नेता गायब, भक्तों ने संभाली यमुना तलहटी की सफाई का काम

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आगरा: जो विश्व प्रसिद्ध ताजमहल के लिए जाना जाता है, केवल इस स्मारक तक सीमित नहीं है। यहाँ बहने वाली यमुना नदी शहर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह नदी न केवल आगरा के जीवन का आधार रही है, बल्कि इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को भी समृद्ध करती है।

लेकिन आज, प्रदूषण और उपेक्षा के कारण यमुना अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। नदी का जल विषाक्त हो चुका है, और इसके किनारे कचरे के ढेर में तब्दील हो गए हैं।

इसी चिंता को देखते हुए, रविवार सुबह एत्माद्दौला व्यू प्वाइंट पर यमुना आरती स्थल के पास यमुना सफाई महोत्सव का आयोजन किया गया। इस अभियान में शहरवासियों, पर्यावरणविदों, और नगर निगम के कर्मचारियों ने एकजुट होकर नदी की तलहटी को स्वच्छ करने का बीड़ा उठाया। इस दौरान कई ट्रैक्टरों में भरकर कचरा निकाला गया, जिसमें पॉलीथिन, प्लास्टिक कचरा, खंडित मूर्तियाँ, और घरेलू सामान के अवशेष शामिल थे। लगभग डेढ़ एकड़ क्षेत्र को कचरे से मुक्त किया गया, जो यमुना की सफाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यमुना का ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्वभारतीय संस्कृति में यमुना नदी का विशेष स्थान है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमुना भगवान श्रीकृष्ण की सखी और सूर्यदेव की पुत्री हैं। मथुरा और वृंदावन के बाद आगरा में यमुना का तट भी कृष्ण भक्ति का केंद्र रहा है। मुगलकाल में यह नदी शाही नौकायन और जल आपूर्ति का प्रमुख स्रोत थी। ताजमहल की सुंदरता को यमुना का स्वच्छ जल और भी निखारता था।
सोशल एक्टिविस्ट पद्मिनी अय्यर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “आज, औद्योगिक कचरे, सीवेज, और प्लास्टिक प्रदूषण ने इस पवित्र नदी को संकट में डाल दिया है।राष्ट्रीय पर्यावरण अनुसंधान संस्थान (NEERI) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, यमुना का जल आगरा में इतना प्रदूषित हो चुका है कि इसका ऑक्सीजन स्तर शून्य के करीब है, जिससे जलीय जीवन लगभग नष्ट हो चुका है। नदी में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) स्तर 30 मिलीग्राम/लीटर से अधिक है, जो स्वच्छ जल के लिए निर्धारित 3 मिलीग्राम/लीटर की सीमा से कहीं अधिक है।”

यमुना सफाई महोत्सव:

जनता की पहल
यमुना सफाई महोत्सव में स्थानीय नागरिकों, छात्रों, और पर्यावरण संगठनों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। रिवर कनेक्ट कैंपेन के बृज खंडेलवाल ने कहा, “यमुना केवल एक नदी नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की धमनी है। इसकी सफाई केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। इस अभियान में युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कई घंटों तक कचरा हटाने में श्रमदान किया।”

हालांकि, इस आयोजन में स्थानीय नेताओं और जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति ने कई सवाल खड़े किए। आगरा के मेयर, विधायक, और सांसद इस अभियान में शामिल नहीं हुए, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या यमुना की सफाई केवल जन आंदोलन तक सीमित रहेगी? रिवर कनेक्ट कैंपेन के जगन प्रसाद तेहरिया ने उम्मीद जताई कि आगामी गंगा दशहरा (5 जून 2025) के लिए होने वाले सफाई अभियान में नेता और उनके समर्थक सक्रिय रूप से भाग लेंगे।

प्रदूषण का संकट और चुनौतियाँ

पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने चेतावनी दी, “यमुना आज जीवनदायिनी नहीं, बल्कि विषैला जलाशय बन चुकी है। इसका पानी इतना दूषित है कि इससे त्वचा रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं। अगर तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो यमुना केवल इतिहास की किताबों में रह जाएगी।”

