बांग्लादेशी घुसपैठ के खिलाफ ऐतिहासिक कदम

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संसद के बजट सत्र- 2025 में बजट के अतिरिक्त भी कई ऐतिहासिक विधेयक पारित हुए हें जिनमें से एक है आब्रजनऔर विदेशियों विषयक विधेयक -2025 । यह विधेयक भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में अग्रणी भूमिका निभाने वाला तो है ही साथ ही भारत की आंतरिक व वाह्य सुरक्षा तंत्र और आर्थिक तंत्र को भी मजबूत बनाने वाला भी है। जब यह विधेयक अधिसूचित होकर पूरे भारत में लागू हो जायेगा तब बांग्लादेशी व रोहिंग्याओं की अवैध घुसपैठ सहित अनेक प्रकार के अपराधों पर भी लगाम लग सकेगी।

इस विधेयक के कानून बन जाने के बाद कोई भी विदेशी नागरिक पहले की तरह भारत में घुस कर, भारत के किसी भी हिस्से में जाकर निवास करते हुए भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त नहीं हो पाएगा। अब सीमा पार करने वाले हर व्यक्ति का पूरा डाटा एकत्र किया जायेगा । अभी भारत आने वाले विदेशी नागरिकों का कोई डाटा उपलब्ध नहीं है। यह विधेयक भारत की एकता, अखंडता तथा सुरक्षा के लिए अतयंत महत्वपूर्ण है । इस बिल के लागू हो जाने के बाद अवैध रोहिंग्या/बांग्लादेशी घुसपैठ पर रोकथाम ही नहीं लगेगी अपितु ऐसे अराजक तत्व जो समाज में घुल मिलकर छोटे मोटे अपराधों में संलिप्त हो रहे हैं तथा समाज का वातावरण प्रदूषित करते हुए लवजिहाद व धर्मान्तरण जैसी गतिविधियों में संलिप्त हो जाते हैं उनसे भी निपटा जा सकेगा।
इस विधेयक पर संसद के दोनों सदनों में चर्चा के दौरान स्पष्ट हुआ कि भारत में अवैध घुसपैठ की समस्या कितना विकराल रूप ले चुकी है। भारत के सभी मेट्रो शहर अवैध अराजक तत्वों के निशाने पर हैं। भारत के अधिकांश सीमावर्ती क्षेत्रों तथा समस्त पूर्वी राज्यों जिनमें असम और पश्चिम बंगाल प्रमुख हैं में यह समस्या नासूर बन चुकी है। पश्चिम बंगाल के तीन सीमावर्ती जिलों की डेमेग्राफी अवैध घुसपैठ के कारण बदल चुकी है । गृह राज्यमंत्री नित्यांद राय ने जब सदन में बताया कि बांग्लादेशी घुसपैठ की सबसे अधिक समस्या कांग्रेस शासित राज्यों कर्नाटक, झारखंड, तेलंगना तथा तृणमूल कांग्रेस शासित राज्य पश्चिम बंगाल में है क्योंकि यहां की राज्य सरकारें सहयोग नहीं कर रही हैं तब विपक्षी दलो ने हंगामा करते हुए सदन का बहिष्कार कर दिया। गृहराज्य मंत्री ने अवगत कराया कि बंगाल सरकार सीमा पर बाड़ नहीं लगाने दे रही है साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सीमा पर टीएमसी के कार्यकर्ता ही बीएसएफ के कार्यों में बाधा डालने का काम कर रहे हैं जिसके कारण बांग्लादेशी घुसपैठ पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। लोकसभा में बहस के दौरान ही गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया कि भारत कोई “धर्मशाला“ नहीं हैं।

विधेयक पर बहस के दौरान घुसपैठ व शरणार्थी शब्द को स्पष्ट किया गया क्योंकि विपक्षी दलों के सांसद तुष्टिकरण की विकृत राजनीति के कारण इन दोनों शब्दों का घालमेल कर रहे थे। ये विपक्षी सांसद इस विधयेक को वसुधैव कुटुंबकम की भवना से परे बताकर भ्रम व अराजकता की राजनीति करने का प्रयास कर रहे थे किंतु सरकार ने अपने तर्कों से विपक्ष को बेनकाब कर दिया जिसके परिणामस्वरूप वे राज्यसभा में हंगामा करते हुए सदन से बाहर चले गये।

