नागरिक सुप्रीम कोर्ट के पैदल-अनुकूल शहरों के आह्वान पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं

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दुनिया भर में प्रसिद्ध आगरा शहर एक बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ा है – अगर स्थानीय प्रशासन निर्णायक रूप से कार्य करने का मन बना ले और नेता साथ दें। 14 मई को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद, जिसने अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत सुलभ, बाधा-मुक्त और दिव्यांग-अनुकूल फुटपाथों के अधिकार को एक संवैधानिक गारंटी के रूप में स्थापित किया है। अब स्थानीय नागरिक पैदल चलने वालों के लिए सार्वजनिक स्थानों को वापस लेने के लिए अधिकारियों पर दबाव बढ़ा रहे हैं।

एक ऐतिहासिक फैसले में, शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को फुटपाथों के प्रावधान और रखरखाव के लिए दो महीने के भीतर विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया। इस फैसले ने आगरा में नागरिक समूहों को सक्रिय कर दिया है, जहां शहरी नियोजन लंबे समय से मोटर चालित परिवहन के पक्ष में रहा है, अक्सर पैदल चलने वालों की सुरक्षा की कीमत पर।

सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर ने कहा, “आगरा की सड़कें पैदल चलने वालों के लिए मौत का जाल बन गई हैं।” “फुटपाथ या तो हैं ही नहीं या विक्रेताओं और अवैध पार्किंग से बुरी तरह अतिक्रमण कर लिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक वेक-अप कॉल है।”

पांच मिलियन से अधिक आबादी और दो मिलियन से अधिक पंजीकृत वाहनों के साथ, आगरा की सड़कें जबरदस्त दबाव में हैं। शहर में यमुना एक्सप्रेसवे और आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे के माध्यम से दैनिक यातायात का प्रवाह भी होता है, जिससे भीड़ और बढ़ जाती है। नेशनल चैंबर ऑफ इंडस्ट्रीज एंड कॉमर्स के पूर्व अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने कहा, “बुनियादी ढांचा अब और अधिक सहन नहीं कर सकता।” “हम सड़क नेटवर्क पर अभूतपूर्व दबाव का सामना कर रहे हैं, जिसमें लगातार ट्रैफिक जाम, सड़क पर होने वाले गुस्से की घटनाएं और बिगड़ता वायु प्रदूषण शामिल है।”
सार्वजनिक मांग का एक मुख्य केंद्र यमुना किनारा का खिंचाव है – ताजमहल से ऐतिहासिक वाटर वर्क्स तक – जिसे एक समर्पित पैदल यात्री गलियारे के रूप में प्रस्तावित किया गया है। फुटपाथ पहले से ही मौजूद है लेकिन खराब हालत में है और अतिक्रमणों से भरा पड़ा है। रिवर कनेक्ट कैंपेन के देवाशीष भट्टाचार्य ने कहा, “इस आकर्षक खिंचाव में ताजमहल, आगरा किला और राम बाग के दृश्यों के साथ एक विरासत सैरगाह बनने की क्षमता है। इसे सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक कार्रवाई की जरूरत है।”

विदेशी पर्यटक अक्सर शहर में पैदल चलने की कमी से हैरान होते हैं। जर्मनी की एक आगंतुक मार्टिना ने कहा, “आगरा की सुंदरता का आनंद लेना मुश्किल है जब आप ट्रैफिक, गड्ढों और आवारा कुत्तों से बच रहे होते हैं।” एक वैश्विक पर्यटन स्थल के रूप में शहर की प्रतिष्ठा तेजी से इसकी खराब पैदल यात्री बुनियादी ढांचे के साथ विरोधाभास में है।

संकट को आवारा जानवर, विशेष रूप से गायें, कुत्ते और बंदर बढ़ा रहे हैं, जो स्वतंत्र रूप से घूमते हैं, पैदल चलने वालों के लिए खतरा पैदा करते हैं और लगातार दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। बुजुर्ग नागरिक और बच्चे विशेष रूप से कमजोर हैं। कमला नगर की एक वरिष्ठ निवासी निर्मला ने बताया, “एक बंदर के मेरा शॉपिंग बैग छीनने के बाद मैंने शाम को घूमना बंद कर दिया।”

