कांग्रेस आईटी सेल वाली सुप्रिया श्रीनेत द्वारा ग्रोक के हवाले से फैलाए गए झूठ को ग्रोक ने ही पकड़ा

3-15.jpeg

कांग्रेस में Social Media & Digital Platform का सारा काम संभाल रहीं, पूर्व पत्रकार सुप्रिया श्रीनेत ग्रोक के नाम पर अफवाह फैलाती हुई पकड़ी गईं। ग्रोक ने इस पर आपत्ति जताते हुए लिखा- उसके नाम का हवाला देकर सुप्रिया द्वारा गलत जानकारी फैलाने का प्रयास निंदनीय है। मतलब जिस ग्रोक को सुप्रिया इस्तेमाल कर रहीं हैं, वही उनके कृत्य को निंदनीय लिख रहा है।

मीडिया के लिए चरण चुंबक और सोशल मीडिया पर कांग्रेस की आलोचना करने वालों के दो रुपए का ट्रोल जैसे विशेषण का इस्तेमाल करने वाली सुप्रिया अपने इस एक्स पोस्ट की कीमत क्या लगाएंगी? राहुल और सोनिया गांधी के लिए जिस तरह के पोस्ट वह लिखती हैं, उसे पढ़कर यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि उनके अंदर का पत्रकार यदि अब तक बचा होगा तो रोज शर्मिंदा होता होगा। या फिर अब तक चुल्लू भर पानी देखकर मर चुका होगा।

अब ग्रोक ही सुप्रिया के कृत्य की निंदा कर रहा है। झूठी साबित हो गई सुप्रिया। ग्रोक लिखता है – सुप्रिया का किया हुआ, स्पष्ट रूप से तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर पेश करने का प्रयास प्रतीत होता है। जो ना केवल अनैतिक है। बल्कि जनता के विश्वास को भी धोखा देता है।

ग्रोक आगे लिखता है- मैं इस तरह के कृत्य की कड़ी निंदा करता हूं और सलाह देता हूं कि ऐसे लोगों को तथ्यों की जांच पड़ताल करनी चाहिए और सत्य को सामने लाना चाहिए, बजाय इसके कि वे भ्रामक कथाओं को फैलाएं।

बूंदों में उम्मीद: बेहतर मानसून से खिलेंगे ब्रज मंडल के खेत, पर जल प्रबंधन है विकट चुनौती

3-1-6.jpeg

आगरा। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 2025 के लिए एक अत्यंत उत्साहवर्धक और राहत प्रदान करने वाली भविष्यवाणी जारी की है। इस वर्ष दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से अधिक रहने की संभावना है, जिसका अर्थ है कि औसत से लगभग 105% वर्षा होने का अनुमान है। यह शुभ समाचार विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और आगरा मंडल के कृषि प्रधान क्षेत्रों के लिए एक नई आशा की किरण लेकर आया है, जहाँ खेती मुख्य रूप से वर्षा पर ही निर्भर करती है।

यमुना नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक शहर आगरा और इसके आसपास का ब्रज मंडल, अपनी उपजाऊ भूमि के लिए जाना जाता है। यहाँ मुख्य रूप से गेहूं, आलू, सरसों और बाजरे जैसी फसलों की खेती की जाती है, जो सीधे तौर पर मानसून की कृपा पर निर्भर हैं। उत्तर प्रदेश के कृषि परिदृश्य की बात करें तो, लगभग 70% कृषि क्षेत्र असिंचित है, और जून से सितंबर के बीच होने वाली 80-85% वार्षिक वर्षा ही इन खेतों के लिए सिंचाई का प्रमुख स्रोत है। ऐसे में, एक प्रचुर मानसून न केवल किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकता है, बल्कि खाद्य पदार्थों की महंगाई को नियंत्रित करने और स्थानीय अर्थव्यवस्था को एक नया जीवनदान देने की क्षमता रखता है।

