मतान्तरण न करने पर पूरे परिवार का एक एक अंग काटा था लाहौर के किलेदार ने

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बलिदानी भाई मणिसिंह का उल्लेख लगभग सभी सिक्ख ग्रंथों में है । एक अरदास में भी उनका नाम आता है । पर उनके जन्म की तिथि पर मतभेद है । मुगल काल में उन्हें परिवार सहित बंदी बनाया था और मतान्तरण के लिये दबाव डाला गया । वे तैयार नहीं हुये तो पूरे परिवार के एक एक अंग काटकर प्राण लिये गये ।

वे चन्द्रवंशी राजपूत परिवार से थे । समय के साथ पंजाब गये और वहीं बस गये । राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिये जब सिक्ख पंथ अस्तित्व में तो परिवार सिक्ख पंथ से जुड़ घया । भाई मणिसिंह की गणना प्रमुख सिख विद्वानों में और पंथ प्रचारकों में होती है । गुरु तेग बहादुर के साथ बलिदान हुये भाई दयालदास इनके बड़े भाई थे । भाई मणिसिंह उनका जन्म 10 मार्च 1670 को मुल्तान प्राँत के अलीपुर गाँव में हुआ था । यह क्षेत्र अब पाकिस्तान में है । कहीं कहीं यह जन्म तिथि अप्रैल 1744 तो कहीं 1764 लिखी है । कुछ शोधकर्ताओं ने जन्तिथि पर शोध भी किये पर तिथि पर मतैक्य न हो सका । उनके के बचपन का नाम ‘मणि राम’ था। सिक्ख पंथ से जुड़े तो नाम मणिसिंह हुआ । पिता माई दास भी गुरुसेवा में लग गये थे । माता मधरी देवी गृहणीं थीं।15 वर्ष की उम्र में मणि सिंह का विवाह खैरपुर के यादववंशी लखी राय जी की बेटी सीतो बाई से हुआ। शादी के बाद मणि सिंह ने कुछ समय परिवार के साथ गांव अलीपुर में रहे फिर पत्नि के साथ अमृतसर आ गये । यहाँ रहकर उन्होने सिक्ख साहित्य की रचना की । वे प्रतिदिन प्रवचन करते थे और क्षेत्र में भ्रमण करके समाज से अपनी संस्कृति से जुड़े रहने का संदेश देते । उनके प्रवचनों में स्वत्व और स्वाभिमान जागरण का आव्हान होता । कुछ दिनों आद उन्होने एक विवाह और खेमी बाई से किया ।

1699 में जब गुरु गोविन्द सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी तो वे पंथ के प्रचार और विस्तार अभियान से जुड़ गये । उन्हें अमृतसर हरमंदिर साहब की व्यवस्था देखने का दायित्व मिला । आज यदि हरमिन्दर साहब की ख्याति है तो इसमें बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका भाई मणिसिंह की रही है । समय के साथ उनके कुल नौ पुत्र हुये । सात पुत्र पहली पत्नि सीतो बाई से और दो पुत्र दूसरी पत्नि खेमी बाई से । ये सभी सभी स्वत्व, स्वाभिमान और स्वधर्म के लिये बलिदान हुये । कोई युद्ध में तो कोई राष्ट्र रक्षा अभियान में ।

भाई मणिसिंह सिक्ख पंथ प्रचार के साथ समाज को संगठित करने और अपनी रक्षा स्वयं करने के अभियान में जुटे थे । उनकी गतिविधियों की सूचना लाहौर के मुगल किलेदार जकारिया खान के पास पहुँच रही थी । वह मौके की तलाश में था । उसे मौका मिला 1734 में । भाई मणि सिंह ने हरमिन्दर साहिब में एक उत्सव का आयोजन किया । यद्यपि समागम की सूचना किलेदार को दे दी गई थी और सहमति भी मिल गई थी । पर यह किलेदार जकारिया खान की चाल थी । समागम की तिथि जैसे ही समीप आई तो किलेदार ने सेना तैनात कर दी और इस आयोजन को विद्रोह माना । भाई मणिसिंह को जब इसका संकेत मिला तो उन्होने आने वाले अतिथियों को न आने का संदेश भी भेज दिया । मुगल सेना हरमिन्दर साहिब और उसे जोड़ने वाले सभी रास्तों पर तैनात हो गई। भाई मणिसिंह परिवार सहित बंदी बना लिये गये । भाई मणि सिंह को जंजीरों में बांधकर लाहौर ले जाया गया। उनपर पाँच हजार की राशि का जुर्माना लगा । जो उस समय के अनुसार बहुत बड़ी रकम थी । जुर्माने की रकम माफ करने केलिये इस्लाम धर्म अपनाने की शर्त रखी गई। जिसे भाई मणिसिंह ने इंकार कर दिया । तब उनके सामने उनके दो पुत्रों छीतर सिंह और गुरुबख्श सिंह को प्रताड़ना दी गई । एक एक अंग काटा गया । दोनों का बलिदान हुआ । फिर भी भाई मणिसिंह अडिग रहे । तब किलेदार ने उनक अंग-भंग करके मौत का आदेश दिया गया। यह नौ जुलाई 1734 की तिथि थी जब भाई मणिसिंह अपने पुत्र और परिवार सहित बलिदान हुये ।