इस नये कानून में विदेशी अधिनियम 1946, पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम 1920 तथा विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम 1939 और आब्रजन (वाहक दायित्व ) अधिनियम 2000 को निरस्त करते हुए एक नया व्यापक कानून बनाने की आवयकता की पहचान करते हुए नया आब्रजन और विदेशी विधेयक 2025 लाया गया है। नये कानून का एक उद्देश्य यह भी है कि कानूनों की बहुलता और अतिव्यापन से बचा जाये तथा विदेशियों से संबंधित मामलों को विनियमित किया जाए, जिसमें वीजा की आवश्यकता, पंजीकरण और अन्य यात्रा संबंधी दस्तावेज (पासपोर्ट) आदि शामिल है । इस नये कानून के माध्यम से भारत में प्रवेश करने और बाहर जाने वाले सभी लोगों के लिए सभी प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित किया जा सकेगा।

नये कानून के अनुसार किसी भी विदेशी को बिना वैध पासपोर्ट या दस्तावेजों के भारत आने पर 7 साल की जेल और 10 लाख रुपये का जुर्माना देना होगा। गलत जानकारी देने या दस्तावेजों में गड़बड़ी करने पर 3 साल की जेल और 3 लाख रुपये जुर्माने का प्रावधान किया गया है। भारत में बिना वैध पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेजों के माध्यम से प्रवेश करने पर तुरंत हिरासत में लिया जायेगा। अब इस विधेयक के नये नियमों के अनुरूप अगर कोई मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है तो अधिक कड़ी कार्यवाही की जायेगी। यह विधेयक केंद्र सरकार को उन स्थानों का नियंत्रण करने का अधिकार भी देता है जहां विदेशियो काआना जाना लगा रहता है । इसके तहत मालिक को परिसर को बंद करने, निर्दिष्ट शर्तों के साथ इसके उपयोग की अनुमति देने या सभी या निर्दिष्ट वर्ग के विदेशियों को प्रवेश देने से मना करने का अधिकार का दिया गया है।

निरस्त किये गए कानून की कमियों का लाभ उठाकर ही बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक भारत आ रहे थे क्योंकि उस क़ानून में उनकी जांच करने तथा व्यापक पूछताछ की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं थी। इसी कारण से आज लाखों की संख्या में अवैध नागरिक भारत में रह रहे हैं और अब वह राष्ट्रीय समाजिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं।

गृहमंत्री अमित शाह ने सदन में अपने भाषण के दौरान कहा कि हम नियम बनाकर अवैध घुसपैठ को रोक रहे हैं। हमारी सीमा पर कुछ संवदेनशील स्थान हैं, सेना के अड्डे हैं, उनको दुनियाभर के लिए खुला नहीं छोड़ सकते। पहले भी घुसपैठियो को रोका जा सकता था किंतु कोई नियम नहीं था अतः हमने नियम बनाने का साहस किया है । इस नये कानून से भारत आने वाले विदेशी नागरिकों की जानकारी पुख्ता होगी । सुरक्षा की दृष्टि से ड्रग्स कार्टल, घुसपैठियों की कार्टल, हवाला व्यापारियों को समाप्त करने की व्यवस्था इस विधेयक में की गई है।

गृहमंत्री अमित शाह ने सदन को बताया कि सबसे अधिक बांग्लादेशी व रोहिंग्याओं की घुसपैठ बंगाल से हो रही है। अब तक जितने घुसपैठिये पकड़े गये हैं, उनके आधार कार्ड बंगाल के 24 परगना क्षेत्र के है। तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता ही इन लोगों के अवैध कागज बनवा रहे हैं। नये कानून में अवैध कागज बनवाने वाले भी सजा के दायरे में आ गये हैं। नया कानून 36 धाराओं में निहित है । सभी को कानूनी रूप दिया गया है । सदन में गृहमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि अब जो भारत में केवल भारत के हित के लिए आयेगा वहीं यहां पर रह सकेगा। अब भारत धर्मशाला नही है । सरकार उन लोगों का स्वागत करने के लिए तैयार है जो पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा या व्यापार के लिए भारत आना चाहते हैं सरकार केवल उन लोगों को भारत आने से रोकेगी जिनके इरादे गलत हैं और जो हमारे लिए खतरा पैदा करेंगे उनसे गंभीरता से निपटा जायेगा।

इस कानून के माध्यम से भारत में गैरकानूनी तरीके से घुसना और यहां बसना मुश्किल हो जायेगा। रोहिंग्या/ बांग्लादेशी घुसपैठ अब चुनाव में भी एक बड़ा मुददा बन गई है । दिल्ली में तो आम आदमी पार्टी कई विधायक बांग्लादेशी व रोहिंग्याओं का फर्जी पासपोर्ट, आधार कार्ड व राशन कार्ड आदि बनवा रहे थे जिनकी जांच चल रही है । केंद्र की सरकार को पूर्ण विश्वास है कि नक्सलवाद, आतंकवाद की तरह आने वाले समय में रोहिंग्या/ बांग्लादेशी घुसपैठ का भी समाधान हो जायेगा और भारत तीव्रता के साथ विकास के पथपर अग्रसर हो सकेगा।

लेख- कानून की बदलती परिभाषा?

