार संघ की समयानुकूल व्यवहारिक कार्यशैली है। तृतीय सरसंघचालक बालासाहब जी देवरस भी संघ की कार्यशैली में ऐसे ही व्यवहारिक विस्तार देने के लिये जाने जाते हैं। उनकी प्रत्येक भोपाल यात्रा में संघ कार्य में विस्तार हुआ कार्यकर्ताओं में नया उत्साह आया ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई और लगभग डेढ़ वर्ष बाद नियमित शाखाएँ आरंभ हुईं। देवरसजी प्रारंभिक शाखा में ही स्वयंसेवक बने थे। तब उनकी आयु मात्र ग्यारह वर्ष थी। इस शाखा का शुभारंभ संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार जी ने स्वयं किया था। इस प्रथम शाखा में बालासाहब के साथ केशवराव वकील, त्र्यंबक झिलेदार, अल्हाड़ जी अंबेडकर, बापू रावदिवाकर, नरहरि पारखी, बाली यशकुण्यवर, माधवराव मुले और एकनाथ रानाडे भी थे। बाला साहब बचपन से बहुत कुशाग्र और तीक्ष्ण बुद्धि थे। विषय को सुनकर प्रस्तुतिकरण करने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। इसलिये वे इस टोली के स्वभाविक समन्वयक के रूप में उभरे । डाॅक्टरजी स्वयं इस शाखा के शिक्षक और संचालक थे। इस टोली की पूरी शिक्षा डॉक्टरजी के माध्यम से ही हुई। देवरसजी के विषय प्रस्तुतिकरण में भी डॉक्टरजी की झलक साफ होती थी। समय के साथ संघ की संकल्पना, शिक्षा और डाक्टरजी के मार्गदर्शन से वे इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने संघ को माध्यम बनाकर अपना पूरा जीवन राष्ट्र और संस्कृति की सेवा केलिये समर्पित कर दिया। देवरसजी द्वारा प्रस्तुत विषयों में गहराई और व्यापकता बहुत विशिष्ट थी। श्रोता वर्ग एकाग्रता के साथ उनसे बंध जाता था। भले कोई स्वयं सेवक हों अथवा समाज के अन्य प्रबुद्ध जन, सभी एकाग्र होकर उनका बौद्धिक सुनते थे। उन्होंने प्रचारक से लेकर सरसंघचालक तक संघ के सभी दायित्वों का निर्वाहन किया। उन्होंने भारत के प्रत्येक प्राँत और क्षेत्र की यात्रा करके कार्य को विस्तार दिया। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तीसरे सरसंघचालक थे। द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य “गुरुजी” जी का निधन 5 जून 1973 को हुआ। संघ की परंपरानुसार प.पू. गुरूजी संसार से विदा होने से पहले पत्र लिखकर देवरसजी को अपना उत्तराधिकार सौंप गये थे।

और उनकी अंतिम इच्छा के अनुरूप देवरसजी ने 6 जून 1973 को तृतीय “सरसंघचालक” का दायित्व संभाला। तब उनकी आयु 58 वर्ष थी। मधुमेह रोग ने भी उन्हें प्रभावित कर लिया था। फिर भी उन्होंने अपने शरीर और स्वास्थ्य की कोई परवाह नहीं की और देश व्यापी यात्रा करते रहे। उन्हीं दिनों भारत में मँहगाई विरोधी आँदोलन आरंभ हुआ था। यह आँदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा था। जन सामान्य को मँहगाई से राहत दिलाने के इस आँदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता बढ़ चढ़ भाग ले रहे थे। देवरसजी ने देशभर की व्यापक यात्राएँ की और राष्ट्रहित केलिये संपूर्ण समाज को एकजुट होने का आव्हान किया। उनकी इन यात्राओं से समाज में संघ को लेकर वे भ्रांत धारणाएँ स्पष्ट होने लगी जो कतिपय संघ विरोधी शक्तियों ने फैला रखीं थीं। उनकी इन यात्राओं से संघ के कार्यकर्ताओं में उत्साह आया कार्य विस्तार भी हुआ। मंहगाई विरोधी आँदोलन में संघ कार्यकर्ता एक बड़ी शक्ति थे। इस तथ्य से सरकार भी अवगत हो गई थी। इसलिये संघ के अधिकारियों की निगरानी बढ़ी। परिस्थितियों को देखकर देवरस जी को यह आभास हो गया था कि प्रधानमंत्री श्रीमती गाँधी कोई कड़ा निर्णय ले सकतीं हैं। उन्होंने अपने आकलन से संघ के सभी प्रमुख अधिकारियों को सावधान कर दिया था। इंदिराजी ने आपातकाल लगाया, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा और सर्वाधिक दमन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यकर्ताओं का हुआ। यह देवरसजी की दूरदृष्टि और समय से पूर्व उठाये गये कुछ कदम थे कि देशभर में एक लाख स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी होने के बाद भी संघ की सक्रियता बनी रही। आँदोलन और गिरफ्तारियों का क्रम आपातकाल की पूरी अवधि चला। और आपातकाल हटने के तुरन्त बाद संघ पुनः अपनी गति से काम करने लगा ।