स्वत्व और स्वाभिमान के लिये इस परिवार के बलिदान की एक लंबी परंपरा रही है । उनके पिता, बड़े भाई और दादाजी सभी बलिदान हुये । भाई मणिसिंह के सभी पुत्र भी बलिदान हुये । पुत्र उदय सिंह, 1704 में आनंदपुर साहिब के पास साही तिब्बी में, अनेक सिंह, अजब सिंह और अजायब सिंह 1704 में चमकौर के युद्ध में बलिदान हुये ।

बलिदानों की यह गाथा सिक्ख साहित्य और अरदास में तो है पर इतिहास से नदारत । ऐसे बलिदानों के कारण ही भारतीय संस्कृति पुष्पित और पल्लवित हो रही है ।

कोटिशः नमन ऐसे बलिदानियों को .

Degenerated press club invites unwanted controversy

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Nava Thakuria

A recent controversy erupted following a social media post by a television journalist, associated with Gauhati Press Club (earlier Guwahati Press Club) in northeast India, brought many questions for the media body, which invited a minister in Assam chief minister Himanta Biswa Sarma’s cabinet for a cultural program, but shockingly ‘faced derogatory comments’. The particular post was generated by the journalist working for a satellite news channel owned by the CM’s family, and his outburst that the State health & family welfare minister Ashok Singhal disrespected a delegation from GPC, was taken seriously. According to the journalist, the GPC delegation went to invite Singhal for a forthcoming Bhaona performance in the city. During the brief interaction, the minister allegedly questioned the necessity of a press club to organise a Bhaona. Moreover, the minister termed the native traditional performing art-form as not being secular in nature.

The issue suddenly had gone viral as many individuals, outfits, media outlets and opposition political leaders started making a hue & cry demanding an apology from the minister. Some even termed Singhal as a ‘non-Assamese’ who has no idea about the religious performing art form (Ankiya Bhaona), developed by the sixteenth century Vaishnavite saint, scholar and philosopher Mahapurush Srimanta Sankardev and his prime disciple Madhavdev to enact plays primarily with mythological characters. However, CM Sarma opined that he did not believe Singhal could make such an immature comment. It was followed by a formal clarification from Singhal denying the allegation that he made such derogatory remarks regarding the Bhaona.

Later in a social media post, Singhal stated that it was completely ‘false and fabricated’ after acknowledging that a group of scribes visited him to invite for the cultural program, but a fictitious story was generated by a particular journalist. Singhal tendered an apology citing the reason that he did not want any unnecessary debate over the matter, but he stuck to his stand that he never made any derogatory remark on Bhaona. The issue should have been resolved after the minister’s apology and the GPC was seemingly happy with the development (though it was half-hearted), but soon the city press club made a puzzling statement that the meeting with the minister was not prescheduled. A statement in Assamese language, endorsed by GPC president Susmita Goswami and general secretary Sanjay Rai, claimed that they came to know about the meeting with Singhal from social media only.

The social media users questioned why the particular minister was invited even though he is not in charge of IPR or cultural ministry? Moreover, why did the GPC delegation approach the concerned minister at his residence in the evening hours (but not in the Secretariat)? More precisely, why would a minister make derogatory comments just to receive an invitation for any event? Was there any instigation and it was none other than a demand for some hefty donations from the minister, but somehow it was materialised? Why the GPC committee will not apologise to the media fraternity for the mess as the Bhaona titled ‘Gandharir Abhishap’ was already supported by the North East Zone Cultural Centre under the Union Ministry of Culture, New Delhi?