आंकड़ों के अनुसार, आगरा में यमुना में प्रतिदिन 150 मिलियन लीटर से अधिक अनुपचारित सीवेज डाला जा रहा है। इसके अलावा, स्थानीय उद्योगों से निकलने वाला रासायनिक कचरा और धार्मिक गतिविधियों में प्रयुक्त सामग्री नदी को और प्रदूषित कर रही है।

आगे की राह और गंगा दशहरा की तैयारी

आगरा नगर निगम के अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि वे यमुना की सफाई के प्रति जागरूक रहें और गंगा दशहरा के अवसर पर 5 जून को होने वाले बड़े सफाई अभियान में हिस्सा लें।

यमुना आरती महंत पंडित जुगल किशोर ने कहा, “यमुना की पवित्रता को बचाना हमारा धार्मिक कर्तव्य है। यह अभियान केवल सफाई तक सीमित नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति को जीवित रखने का संकल्प है।”

डॉ. हरेंद्र गुप्ता ने जोर देकर कहा, “यमुना के बिना आगरा और समूचा ब्रज मंडल अधूरा है। अगर हम अब भी नहीं जागे, तो यह नदी पूरी तरह लुप्त हो सकती है।”

रिवर कनेक्ट कैंपेन के चतुर्भुज तिवारी, राहुल, और दीपक ने भी सभी आगरावासियों से यमुना को पुनर्जनन देने में योगदान देने की अपील की।

नागरिकों की जिम्मेदारी

यमुना की सफाई केवल सरकारी योजनाओं या अभियानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक नागरिक को यह सुनिश्चित करना होगा कि नदी में कचरा न डाला जाए। स्थानीय प्रशासन को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स को और प्रभावी करना होगा, और औद्योगिक कचरे पर सख्त नियंत्रण लागू करना होगा।
आइए, हम सब मिलकर यमुना को फिर से स्वच्छ, जीवंत, और पवित्र बनाएँ, ताकि यह नदी न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर बनी रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जीवन का आधार बने।

अमेरिका से संबंध: सावधानी और आत्मनिर्भरता की जरूरत

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दिल्ली । हाल ही में सरकारी विद्वानों, नेताओं और एक्सपर्ट्स ने बेबाकी से पश्चिमी दुनिया की सोच का खुलासा किया है, उनका कहना है कि ‘गोरे लोगों का दिल’ आज भी पाकिस्तान के लिए धड़कता है. यह सिर्फ एक राजनयिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है.

आज की वैश्विक व्यवस्था में, जहाँ हर देश अपने हितों को सर्वोपरि रखता है, भारत को अमेरिका के साथ अपने संबंधों को लेकर अत्यधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है.

बदलते वैश्विक समीकरण और ‘ट्रंप युग’ का यथार्थ
आज का सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध ‘वन-टू-वन’ (one-to-one) रिश्तों पर आधारित हैं. ‘ट्रंप युग’ ने इस बात को और स्पष्ट कर दिया है कि भू-राजनीति में साझा मूल्यों – चाहे वह जम्हूरियत हो या मानवाधिकार – की जगह परस्पर आर्थिक लेन-देन ने ले ली है. समाजवाद का सूर्य सोवियत संघ के विघटन के साथ ही अस्त हो गया था, और अब हम एक खूंखार पूंजीवाद के दौर में जी रहे हैं.
ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने की संभावनाओं के बीच यह उम्मीद की जा रही थी कि भारत-अमेरिकी संबंध और प्रगाढ़ होंगे, जिससे भारत को अनेकों लाभ मिलेंगे. सतही तौर पर कुछ नज़दीकियां दिखीं भी, जिन्होंने एक मजबूत साझेदारी का भ्रम पैदा किया, लेकिन जल्द ही यह खोखला ढकोसला साबित हुआ. जब हम ऐतिहासिक संदर्भों, भू-राजनीतिक हितों, और बार-बार सामने आए दोहरे मापदंडों को देखते हैं, तो यह साफ हो जाता है कि अमेरिका पर आँख मूँदकर भरोसा करना भारत के लिए खतरनाक हो सकता है.