कुछ परंपराओं को व्यवहारिक बनाया

बालासाहब देवरस जी ने संघ की कुछ परंपराओं को समयानुकूल व्यवहारिक भी बनाया। इसमें सबसे पहले था “परम पूज्यनीय” संबोधन। जब उन्हें “परम पूजनीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस” संबोधित किया गया तो उन्होंने स्पष्ट किया कि “परम् पूज्यनीय” संबोधन केवल “सरसंघचालक” दायित्व के लिये हो, व्यक्ति के लिये नहीं।
बालासाहेब देवरस ने बौद्धिक परंपरा को भी उभय पक्षीय बनाया और विभिन्न स्तरों पर कार्यकर्ताओं के साथ संवाद की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया । उनका मानना था कि यदि स्वयंसेवकों के मन में कोई प्रश्न उठ रहा है तो इसका समाधान होना चाहिए। इसलिये बौद्धिक समागम में शंका समाधान के लिये भी समय रहे।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सरसंघचालक का दायित्व सौंपने की एक परंपरा थी। सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी का चयन करके एक पत्र लिखकर रख देते थे। यह उनके निधन के बाद खोला जाता था। डाॅक्टरजी के निधन के बाद उनका पत्र पढ़ा गया। और उनके अनुसार ही “गोलवलकर जी उपाख्य गुरुजी” को सरसंघचालक का दायित्व सौंपा गया और “गुरूजी” के पत्र के आधार पर यह दायित्व बालासाहब देवरस जी को मिला। लेकिन देवरस जी ने इस परंपरा में एक परिवर्तन किया। उन्होंने अपने जीवन काल में ही सरसंघचालक का दायित्व रज्जू भैया को सौंप दिया था। उनके बाद रज्जू भैया ने भी इस परम्परा का पालन किया करके अपने जीवनकाल में ही सुदर्शन जी को सरसंघचालक का दायित्व सौंप दिया था। सुदर्शन जी ने भी इसी परंपरा का पालन किया और अपने जीवन काल में ही यह दायित्व वर्तमान सरसंघचालक डा मोहन भागवतजी सौंप दिया था।