शहर की मेट्रो रेल प्रणाली का चल रहा निर्माण और दो प्रमुख सड़क ओवरब्रिज पर मरम्मत कार्य में देरी से समस्या और बढ़ गई है, जिससे व्यापक चक्कर और मुख्य धमनियों में रुकावट आ गई है। दैनिक आवागमन एक बुरा सपना बन गया है, खासकर NH-19 पर सिकंदरा बॉटलनेक के पास।

सोशल मीडिया नागरिक शिकायतों का युद्ध का मैदान बन गया है – जिसमें अवरुद्ध फुटपाथ और अपर्याप्त पार्किंग से लेकर दमघोंटू वायु प्रदूषण तक शामिल है। एक स्थानीय शिक्षक डॉ. अनुभव खंडेलवाल ने कहा, “आगरा में टाउन प्लानिंग बहुत लंबे समय से वाहन-केंद्रित रही है।” “हमें एक प्रतिमान बदलाव की जरूरत है जो पैदल चलने वालों और साइकिल चालकों को शहरी डिजाइन के केंद्र में रखे।”

सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने वालों के अधिकारों की उपेक्षा की भारी मानवीय लागत की ओर इशारा किया है: पिछले पांच वर्षों में पूरे भारत में 1.5 लाख से अधिक पैदल चलने वालों की मौतें। इसका निर्देश सिर्फ एक कानूनी दिशानिर्देश नहीं है – यह शहर नियोजकों के लिए एक नैतिक अनिवार्यता है।

अदालत की दो महीने की अनुपालन समय-सीमा को पूरा करने के लिए, आगरा में अधिकारियों – जिसमें आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए), आगरा नगर निगम और ताज ट्रपेज़ियम ज़ोन अथॉरिटी शामिल हैं – को अतिक्रमण हटाने, फुटपाथों की मरम्मत और चौड़ा करने, उचित साइनेज स्थापित करने और आवारा जानवरों की आवाजाही को रोकने के लिए प्रयासों का समन्वय करना होगा। नागरिक समूह प्रवर्तन सुनिश्चित करने के लिए एक समर्पित कार्यबल और समय-सीमा वाली कार्य योजना की मांग कर रहे हैं।

बायो डायवर्सिटी विशेषज्ञ डॉ मुकुल पांड्या सुझाव देते हैं कि हरे-भरे बफर, छायादार रास्ते और सुलभ रैंप को एकीकृत करने से न केवल अदालत के आदेशों को पूरा किया जा सकता है, बल्कि जीवन की गुणवत्ता और पर्यटन अपील में भी काफी सुधार हो सकता है। एक खूबसूरत होम स्टे फैसिलिटी चलाने वाले बर्ड वाचर गोपाल सिंह ने कहा, “आगरा को पैदल चलने योग्य बनाना सिर्फ सुरक्षा के बारे में नहीं है – यह स्थिरता, सौंदर्यशास्त्र और रहने योग्यता के बारे में है।”

आगामी पर्यटन सीजन से पहले आगरा बढ़ते वैश्विक ध्यान के लिए तैयार हो जाना चाहिए । सुप्रीम कोर्ट का फैसला शहर के भविष्य की फिर से कल्पना करने का एक मौका दे रहा है – न केवल एक विरासत स्थल के रूप में, बल्कि एक मानवीय, समावेशी और पैदल यात्री-पहले शहरी स्थान के रूप में।

शशि थरूर को भेजना: एक पत्थर से कई निशाने?