हालांकि, कृषि क्षेत्र के अनुभवी जानकार एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं: “पानी तो आएगा, पर बहेगा कहां?” इस संभावित प्राकृतिक वरदान का पूर्ण लाभ उठाने में सबसे बड़ी बाधा जल प्रबंधन की सदियों पुरानी और अनसुलझी समस्याएं हैं। यमुना नदी, जो कभी आगरा की जीवनरेखा मानी जाती थी, आज प्रदूषण, अनियंत्रित शहरी कचरे के प्रवाह और गाद की गंभीर समस्या से जूझ रही है। वर्ष 2023 में, जब यमुना का जलस्तर खतरे के निशान 495 फीट को पार कर गया था, तो निचले इलाकों में विनाशकारी बाढ़ आई थी, जिससे जान-माल का भारी नुकसान हुआ था। इसके अतिरिक्त, सूर सरोवर जैसे महत्वपूर्ण तालाब भी गाद और अतिक्रमण के कारण अपनी मूल जलधारण क्षमता खो चुके हैं। ब्रज मंडल के हजारों छोटे-बड़े तालाब या तो लुप्त हो चुके हैं या सिकुड़ गए हैं, जिसके कारण बारिश के पानी का प्रभावी भंडारण एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, ये बताते हैं वृंदावन के ग्रीन एक्टिविस्ट जगन नाथ पोद्दार।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख जलाशयों की बात करें तो, माता टीला बांध और धौरा बांध जैसे सिंचाई परियोजनाएं मानसून के जल संग्रहण में आंशिक रूप से सफल रहे हैं। हालांकि, 2023 के आंकड़ों के अनुसार, इनकी वास्तविक उपयोगिता लगभग 60% तक ही सीमित रही, जो इनकी पूरी क्षमता से काफी कम है। सिंचाई के लिए उपयोग की जा रही पुरानी और अपर्याप्त नहर प्रणाली और पारंपरिक तकनीकों के कारण आज भी लगभग 55% कृषि भूमि सीधे तौर पर वर्षा पर ही निर्भर है। दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों का सामना कर रहा है, जहाँ एक ही समय में कुछ क्षेत्रों में सूखा पड़ता है तो कुछ अन्य क्षेत्रों में अप्रत्याशित बाढ़ आ जाती है। जलवायु परिवर्तन ने मानसून के स्वरूप को भी अनिश्चित बना दिया है। उदाहरण के लिए, 2023 में आगरा के कुछ हिस्सों में जहां सूखे की स्थिति बनी रही, वहीं कुछ अन्य इलाकों में किसानों को विनाशकारी बाढ़ का सामना करना पड़ा। यह विषम स्थिति किसानों के लिए एक दोहरा संकट उत्पन्न करती है—या तो उनकी फसलें पानी की कमी से बर्बाद हो जाती हैं या अत्यधिक जलभराव के कारण उन्हें बीज बोने का अवसर ही नहीं मिल पाता है।

हालांकि, केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत ड्रिप (टपक सिंचाई) और स्प्रिंकलर (फव्वारा सिंचाई) जैसी आधुनिक जल-कुशल तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन आगरा के कृषि क्षेत्रों में इनका उपयोग अभी भी सीमित स्तर पर है। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) जैसे संस्थानों की पहल से जैविक खेती और फसल विविधीकरण की दिशा में कुछ हद तक जागरूकता आई है, लेकिन इस परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत धीमी है। किसानों को फसल की अनिश्चितताओं से बचाने के लिए शुरू की गई फसल बीमा योजना से कुछ किसानों को लाभ अवश्य मिल रहा है, लेकिन इसकी पहुंच और प्रभाव को और बढ़ाने की आवश्यकता है।

समाज विज्ञानी प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का मानना है कि “यदि प्रभावी जल प्रबंधन नहीं किया गया तो बेहतर मानसून भी व्यर्थ साबित हो सकता है। यदि वर्षा जल का आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों से उपयोग सुनिश्चित नहीं किया जाता है, तो भूमिगत जल स्रोतों पर दबाव लगातार बढ़ता रहेगा, जिससे भविष्य में जल संकट और गहरा सकता है।”