देवरसजी की कुछ प्रमुख भोपाल यात्राएँ

अपनी देश व्यापी यात्राओं के क्रम में वे अनेक बार भोपाल आये। सरसंघचालक के रूप में भी और इससे पहले सरकार्यवाह एवं सहसरकार्यवाह के रूप में भी। उनके कुछ प्रमुख कार्यक्रमों एक आयोजन सरस्वती शिशु मंदिरों के विद्यार्थियों का समागम था । यह आयोजन तात्या टोपे नगर भोपाल के स्टेडियम में हुआ था। इसमें लगभग चार से अधिक बच्चे थे। नगर प्रबुद्धजनों की संख्या भी बहुत अधिक थे। इस समागम में देवरसजी ने हिन्दुत्व और सामाजिक स्वरूप की व्याख्या की थी। देवरसजी आधुनिकता के समर्थक तो थे लेकिन अपने स्वत्व एवं आत्म गौरव के साथ। उनका मानना था स्वत्व व्यक्ति का मूल है। जो अपने मूल से जितना गहरा जुड़ा होगा वह आकाश की उतनी ही ऊँचाई तक जा सकता है। अपने प्रबोधन में उन्होंने यही बात समझाने का प्रयास किया था।उनके संबोधन में दो धाराएँ बहुत स्पष्ट थीं। एक आव्हान बच्चों और किशोरों से था। उन्होंने उभरती पीढ़ी से सैद्धांतिक अडिगता के साथ समय के अनुरूप व्यवहारिक होने का संदेश दिया। जबकि समाज के वरिष्ठ और प्रबुद्ध जनों से भ्रांत धारणाओं से मुक्त होकर आगामी पीढ़ी को समाज के मूल स्वरूप से परिचित कराने का आव्हान किया। उनके व्याख्यान में हिन्दुत्व की व्याख्या के उदाहरण इतने प्रभावशाली थे कि आगामी दिनों में प्रबुद्ध जनों के विमर्श में प्रमुख विन्दु बने। उनकी एक अन्य यात्रा भोपाल स्थित वर्तमान भारत माता चौराहे के समीप भदभदा रोड पर भारतीय मजदूर संघ और विद्यार्थी परिषद भवन के भूमि पूजन के निमित्त बनी। इस आयोजन में भी संघ से सम्बद्ध कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त नगर प्रबुद्ध जनों को भी आमंत्रित किया गया था। कार्य व्यवहार की दृष्टि से देंखे तो मजदूर संघ और विद्यार्थी परिषद दो अलग धाराएँ हैं पर देवरस जी का संबोधन दोनों संस्थाओं के लिये प्रेरक रहा। वे अपनी एक यात्रा में उन्होंने भोपाल के पत्रकारों से पृथक भेंट की थी। यद्यपि उनके सार्वजनिक आयोजनों में प्रबुद्ध जनों के साथ पत्रकार भी होते थे। भोपाल के कुछ पत्रकारों ने उनके साथ भोजन भी किया है। उनका तर्कशील प्रबोधन और विषय का प्रस्तुतिकरण सदैव प्रभावी रहा।

संक्षिप्त जीवन परिचय

बालासाहब देवरस जी का पूरा नाम मधुकर दत्तात्रेय देवरस था लेकिन वे बालासाहेब देवरस के नाम से जाने गये। परिवार यद्यपि आन्ध्रप्रदेश का मूल निवासी था। लेकिन पिता दत्तात्रेय जी शासकीय सेवा के चलते मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में रहे। बालासाहब का जन्म मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में हुआ। इस नाते उन्हें मध्यप्रदेश से बहुत लगाव था। उनका जन्म स्थान बालाघाट जिले में करंजा नामक स्थान था। उनकी जन्म तिथि पौष शुक्ल पक्ष की पंचमी और विक्रम संवत 1972 था। जबकि ईस्वी कैलेंडर के अनुसार उनकी जन्मतिथि 11 दिसम्बर 1915 थी । इस वर्ष पौष शुक्ल पंचमी तिथि 9 दिसम्बर को पड़ रही है। पिता दत्तात्रेय कृष्णराव देवरस और माता पार्वती बाई दोनों भारतीय परंपराओं और मान्यताओं के लिये समर्पित थे । उनके जन्म के साथ ही पिता का स्थानान्तर नागपुर हो गया। इसके चलते बालासाहब की शिक्षा नागपुर के न्यू इंग्लिश हाई स्कूल में हुई। उन्होंने 1931 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। नागपुर महाविद्यालय से वकालत पास की ।

वे बाल स्वयंसेवक थे । पढ़ाई पूरी करके संघ के प्रचारक बने । प्रचारक के रूप में संघ कार्य विस्तार केलिये उन्हे पहला दायित्व बंगाल का मिला। 1946 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के का सहसरकार्यवाह और 1965 सरकार्यवाह बने। 6 जून, 1973 को संघ के सरसंघचालक बने । उनके दायित्व संभालने के दो साल बाद ही देश में 25 जून 1975 को आपातकाल लागू हो गया 30 जून को देवरसजी गिरफ्तार कर लिये गये। उन्हें यरवदा जेल में रखा गया। 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा जो 1977 तक जारी रहा। 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और देवरसजी सहित संघ के अन्य कार्यकर्त्ता रिहा हो सके। आपातकाल के दौरान देवरस जी 20 महीनों से भी अधिक समय तक जेल में रहे।