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मोदी सरकार ने हाल ही में हुए तीन दिनों के भारत-पाक संघर्ष और पहलगाम नरसंहार का बदला लेने के बाद एक अभूतपूर्व राजनयिक पहल शुरू की है, जो भारत के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित होती दिख रही है।

जानकारों को लग रहा है कि मुख्य विपक्षी दल राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी की दुविधा, खासतौर पर शशि थरूर का बढ़ता कद, दिक्कतों का पिटारा खोलेगी।

22 अप्रैल, 2025 को जम्मू-कश्मीर में 26 निर्दोष पर्यटकों की हत्या केवल आम नागरिकों पर हमला नहीं था, बल्कि भारत की संप्रभुता और दृढ़ता को चुनौती थी।

ऑपरेशन सिंदूर के तहत, भारत ने पाकिस्तान और पाक-अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर सटीक सैन्य कार्रवाई करके साफ संदेश दिया: अब भारत सीमा पार से आतंकवाद बर्दाश्त नहीं करेगा।

लेकिन असली मास्टर स्ट्रोक, भाजपा सरकार ने सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ एक जोरदार राजनयिक अभियान चलाकर खेला।

सात अखिल दल प्रतिनिधिमंडलों को 33 देशों में भेजकर, भारत के खिलाफ झूठे प्रचार का जवाब दिया गया और भारत का पक्ष एकजुट होकर रखा गया।

इस पहल में विपक्ष के बड़े नेताओं—जैसे शशि थरूर, असदुद्दीन ओवैसी, कनिमोझी करुणानिधि और सलमान खुर्शीद—को बीजेपी प्रतिनिधियों के साथ शामिल करना, भारत की एकजुटता का प्रमाण है।

इतने बड़े पैमाने पर कभी भी ऐसा समन्वित प्रयास नहीं हुआ, जिसमें इंदिरा गांधी द्वारा बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के समय जयप्रकाश नारायण को समर्थन जुटाने भेजना या अटल बिहारी वाजपेयी को यूएन में भारत का पक्ष रखने भेजना भी शामिल हो।

विभिन्न राजनीतिक आवाज़ों को शामिल करने से पाकिस्तान के आतंकवाद को बढ़ावा देने और परमाणु ब्लैकमेल के जरिए जिम्मेदारी से बचने की कोशिशों के खिलाफ राष्ट्रीय सहमति दिखाई दी है।

इस अभियान की सफलता पहले ही दिखने लगी है। कोलंबिया ने शशि थरूर की टीम से बातचीत के बाद अपना पाकिस्तान-समर्थक बयान वापस ले लिया, जिससे भारत की आतंकवाद के प्रति जीरो टॉलरेंस नीति स्पष्ट हुई।

ये प्रतिनिधिमंडल विदेशी सरकारों, मीडिया और प्रवासी भारतीयों से मिलकर पाकिस्तान के झूठे प्रचार का मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं।

यह सिर्फ कहानी बदलने की कोशिश नहीं, बल्कि पाकिस्तान को आतंकवाद की फैक्ट्री के रूप में बेनकाब करने का अभियान है—एक ऐसा देश जो पाप और नफरत से पैदा हुआ और अब आर्थिक तबाही और वैश्विक दबाव में घिरा है।

भारत की दृढ़ता सिर्फ राजनयिक स्तर तक सीमित नहीं है। ऑपरेशन सिंदूर जारी है, और सीमावर्ती राज्यों में मॉक ड्रिल से सैन्य तैयारियों का संकेत मिलता है। सिंधु जल समझौते का लाभ उठाकर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया जा रहा है, जो पहले से ही आर्थिक संकटों के दल दल में फंसा हुआ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कहा है—आतंकियों को उनके ठिकानों में खत्म किया जाएगा। यह रुख सभी दलों के नेताओं ने अपनाया है। इस एकजुटता से साफ है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपनी ताकत दिखाने को तैयार है।

