‘प्रोपेगेंडा’ में एनडीटीवी (प्रणय रॉय) के मुकाबले कोई चैनल खड़ा नहीं हो पाया

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देश में 2014 से पहले ऐसे दर्जनों खोल थे जहां कांग्रेस को सत्ता में बनाए रखने के लिए तरह—तरह के प्रयोग हुआ करते थे। चूंकि इन आवरणों पर अलग—अलग नाम चिपके थे, इसलिए प्रयोग असफल हो जाने पर भी कभी इल्जाम कांग्रेस पर नहीं आता था।

इन प्रयोगों में सबसे अधिक लोकप्रिय और लंबा चलने वाला एक प्रयोग था, साम्प्रदायिक शक्तियों से मुकाबला। इस प्रयोग के अन्तर्गत कांग्रेस सरकारों से ‘फंडेड’ सैकड़ों विद्वान, दर्जनों पार्टियों के साथ मिलकर अकेली भाजपा के खिलाफ प्रोपेगेंडा और आरएसएस को लेकर दुष्प्रचार करती थी। और इस परियोजना को नाम दिया गया था, साम्प्रदायिक शक्तियों से मुकाबला।

इस परियोजना से पैसा कमाने वाली एक महत्वपूर्ण किरदार तीस्ता सीतलवाड़ भी थीं। उन दिनों गुजरात में दो ही राजनीतिक पार्टियां आमने सामने थीं। एक का नाम था कांग्रेस और दूसरी थी भारतीय जनता पार्टी। तीस्ता साम्प्रदायिक शक्तियों से मुकाबला के नाम पर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ अभियान चला रहीं थी। एक यात्रा निकाली उन्होंने। कांग्रेस को सत्ता में बनाए रखने के लिए ‘साम्प्रदायिक शक्तियों से मुकाबला’ सफलतम प्रयोगों में से एक था। कांग्रेस ने इस पर खूब निवेश किया। कुल मिलाकर यह सारा काम 2014 तक आउटसोर्सड था। अब तो यह पवन खेड़ा और सुप्रिया श्रीनेत की निगरानी में सीधे सीधे चल रहा है। इसलिए कांग्रेस पार्टी के स्नेहित, पुष्पित पल्लवित यू ट्यूबर्स भूलकर भी ऐसी कोई बात नहीं कहते जो पवन सर या फिर सुप्रिया मैडम को नागवार गुजरे। वे एक बार को मल्लिकार्जुन सर को निराश कर सकते हैं लेकिन पवन सर और सुप्रिया मैडम को बिल्कुल नहीं।

कांग्रेस ने दशकों के अपने राज में एक मजबूत इको सिस्टम खड़ा कर लिया है। जिसे तोड़ पाना भाजपा के लिए दस साल के शासन के बाद भी मामूली बात नहीं है। गांव के किसी पुराने जमींदार की तरह कांग्रेस पार्टी को सरकार चलाने के दौरान कोई बात कहनी होती थी, वह खुद नहीं कहती थी। उसके लिए उन्होंने प्रणय रॉय को रखा था। उस बात को प्रोफेशनल तरीके से प्रणॉय राय का पूरा चैनल कहता था। इस चैनल के लिए राष्ट्रपति भवन के दरवाजे से लेकर कांग्रेस सरकार के खजाने तक खुले थे। अब उनका ‘चैनल’ रहा नहीं, इसलिए कांग्रेस यह काम अपने यू ट्यूबर्स से कराती है।

एनडीटीवी की सस्ती कॉपी

प्रणय रॉय की कॉपी बनने की कोशिश उनके ही स्कूल से निकले एक पत्रकार ने मोदी सरकार में की लेकिन वे अपने चैनल को एनडीटीवी नहीं बना सके। एनडीटीवी प्रोपेगेंडा टूल था लेकिन वह इस काम को बहुत प्रोफेशनल तरीके से करता था। मोदी सरकार में प्रणय रॉय को कॉपी करने की कोशिश में लगे ये नए पत्रकार अपने चैनल को एनडीटीवी की एक सस्ती कॉपी कह सकते हैं। जहां शोर अधिक है और पत्रकारिता ‘गोल’ है।

ऐसा नहीं है कि प्रणय रॉय को कॉपी कर रहे पत्रकार कम जानकार हैं या उनमें हुनर की कोई कमी है। कमी है तो सिर्फ विचार को लेकर प्रतिबद्धता की। प्रणय के लिए उनका चैनल एक मिशन था। कॉपी कर रहे पत्रकार के लिए उनका चैनल एक कारोबार है। उनका किसी पार्टी या विचार से कोई लगाव नहीं। उनकी प्रतिबद्धता एक व्यक्ति के प्रति है।