सरसंघचालक के रूप में उनके कार्यकाल में संघ पर दूसरी बार प्रतिबंध 1992 में लगा। यह अयोध्या में विवादास्पद बाबरी ढांचा ढहने के बाद 10 दिसंबर 1992 को नरसिम्हा राव सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगाया था जो छै माह तक लगा रहा था । बालासाहेब 1994 तक सरसंघचालक रहे। स्वास्थ्य की गिरावट के कारण उन्होंने पद छोड़ दिया और प्रो. राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया को संघ का सरसंघचालक नियुक्त कर दिया था। समय अपनी गति से आगे बढ़ा और 17 जून 1996 को देवरसजी ने देह त्यागकर संसार से विदा ले ली ।

बंगाल नहीं बंकिम ने भारत के लिए लिखा माँ

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मनोज श्रीवास्तव

भोपाल । मुझे मालूम था कि यह तर्क लाया जाएगा कि यह बंगाल का गीत है, भारत का नहीं क्योंकि सप्तकोटि जनसंख्या तत्कालीन बंगाल की थी।

पर बंकिमचंद्र ने खुद स्पष्ट किया था कि माता बंगाल नहीं, भारत है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने १८८२ में आनन्दमठ का दूसरा संस्करण प्रकाशित करते समय प्रस्तावना में लिखा: “यह समस्त भारतवर्ष की माता के लिए लिखा गया है।” (स्रोत: आनन्दमठ, १८८२ संस्करण, पृष्ठ ४–५)

गीत में एक भी शब्द “बंगाल विशिष्ट नहीं है
पूरा गीत पढ़ लीजिए – “वन्दे मातरम्, सुजलां सुफलां, मलयजशीतलाम्, शस्यशामलाम्…” – कहीं बंगाल, गंगा, पद्मा, सुंदरवन, कुछ नहीं।

बंकिम ने “सप्तकोटि” काव्य अलंकार के लिए लिखा, जैसे वेदों में सहस्रशीर्ष लिखा जाता है, न कि सटीक गिनती के लिए)।

श्री अरविंद ने १९०७ में लिखा था:
“बंकिम ने बंगाल को भारत का प्रतीक बनाया है। जिस तरह गीता में कृष्ण अर्जुन के माध्यम से समस्त मानवता को उपदेश देते हैं, उसी तरह बंकिम ने बंगाल के माध्यम से समस्त भारत को जागृत किया।”
(बंदे मातरम् अखबार, ११ अप्रैल १९०७)

रवीन्द्रनाथ ने १९१७ में Nationalism पुस्तक में लिखा:
“बंकिम की माता बंगाल की नहीं, सम्पूर्ण भारत की माता है। वह हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक फैली हुई है।”

नेताजी ने १९४३ में सिंगापुर में आजाद हिंद सरकार बनाई और पूरे छह छंद वाले मूल वन्दे मातरम् को ही राष्ट्रगान घोषित किया। वहाँ बंगाली, तमिल, पंजाबी, मराठी, मलयाली सब सैनिक एक साथ पूरे गीत को गाते थे। क्या नेताजी बंगाल को छोड़कर पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में सिर्फ बंगाल का गीत गवाते?

कांग्रेस ने १८९६ से ही इसे राष्ट्रीय सलामी गीत माना
• १८९६ कलकत्ता अधिवेशन (रहीमतुल्ला सयानी की अध्यक्षता) – पहली बार वन्दे मातरम् गाया गया।
• १९०५ बनारस अधिवेशन – औपचारिक रूप से “राष्ट्रीय सलामी गीत” घोषित।
• १९०६ कलकत्ता अधिवेशन (दादाभाई नौरोजी) – हर सत्र की शुरुआत वन्दे मातरम् से।
• १९१५ बॉम्बे अधिवेशन – गांधीजी ने पहली बार सुना और तुरंत कहा: “यह गीत मेरी रगों में दौड़ गया।”

ब्रिटिश सरकार ने इसे “राष्ट्रीय खतरा” माना और प्रतिबंधित किया
• १९०८ में वन्दे मातरम् गाने-बजाने पर ६ महीने तक की जेल।
• १९३१ में गांधीजी गिरफ्तार हुए तो जेल में भी वन्दे मातरम् गाते रहे।
• १९४२ भारत छोड़ो आंदोलन में लाखों लोग गिरफ्तार हुए सिर्फ इसलिए कि वे वन्दे मातरम् बोल रहे थे। क्या ब्रिटिश सरकार बंगाल के किसी प्रादेशिक गीत से इतना डरती?