The media club, currently functioning illegally from Ambari archaeological site, claims that it has nearly one thousand members, but many city-based scribes publicly stated that they are not associated with the GPC. The club, which celebrated the golden jubilee year of its existence in 2022, but its closing function is yet to be organised. Many conscious citizens now demand to relocate the press club so that the rich archaeological site could be preserved for research works. The archaeology department claims that the ruins of Ambari reflect the period of Sunga-Kushana dynasty. So the Ambari site, which attracts daily visitors from different parts of India, needs to be made encroachment-free, with no sympathy to the illegal occupiers including the press club.

स्त्री विमर्श: अपनी रक्षा के लिए खुद को ही पहल करनी होगी

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सुरेन्द्र चतुर्वेदी

भारत की नारियों को किस बात की प्रतीक्षा है ? इतनी घटनाएं होने के बाद भी क्या उन्हें लगता है कि कोई दैवीय शक्ति उनकी रक्षा के लिए अवतरित होगी ? जब तक वे स्वयं अपनी सुरक्षा के लिए सतर्क और सन्नद्ध नहीं होंगी, बलात्कार जैसी घटनाएं होती ही रहेंगी। यह रक्तबीज के कलयुगी संस्करण हैं, इनको जितना मारो वे उतने ही पैदा होते रहेंगें।

भारत में बलात्कार इतना आम हो चुका है कि हमारी चेतना जागृत ही नहीं होती! सरकारी आंकड़ों की मानी जाए तो 2022 में देशभर में 31000 से ज्यादा बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गई हैं, यह तो वह संख्या है जिसके लिए पीड़िता ने पुलिस के पास अपनी शिकायत दर्ज कराई है। इसके अलावा ऐसे कितने ही मामले होंगें जिनमें पीड़िता ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया होगा और उन मामलों की शिकायत दर्ज नहीं हो पाई होगी। ऐसा माना जाता है कि 60 से 70 प्रतिशत मामलों में शिकायत नहीं की जाती है।

बंगाल में हुए अत्याचारी बलात्कार पर पूरे देश में गुस्सा है। ऐसा ही गुस्सा दिल्ली में हुए निर्भया के अत्याचारी बलात्कार के मामले में भी था। पर उससे हुआ क्या ? क्या परिणाम निकला ? *पीड़िता को निर्भया कहें या अभया ! किसी भी नाम से घटना तो जनमानस के पटल पर स्थायी हो जाती है, लेकिन बदलाव क्या होता है यह महत्वपूर्ण है। प्रश्न यह है कि क्या समाज में स्त्रियों के प्रति मानसिकता में बदलाव आ रहा है?* समाज सरकारों के भरोसे बैठा है, सरकारे सिर्फ दंड संहिता बना सकती हैं, अपराधियों को दोषी सिद्ध होने पर सजाएं दिला सकती हैं लेकिन क्या वे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोक सकती हैं ? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है।

महिला सशक्तिकरण के दावे वाले इस दौर में बलात्कार जैसा अत्याचार और उसपर होने वाला प्रतीकात्मक विरोध सरकार, व्यवस्था, समाज और माता-पिताओं की लाचारी और हताशा को स्पष्ट रूप से प्रमाणित करता है। *प्रश्न यह है कि भारत जैसे देश में जहां नारी को नारायणी माना और कहा जाता है वहां स्त्री के प्रति दुर्भावना और हीनता के पोषक तत्व कहां से उपज रहे हैं? आखिर वो कौनसे कारण हैं जो इन बलात्कारी रक्तबीजों को वो संजीवनी प्रदान करते हैं कि कठोर कानूनी दंड के प्रावधानों के होने के बाद भी वे इस अत्याचार को करने से पहले हिचकते-डरते तक नहीं हैं।*

*क्या भारत की लचर न्यायिक व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार है? या राजनीतिक दल, जो अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी भी घटना के अपराध को राजनीतिक और सामाजिक बना देते हैं, जिससे उनके हितों की पूर्ति होती रहे। वे किसी भी स्त्री की गरिमा को खंड़ित कर देने में बिल्कुल भी नहीं हिचकते? या फिर हमारा समाज, जो इन घटनाओं का इतना आदी हो चुका है कि वह स्वयं के स्वार्थ से उपर आ ही नहीं पा रहा है ? वह यह नहीं सोचता कि जो आज बंगाल में हुआ है या दिल्ली में हुआ था वह कल उनके घर में भी हो सकता है ? या सड़क पर एकत्रित होकर सरकार के खिलाफ जनमत पैदा करने की कोशिश करते मोमबत्तीवाले आंदोलनजीवी जिन्हें सिर्फ एक मौके की तलाश रहती है जिससे वो अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकें।* इन सबमें वह पीड़िता कहीं खो जाती है, और फिर से एक नई कहानी के साथ अखबारों में बलात्कार की घटनाएं अपना स्थान बना लेती हैं।