एनडीटीवी ने पत्रकारिता और पत्रकारों पर बहुत निवेश किया। चैनल द्वारा तैयार डॉक्यूमेंट्री और दर्जनों रिपोर्ट आज भी देखी जा सकती है। उसके पीछे रिपोर्टर की मेहनत साफ दिखाई देती है। एनडीटीवी की सस्ती कॉपी वाले चैनल को प्रतिदिन एक नया वेंचर खोलने की जल्दी है। जो चल रहा है, वहां ढेर सारा शोर और रिपोर्ट के पीछे उससे अधिक सन्नाटा पसरा है। एनडीटीवी प्रोपेगेंडा कर रहा था लेकिन वह इस कला में निपुण था। उसकी इस कुशलता से मुकाबला करता हुआ कोई दूसरा भारतीय न्यूज चैनल खड़ा नहीं हो सका।

एनडीटीवी की सस्ती कॉपी वाले चैनल को देखकर ऐसा लगता है कि कोई नया नया पेंटर एक आर्ट गैलरी में रखे न्यूड पेंटिंग को देखकर ‘नंगई’ को ही कला समझ बैठा है।

मुस्लिम तुष्टीकरण का विकृत स्वरूप है, औरंगजेब का महिमामंडन

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संभा जी महाराज के जीवन पर बनी फिल्म छावा धूम मचाते हुए 500 करोड़ के क्लब में शामिल हो गई है तथा सिनेमा व्यवसाय विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह फिल्म अगर 1000 करोड़ का करोबार कर ले तो कोई आश्चर्य नही होगा। छावा फिल्म की लोकप्रियता को देखते हुए कुछ राज्यों ने इसे टैक्स फ्री भी कर दिया है। छावा के माध्यम से जनता के संभा जी महाराज की वीरता और औरंगजेब की क्रूरता को पहली बार अनुभव किया है । जो फिल्म देखने गया उसका ही सिर संभा जी की वीरता के सामने झुक रहा है और औरंगजेब से घृणा हो रही है, साथ ही सच्चे इतिहास को छुपाए जाने और मुगलों को जबरन महिमामंडित किये जाने से क्रोध में भी है।

छावा के माध्यम से वास्तविक इतिहास सामने आ रहा है तो भारत की राजनीति में कुछ लोग इसे भी अपनी तुष्टीकरण की राजनीति में भुना लेना चाहते हैं और क्रूर औरंगजेब के पक्ष में खड़े होकर अपने वोट बैंक को खुश कर रहे हैं। महाराष्ट्र के सपा विधायक अबू आजमी ने औरंगजेब को महान समाजसेवी बता दिया जिसके बाद महाराष्ट्र से लेकर उत्तर प्रदेश तक राजनीतिक बयानबाजी गर्म हो उठी। इसके बाद अबू आजमी को महाराष्ट्र विधानसभा के बजट सत्र तक के लिए निलंबित करते हुए उनके विधानसभा परिसर में प्रवेश पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। महाराष्ट्र में अपने विधायक के निलंबन पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का भड़कना स्वाभविक था, वो भड़के तो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी औरंगजेब फैंस क्लब को एक कड़ा संदेश दिया।

अबू आजमी के बयान से उपजे विवाद के बीच टीवी चैनलों तथा सोशल मीडिया में जिस प्रकार से औरंगजेब के समर्थक निकल रहे हैं वह अत्यंत चिंताजनक है। यह संभवतः वही लोग हैं जिन्होने भाजपा प्रवक्ता नुपुर शर्मा के खिलाफ सर तन से जुदा का नफरत भरा अभियान छेड़ दिया था। अब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि ,क्या भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के 75 वर्षो के बाद भी औरंगजेब का फैन क्लब जीवित है जिसे सनातन विरोधी कांग्रेस व इंडी गठबंधन के नेताओं का संरक्षण प्राप्त है। टीवी चैनलों पर विरोधी दलों के सभी प्रवक्ता सपा नेता अबू आजमी के बयान का समर्थन कर रहे हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बोटी -बोटी काटने जैसे शब्दों का प्रयोग करने वाले कांग्रेस सांसद इमरान मसूद भी इसमें शामिल हैं।