बीजेपी के संगठनात्मक बल ने देशभर में तिरंगा यात्राओं के जरिए जबरदस्त देशभक्ति की लहर पैदा की है, जिसमें हिचकिचाते समूह भी शामिल हो रहे हैं। राष्ट्रीय जोश ने संदेह करने वालों और विपक्षी नेताओं को चुप करा दिया है, जो हमेशा सबूत मांगते रहते थे।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के मुताबिक “जहां पश्चिमी देश अक्सर पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने में ढील देते रहे हैं, वहीं नई दिल्ली का संदेश साफ है—भारत अब बिना किसी डर के जवाबी कार्रवाई करेगा। अमेरिका, खाड़ी देशों और अन्य राष्ट्रों के नेताओं से मुलाकातों में भारत से भेजी गईं डेलिगेशंस यह संदेश साफ तौर पर दे रहीं हैं कि आतंकवाद के खिलाफ यह सिर्फ भारत की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की लड़ाई है।”

जाहिर है, भाजपा सरकार की रणनीति—सैन्य शक्ति, आक्रामक राजनय और राष्ट्रीय एकजुटता का मिश्रण—एक नए युग, और एक अभिनव मॉडल पेश करती है। भारत अब पीड़ित बनकर नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान को सबक सिखाने और अपने लोगों को आतंक से बचाने के लिए पूरी तरह तैयार है। साथ ही भारत को आत्म बल, स्वाबलंबन पर भरोसा करना होगा। समय पर कोई देश किसी के साथ खड़ा हुआ नहीं दिखेगा।

भारत के भीतर पाकिस्तान समर्थन की इस अंतर्धारा का स्त्रोत क्या हैं ?

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पहलगांव में आतंकी हमले के बाद पूरे भारत में पाकिस्तान को सबक सिखाने की आवाज उठ रही है। विपक्षी नेताओं के साथ मुस्लिम धर्मगुरु भी आगे आये हैं। कहीं कहीं तो आतंकवाद के विरुद्ध काली पट्टी बाँधकर नमाज अदा की गई। लेकिन विरोध के इन स्वरों के बीच आतंकवादियों और पाकिस्तान समर्थन के स्पष्ट दृश्य भी देखे गये। कहीं कोई पाकिस्तान के झंडे सहेजता दिखाई दिया तो कहीं पाकिस्तान जिन्दाबाद की ध्वनि भी सुनाई दी गई।

पहलगांव में यह आतंकी हमला साधारण नहीं था। यह पिछले लगभग सभी आतंकी हमलों से बहुत अलग था। अब तक हुये हमलों में आतंकवादी या तो घात लगाकर हमला करते थे अथवा ब्लास्ट करके लौट जाते थे। लेकिन इस हमले में ऐसा नहीं हुआ। आतंकवादी सीना तानकर पहलगांव के बैसरन मैदान में आये। उन्होंने पहले हिन्दुओं को कतारबद्ध खड़ा किया। फिर पहचान पूछकर गोली मारी। आतंकवादियों ने हिन्दुओं पहचान सामान्य रूप से नहीं पूछी। पहचान पूछने का यह तरीका क्रूर और निम्नतम था। पहले कलमा पढ़वाया फिर पेन्ट की जिप खुलवाकर पहचान सुनिश्चित करने की नौटंकी की गई। अब तक जो विवरण सामने आये हैं उनके अनुसार अप्रैल के प्रथम सप्ताह से आतंकवादी इस क्षेत्र में सक्रिय थे। कुछ खच्चरवालों से भी उनका संपर्क था। दो लोग तो खुलकर उनके साथ थे। उनके पास एक एक पर्यटक का विवरण था। फिर भी पहचान देखने केलिये पेन्ट की जिप खुलवाई गई। पेन्ट की जिप खुलवाना और कलमा पढ़वाना उनकी सुनियोजित कार्रवाई थी। इसके द्वारा वे भारत के कट्टरपंथी मुसलमानों का मानसिक समर्थन प्राप्त करना चाहते थे। इसमें वे बड़ी सीमा तक सफल भी रहे। इसकी झलक पूरे देश में देखी भी गई। एक ओर आतंकवादियों और पाकिस्तान पर निर्णयात्मक कार्रवाई की आवाज उठी तो वहीं वहीं कुछ लोग भी सामने आये जिनकी गतिविधि पाकिस्तान और आतंकवाद का समर्थन में मानी गई। आतंकवाद और पाकिस्तान के समर्थन में ये स्वर किसी एक प्रदेश या किसी एक क्षेत्र में नहीं, पूरे भारत में सुने गये। सुदूर असम में भी और मध्यप्रदेश में भी। कर्नाटक में भी और उत्तर प्रदेश में भी। दिल्ली में भी और केरल में भी। इस श्रंखला में विधायक, पार्षद, पत्रकार, विद्यार्थी, वकील और सेवानिवृत्त शिक्षक जैसे सभी स्तर के लोग देखे हैं। एक आश्चर्यजनक बात यह भी देखी गई महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तरप्रदेश में पाकिस्तान का झंडा सहेजते हुये महिलाएँ देखीं गईं।