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सोनम लववंशी

न्याय का मकसद केवल कानून के शब्दों की व्याख्या करना नहीं होता, बल्कि पीड़ित को न्याय दिलाना भी होता है। लेकिन जब अदालतें ऐसे फैसले सुनाने लगें, जो अपराधियों के पक्ष में झुके हुए प्रतीत हों, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था में कोई गंभीर खोट है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फ़ैसला कि किसी नाबालिग लड़की के स्तनों को पकड़ना, उसके कपड़ों से छेड़छाड़ करना या उसे जबरन पुलिया के नीचे ले जाने की कोशिश करना ‘बलात्कार’ या ‘बलात्कार के प्रयास’ की श्रेणी में नहीं आता—यह केवल एक न्यायिक भूल नहीं, बल्कि सामाजिक पतन का प्रमाण है। हमारी न्यायिक व्यवस्था का मूलभूत सिद्धांत यह होना चाहिए कि किसी भी निर्णय से पीड़िता को न्याय मिले और अपराधी को दंड मिले, ताकि भविष्य में कोई और ऐसी घृणित हरकत करने से पहले सौ बार सोचे। परन्तु वर्तमान में यह फैसला ठीक इसके उलट जाता है। यह न केवल पीड़िता के घावों पर नमक छिड़कता है, बल्कि अपराधियों को एक नया बहाना भी देता है कि, “हमने तो बस छूकर देखा था!” क्या अब अपराधियों को यह छूट दी जाएगी कि वे लड़की के शरीर के साथ किसी भी हद तक जाएं और जब तक बलात्कार की ‘पूर्णता’ न हो, तब तक वे निर्दोष बने रहें?

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2021 में भारत में 32,000 से अधिक बलात्कार के मामले दर्ज हुए थे। इसका मतलब है कि हर 16 मिनट में एक महिला बलात्कार का शिकार होती है। वहीं हालिया घटनाओं पर नजर डालें तो जनवरी 2025 में, केरल राज्य में एक दलित लड़की के साथ पाँच वर्षों तक 60 से अधिक व्यक्तियों द्वारा सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया, जिसमें अब तक 44 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। मार्च 2025 में ही कर्नाटक में एक इज़राइली पर्यटक और उसकी भारतीय मेज़बान के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना हुई, जिसमें दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया है। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि भारत में यौन अपराधों की समस्या गंभीर बनी हुई है, और इस दिशा में प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता है। लेकिन यह सिर्फ वे मामले हैं जो रिपोर्ट हुए। हजारों-लाखों महिलाएँ सामाजिक डर, परिवार के विरोध, और न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करा पातीं। ऐसे में, जब अदालतें इस तरह के फैसले सुनाती हैं, तो यह एक स्पष्ट संकेत देता है कि अपराधियों को बचाने के लिए हमारे कानून की परिभाषाएँ इतनी जटिल बना दी गई हैं कि न्याय केवल शब्दों की भूलभुलैया में उलझकर रह जाता है।

भारत में यौन अपराधों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई अध्ययन बताते हैं कि 90 फीसदी मामलों में अपराधी पीड़िता का कोई परिचित ही होता है—कभी शिक्षक, कभी रिश्तेदार, तो कभी कोई पड़ोसी। लेकिन इस न्यायिक फैसले से ऐसा प्रतीत होता है कि जब तक अपराधी अपनी ‘नीयत’ को पूरी तरह से अंजाम नहीं दे देता, तब तक वह निर्दोष बना रहेगा। ऐसे में यह किस प्रकार का न्याय है? क्या हमें तब तक इंतज़ार करना चाहिए जब तक कि लड़की की पूरी अस्मिता लूट न ली जाए? बलात्कार या यौन उत्पीड़न केवल शरीर का अपराध नहीं होता, बल्कि यह मानसिक और भावनात्मक यातना भी होती है। पीड़िता का आत्मसम्मान, उसका आत्मविश्वास और उसका पूरा व्यक्तित्व इस अपराध से प्रभावित होता है। लेकिन जब अदालतें ऐसे फैसले सुनाती हैं, तो वे इस बात को पूरी तरह अनदेखा कर देती हैं। कानून का काम केवल कानूनी किताबों में लिखे शब्दों को दोहराना नहीं, बल्कि न्याय को वास्तविकता में उतारना भी होता है।