भगवान राम को काल्पनिक बताने वाले आज औरंगजेब को महान बता रहे हैं और अबू आजमी को सही ठहरा रहे हैं। अयोध्या में निहत्थे हिंदू रामभक्तों पर गोलियां चलवाकर उनका नरसंहार करवाने वाले औरंगजेब के साथ हैं तो आश्चर्य कैसा ? अबू आजमी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के दौरान भी नफरत भरे भाषण दिये थे। महाराष्ट्र में तो अबू आजमी को सांकेतिक सजा मिल चुकी है तथा उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो चुकी है किंतु यही सही समय है कि मुगल शासक औरंगजेब की क्रूरता का महिमामंडन करके मुस्लिम तुष्टीकरण में संलिप्त राजनैतिक दलों को भी बेनकाब किया जाये।

यह प्रमाणिक ऐतिहासिक तथ्य है कि मुगल शासक औरंगजेब एक बहुत ही क्रूर शासक था। दिल्ली के तख़्त के लिए उसने अपने पिता शाहजहां को जेल में डाल दिया था और अपने भाई दारा शिकोह का सिर तन से जुदा करके अपने बाप को भेंट में भिजवा दिया था लेकिन भारत में औरंगजेब के फैन्स की कमी नहीं है। एक अनुमान के अनुसार भारत में मोहम्मद की तरह औरंगजेब नाम भी काफी लोकप्रिय है और अकेले महाराष्ट्र में ही 2 लाख से अधिक लोगों का नाम औरंगजेब है। इसी तरह पाकिस्तान में भी 17 लाख लोगों का नाम औरंगजेब क नाम पर रखा गया है और पाकिस्तान के वित्तमंत्री का नाम भी मोहम्मद औरंगजेब है और इसी से समझा जा सकता हे कि औरंगजेब की जबरदस्त फैन फालोइंग भारत से लेकर पाकिस्तान तक है । यही कारण है कि जब भारत के राष्ट्रद्रोही औरंगजेब का महिमामंडन करते है तब पाकितान के लोग भी तालियां पीटते हैं।

भारत के विरोधी दलों के नता विदेशी समाचार पत्रों व एजेंसियों की झूठी रिर्पोटों पर संसद तक ठप कर देते हैं किंतु अमेरिका का एक बहुत बड़ा समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स लिखता है कि,“औरंगजेब के 49 वर्षों के कार्यकाल में 46 लाख और हर वर्ष लगभग एक लाख हिन्दू मारे गये थे” तो उस पर विश्वास नहीं करते। भारत का इतिहास ऐसी हजारों घटनाओं से भरा पड़ा है जो ये बताती हैं कि औरंगजेब सबसे क्रूर मुगल शासक था और वह हिन्दुओं से घोर नफरत करता था। औरंगजेब का शासनकाल भारतीय इतिहस का अभिशप्त काल है। वह पाप द्वेष दुष्टता क्रूरता आतंक तथा निर्दयता की पराकाष्ठा का द्योतक है। फिल्म छावा में औरंगजेब के अत्याचार बस एक उदाहरण भर हैं। उसका प्रत्येक कार्य हिन्दुओं को मतांतरित करने के लिए था।

मुस्तकबल लुबाब के लेखक सफी खां औरंगजेब के अत्याचारों के विषय में बिलकुल वैसा ही लिखा है जैसा उस समय हुआ। सफी खां लिखते हैं कि “औरंगजेब ने अपनी सेना को हिन्दुओं पर अत्याचार करने की खुली छूट दे रखी थी। औरंगजेब के शासनकाल में जनता को निर्दयता के साथ लूटा जाता था। उसके शासनकाल में ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं बचा था जहां से कर न लिया जाता हो।“ औरंगजेब के शासनकाल में ही हिंदुओं पर जजिया कर लगा दिया गया था। औंरंगजेब की सेनाओं ने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण और बंगाल तक चारों तरफ मंदिर तोड़कर उन पर मस्जिद बनाने और तलवार की नोक पर धर्म परिवर्तन के लिए कोहराम मचा दिया था। इसी औरंगजेब के फैन क्लब का कहना है कि उसने हिन्दुओं के लिए 80 मंदिर बनवाये जबकि वास्तविकता यह है कि उसकी सेनाओं ने 80 से अधिक मंदिरों का विध्वंस किया। औरंगजेब का शासनकाल ऐसा विकृत व घिनौना शासनकाल था जिसमें हिन्दू महिलाओं और बेटियों के साथ सरेआम बलात्कार किये जाते थे यहां तक कि उनकी हत्या करके उनके नग्न शवों को पेड़ों पर लटका दिया जाता था। सर्वत्र लूट, हत्या, धर्म परिवर्तन का बोलबाला था तब महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में हिंदू शक्ति का पुनर्जागरण हुआ, उन्होंने औरंगजेब के दांत खट्टे कर दिये थे। सफी खां लिखता है कि औरंगजेब की सेना के लगातार हमलों के कारण तथा खेतों में खड़ी फसलों में आग लगा देने के कारण कई बार भयंकर सूखा तक पड़ा किंतु उसे इसकी कोई परवाह नहीं थी।