सामान्यतः उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के समाज जीवन में बहुत भिन्नता है। भाषा और भूषा ही नहीं भोजन में भी अंतर है फिर भी इन तीनों प्रदेशों में पाकिस्तान का झंडा सहेजते हुये महिलाएँ देखी गई। वस्तुतः पहलगांव में हुये आतंकी हमले के विरुद्ध देशभर में प्रदर्शन हुये और पाकिस्तान का झंडा फाड़कर फेका गया। कहीं कहीं बीच सड़क पर चिपकाया भी गया ताकि लोग उसके ऊपर से निकले। ऐसा करके प्रदर्शनकारी पाकिस्तान को अपना कड़ा विरोध संदेश देना चाहते थे। ऐसा उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में भी हुआ। बजरंग दल ने प्रदर्शन करके पाकिस्तान का झंडा जलाया था। प्रदर्शनकारी तो चले गये लेकिन पाकिस्तानी झंडे के टुकड़े सड़क पर बिखरे रहे। लोग उनके ऊपर गाड़ियों से अथवा पैर रखकर निकल रहे थे। उस सड़क से एक मुस्लिम छात्रा स्कूटी से निकल रही थी। उसने अपनी स्कूटी रोकी और पाकिस्तानी झंडे को सड़क से हटाने लगी । लोगों ने रोका तो उसने छुपाया भी नहीं और झंडे के टुकड़े उठाने केलिये रुकना स्वीकार किया।

दूसरी घटना मुम्बई के विले पारले स्टेशन की है। महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई में भी अनेक स्थानों पर पाकिस्तान के विरुद्ध प्रदर्शन हुये। पाकिस्तान के झंडे जलाये गये अथवा कागज के झंडों को फाड़कर फेका गया। ऐसा ही प्रदर्शन विले पारले स्टेशन क्षेत्र में हुआ। वहाँ स्टेशन के बाहर सीढ़ियों पर पाकिस्तानी झंडा लगा दिया गया। लोग उसपर पैर रखकर निकल रहे थे। तभी एक मुस्लिम महिला वहाँ पहुंची उसने झंडे पर इस प्रकार पैर रखकर निकलने का कड़ा विरोध जताया और उन टुकड़ों को वहाँ से हटाया भी। यही दृश्य कर्नाटक में भी देखा गया। वहाँ भी सड़क पर विखरे पाकिस्तानी झंडे के टुकड़ों को दो महिलाएँ सहेजते देखी गई। यदि किसी ने टोका तो दोनों महिलाओं ने कड़क कर उत्तर भी दिया। ये तीन घटनाएँ वे हैं जिनके वीडियो और बातचीत मीडिया और सोशल मीडिया पर वायरल हुई। ऐसी और कितने स्थान होंगे जहाँ लोग खुलकर पाकिस्तानी झंडे को अपमान से बचाने केलिये सामने आये होंगे। इन तीनों घटनाओं में महिलाओं का होना इस संदेह को भी जन्म देता है कि पाकिस्तानी झंडे के टुकड़े सहेजने की कोई अंतर्धारा देशभर में समान रूप से बह रही है। जिसने महिलाओं को आगे किया। चूँकि भारतीय जन मानस महिलाओं का सम्मान करता है। यह रणनीति वर्ष 2019 में दिल्ली के शाहीनबाग के प्रदर्शन में भी देखी गई थी जिसमें महिलाओं को आगे करके प्रदर्शन को आक्रामक बनाया गया था। अब पुनः भारत के विभिन्न स्थानों में पाकिस्तानी झंडे के टुकड़े सहेजने के लिये महिलाएँ ही सामने आईं। जिन तीन स्थानों के वीडियो वायरल हुये इन तीनों स्थानों पर झंडे के टुकड़े सहेजने वाली महिलाओं के तेवर भी समान रूप से तीखे थे। हो सकता है वीडियो वाली तीनों घटनाओं में कोई योजना न हो। यदि योजना नहीं है और केवल संयोग है तो बहुत आश्चर्यजनक संयोग। सड़क पर पाकिस्तानी झंडा सहेजने की ऐसी घटनाओं के समाचार दिल्ली, बंगाल और मध्यप्रदेश से भी आये। लेकिन प्राँतों में सड़क पर झंडे के टुकड़े उठाने केलिये किशोर वय के विद्यार्थी सामने आये।