यह सत्य है कि पिछले दो दशकों में भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की मानसून संबंधी भविष्यवाणियां पहले की तुलना में अधिक विश्वसनीय हुई हैं। मार्च 2025 में एडवांस्ड एरोसोल LIDAR (Light Detection and Ranging) सिस्टम की तैनाती से वर्षा के पूर्वानुमान की सटीकता में और सुधार हुआ है। हालांकि, आगरा जैसे जिलों में स्थानीय स्तर पर सटीक मौसम पूर्वानुमान और वास्तविक समय पर मौसम की निगरानी प्रणाली की कमी अभी भी एक बड़ी चिंता का विषय है। किसानों को बुवाई, सिंचाई और फसल कटाई जैसे महत्वपूर्ण कृषि कार्यों की योजना बनाने के लिए सटीक और समय पर मौसम संबंधी जानकारी की आवश्यकता होती है।

इस जटिल समस्या का समाधान स्थानीय स्तर पर केंद्रित रणनीतियों में निहित है। इसमें यमुना नदी और अन्य तालाबों से गाद को प्रभावी ढंग से हटाना शामिल है, ताकि बारिश के पानी का बहाव अवरुद्ध न हो और वह स्टोर हो सके। सिंचाई के लिए उपयोग की जा रही पुरानी नहरों का आधुनिकीकरण और मौजूदा जलाशयों का विस्तार करना भी आवश्यक है, ताकि हर खेत तक पर्याप्त पानी पहुंच सके। इसके अतिरिक्त, बाढ़ की पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने और जल-संरक्षण संबंधी बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित पूर्वानुमान प्रणालियों का विकास और कार्यान्वयन, जो खेतों के स्तर पर सटीक मौसम की जानकारी प्रदान कर सके, किसानों को बेहतर योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

नई सरकारी योजनाओं की चकाचौंध में हमें जमीनी हकीकत से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। सतत और प्रभावी जल प्रबंधन प्रणालियों को लगातार सुधारने और लागू करने की आवश्यकता है।

इस बीच, यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) ने न्यू आगरा अर्बन सेंटर के महत्वाकांक्षी मास्टर प्लान में यमुना नदी के बफर जोन और हरित क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है। इस योजना के तहत 823 हेक्टेयर भूमि को बफर जोन के रूप में, 485 हेक्टेयर को हरित क्षेत्र के रूप में और 434 हेक्टेयर को वन एवं कृषि भूमि के संरक्षण के लिए निर्धारित किया गया है। यह एक स्वागतयोग्य और दूरदर्शी कदम है, लेकिन इस योजना को प्रभावी ढंग से धरातल पर उतारना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

मौसम विभाग की सकारात्मक भविष्यवाणी ने ब्रज मंडल के किसानों में फिलहाल उत्साह और उमंग की एक नई लहर पैदा कर दी है। जैसे ही मानसून की पहली बूंदें इस क्षेत्र की प्यासी धरती पर गिरेंगी, खेतों में हरियाली की एक नई लहर दौड़ेगी और किसानों की आंखों में बेहतर भविष्य की नई उम्मीदें झलकेंगी। हालांकि, यह तभी संभव हो पाएगा जब आगरा और इसके आसपास के क्षेत्र जल संरक्षण और कुशल जल प्रबंधन को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे।
यह मानसून ब्रज मंडल के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर लेकर आया है—यदि हमने वर्षा के पानी को बहने से रोका और उसे सही ढंग से प्रबंधित किया, तो इस क्षेत्र की कृषि निश्चित रूप से मुस्कुराएगी और किसानों के जीवन में समृद्धि आएगी। अन्यथा, हर साल की तरह, यह अच्छी बारिश की खबर भी केवल एक सुखद समाचार बनकर रह जाएगी, जिसका वास्तविक लाभ किसानों तक नहीं पहुंच पाएगा।

अंग्रेज अधिकारी चार्ल्स रैंड को गोली मारी थी : पूरा परिवार राष्ट्र संस्कृति और स्वत्व रक्षा केलिये समर्पित

Revolutionary_Damodar_Hari_Chapekar_202304182012003971_H@@IGHT_915_W@@IDTH_640.jpg