औरंगजेब हिंदुओं से इतनी नफरत करता था कि उसने जयपुर के राजा जय सिंह को दासता स्वीकार न करने के कारण जहर पिलवा दिया था ।औरंगजेब ने संपूर्ण भारत में इस्लाम के नाम पर जो आतंक मचा रखा था उसका वर्णन मुस्लिम लेखक साकी मुस्तईद खां के मासिर -ए – आलमगीरी की पंक्तियों मे मिलती है वह लिखता है,“ 18 अपैल 1669 को उसने सभी यवन शासकों को हिन्दुओं के मंदिरों तथा स्कूलों के विनाश के आदेश दिये थे। उस आदेश के अनुसार ही बनारस का आज का काशी विश्वनाथ मंदिर विध्वंस किया गया था।“मंदिर को हथियाकर उसे मस्जिद में बदलना मुसलमानों के लिए गर्व की बात थी। दिसंबर 1669 में ही मथुरा के भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली को भी औरंगजेब ने ही ध्वस्त करवाया। 1679 में जोधपुर में भी कई मंदिरों व मूर्तियां का विध्वंस किया गया। औरंगजेब ने स्वयं चित्तौड़ जाकर हिन्दुओं के 63 मंदिरों का विध्वंस किया था और जश्न मनाया था।

जिस औरंगजेब की क्रूरता की कहानियों का वर्णन उसके अपने चाटुकार लेखकों तक ने किया है उसका समाजवादी व इंडी गठबंधन के नेता महिमामंडन कर रहे हैं यह उनकी दूषित व विकृत मानसिकता का ही परिचय है। छत्रपति शिवाजी के पुत्र सम्भा जी के जीवन पर बनी फिल्म छावा में जो दिखाया गया है वह एक कटु सत्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता और न ही दबाया जा सकता हैं।अभी तक इस सत्य को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर छुपाया जाता रहा और अब जब यह सामने लाया जा रहा है तब मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाले सभी दल छटपटा रहे हैं और औरंगजेब का अनर्गल महिमामंडन कर रहे हैं। महाराष्ट्र में सपा नेता अबू आजमी को सांकेतिक सजा मिलने के बाद जिस तरह सपा तथा अन्य मुस्लिम परस्त दलों ने औरंगजेब को महान बताने का बीड़ा उठाया है वो भविष्य के लिए चिंताजनक है।

डायरेक्टर सनोज मिश्रा ने की कोंच इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की तारीफ

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कोंच (जालौन): फिल्म इंडस्ट्री के जाने-माने डायरेक्टर सनोज मिश्रा ने कोंच इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की सराहना करते हुए इसे स्थानीय कलाकारों के लिए एक बड़ा अवसर बताया। हाल ही में महाकुंभ में वायरल हुई मनोलिसा की फिल्मी दुनिया में एंट्री पर चर्चा के बीच, मिश्रा ने फेस्टिवल के फाउंडर पारसमणि अग्रवाल से मुलाकात की।

मिश्रा ने कहा, “इस तरह के फेस्टिवल छोटे कस्बों की प्रतिभाओं को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का काम करते हैं।” उन्होंने बताया कि कोंच जैसे कस्बों में छुपी हुई प्रतिभाएं बड़े मंच की तलाश में रहती हैं, और ऐसे आयोजन उनके लिए उम्मीद की किरण बनते हैं।

सनोज मिश्रा पहले भी बतौर गेस्ट इस फेस्टिवल में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि फिल्मों के माध्यम से समाज के अनछुए पहलुओं को सामने लाना और स्थानीय कलाकारों को प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी है। कोंच इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल न सिर्फ कलाकारों के लिए बल्कि नई कहानियों और अनूठे सिनेमा के लिए भी एक खास मंच बनकर उभरा है।