सड़क पर पड़े पाकिस्तानी झंडा सहेजने की इन घटनाओं के अतिरिक्त सोशल मीडिया पर पाकिस्तान और आतंकवादियों के समर्थन में पोस्ट डालने की सौ से अधिक घटनाएँ सामने आईं। इनमें सबसे अधिक असम प्राँत से आईं। असम में अबतक 42 एफआईआर दर्ज हो चुकीं हैं। इनमें ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के विधायक अमीनुल इस्लाम भी हैं। विधायक अमीनुल इस्लाम ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में पहलगांव हमले को भी पुलवामा हमले की भाँति “सरकार की साजिश” बताया था। इसके अतिरिक्त कश्मीर से लेकर केरल तक कुछ स्वर ऐसे भी सुनाई दिये जिनमें भारत सरकार से पहलगांव आतंकी हमले का बदला लेने केलिये पाकिस्तान पर आक्रमण न करने की अपील की गई। इसे मानवीयता से जोड़कर कहा गया कि इससे सामान्य नागरिकों को कष्ट होगा। ऐसी अपील करने वाले अधिकांश राजनेता और कथित सामाजिक कार्यकर्ता रहे।

पहलगांव में हुये आतंकी हमले के बाद के इन तीन सप्ताहों में सामने आई ये घटनाएँ तीन प्रकार की हैं लेकिन तीनों का स्वर पाकिस्तान का बचाव ही है। पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकवादियों द्वारा हिन्दुओं पर यह हमला पहला नहीं है। जो पाकिस्तान बनने के बाद आरंभ नहीं हुये अपितु पाकिस्तान बनने की प्रक्रिया से ही शुरु हो गये थे। इसे 1921 की मालाबार में हुई हिन्दुओं के सामूहिक नरसंहार से लेकर लगातार हुये दंगों, मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन और कश्मीर में कबाइलियों के नाम पर कई गई हिंसा कश्मीरी पंडितों की हत्याओं, कश्मीर में श्रमिकों की हत्या से लेकर देशभर हो रहे आतंकी हमलों से समझा जा सकता है। फिर भी पाकिस्तानी झंडे को अपमान से बचाना, सोशल मीडिया पर निसंकोच आतंकवादियों तथा लश्कर को बधाई लिखना और लोगों का ध्यान पाकिस्तान से हटाने केलिये भारत सरकार की साजिश लिखने का आशय क्या है और लगातार भारत विरोधी गतिविधियों के बाद भी पाकिस्तान के समर्थन अथवा सद्भाव की मानसिकता का कारण क्या है ?