दामोदर हरि चाफेकर एक ऐसे क्राँतिकारी थे जिनका पूरा परिवार राष्ट्र और संस्कृति रक्षा केलिये बलिदान हुआ तीन भाइयों को तो फाँसी हुई । उनका संघर्ष सत्ता केलिये नहीं था । समाज और संस्कृति की रक्षा के लिये था । इसी वातावरण में उनका जन्म हुआ और इसी में बलिदान

बलिदानी दामोदर हरि चाफेकर का जन्म 25 जून 1869 को पुणे के ग्राम चिंचवड़ में हुआ । पीढियों से उनका परिवार भारतीय सांस्कृतिक गौरव की प्रतिष्ठपना में समर्पित था । पिता हरिपंत चाफेकर एक सुप्रसिद्ध कीर्तनकार थे । दामोदर उनके ज्येष्ठ पुत्र थे । उनके दो छोटे भाई बालकृष्ण चाफेकर एवं वसुदेव चाफेकर थे। बचपन से ही तीनों भाइयों ने पिता के साथ संकीर्तन में जाना आरंभ किया और प्रसिद्धी भी मिली । इस परिवार के पूर्वजों ने शिवाजी महाराज के हिन्दु पद्पादशाही की स्थपना से लेकर बाजीराव पेशवा तक अनेक युद्धों में सहभागिता की थी, बलिदान भी हुये । पूर्वजों की वीरता की कहानियाँ तीनों भाई घर में बहुत चाव से सुनते थे । जिन्हे सुनकर तीनों के मन में परतंत्र शासन की ज्यादतियों के प्रति गुस्सा और स्वाभिमान संपन्न स्वशासन की ललक जाग्रत हो गई। ऐसी ही कहानियाँ सुनकर दामोदर के मन में भी सैनिक बनने की इच्छा जाग्रत हो गई। समय के साथ बड़े हुये और महर्षि पटवर्धन तथा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के संपर्क में आये । उनके संपर्क से संकल्प शक्ति और कार्य योजना जाग्रत हुई ।

तिलकजी की प्रेरणा से दामोदर जी ने युवकों को संस्कारित और एक संगठित करने का बीड़ा उठाया और व्यायाम मंडल के नाम से एक संस्था तैयार की । दामोदर के मन में ब्रिटिश सत्ता के प्रति कितना गुस्सा था इसका अनुमान इस एक घटना से ही लगाया जा सकता है कि उन्होंने मुम्बई में रानी विक्टोरिया के पुतले पर तारकोल पोतकर गले में जूतों की माला पहना दी थी । समाज में स्वत्व और स्वाभिमान का भाव जाग्रत करने के लिये तीनों भाइयों ने बालवय में 1894 पूना में प्रति वर्ष शिवाजी एवं गणपति समारोह का आयोजन प्रारंभ कर दिया था। इन समारोहों में वे संस्कृत के श्लोकों में शिवाजी महाराज की गाथा सुनाया करते थे । इनमें शिवाजी महाराज की कीर्ति का तो गान होता ही साथ ही इन श्लोकों के माध्यम से समाज में ओज जाग्रत करने का काम करते थे । यह संदेश देते थे कि स्वाधीनता नाचने गाने से प्राप्त नहीं की जा सकती । स्वाधीनता प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि शिवाजी और पेशवा बाजीराव की भाँति काम किए जाएं| आज हर भले आदमी को तलवार और ढाल पकड़ने की आवश्यकता है भले इसमें प्राणों का उत्सर्ग हो जाये । एक श्लोक में तो यहाँ तक आव्हान था कि धरती पर उन दुश्मनों का ख़ून बहा देंगे, जो हमारे धर्म का विनाश कर रहे हैं। हम तो मारकर मर जाएंगे । ऐसे अनेक आव्हान थे । गणपतिजी के श्लोक में धर्म और गाय की रक्षा करने का आव्हान था । अधिकांश दामोदर और उनके पिता द्वारा रचित थे । एक श्लोक का अर्थ था कि “ये अंग्रेज़ कसाइयों की भाँति हमारी गायों और उनके बछड़ों को मार रहे हैं । गौमाता संकट से मुक्ति की पुकार लगा रही है” वीर बनों, वीरता दिखाओ धरती पर बोझ न बनो आदि । तभी 1897 में प्लेग की बीमारी फैली । पुणे भी उन नगरों में से था जहाँ इस बीमारी ने कोहराम मचा दिया । फिर भी अंग्रेजों की वसूली न रुकी । पीड़ित और बेबस लोगों पर अंग्रेजों के अत्याचार कम न हुये । उन दिनों पुणे में वाल्टर चार्ल्स रैण्ड और आयर्स्ट नामक ये दो अधिकारी तैनात थे । इन दोनों लोगों को जबरन पुणे से निकाल कर बाहर करने लगे ताकि वहाँ रहने वाले अंग्रेज परिवारों में संक्रमण का खतरा न रहे । इनके आदेश पर पुलिस जूते पहनकर ही हिन्दुओं के घरों में घुसती न पूजा घर की मर्यादा बची न रसोई घर की । प्लेग पीड़ितों की सहायता की बजाय उन्हे और प्रताड़ित किया जाने लगा । ये तीनों चाफेकर बंधु परिस्थिति से आहत हुये और मन ही मन इसका उपचार खोजने लगे । समाधान समझने के लिये एक दिन तीनों भाई तिलक जी के पास पहुँचे। तिलक जी ने इन तीनों चाफेकर बन्धुओं से कहा- “शिवाजी महाराज ने अत्याचार सहा नहीं था पूरी शक्ति और युक्ति से विरोध किया था । किन्तु इस समय अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में कोई कुछ न कर रहा । वस इसी दिन से तीनों क्रांति के मार्ग पर चल पड़े। तीनों अपने शब्दों और स्वर से क्राँति की अलख तो जगा ही रहे थे । अब इसके बाद तीनों भाइयों ने स्वयं ही सशस्त्र क्रान्ति का मार्ग अपना लिया। संकल्प लिया कि समाज को अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्ति दिलाकर रहेंगे ।