ऐतिहासिक विश्वासघात: पाकिस्तान को अमेरिकी समर्थन

सबसे पहले, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका और ब्रिटेन ने दशकों तक पाकिस्तान में आतंकवाद को खुला समर्थन दिया है. पाकिस्तानी हुक्मरान खुद स्वीकार कर चुके हैं कि उनकी सरकारें कई दशकों से डर्टी वर्क करती रही हैं. यह कोई गुप्त बात नहीं है कि अफ़गान युद्ध के दौरान अमेरिका ने पाकिस्तान को एक रणनीतिक मोहरे की तरह इस्तेमाल किया, जिससे भारत को अपार नुकसान उठाना पड़ा. पाकिस्तानी रक्षा मंत्री की हालिया स्वीकारोक्ति कि अमेरिका और ब्रिटेन ने 30 वर्षों तक पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा दिया, भारत के खिलाफ एक छिपे युद्ध के समर्थन जैसा है.

इतिहास इस बात का भी गवाह है कि अमेरिका ने भारत के खिलाफ कई बार दुर्भावना दिखाई है. 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय, जब भारत मानवता के पक्ष में खड़ा था, तब अमेरिका ने अपना सातवां नौसेना बेड़ा (Seventh Fleet) भारत के विरुद्ध भेजा. क्या यह किसी मित्र देश का संकेत था? क्या यह भारत की संप्रभुता का सम्मान था? और आज भी, जब पाकिस्तान भारत के खिलाफ एफ-16 विमानों का उपयोग करता है, जो अमेरिका ने उसे यह वादा कर के दिए थे कि वे भारत के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होंगे, तो अमेरिका की नीयत एक बार फिर संदिग्ध साबित होती है.

‘अमेरिका फर्स्ट’ की नस्लवादी सोच और आर्थिक दबाव

डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता की राजनीति का आधार ही नस्लवाद (racism) और ‘अमेरिका फर्स्ट’ की संकीर्ण सोच है. उनकी प्रवासी नीति, मुस्लिम देशों के नागरिकों पर प्रतिबंध, और भारतवंशियों के साथ अमानवीय व्यवहार – ये सब दिखाते हैं कि रंगभेद और नस्लीय श्रेष्ठता उनके दृष्टिकोण का हिस्सा हैं. जब भारतीय मूल के लोगों को अमेरिका में उनके धर्म और रंग के आधार पर अपमानित और प्रताड़ित किया जाता है, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है – क्या अमेरिका सचमुच भारत का मित्र है, या केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए समीप आता दिख रहा है?
अमेरिका का आर्थिक रवैया भी संदेहास्पद रहा है. भारत से अत्यधिक मूल्य पर एफ-35 जैसे हथियार खरीदने का दबाव बनाना, भारतीय रुपये की कीमत को कम करते हुए डॉलर को मजबूत बनाए रखना, और पेटेंट कानूनों के ज़रिए भारतीय नवाचारों और पारंपरिक ज्ञान पर कब्जा करना – ये सब संकेत हैं कि अमेरिका केवल एक व्यापारिक लाभकारी साझेदार है, न कि आत्मीय मित्र.

आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा

भारत ने जब-जब आत्मनिर्भर बनने की ओर कदम बढ़ाया, पश्चिमी देशों ने शंका और विरोध ही किया. चाहे परमाणु नीति हो या डिजिटल डेटा सुरक्षा, अमेरिका ने हमेशा भारत की स्वतंत्र नीतियों को दबाने की कोशिश की है. क्वाड (QUAD) जैसे संगठनों में भी, जब भारत को पाकिस्तान द्वारा उकसाया गया, तब कोई एक भी पश्चिमी देश खुलकर भारत के पक्ष में नहीं आया.

यह भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका कभी भी भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को नहीं समझ पाया है. उनका शिक्षा, रहन-सहन, जीवन शैली और मूल्य प्रणाली थोपने का प्रयास आज भी जारी है. हमें उनके सिस्टम, उनकी भाषाएं, और उनके लाइफस्टाइल को श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति से बचना होगा. यह गोरों और रंग वालों की पुरानी मानसिकता अब भी जीवित है – बस नया रूप ले चुकी है.

अतः, समय आ गया है कि भारत अपनी विदेश नीति को फिर से परखे और आत्मनिर्भरता को ही अपनी सुरक्षा और सम्मान की ढाल बनाए. अमेरिका जैसे देशों से सावधानीपूर्वक संबंध बनाए रखें, लेकिन आँख मूँदकर विश्वास न करें. भारत को अब अपने आत्म-सम्मान, सांस्कृतिक मूल्यों, और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए, विदेशी मित्रताओं की कसौटी पर कड़ा मूल्यांकन करना होगा. क्या हम इस बदलती दुनिया में अपनी पहचान और स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए तैयार हैं?