2012 में हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर दिया था। उस वक़्त ऐसा लगा कि भारत की न्यायिक व्यवस्था और समाज दोनों बदलेंगे। जनता के भारी दबाव के बाद सरकार को बलात्कार के कानूनों में संशोधन करने पड़े, कड़े दंड तय किए गए, लेकिन क्या अपराध रुके? एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2012 के बाद से भारत में बलात्कार के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। हाथरस केस को ही ले लीजिए, जहाँ एक दलित लड़की के साथ गैंगरेप हुआ और फिर प्रशासन ने बिना परिवार की अनुमति के उसका अंतिम संस्कार कर दिया। कठुआ केस को याद करिए, जहाँ एक मासूम बच्ची के साथ मंदिर में बलात्कार किया गया और कुछ लोग अपराधियों के समर्थन में रैलियाँ निकाल रहे थे। ऐसे माहौल में जब हमारी अदालतें यह तय करने में लग जाए कि कौन-सा अपराध ‘पूरी तरह’ अपराध है और कौन-सा नहीं, तब यह समझना कठिन नहीं कि हमारी न्याय प्रणाली किस दिशा में जा रही है।

जब कोई पीड़िता शिकायत दर्ज कराती है, तो उसे न्याय मिलने में सालों लग जाते हैं। भारत में बलात्कार के मामलों की सजा दर सिर्फ 28 प्रतिशत है। इसका मतलब यह है कि हर 100 में से 72 अपराधी या तो छूट जाते हैं या फिर उन पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं होती। कारण? सुस्त न्याय प्रक्रिया, लचर जांच, और समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक मानसिकता। आरोपी को बचाने के लिए ‘नीयत’ और ‘पूरी घटना’ जैसी दलीलें दी जाती हैं, जबकि पीड़िता को उसके कपड़ों, चरित्र और परिस्थितियों को लेकर कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। न्याय की ऐसी परिभाषा, जहाँ पीड़िता को ही दोषी ठहरा दिया जाए, क्या सच में न्याय है? कई बार यह दलील दी जाती है कि महिलाओं द्वारा झूठे मुकदमे दर्ज कराए जाते हैं, लेकिन एनसीआरबी के ही आंकड़े बताते हैं कि 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में पीड़िताओं की शिकायतें सही पाई जाती हैं। इसके बावजूद, जब भी कोई महिला न्याय की गुहार लगाती है, तो सबसे पहले उस पर संदेह किया जाता है। क्या यह समाज और न्याय व्यवस्था का पाखंड नहीं है?

ऐसे में यह सुनिश्चित करना होगा कि कानून में यौन उत्पीड़न और बलात्कार के प्रयास की परिभाषाएँ इतनी स्पष्ट हों कि कोई अपराधी कानूनी पेचीदगियों का फायदा न उठा सके। फास्ट-ट्रैक अदालतों की संख्या बढ़ाई जाए और ऐसे मामलों में त्वरित सुनवाई सुनिश्चित की जाए। न्यायधीशों को जेंडर सेंसिटिविटी पर प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि वे अपराध को केवल ‘शारीरिक संपर्क’ तक सीमित करके न देखें, बल्कि मानसिक और सामाजिक प्रभाव को भी समझें। कई बार पीड़िता को धमकाया जाता है, उसे चुप रहने के लिए मजबूर किया जाता है। ऐसे मामलों में सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़िताओं को पर्याप्त सुरक्षा मिले। समाज में यह जागरूकता लानी होगी कि यौन अपराधों को सहना कोई समाधान नहीं है। महिलाओं को सशक्त बनाना और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

आज जब देश डिजिटल इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और वैश्विक नेतृत्व की बातें कर रहा है, तब हमारी न्यायिक व्यवस्था ऐसे शर्मनाक फैसले सुना रही है। यह न केवल न्यायपालिका की संवेदनहीनता को दर्शाता है, बल्कि अपराधियों को खुली छूट भी देता है। न्याय में निष्पक्षता होनी चाहिए, लेकिन जब यह निष्पक्षता अपराधियों को बचाने लगे, तो यह अन्याय में बदल जाती है। अगर हमने अब भी आवाज़ नहीं उठाई, तो कल हमारे घर की मां, बेटियाँ और बहनें इसी न्याय प्रणाली के आगे गिड़गिड़ाती नज़र आएँगी। न्याय केवल किताबों में लिखे कानूनों से नहीं मिलता, बल्कि इसे महसूस करने की ज़रूरत होती है, और जब अदालतें इस भावना से अछूती हो जाएँ, तो समाज को खुद अपनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। इतिहास यह ज़रूर दर्ज करेगा कि जब न्याय के मंदिरों में अन्याय की आरती उतारी जा रही थी, तब समाज कहाँ खड़ा था? हम चुप रह गए, तो न्याय की यह चिता और भी भड़क उठेगी और अब तो न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी भी नहीं, फिर कैसे यह अन्याय हो रहा। यह समझ से परे है।