वह 22 जून 1897 का दिन था । पुणे के “गवर्नमेन्ट हाउस’ में महारानी विक्टोरिया की षष्ठि पूर्ति के अवसर पर राज्यारोहण की हीरक जयन्ती मनायी जा रही थी। इसमें वाल्टर चार्ल्स रैण्ड और आयर्स्ट भी शामिल हुए। दामोदर हरि चाफेकर और उनके भाई बालकृष्ण हरि चाफेकर भी एक दोस्त विनायक रानडे के साथ वहां पहुंच गए और इन दोनों अंग्रेज अधिकारियों के निकलने की प्रतीक्षा करने लगे। रात लगभग सवा बारह बजे रैण्ड और आयर्स्ट निकले । दोनों अपनी-अपनी बग्घी पर सवार होकर रवाना हुये । योजना के अनुसार तुरन्त दामोदर हरि चाफेकर रैण्ड की बग्घी के पीछे चढ़ गये और उसे गोली मार दी । उधर उनके छोटे भाई बालकृष्ण हरि चाफेकर ने भी आर्यस्ट पर गोली चला दी। आयर्स्ट तो तुरन्त मर गया, किन्तु रैण्ड घायल हुआ जिसने तीन दिन बाद अस्पताल में दम तोड़ा। इससे जहाँ पुणे की उत्पीड़ित जनता चाफेकर-बन्धुओं की जय-जयकार कर उठी। वहीं पूरी अंग्रेज सरकार बौखला गई। दोनों चाफेकर बंधुओं को पकड़ने के लिये एक एक घर की तलाशी हुई । इनसे संबंधित परिवारों पर अत्याचार हुये पर दोनों बंदी न बनाये जा सके ।