डॉ. राजेंद्र प्रसाद (सभापति) ने प्रस्ताव रखा:
“यह सभा निर्णय करती है कि भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ होगा तथा ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगान के समकक्ष सम्मान प्राप्त होगा। यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक रहा है और इसे समान दर्जा दिया जाता है।”
(संविधान सभा वाद-विवाद, खंड १२, पृष्ठ ९९३–९९४)
यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ। आज भी भारत सरकार के सभी आधिकारिक दस्तावेजों में लिखा रहता है।

पूरे भारत में इसकी स्वीकार्यता के प्रमाण हैं :
• तमिलनाडु में सुब्रह्मण्य भारती ने १९१० में तमिल अनुवाद किया और गाया।
• पंजाब में लाला लाजपत राय और भाई परमानंद ने पंजाबी में गवाया।
• महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक और विनायक दामोदर सावरकर ने मराठी में प्रचार किया।
• केरल में वक्खम अब्दुल खादर और केलप्पन ने मलयालम में गाया।
• उत्तर प्रदेश में पंडित मदन मोहन मालवीय और गोविंद वल्लभ पंत हर सभा में गवाते थे।
क्या ये सब नेता बंगाल का प्रादेशिक गीत गाकर अपना समय बर्बाद कर रहे थे?

(लेखक राज्य निर्वाचन आयुक्त, मध्यप्रदेश हैं)

Unprecedented enthusiasm in Delhi to participate in Pravasi Rajasthani Diwas

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Neeti Gopendra Bhatt

New Delhi: Unprecedented enthusiasm is being witnessed in Delhi to participate in the first Pravasi Rajasthani Sammelan being held on December 10th in Jaipur, the Pink City of Rajasthan.

A delegation from Delhi, led by Dr. Ramavtar Kila, CA, President of the Rajasthan Foundation, Delhi Chapter, will depart from Delhi on December 9th in three buses, with approximately 100 people traveling directly to Jaipur. This delegation, under the auspices of the Rajasthani Mitra Mandal and the Rajasthan Foundation Delhi Chapter, will depart from the Adhyatma Sadhna Kendra, Chhatarpur, en route to Kotputli for an overnight stay before departing in the morning to participate in the Rajasthan Pravasi Diwas at the Jaipur Exhibition and Convention Centre (JECC) complex in Sitapura.

Representatives from other Delhi-based organizations are leaving for Jaipur to participate in the Pravasi Diwas Rajasthani Conference. Approximately 300 people from Delhi will participate in the conference.

Dr. Ramavtar Kila praised Rajasthan Chief Minister Bhajan Lal Sharma’s initiative to organize the Rajasthan Pravasi Diwas in a grand manner and stated that the Chief Minister held an online meeting with the presidents of each chapter of the Rajasthan Foundation and appealed for their support to ensure the event was a success.

Kila expressed confidence that the first Pravasi Rajasthani Diwas, being organized on Chief Minister Sharma’s initiative, will be a phenomenal success.

योगी का भगवा और बुलडोजर : विपक्ष के झूठ का पोस्टमार्टम और 2027 के गठबंधन की अनिवार्यता

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लखनऊ : उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वही पुराना टेप-रिकॉर्ड फिर बजा दिया गया है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और उनके नए-पुराने सहयोगी एक ही सुर में चिल्ला रहे हैं :

“संन्यासी को सत्ता में नहीं आना चाहिए”, “भगवा राजनीतिक हथियार है”, “योगी अनपढ़ हैं, फर्जी डिग्री वाले हैं”, “कट्टर हिंदुत्ववादी हैं”।
ये चार लाइनें पिछले दस साल से एक ही रिकॉर्ड की तरह बज रही हैं। अब समय आ गया है कि इस रिकॉर्ड को तोड़ा जाए और सुई को सच्चाई के पॉइंट पर फिट कर दिया जाए।पहला झूठ : संन्यासी को सत्ता में आने का अधिकार नहींविपक्ष का सबसे पुराना और सबसे घटिया तर्क है कि संन्यासी ने गृहस्थ जीवन त्याग दिया है, इसलिए वह मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। यह तर्क इतना खोखला है कि हंसते-हंसते पेट दुख जाए।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में हर नागरिक को धर्म पालन करने, धार्मिक संस्थाएं बनाने और प्रचार करने का अधिकार है। संन्यास लेना भी एक धार्मिक अधिकार है। कहीं नहीं लिखा कि संन्यासी वोट नहीं लड़ सकता, मंत्री नहीं बन सकता या मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। अगर ऐसा होता तो 1952 में ही स्वामी करपात्री जी महाराज, स्वामी आत्मानंद, आचार्य जे. बी. कृपलानी जैसे दर्जनों संन्यासी-साधु संसद में नहीं पहुंचते।अब विपक्ष के अपने हीरो देखिए।