लोक के आलोक में राम

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डॉ. विशाला शर्मा

हमारे हृदय में बसने वाले राम हमारे भीतर का प्रकाश है और रामायण की आत्मा है रामायण जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देता है और विश्व के सम्मुख रामराज्य की अवधारणा को स्थापित करता है रामराज्य की नींव जनक की बेटियां है सही तरीके से जीवन जीना और आंतरिक शांति बनाए रखना रामायण का मूल है जब समाज में बुराई सहनशीलता की रेखा को पार कर जाती है तो एकमात्र तरीका उस व्यक्ति को रोकना है जिसने बुराई मौजूद है बाली हो या रावण जिसने बुराई का प्रतिनिधित्व किया राम ने उन्हें नष्ट कर दिया 24000 श्लोकों के साथ 500 उपखंड तथा सात कांड में विभक्त सनातन संस्कृति का प्रतिनिधित्व ग्रंथ रामायण त्याग ,प्रबंधन कौशल ,प्रेम भाईचारे और संबंधों की घनिष्ठता के साथ हमारी आंतरिक आत्मा को छू लेता है मन की शांति ही सीता है। जिस दिन मन स्वर्णमृग पर आसक्त होगा उसी दिन से कष्टों का प्रारम्भ होगा। जब सीता ने अपने राम से स्वर्ण मृग की अपेक्षा की तो राम सीता से दूर चले गये। क्योंकि मन का गलियारा बहुत छोटा होता है,उसमें दो नहीं रह सकते। राम को रख लो या फिर माया (स्वर्ण) को रख लो। लौकिक दृष्टी से सीता के लिए स्वर्ण मृग प्रथम और राम द्वितीय हो गये।

जब स्वर्ण सहज भाव से आता है तो वह राम की कृपा का प्रसाद होता है, परन्तु जब वह असहज भाव से आता है तो भीतर के राम को उसके स्थान से हटाकर स्वयं विराजित हो जाता है।

सच कहें तो गीता का उपदेश भी यही है कि- यदि उनकी कृपा से सहज होकर स्वर्ण आता है तो वह अलौकिक सुख के साथ लौकिक सुख की रचना करेगा। ऐसे व्यक्ति का शरीर तो मथुरा में होगा परन्तु मन वृंदावन में विचरण करेगा।

नानक ने 550 वर्ष पूर्व 1469 में लिखा है-

संसार के महासागर में अपने को उसी के भरोसे छोड़ दो। न जप, न तप, न ध्यान, न धारणा, न लाभ, न हानि। एक ही विचार है उसकी इच्छा। स्वर्णमृग देना चाहे तो ठीक न देना चाहे तो ठीक, अपनी कोई चाहत नहीं। अर्थात-

लौकिक धरातल पर सीता का शरीर कुटिया के आँगन में है और मन स्वर्ण मृग के पीछे भाग रहा हैं जब भी जीवन में ऐसा होगा तब लक्ष्मण कितनी ही रेखाएँ खींच देे, शांति रूपी सीता का हरण अवश्य होगा।

हनुमान ने लंका जाते समय ऐसे प्रतीक की अपेक्षा की थी जिसमें स्वयं राम हो। इस अपेक्षा को राम समझ गये और उन्होंने राम नाम अंकित अपनी मुद्रिका हनुमान को दी।

’तब देखी मुद्रिका मनोहर ! राम नाम अंकित अति सुन्दर ।

मैं सोचता हूँ मुद्रिका देते समय राम के मुख पर प्रसन्नता के भाव रहे होंगे, वे भाव भंगिमा से यह समझाना चाहते है कि तुम्हे इसकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि तुम्हारे भीतर मैं हूँ और मेरे भीतर तुम (शिव स्वरूप) परन्तु जिसका मन स्वर्णमृग के पीछे दौड़ने से मुझसे विरक्त हो गया था वहाँ तुम पुनः मेरे एहसास को स्थापित करना चाहते हो।