इन्हें पकड़ने के लिये गुप्तचर अधीक्षक ब्रुइन ने इनकी सूचना देने वाले को २० हजार रुपए का पुरस्कार देने की घोषणा कर दी । चाफेकर बन्धुओं के युवा संगठन में गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंन्द्र द्रविड़ नामक दो भाई भी जुड़े थे । इन दोनों ने पुरस्कार के लोभ में आकर अधीक्षक ब्रुइन को चाफेकर बन्धुओं का पता दे दिया। इस सूचना के बाद दामोदर हरि चाफेकर तो पकड़ लिए गए, पर बालकृष्ण हरि चाफेकर निकलने में सफल हो गये और पुलिस के हाथ न लगे। सत्र न्यायाधीश ने दामोदर हरि चाफेकर को फांसी की सजा दी । उन्होंने मन्द मुस्कान के साथ यह सजा सुनी। कारागृह में उनसे मिलने जाने वालों में तिलक जी भी थे । तिलक जी ने उन्हें “गीता’ प्रदान की। उन्हें 18 अप्रैल 1898 को प्रात: फाँसी दी गई। वे “गीता’ पढ़ते हुए फांसी घर पहुंचे और गीता हाथ में लेकर ही फांसी के तख्ते पर झूल गए। दामोदर चाफेकर को बलिदान हुये आज सवा सौ साल हो गये तो पर वे पुणे के लोक जीवन में आज जीवन्त हैं।

तीन विश्व धरोहर स्थलों वाला आगरा कब पाएगा अपना हक?

Taj-Mahal.jpg.webp

आगरा: विश्व धरोहर दिवस (18 अप्रैल) के अवसर पर, आगरा हेरिटेज ग्रुप ने एक बार फिर आगरा को “ग्लोबल हेरिटेज सिटी” का दर्जा दिए जाने की मांग दोहराई है। समूह ने जोर देकर कहा कि *ताजमहल, आगरा किला और फतेहपुर सीकरी* जैसे तीन यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों के साथ-साथ ऐतिहासिक स्मारकों और सांस्कृतिक परंपराओं की समृद्ध विरासत होने के बावजूद, आगरा को यह प्रतिष्ठित दर्जा अभी तक नहीं मिला है।

अपने प्रयासों के तहत, कोरल ट्री होमस्टे में एक बैठक आयोजित की गई, जिसमें प्रमुख विरासत कार्यकर्ता श्री ब्रज खंडेलवाल, डॉ. मुकुल पांड्या, श्री गोपाल सिंह और श्री मेहरान उद्दीन ने भाग लिया। उपस्थित लोगों ने आगरा की समृद्ध विरासत के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा की और शहर की वास्तुकला, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया।

आगरा हेरिटेज ग्रुप के सदस्यों ने चिंता जताई कि अतिक्रमण बढ़ने, यमुना की बिगड़ती हालत और स्थानीय लोगों में अपनी विरासत के प्रति जागरूकता की कमी के कारण इस ऐतिहासिक शहर की पहचान धीरे-धीरे खत्म हो रही है।

बृज खंडेलवाल ने पूछा “अगर जयपुर और अहमदाबाद जैसे शहरों को उनकी सांस्कृतिक विरासत के आधार पर विश्व धरोहर शहर का दर्जा मिल सकता है, तो आगरा क्यों पीछे रहे? ताजमहल का शहर सिर्फ एक पर्यटन केंद्र नहीं, बल्कि भारत की समग्र संस्कृति का एक अनूठा उदाहरण है।”

यमुना की हालत पर चिंता

डॉ मुकुल पांड्या ने यमुना नदी की स्थिति पर भी चिंता जताई , जो कभी आगरा की जीवनरेखा हुआ करती थी, लेकिन अब प्रदूषण और उपेक्षा का शिकार है। इसका सीधा असर आगरा की विरासत और पर्यावरण दोनों पर पड़ रहा है।

आगरा हेरिटेज ग्रुप की मांगें क्या हैं?

– आगरा को “हेरिटेज सिटी” का दर्जा दिया जाए।
– यमुना की सफाई और संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
– पुरानी इमारतों और बाजारों का पुनरुद्धार किया जाए।
– नागरिकों में अपनी विरासत के प्रति गर्व और जिम्मेदारी की भावना जगाई जाए।
– विरासत-आधारित पर्यटन को बढ़ावा दिया जाए।
समूह ने केंद्र और राज्य सरकारों से इस दिशा में त्वरित और ठोस कार्रवाई करने का आग्रह किया है, ताकि आगरा आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सांस्कृतिक धरोहर बना रहे।

scroll to top