“ब्लू ड्रम, कटा शव और लुटेरी मोहब्बत: क्या यही है महिला सशक्तिकरण की कीमत

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मथुरा । आज के युवा पति, ब्लू प्लास्टिक ड्रम और सीमेंट के कट्टों से डरते हैं, मानो ये कोई जानलेवा संकेत बन गए हों। वहीं, संयुक्त परिवारों की बुजुर्ग सासें अब शादी के बर्तन नहीं, ‘कटोरे’ इस डर से खरीद रही हैं कि बहू अब केवल रसोई तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसके इरादे कहीं और हैं।
भारतीय समाज में महिला सशक्तिकरण की लहर ने निश्चित रूप से उन्हें शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने की आजादी दी है, लेकिन इसके पीछे एक स्याह परछाईं भी है—बिखरते रिश्ते, अवैध संबंध, और प्रेम के नाम पर की जा रही हत्याएं।
ताजा घटनाएं जो रूह कंपा दें:
आगरा: 40 वर्षीय महिला ने प्रेमी संग मिलकर पति की हत्या कर दी, क्योंकि पति ने उन्हें आपत्तिजनक हालत में देख लिया था।
लखनऊ: 25 वर्षीय महिला ने शिकायत की कि उसका पति उसे कभी बाहर नहीं ले गया, न ही उसकी इच्छाओं को समझा। प्रेमी संग पति की हत्या कर डाली।
बलिया: एक पूर्व सैनिक के शव को छह टुकड़ों में काट कर अलग-अलग जगह फेंका गया—कातिल कोई और नहीं, उसकी पत्नी और उसका प्रेमी थे।
कानपुर: एक महिला ने अपने भतीजे के साथ पति की हत्या की और पड़ोसियों को फंसाने की कोशिश की।
औरैया: शादी के 15 दिन बाद ही महिला ने कॉन्ट्रैक्ट किलर को 2 लाख देकर पति को मरवा दिया, क्योंकि वह प्रेमी के साथ “नई जिंदगी” शुरू करना चाहती थी।

जब बच्चे बनें रुकावट:
तेलंगाना: तीन बच्चों की मां ने अपने प्रेमी के कहने पर उन्हें मार डाला, ताकि वह ‘सिंगल’ होकर शादी कर सके।
पश्चिम बंगाल: एक महिला ने 10 साल के बेटे की हत्या कर दी क्योंकि उसे डर था कि बेटा उसके समलैंगिक संबंध को उजागर कर देगा।
गुरुग्राम: 8 वर्षीय बेटे की हत्या, कारण वही—प्रेमी और ‘नई शुरुआत’।
यूपी: महज तीन साल की बेटी को सूटकेस में भर कर मार डाला गया—क्योंकि प्रेमी को बच्चे पसंद नहीं थे।

इन मामलों में एक समानता है—रिश्ते अब समझौते और परंपराओं पर नहीं, इच्छाओं और इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन पर टिके हैं।
सवाल यह है: क्या हम महिला सशक्तिकरण के नाम पर रिश्तों की कब्रें बना रहे हैं?
आज की औरतें पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनी हैं। 2023 तक, 49% महिलाएं किसी न किसी रूप में कार्यरत थीं। उनकी आर्थिक आज़ादी ने उन्हें आत्मविश्वास तो दिया, लेकिन यह बदलाव पारिवारिक ताने-बाने के लिए चुनौती बन गया।

सोशल मीडिया—नई मोहब्बत का पुराना जाल
इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और फेसबुक जैसे मंच अब सिर्फ टाइमपास नहीं, नए रिश्तों की जमीन बन गए हैं।
2024 के एक अध्ययन के अनुसार, 70% लोग सोशल मीडिया पर रोज़ाना एक्टिव रहते हैं। उनमें से बड़ी संख्या में लोग भावनात्मक सहारा इन्हीं डिजिटल रिश्तों में तलाशते हैं। कई महिलाएं unhappy marriages से भागने के लिए इसी राह को अपनाती हैं।
लेकिन जब ये ‘डिजिटल मोहब्बतें’ हकीकत में बाधित होती हैं—पति, बच्चे या परिवार की शक्ल में—तो मामला कत्ल, साजिश और ड्रामा तक जा पहुंचता है।

बदलते सामाजिक मूल्य—आशीर्वाद या अभिशाप?