प्रभु की मुद्रिका है अर्थात मुद्रिका भी प्रभु ही है। इस देश में निर्गुण राम के उपासक सूफी संत कहते हैं- खुद की उपस्थिति का अहसास ही खुदा है। तेरी चाहता की वेदना ही परमानन्द है।

भीतर मेरे हे राम तेरा एहसास बना रहे।
न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे ।
जब तक हे तन में प्राण रगों में लहू रहे।
बस तू रहे और तेरी जुस्तजू रहे।

…2….
मुद्रिका धातु की है, लौकिक है। राम के स्पर्श के कारण अलौकिक हो गई। यही भाव केवट का अपनी नौका के प्रति था। जिस नौका में राम विराजे वह नौका केवट के लिए वंदनिय हो गयी। उस नौका के भीतर वह सदैव राम की उपस्थिति की अनुभूति करता है। यहाँ गौस्वामी तुलसीदास कहते है-
’’जड़ चेतन सब जीव जग, सकल राम मय जानि।’’

जिस दिन हनुमान ने यह मुद्रिका पेड़ के ऊपर बैठकर सीता की झोली में डाली उसी दिन से कष्टों का हिमालय गलने लगा और गंगा सागर स्वयं गंगौत्री के पास आ गया। आत्मा और परमात्मा का विछोह समाप्त हो गया। यहाँ गंगोत्री सीता का प्रतीक है और गंगा सागर राम का।
संत कबीर कहते है- मैं का विगलन (गलजाना) ही हरि है। ज्ञान भक्ति और कर्म तीनों का सार है- अहंकार के हिमालय का विगलन।
‘‘बूंद बनने को समन्दर की हिमालय गल रहा है।’’ मैं तो बर्फ का ढैला है जिस दिन गल जायगा उस दिन शून्य हो जायेगा। बुध्द कहते हैं- जब तुम शून्य हो जाओगे तभी तुम्हारे भीतर का अंतरमन ज्ञान के प्रकाश से भर जायगा। अर्थात –

जब मैं था तब हरि नहीं,

अब हरि है मैं नहीं।

अहंकार एक आवरण है। यह घना कोहरा है जिसने सत्य को ढक लिया है। गीता ने इसे तमोगुण कहा है। दूसरी ओर जीवन का सतोगुण स्वयं राम है। उसके विश्वास का प्रकाश ही तमोगुण का नाश कर सकता है। जिस दिन सीता ने मुद्रिका को मस्तक से लगाया उसी दिन से सर्वत्र जड़ और चेतन में उसकी उपस्थिति का ऐहसास होने लगा।

दूसरी ओर राम दूत ने अनुभव करा दिया कि जिसका दूत अपराजितों को भी पराजित कर सकता है। उसकी इच्छा के बिना संसार की कोई भी दिव्य शक्ति उसे बाँध नहीं सकती। महावीरों की उपस्थिति में भी वह लंका दहन कर सकता है अर्थात दूत भी साधारण नहीं है, तब हे ! लंकेश श्री राम को असाधारण कैसे समझ रहे हो।

हर व्यक्ति को परमात्मा ने शुभ और अशुभ के सोच के कई आधार दिये हैं। रावण के पास इसके दस आधार थे इसलिऐ उसे दशानन कहते हैं परन्तु शुभ का सोच भी उसकी उपस्थिति के ऐहसास से ही संभव है। बिना उसकी कृपा के अशुभ से नहीं बचा जा सकता। उसका ऐहसास तो घने अंधकार के मध्य आत्मा में जलने वाले उस दीप की तरह है जो हमारा मार्ग प्रशस्त करता है।

लोग कहते है वह करोड़ या अबरपति है अर्थात धनपति है। पति का अर्थ स्वामी है। इसलिए धन उसका दास है। यदि दास चला जाय तो स्वामी को फर्क नहीं पड़ता। भारत में इस दास को चंचला कहते है। जाना और आना उसकी प्रकृति है। फिर भी इस दास के जाने पर हार्ट अटैक आता है। इस सत्य को समझकर मीरा ने सब कुछ त्याग दिया। केवल उसकी उपस्थिति को भीतर और बाहर अनुभव करते हुए उस युग के सम्राट अकबर की उपस्थिति में कहा-पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।
…3…
परम तत्व को ही जिसने अपनी सम्पत्ति मान लिया, उसके लिए फिर संसार में क्या शेष रह जाता है। मीरा हो या तुलसी दोनों के लिए आराध्य ही परम तत्व थे।