इसके दो कारण हैं। एक तो पहलगांव में आतंकवादियों द्वारा अपनाई गई हिंसा की शैली में स्पष्ट दीख रहा है। और दूसरा पाकिस्तान निर्माण की मानसिकता में है। पहलगांव में आतंकवादियों ने पर्यटकों को सीधे गोली नहीं मारी। पहले पेन्ट की जिप खुलवाई, कलमा बुलवाया फिर गोली मारी। पहचान पूछने और कलमा पढ़वाने की यह नौटंकी आतंकी हिंसा को धर्म की चादर से ढँकने का षड्यंत्र है। ताकि धर्मभीरू मुसलमानों का समर्थन मिल सके अथवा उन्हें तटस्थ किया जा सके। यह वही शैली है जो सैकड़ों सालों से मध्य ऐशिया के लुटेरे अपना रहे हैं। भारत पर पहले हमले सत्ता के लिये नहीं बल्कि लूट केलिये ही हुये थे। सामूहिक नरसंहार, लूट और निर्दोष स्त्री बच्चों पर अत्याचार करने की अनुमति कोई धर्म नहीं देता। लेकिन सैकड़ों सालों से ऐसे अमानवीय कृत्यों को ढँकने केलिये धार्मिक नारा लगाने का खेल सैकड़ों सालों से चल रहा है। वही पहलगांव में खेला गया।

दूसरा पाकिस्तान की मानसिकता को सजीव रखना है। पाकिस्तान आज भले एक देश के रूप में स्थित है। लेकिन वह एक मानसिकता है। जिसका प्रकटीकरण अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के जनक सर सैय्यद अहमद ने अपने लेखन और व्याख्यानों में तब किया था जब न तो मुस्लिम लीग अस्तित्व में आई थी और न पाकिस्तान का स्वरूप स्पष्ट हुआ था। फिर भारत के मुसलमानों को भावनात्मक रूप से पाकिस्तान से जोड़ने का अभियान चला। जो अक्सर पर सड़कों पर दिखाई देता है। कभी क्रिकेट में पाकिस्तान की जीत पर मिठाई बँटते हुये कभी पाकिस्तानी झंडा फहराने के रूप में दिखाई देता है। इन्हें पाकिस्तान से जोड़ने केलिये धार्मिक आवरण ही दिया जाता है। जिस प्रकार युवाओं का ब्रेनवाॅश करके आतंकवादी बनाने का खेल चल रहा है ठीक उसी प्रकार समाज को किसी धार्मिक नारे से जोड़कर भारत के भीतर पाकिस्तान से भावनात्मक जुड़े रहने का अभियान चल रहा है। जो पहलगांव हमले के बाद देशभर में हुये विरोध प्रदर्शन के बीच पाकिस्तानी झंडे के टुकड़े सहेजने में, मानवता केलिये पाकिस्तान पर हमला न करने की सलाह अथवा कलमा पढ़वाने का समाचार सुनकर लश्कर को वधाई संदेश भेजने में झलक रहा है।

सोशल मीडिया का धर्मयुद्ध: एलन मस्क के विरुद्ध महामंच

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अनुराग पुनेठा

जब भी इतिहास नई करवट लेता है, वह अक्सर शोर से नहीं, एक असहज ख़ामोशी से शुरू होता है। ठीक वैसे ही जैसे आज की दुनिया में सबसे बड़ा युद्ध—न हथियारों से, न सरहदों पर—बल्कि विचारों और विज्ञापन बजटों के ज़रिए लड़ा जा रहा है। यह वो युद्ध है जहाँ नायक और खलनायक की पहचान करना उतना आसान नहीं जितना पहले कभी था। इस युद्ध के केंद्र में है एलन मस्क—टेस्ला, स्पेसएक्स और अब X के मालिक—और उसके सामने खड़ी हैं 18 वैश्विक कंपनियाँ, जिनके पास लगभग 900 अरब डॉलर का संयुक्त वार्षिक विज्ञापन बजट है। Nestlé, Lego, Shell, Unilever, Pepsi, Colgate, Procter & Gamble—यह कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि वो ताकतें हैं जो तय करती हैं कि एक आम इंसान इंटरनेट पर क्या देखेगा और क्या नहीं।