कुछ लोग इस बदलाव को ‘पुराने मूल्यों का पतन’ मानते हैं।
“पहले बहू शादी को धर्म समझती थी, अब वो खुद को CEO समझती है,”—ऐसी बातें सुनना आम हो गया है।
एक सर्वे के अनुसार, 2023 में 30% महिलाओं ने घरेलू हिंसा की शिकायत की थी—इससे यह भी स्पष्ट है कि सभी रिश्ते परफेक्ट नहीं होते।
लेकिन सवाल यह है कि क्या रिश्ते सुधारने की बजाय खत्म कर देना ही विकल्प है?
क्या प्रेम के नाम पर हत्या एक नई सामाजिक स्वीकृति बन रही है?

संयुक्त परिवार और बुजुर्ग—नई दुनिया में अनफिट
सास-ससुर जो कभी परिवार के स्तंभ माने जाते थे, अब बहुओं की नजर में अक्सर ‘बाधाएं’ बनते जा रहे हैं। बुजुर्गों को इन परिवर्तनों के साथ सामंजस्य बिठाना कठिन लग रहा है।

कानून और व्यवस्था—अब क्या करे?

ये घटनाएं केवल ‘क्राइम स्टोरीज़’ नहीं हैं। ये सामाजिक चेतावनी हैं।
कानून तो अपना काम करेगा, लेकिन समाज को भी अब यह सोचना होगा कि आर्थिक आजादी और आधुनिकता के बीच नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों को कैसे बचाया जाए।

महिला सशक्तिकरण जरूरी है—उसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सशक्त होना जिम्मेदारी के साथ आता है।
यदि आज की महिला खुद के फैसले लेने के लिए सक्षम है, तो उसे रिश्तों की गरिमा को भी समझना होगा।
वरना, अगली बार किसी पति का शव फिर प्लास्टिक के ड्रम में मिले तो चौंकिए मत—ये आज की ‘आज़ाद मोहब्बत’ की नई क़ीमत है।

नर्क का रास्ता: भारतीय ‘विकास’

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दिल्ली । धूल फाँकती सड़कें, भरभराकर तेज़ी से गिरकर ढहते पुल, और मलबे में तब्दील होते स्कूल – यही है हमारे ‘विकास’ की हक़ीक़त ! जिस भारत में सरकारी तिजोरी से हज़ारों करोड़ रुपये पानी की तरह बहाए जाते हैं, वहाँ अवाम के हिस्से में आता है बस घटिया काम और टूटे वादे। यह ठेकेदारी की व्यवस्था असल में मुल्क की तरक़्क़ी को लूटतंत्र में बदल चुकी है, जहाँ गुणवत्ता को क़ुर्बान करके भ्रष्टाचार का महाभोज चल रहा है। ये ऐसा ज़हर है जो भारत के विकास को अंदर ही अंदर चाट रहा है।

कागज़ी घोड़े और अंतहीन इंतज़ार

सरकारी टेंडर हासिल करने वाली बड़ी कंपनियाँ, कागज़ों पर अपनी काबिलियत का डंका बजाने के बाद, काम को छोटे-छोटे ठेकेदारों में बाँट देती हैं। ये छोटे ठेकेदार, जो पहले से ही कई परियोजनाओं में उलझे होते हैं, काम को अनंत काल तक खींचते रहते हैं। जैसे कोई बूढ़ा शायर अपनी नज़्म को दोहराता रहे, उसी तरह यह काम भी कभी ख़त्म होने का नाम नहीं लेता।

2023 की कैग (CAG) रिपोर्ट चीख़-चीख़कर बताती है कि 60% सड़क परियोजनाएँ समय पर पूरी नहीं हो पातीं, और तो और, उनकी लागत 40-50% तक बढ़ जाती है। क्या यह सिर्फ़ लापरवाही है या कोई साज़िश ?