इस फेस्टिवल की बदौलत कई युवा कलाकारों को मुंबई और अन्य बड़े शहरों में काम करने का मौका मिला है। मिश्रा ने कहा, “इस पहल से न सिर्फ कला को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि छोटे शहरों की कहानियां भी दुनिया के सामने आएंगी।”

रेल यात्रा होगी अब पहले से अधिक सुरक्षित

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आज रेल मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव की अध्यक्षता में स्टेशनों पर भीड़ नियंत्रण को लेकर एक उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में निम्नलिखित निर्णय लिए गए हैं:

60 स्टेशनों पर स्थायी बाहरी waiting area:

2024 के त्योहारों के दौरान, स्टेशनों के बाहर waiting areas बनाए गए थे, जिससे सूरत, उधना, पटना और नई दिल्ली में भारी भीड़ को नियंत्रित किया जा सका। यात्रियों को केवल तब प्लेटफॉर्म पर जाने की अनुमति दी गई जब ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ गई।

इसी तरह की व्यवस्था प्रयाग क्षेत्र के नौ स्टेशनों पर महाकुंभ के दौरान की गई थी।

इन अनुभवों के आधार पर, हमने देशभर के 60 ऐसे स्टेशनों पर permanent waiting areas बनाने का निर्णय लिया है, जहां समय-समय पर भारी भीड़ होती है।

नई दिल्ली, आनंद विहार, वाराणसी, अयोध्या और पटना स्टेशनों पर पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो चुके हैं।

इस व्यवस्था से अचानक आने वाली भीड़ को waiting area में नियंत्रित किया जा सकेगा और यात्रियों को केवल ट्रेन के आने पर प्लेटफॉर्म पर जाने दिया जाएगा, जिससे स्टेशन पर भीड़भाड़ कम होगी।

Access control:
इन 60 स्टेशनों पर पूरी तरह से प्रवेश नियंत्रण लागू किया जाएगा।
केवल confirm reservation टिकट वाले यात्रियों को सीधे प्लेटफॉर्म तक जाने की अनुमति होगी।
बिना टिकट यात्री या प्रतीक्षा सूची टिकट वाले यात्री बाहरी waiting area में रुकेंगे।
सभी unauthorised entry points सील कर दिए जाएंगे।
चौड़े फुट-ओवर ब्रिज (FOB):
12 मीटर (40 फीट) और 6 मीटर (20 फीट) चौड़ाई वाले दो नए standard के फुट-ओवर ब्रिज डिज़ाइन किए गए हैं।
ये चौड़े FOB और ramp महाकुंभ के दौरान भीड़ प्रबंधन में बहुत प्रभावी साबित हुए।
इन नए चौड़े FOB को सभी स्टेशनों पर स्थापित किया जाएगा।

Cameras:
महाकुंभ के दौरान भीड़ नियंत्रण में कैमरों की अहम भूमिका रही।
सभी स्टेशनों और आसपास के क्षेत्रों में निगरानी के लिए बड़ी संख्या में कैमरे लगाए जाएंगे।

War rooms:
बड़े स्टेशनों पर war room विकसित किए जाएंगे।
भीड़भाड़ की स्थिति में सभी विभागों के अधिकारी war room में कार्य करेंगे।

New generation communication equipment:
अत्याधुनिक डिज़ाइन वाले डिजिटल संचार उपकरण जैसे वॉकी-टॉकी, announcement system और caling system भारी भीड़ वाले सभी स्टेशनों पर लगाए जाएंगे।

नए design के ID card:
सभी स्टाफ और सेवा कर्मियों को नए design के ID card दिया जाएगा, जिससे केवल अधिकृत व्यक्तियों को ही स्टेशन में प्रवेश की अनुमति मिलेगी।

Staff के लिए नई डिज़ाइन की uniform:
सभी स्टाफ को नया डिज़ाइन uniform दी जाएगी ताकि किसी भी आपातकालीन स्थिति में उन्हें आसानी से पहचाना जा सके।

Upgradation of station director (स्टेशन निदेशक) post:
सभी प्रमुख स्टेशनों पर एक वरिष्ठ अधिकारी को स्टेशन निदेशक बनाया जाएगा।

सभी अन्य विभाग Station Director को रिपोर्ट करेंगे।
Station Director को वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे ताकि वे स्टेशन सुधार के लिए तत्काल निर्णय ले सकें।
टिकटों की बिक्री क्षमता के अनुसार:

Station Director को स्टेशन की क्षमता और उपलब्ध ट्रेनों के अनुसार टिकट बिक्री को नियंत्रित करने का अधिकार दिया जाएगा।

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