  • मौलाना अबुल कलाम आजाद : मौलाना की टोपी-दाढ़ी में आजादी की लड़ाई लड़ी, मंत्री बने। कोई नहीं बोला कि मौलाना ने दुनिया नहीं त्यागी, इसलिए सत्ता में नहीं आ सकते।
  • मौलाना तौकीर रजा : 2022 में सपा के मंच पर खड़े होकर वोट मांगते हैं। कोई नहीं बोला कि मौलाना को मसjid में रहना चाहिए।
  • इमाम-उल-हक बुधवार को जुमे की नमाज पढ़ाते हैं, शनिवार को सपा की रैली में भाषण देते हैं। तब सेक्युलरिज्म की सारी नदियां बहने लगती हैं।

बस योगी आदित्यनाथ भगवा पहनकर जनता की सेवा करें तो संविधान खतरे में पड़ जाता है?
यह दोहरा मापदंड नहीं, घोर पाखंड है। भगवा जब टोपी-दाढ़ी के सामने आता है तो विपक्ष की सेक्युलर आंखें अचानक धुंधली हो जाती हैं।दूसरा झूठ : भगवा राजनीतिक हथियार है, आध्यात्मिकता का प्रतीक नहींयह तर्क भी उतना ही हास्यास्पद है।
भगवा रंग हिंदू संन्यास परंपरा का प्रतीक है। आदि शंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद तक, स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर स्वामी रामदेव तक सबने भगवा धारण किया। क्या वे सब राजनीतिक हथियार बना रहे थे?योगी आदित्यनाथ ने 1993-94 में दीक्षा ली थी। उस समय वे न तो सांसद थे, न विधायक, न मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे थे। वे गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बने, यह धार्मिक परंपरा का हिस्सा था। 1998 में जब पहली बार लोकसभा लड़े तब भी भगवा नहीं उतारा। 2017 में मुख्यमंत्री बने तब भी नहीं उतारा। अगर भगवा राजनीतिक हथियार होता तो अखिलेश यादव 2013 में सैफई महोत्सव में भगवा शॉल ओढ़कर क्यों घूम रहे थे? राहुल गांधी जनेऊ दिखाकर क्यों वोट मांगते हैं? प्रियंका गांधी माथे पर बड़ी-बड़ी बिंदी लगाकर क्यों घूमती हैं? सच यह है कि भगवा जब हिंदू संन्यासी पहनता है तो कट्टरता हो जाता है, जब विपक्षी नेता चुनाव में ओढ़ लेते हैं तो सेक्युलर फैशन हो जाता है। यह दोहरा चरित्र ही विपक्ष की असली पहचान है।तीसरा झूठ : कम पढ़े-लिखे हैं, फर्जी डिग्री वाले हैंयह विपक्ष का सबसे प्रिय हथियार है। दस साल से एक ही रटंत : “योगी आधे-अधूरे पढ़े हैं।”सच्चाई :

  • योगी आदित्यनाथ ने 1970 के दशक में गढ़वाल विश्वविद्यालय (तब गढ़वाल यूनिवर्सिटी, अब हेमवती नंदन बहुगुणा) से बी.एस-सी. किया था।
  • 1998 से 2007 तक के चुनावी हलफनामों में बी.एस-सी. लिखा था।
  • बाद में उन्होंने स्वयं सुधार किया और नया हलफनामा दिया कि कोर्स पूरा नहीं कर पाए, इसलिए अंतिम योग्यता इंटरमीडिएट है।
  • आज तक कोई कोर्ट, कोई यूनिवर्सिटी, कोई जांच एजेंसी ने फर्जी डिग्री का आरोप सिद्ध नहीं किया। एक भी FIR नहीं।