मौत का साया: ढहते ढाँचे

यह सिर्फ़ पैसों की बर्बादी नहीं, बल्कि इंसानी जानों की बर्बादी भी है। 2022 में मुंबई का एक फ्लाईओवर गिरा, जिसमें 5 बेक़सूर लोग मौत के मुँह में समा गए। जाँच हुई तो पता चला – ठेकेदार ने सीमेंट में रेत मिला दी थी! यानी, मुनाफ़े की हवस में उसने लोगों की ज़िंदगियों से खिलवाड़ किया। 2023 में बिहार के एक स्कूल की छत ढह गई, जिसमें 12 बच्चे ज़ख़्मी हुए। वजह? निर्माण सामग्री में घपला।

एनएचएआई (NHAI) के आँकड़े बताते हैं कि 30% नई बनी सड़कें पहले मॉनसून में ही उखड़ जाती हैं। क्या यह सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़ (संयोग) है या मौत का इंतज़ार?

नेता और ठेकेदार: एक नापाक गठजोड़

सरकारी अफ़सर और ठेकेदार मिलकर कॉस्ट एस्केलेशन (लागत बढ़ोतरी) का खेल खेलते हैं। टेंडर मिलते ही काम की रफ़्तार धीमी कर दी जाती है, फिर “अतिरिक्त बजट” की मांग की जाती है, जैसे कोई भूखा भेड़िया अपने शिकार का इंतज़ार करे।
सीबीआई (CBI) के 2021 के एक केस में तो यह भी पता चला कि एक ठेकेदार ने 100 करोड़ के प्रोजेक्ट को 300 करोड़ तक पहुँचा दिया, जिसमें से 50 करोड़ अफ़सरों और सियासतदानों की जेब में गए! यह हमारे देश के खून-पसीने की कमाई है, जो ऐसे निकम्मे लोगों के हाथों में लुट रही है।

हुनरमंद क्यों रहते हैं बेकार?

भारत में 15 लाख इंजीनियर बेरोज़गार हैं, लेकिन ठेकेदार अनपढ़ मज़दूरों से काम करवाते हैं ताकि कम लागत में ज़्यादा मुनाफ़ा कमाया जा सके। आईआईटी (IIT) और एनआईटी (NIT) जैसे संस्थानों के पास तकनीकी महारत (विशेषज्ञता) है, लेकिन सरकार उन्हें सीधे प्रोजेक्ट नहीं देती। क्यों? क्योंकि ठेकेदारों का “कमीशन राज” चलता रहे! यह मज़बूरी नहीं, बल्कि मंज़ूरी है इस भ्रष्टाचार की।

कब तक सहेंगे यह ज़ुल्म ?

अंग्रेज़ों के ज़माने का हावड़ा ब्रिज और मुगलों के किले आज भी मज़बूत खड़े हैं, लेकिन आज बनी सड़कें 2 साल भी नहीं टिकतीं! क्या हम अपनी आने वाली नस्लों को यही विरासत देना चाहते हैं? अगर सरकार ने इस ठेकेदारी माफ़िया पर लगाम नहीं कसी, तो “विकास” के नाम पर सिर्फ़ धोखा, धूल और मौतें बचेंगी।

अब नहीं तो कब? समाधान की गुहार

मशीन बैंक योजना: सरकार उद्यमियों को किराए पर निर्माण मशीनें उपलब्ध कराए, ताकि छोटे ठेकेदार भी गुणवत्तापूर्ण काम कर सकें। यह उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगा।
टेंडर में टैलेंट नीति:
आईआईटी (IIT) और सरकारी कॉलेजों के छात्रों को छोटे प्रोजेक्ट दिए जाएँ, ताकि नए विचारों को मौका मिले। उन्हें अपनी काबिलियत साबित करने का मंच मिले।
ज़ीरो टॉलरेंस पॉलिसी:
अगर कोई ठेकेदार समय पर काम पूरा नहीं करता, तो उस पर भारी जुर्माना लगे और उसे हमेशा के लिए ब्लैकलिस्ट किया जाए। कोई लिहाज़ नहीं!

यह वक्त है जागने का, यह वक्त है बदलने का! क्या हम इस अंधेरे में ही जीते रहेंगे या रोशनी की तरफ़ बढ़ेंगे?

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