लंका में अशोक वाटिका है। अशोक का अर्थ होता है जहाँ शोक न हो। परन्तु नाम में क्या रखा है ? नाम की सार्थकता भी उसकी अनुभूति में निहीत हैं। मातुश्री की प्रसन्नता हनुमान के सामर्थ और मुद्रिका के भीतर से प्रवाहित राम के दिव्य प्रकाश में निहीत है। इसी समन्वय ने शोक का हरण किया।
दूसरी ओर जनक वाटिका है जिसमंे सीता राम का पाने के लिए व्याकुल है। राम से मिलने के लिए गौरी से प्रार्थना करती है, जो परम तत्व विचरण करते हुए बाहर दिखलाई दे रहा है, उसे भीतर स्थापित करना चाहती है। सार इतना है कि शुभ की चाहत ही शुभ को फलित करती है। भक्त और भगवान के बीच जो अवरोध है उसे सूफी संतों ने आवरण कहा है। इसके लिए हिज़ाब शब्द का प्रयोग किया है। हिज़ाब हटने पर वह दिखलाई देने लगता है उसकी उपस्थिति का ऐहसास होने लगता हे।

हुस्न भी हो हिज़ाब में और इश्क भी हो हिज़ाब में

या खुद आश्गार हो या मुझ को आश्गार कर।

भक्त सूरदास नैत्रहीन थे। एक बार वे किसी गर्त में गिर गये। बाहर निकलना उनके लिए संभव नहीं था। ऐसे में सूर के सखा कृष्ण ने स्वयं आकर उनकी बाँह पकड़ी और बाहर निकाला। सूर कृष्णा की उपस्थिति का ऐहसास करने लगे और बोले-

बाँह छुड़ाए जात हो, निबल जानिके मोही,
हृदय ते तब जाहिगो, सबल जानुंगो तोही।
कृष्ण को चेलेंज कर दिया और कहते हैं बालकृष्ण माँ यशोदा का हृदय पाने वाले सूर के भीतर सदैव मौजूद रहे। कृष्ण हो या राम सार इतना सा है-
राम की उपस्थिति का ऐहसास ही राम है।

(लेखिका प्रोफेसर एवं हिंदी विभागाध्यक्ष छत्रपति संभाजी नगर महाराष्ट्र)

जेल में घासलेट डालकर जिन्दा जलाया था

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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास बलिदानों से भरा है । क्राँतिकारी लेखक सागरमल गोपा को जेल में इसलिये जलाकर मार डाला गया था कि उन्होंने अपने ओजस्वी साहित्य से जन जागरण अभियान चलाया था ।

सागरमल गोपा मूलतः राजस्थान की जैसलमेर रियासत के थे । उनका जन्म तीन नवम्बर 1900 को जैसलमेर में हुआ था । उनकी आरंभिक शिक्षा जैसलमेर में हुई । उन्होंने संस्कृत और हिन्दी के साथ अंग्रेजी की शिक्षा भी ली । वे बहुत कुशाग्र बुद्धि थे । स्मरण शक्ति भी असामान्य थी ।

उनके पूर्वज रियासत के राजगुरु रहे हैं। पिता अखैराज गोपा भी रियासत के दरबारी थे । उन दिनों जैसलमेर में महरावल जवाहर सिंह का शासन था । पर जवाहर सिंह नाम के महरावल थे रियासत का शासन वहाँ तैनात अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट के इशारे पर चलता था । अंग्रेजों का प्रमुख काम जनता का शोषण करके अधिक से अधिक राजस्व बसूली था । इस वसूली के लिये रियासत के सिपाही पूरी रियासत में भीषण अत्याचार कर रहे थे ।

इस वातावरण से किशोर वय सागरमल को प्रभावित किया । समय के साथ युवा हुये । जब वे केवल अठारह वर्ष के थे तब 1918 में उन्होंने जैसलमेर में एक सभा की जिसमें अंग्रेजीराज की तो आलोचना की ही । इसके साथ इस अत्याचार में सहभागी होने केलिये महरावल की भी आलोचना की और इन अत्याचारों केलिये राजा को ही दोषी माना । इसके साथ अपने मित्रों से मिलकर एक पुस्तकालय की स्थापना की जिसमें कुछ राष्ट्रवादी साहित्य और समाचारपत्र मंगाना आरंभ किये जिससे जन जागरण पैदा हो । इसके साथ जैसलमेर रायासत में वसूली के लिये हो रहे अत्याचारों पर एक पुस्तिका “जैसलमेर का गुण्डाराज” भी तैयार की और इसे वितरित करना आरंभ किया । इससे अंग्रेज पॉलिटिकल एजेंट और राजा दोनों कुपित हुये । महरावल ने गिरफ्तारी के आदेश दिया । युवा सागरमल बंदी बना लिये गये । पिता ने राजा से रिहाई की विनती की । राजा सहमत तो हुये पर जैसलमेर से निष्कासन की शर्त पर । पिता ने सहमति दे दी । पिता ने सागरमलजी को रिहा होते ही परिवार सहित नागपुर भेज दिया । यह 1920 का वर्ष था । सागरमल नागपुर आ गये पर यहाँ भी शांत न बैठे । 1921 में असहयोग आँदोलन आरंभ हुआ तो सहभागी हुये और गिरफ्तार कर लिये गये । उन्हे छै माह की सजा हुई । रिहा होकर पुनः जन जाग्रति और लेखन में ही जुट गये । उन्होने दिल्ली से प्रकाशित “विजय” एवं वर्धा से प्रकाशित “राजस्थान केसरी” में जैसलमेर सहित देशभर में राजनीतिक एवं सामाजिक सुधारों पर लेख लिखे ।