बुद्धिजीवी माने जाने वाले एक बड़े वर्ग का कहना और मानना है कि 90 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में बलात्कार किसी परिचित ने ही किया होता है, इसलिए इसे *व्यक्ति के विरूद्ध अपराध’ की श्रेणी में माना जाना चाहिए, जिसमें सरकार की भूमिका अपराध के हो जाने के बाद ही आती है। राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के अनुसार यह बात सही भी है। इसलिए अपराध की पूर्व में रोकथाम संभव नहीं है। लेकिन यह तो संभव है कि *हर बलात्कार की जांच और न्यायपालिका में सुनवाई फास्ट टेक अदालतों में हो, जिससे जल्दी से जल्दी पीड़िता को न्याय मिले और अपराधियों के बचने की संभावना न्यूनतम रहे। यह तो संभव है कि सभी राजनीतिक दल किसी भी ऐसे अपराधी का राजनीतिक संरक्षण बंद करें, जो बलात्कार का दोषी हो !*

तो जरूरत इस बात की है कि स्त्रियों को अपनी गरिमा और सुरक्षा के लिए स्वयं ही जागृत होना पड़ेगा। वे आत्मरक्षा के लिए आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करें और यह जरूर सुनिश्चित करें कि किसी निर्दोष को छोटे से लाभ या लालच के लिए बलात्कार का दोषी ना बना दें!

(लेखक सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जयपुर से संबद्ध हैं)

8 मार्च 1534 : चित्तौड़ की रानी कर्णावती का जौहर तीन हजार क्षत्राणियों का अग्नि प्रवेश..

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आठ मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की तिथि है । इस दिन पहली बार 1907 में न्यूयार्क की सड़कों पर महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिये एक विशाल प्रदर्शन किया था । लेकिन भारतीय इतिहास में आठ मार्च की तिथि एक ऐसी घटना का स्मरण कराती है जिसमें तीन हजार राजपूतानियों ने अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अग्नि में प्रवेश किया था ।

यह चित्तौड़ का दूसरा बड़ा जौहर था । जो महारानी कर्णावती के नेतृत्व में हुआ था । तीन हजार क्षत्राणियों ने अपना बलिदान दिया था । इसमें छोटी नन्ही बालिकाओं से लेकर बुजुर्ग महिलाएँ भी थीं । रानी कर्णावती को ही इतिहास की कुछ पुस्तकों में रानी कर्मवती भी लिखा है । वे बूँदी के राजा नरबद हाड़ा की पुत्री थीं। उनका विवाह चित्तौड़ के महान सम्राट राणा संग्राम सिंह से हुआ और वे चित्तौड़ की महारानी बनीं। उनके पति राणा संग्राम सिंह इतिहास की कुछ पुस्तकों में राणा साँगा के नाम से ख्यात हैं । राणा संग्राम सिंह ने पेशावर की सीमा पर जाकर भगवा ध्वज फहराया था । लेकिन विश्वासघात के चलते उन्हें घायल होकर खानवा के युद्ध से निकलना पड़ा था । उनके साथ विश्वासघात केवल युद्ध भूमि तक ही सीमित न रहा था अपितु घायल अवस्था में भी एक विश्वासघाती ने विष देकर उनकी हत्या कर दी थी । तब रानी कर्णावती ने अपने वालवय पुत्र विक्रमजीत को गद्दी पर बिठाकर राजकाज देखने का कार्य आरंभ किया । लेकिन चित्तौड़ में राज परिवार के ही कुछ लोग बालवय राजकुमार को शासक बनाने के पक्ष में नहीं थे । वे भी भीतर ही भीतर सत्ता परिवर्तन का षड्यंत्र कर रहे थे । इस घटनाक्रम से गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह अवगत था । उसने चित्तौड़ पर धावा बोल दिया । चित्तौड पर बहादुर शाह का यह दूसरा हमला था । उसका पहला हमला राणा जी के समय हुआ था लेकिन तब राणा जी के हाथों बुरी तरह पराजित हुआ था और माफी मांग कर गुजरात लौटा गया था । वह माफी मांग कर लौट अवश्य गया था पर मन ही मन तिलमिलाया हुआ था । वह अवसर की तलाश में था ।