अब विपक्ष के अपने स्टार देखिए :

  • राहुल गांधी : कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने 2005 और 2019 में साफ कहा कि उनके पास राहुल गांधी का M.Phil का कोई रिकॉर्ड नहीं। फिर भी “M.Phil” लिखते हैं।
  • अखिलेश यादव : सिडनी यूनिवर्सिटी ने साफ कहा कि उनके पास अखिलेश का कोई रिकॉर्ड नहीं। फिर भी “इंजीनियर” लिखते हैं।
  • तेजस्वी यादव : 9वीं फेल होने के बावजूद क्रिकेट अकादमी में BA का फर्जी सर्टिफिकेट लगाकर खेलते रहे।

इन सबके लिए विपक्ष की जुबान पर ताला लग जाता है। लेकिन योगी जी ने खुद सुधार कर लिया तो फर्जी डिग्री हो गई?
यह नहीं चलेगा।और अगर डिग्री ही सबकुछ है तो बिल गेट्स, मार्क जुकरबर्ग, मुकेश अंबानी, गौतम अडानी – सब अनपढ़ हैं क्या? फिर भी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां चला रहे हैं। योगी आदित्यनाथ 20 करोड़ की आबादी वाला प्रदेश 8 साल से बिना एक दंगे, बिना माफिया राज, बिना भ्रष्टाचार के चला रहे हैं। यह डिग्री से नहीं, दम-खम से हो रहा है।चौथा झूठ : कट्टर हिंदुत्ववादी हैं, इसलिए अयोग्य हैंयह सबसे बड़ी हास्यास्पद बात है।
जब मायावती ने 2007 में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ किया था तो वह सामाजिक इंजीनियरिंग था।
जब अखिलेश यादव ने 2022 में मुस्लिम-यादव फॉर्मूला चलाया तो वह सेक्युलरिज्म था।
जब राहुल गांधी मंदिर-मंदिर भागते हैं तो वह सॉफ्ट हिंदुत्व है।
लेकिन योगी जी राम मंदिर की बात करें तो कट्टरता हो जाती है?योगी सरकार ने :

  • 8 साल में एक भी दंगा नहीं होने दिया (अखिलेश राज में हर साल दर्जनों दंगे)
  • 65 हजार से ज्यादा एनकाउंटर किए, 200 से ज्यादा अपराधी मारे गए, हजारों जेल में
  • माफिया की 6000 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति जब्त की
  • 6 लाख से ज्यादा सरकारी नौकरियां बिना पर्ची-खर्ची के दीं
  • 2.5 करोड़ शौचालय बनवाए, 55 लाख गरीबों को घर दिए
  • 100 से ज्यादा नए मेडिकल कॉलेज खोले

यह सब कट्टरता से हुआ या कुशासन खत्म करने की इच्छाशक्ति से?2027 और गठबंधन की अनिवार्यताविपक्ष जानता है कि अकेले-अकेले लड़ने से उत्तर प्रदेश में उसका सूपड़ा साफ है। इसलिए 2024 लोकसभा की तरह फिर “इंडिया” नाम का नया गठबंधन बना रहे हैं। लेकिन जनता सब देख रही है।

  • एक तरफ वह नेता जो भगवा को गाली देता है, संन्यासी को कोसता है, हिंदू त्योहारों पर चुप रहता है।
  • दूसरी तरफ वह संन्यासी जो सुबह 5 बजे उठकर प्रदेश की 20 करोड़ जनता की चिंता करता है, बिना छुट्टी, बिना परिवार, बिना निजी जीवन के।

2027 में जनता फिर वही फैसला सुना देगी जो 2017, 2019, 2022 और 2024 में सुन चुकी है।
क्योंकि जनता जानती है – भगवा डराता नहीं, माफिया को डराता है।
संन्यासी सत्ता में नहीं आया तो अपराधी सत्ता में आ जाएंगे।
और डिग्री से प्रदेश नहीं चलता, इरादे से चलता है।योगी आदित्यनाथ 2027 में फिर मुख्यमंत्री बनेंगे।
और विपक्ष फिर वही पुराना रिकॉर्ड बजाता रहेगा – “अनपढ़… कट्टर… भगवा…”
लेकिन इस बार जनता की लाठी उस रिकॉर्ड को तोड़कर रख देगी।

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