सागरमल गोपाजी ने रघुनाथसिंह मेहता के साथ मिलकर जैसलमेर में माहेश्वरी नवयुवक मंडल की स्थापना की । रघुनाथ सिंह जैसलमेर में ही रहते थे जबकि सागरमल जी नागपुर में रहकर ही इस संस्था से जुड़े थे । यह संस्था गुप्त रूप से राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचारार्थ राष्ट्रीय साहित्य वितरण एवं राष्ट्रीय भावना जागृत करने का कार्य कर रही थी ।

महारावल ने इस संस्था पर प्रतिबंध लगाकर पुस्तकालय जब्त कर लिया और रघुनाथसिंह मेहता को गिरफ्तार कर लिया गया ।

सागरमल गोपा ने नागपुर में रहकर ही जैसलमेर प्रजामंडल की स्थापना की संस्था प्रजामंडल काँग्रेस की ही ईकाई थी जो उन क्षेत्रों में सक्रिय थी जहाँ अंग्रेजों का सीधा शासन नहीं था । रियासती राज था पर अंग्रेजों द्वारा नियंत्रित। जैसलमेर प्रजा मंडल ने नागरिक अधिकारों और सम्मान जनक जीवन के अधिकार के लिये अनेक अभियान चलाये । और राजनीतिक सुधारों की भी मांग की ।

1938 में जैसलमेर से उनके पिता के निधन का समाचार आया । वे जैसलमेर पहुँचे। पिता के अंतिम संस्कार कर वहीं रहने लगे । और स्वतंत्रता आँदोलन के लिये जन जागरण का अभियान आरंभ किया । 25 मई 1941 में बंदी बना लिये गये । उनपर निष्कासन आदेश का उल्लंघन करने और राजद्रोह का आरोप लगा । छो वर्ष की सजा दी गई। सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जयनारायण व्यास जी ने इनकी रिहाई के लिये काँग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू जी से भी संपर्क किया । पर सफलता नहीं मिली । जेल में सागरमल जी के दो ही कार्य थे एक लेखन कार्य और दूसरा जेल अधिकारियों के अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाना । इससे उनपर जेल अधिकारियों की भृकुटी सदैव तनी रहती। जेल के भीतर उनपर अमानुषिक अत्याचार हुये । 4 अप्रैल 1946 को थानेदार गुमान सिंह ने उन्हे बाँधकर घासलेट डाला और आग लगा दी । और सागरमल जी का बलिदान हुआ ।
भारत सरकार ने 1986 में उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया गया और एक नहर का नाम भी उनके नाम पर रखा गया ।

सागरमल जी का पूरा जीवन सामाजिक जागरण के लिये समर्पित रहा । लेखन कार्य से भी और सभा संगोष्ठियों के माध्यम से भी । उन्होंने भारत भर के समाचारपत्रों में जैसलमेर के हालात लिखे । उनकी तीन पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया गया उनमें “जैसलमेर का गुंडाराज” दूसरी “रघुनाथ सिंह का मुकदमा” और तीसरी “आज़ादी के दीवाने” पहली पुस्तक में जैसलमेर के राज्य में सरकारी तंत्र के अत्याचारों का वर्णन था । दूसरी पुस्तक में न्याय व्यवस्था के प्रति सतर्क रहने और तीसरी पुस्तक में देश के स्वतंत्रता आँदोलन में सक्रिय रहने और बलिदान होने वालों का विवरण था । अंग्रेजीराज और रियासत दोनों ने उनकी रचनाओं पर प्रतिबंध लगाये जो आजादी के बाद ही हट सके ।

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