उसने परिस्थितियों का आकलन किया । उसे लग गया था कि खानवा के युद्ध में चित्तौड की शक्ति क्षीण हो गई थी । इसपर राणा जी के निधन से स्थिति और कमजोर हो गई थी । उसे यह अच्छा अवसर दिखा और उसने 1534 में चित्तौड़ पर धावा बोल दिया । रानी ने सहयोग के लिये राजपूतों को सहायता के लिये संदेश भेजे । इतिहास की कुछ पुस्तकों में इस बात का भी उल्लेख है कि रानी कर्णावती ने सहायता के लिये मुगल बादशाह हुँमायु को भी राखी भेजी थी । हुँमायु रवाना भी हुआ । पर समय पर नहीं पहुंच पाया । इस बार चित्तौड में अधिक सहयोगी न जुट सके । सहयोगी रायसेन के राजा को बहादुरशाह ने ही धोखे से पराजित कर दिया था तो खानवा युद्ध के बाद बाबर ने कालिंजर पर धावा बोल दिया था । इस प्रकार चित्तौड़ की ये दो बड़ी सहयोगी रियासतों का पतन हो गया था । इसी अवसर का आकलन करके बहादुरशाह ने फरवरी में चित्तौड़ पर घेरा डाला । यह घेरा लगभग एक माह तक पड़ा रहा । बहादुरशाह ने किले के भीतर रसद ही नहीं पानी जाने के रास्ते भी रोक दिये थे । चित्तौड़ पर एक बड़ी विपत्ति आ गई थी । रानी कर्णावती के कंधों पर मेवाड़ के सम्मान की रक्षा का दायित्व था और वे इसके लिए दृढ़ संकल्पित थीं । उन्होंने अपने दोनों बेटों विक्रमजीत सिंह और उदय सिंह को गुप्त मार्ग से पन्ना धाय के संरक्षण में बूंदी भेजा और सेनापतियों की बैठक बुलाकर हमले का सामना करने की नीति अपनाई । चित्तौड का अपना इतिहास रहा है । चित्तौड के राजपूतों ने अपने प्राण देकर अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा की है । वर्तमान परिस्थिति को भाँप कर भी मेवाड़ के बहादुर राजपूतों ने अपने प्राण देकर भी मेवाड़ की रक्षा का संकल्प लिया । उन्होंने समर्पण के बजाय निर्णायक युद्ध करके वीरगति को प्राप्त करने का निर्णय लिया । राजपूताने की भाषा में इस रणनीति को साका और जौहर कहते हैं। रानी कर्णावती द्वारा विश्वस्त राजपूतों ने साका करने और राजपूतानियो ने जौहर करने का निर्णय लिया । रात्रि एक विशाल चिता तैयार की गई और राजपूतानियों ने अग्नि में प्रवेश किया । इनकी संख्या तीन हजार थी । इसके साथ छोटे बच्चों को भी तलाब में फेक दिया गया । यह तिथि आठ मार्च 1534 की है । अगले दिन किले के द्वार खोलकर निर्णायक युद्ध आरंभ हुआ ।
इस जौहर को मेवाड़ का दूसरा जौहर कहा जाता है। पहला जौहर रानी पद्मिनी का था और यह दूसरा जौहर यह रानी कर्णावती का था । साका अधिक देर न चल सका । बहादुरशाह के तोपखाने के आगे युद्ध पूरे दिन भी न चल सका । जीत के बाद बहादुरशाह किले में प्रविष्ठ हुआ पर उसे सन्नाटा और राख के ढेर मिले । उसने आसपास के गाँवों में लूट मचाई। तभी उसे खबर मिली कि हुँमायू की सेना चित्तौड़ आ रही है । वह किला खाली करके चला गया । मुगल बादशाह हुँमायु ने विक्रमादित्य सिंह को गद्दी पर बिठाने में सहयोग भी किया । पर उसके आने के पहले उसे राखी भेजने वाली रानी कर्णावती का अस्तित्व राख के ढेर में बदल गया था ।

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