2022 में इन कंपनियों ने GARM नामक संगठन के ज़रिए X से सामूहिक रूप से विज्ञापन हटा लिए। कारण बताया गया: “ब्रांड सेफ्टी।” लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह सचमुच सिर्फ सुरक्षा का मामला था, या एक सोची-समझी रणनीति जिससे एक मंच को अपने हिसाब से मोड़ा जाए? उन्होंने X से कहा—कुछ शब्द हटाओ, कुछ विचारों को सीमित करो, कुछ चेहरों को मंच से बाहर करो। जब मस्क ने मंच को स्वतंत्र रखने की ज़िद की, तो पैसे का बहिष्कार शुरू हो गया। यह आज के दौर की ‘अभिव्यक्ति की कीमत’ है—और चुप्पी का मूल्य उससे भी ज़्यादा।

एलन मस्क ने चुप नहीं बैठने का फैसला किया। उसने मुकदमा ठोका—सिर्फ बदले की भावना से नहीं, बल्कि एक वैचारिक सवाल के साथ: क्या कॉरपोरेट जगत को यह अधिकार है कि वह इंटरनेट पर विचारों की सीमा तय करे? क्या एक समूह, अपने धनबल के ज़रिए, तय कर सकता है कि किसकी बात सुनी जाएगी और किसे खामोश किया जाएगा? और जब अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में यह सामने आया कि ये कंपनियाँ एकजुट होकर X की नीतियों को प्रभावित कर रही थीं, तो यह मुकदमा सिर्फ एक कानूनी मामला नहीं रह गया, यह बन गया स्वतंत्रता बनाम नियंत्रण की लड़ाई।

इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहाँ कोई नायक पूरी तरह से मासूम नहीं है, और कोई खलनायक पूरी तरह से दानवी नहीं। मस्क की अराजकता, उसका अहंकार, कभी-कभी सीमाओं से खेलने की उसकी आदत, उसे संदेह के घेरे में लाती है। लेकिन फिर भी, क्या कोई दूसरा इतना बड़ा जोखिम उठाने को तैयार होता? यह लड़ाई उसके लिए सिर्फ पैसे की नहीं, मंच की आत्मा की है। वह पूछ रहा है: क्या किसी विचार को उसकी असहजता के कारण दबा देना सही है? क्या अभिव्यक्ति का मंच एक कॉरपोरेट हैंडबुक से चलना चाहिए?

इस पूरे संघर्ष को कोई एक नाम देना मुश्किल है। कुछ इसे कॉरपोरेट सेंसरशिप कहेंगे, कुछ इसे डिजिटल युग की नई युद्ध नीति। लेकिन इसकी गूंज बहुत दूर तक जाएगी—यह मामला अदालत में भले ही कुछ हफ़्तों या महीनों में सुलझ जाए, पर इसका असर आने वाले दशकों तक महसूस किया जाएगा। क्योंकि यह सिर्फ एक मुकदमा नहीं, बल्कि वह सवाल है जो हर व्यक्ति को छूता है जो इंटरनेट पर बोलता, सोचता और जीता है।

क्या हम एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ विज्ञापनदाता तय करें कि कौन बोले? क्या हम उस लोकतंत्र में यक़ीन रखते हैं जहाँ विचार स्वतंत्र हों, लेकिन अगर वो विचार किसी ब्रांड की “छवि” के खिलाफ हों, तो उन्हें दबा दिया जाए? या फिर हम एक ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ असहमति, असुविधा और ईमानदारी—सभी को मंच मिले?

शायद इस लड़ाई का नतीजा ये बताएगा कि डिजिटल युग में लोकतंत्र का मूल्य क्या है। क्योंकि यहाँ बात केवल एलन मस्क या 18 कंपनियों की नहीं है—यह हमारी उस मौलिक स्वतंत्रता की है जिसे हम अक्सर अपनी स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए हल्के में ले लेते हैं। यह वही क्षण है जहाँ ‘कैंसल कल्चर’ और ‘कॉरपोरेट सेंसरशिप’ का अंतर धुंधला हो जाता है। और यही वह धुंध है जिससे आगे की दिशा तय होगी।

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