देश के पहले ‘गोदी चैनल’ की कहानी: एनडीटीवी का उदय और पतन

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दिल्ली। भारतीय मीडिया के इतिहास में एनडीटीवी को अक्सर ‘पहले गोदी चैनल’ के रूप में चित्रित किया जाता है, जो कांग्रेस पार्टी के प्रचार तंत्र की तरह कार्य करता था। 1988 में प्रणय रॉय और राधिका रॉय द्वारा स्थापित यह चैनल शुरू में दूरदर्शन के लिए सामग्री उत्पादन करता था, लेकिन 2003 में स्वतंत्र ब्रॉडकास्टर बनने के बाद यह कांग्रेस के एजेंडे को बढ़ावा देने का माध्यम बन गया। आलोचकों का मानना है कि एनडीटीवी ने कांग्रेस की नीतियों को ग्लैमराइज किया, विपक्षी दलों को निशाना बनाया और ‘सेक्युलर’ छवि के नाम पर पार्टी लाइन को मजबूत किया। उदाहरणस्वरूप, 2004 के लोकसभा चुनावों में एनडीटीवी की कवरेज ने यूपीए की जीत को ‘लोकतंत्र की विजय’ के रूप में पेश किया, जबकि भाजपा की हार को ‘सांप्रदायिकता की असफलता’ बताया। इसी तरह, 2जी घोटाले (2010) में कांग्रेस को बचाने के लिए चैनल ने जांच एजेंसियों पर हमला बोला, जबकि यूपीए-2 के भ्रष्टाचार कांडों को न्यूनतम कवरेज दिया।

प्रणय रॉय (जिन्हें कभी-कभी ‘जेम्स प्रणय रॉय’ कहा जाता है) पर ईसाई होने का आरोप लगता रहा है, जो सोनिया गांधी की कथित ईसाई पृष्ठभूमि से मेल खाता था। पत्रकारों ने खुलासा किया कि सोनिया इस वजह से रॉय पर अधिक विश्वास करती थीं। पूर्व पीएमओ मीडिया सलाहकार संजय बरू की किताब ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ (2014) में उल्लेख है कि सोनिया-मनमोहन सिंह युग में एनडीटीवी को विशेष पहुंच मिली, क्योंकि रॉय को ‘विश्वसनीय’ माना जाता था। पत्रकार स्वपन दासगुप्ता ने एक इंटरव्यू में कहा, “सोनिया की वेलफेयर योजनाओं के लिए बजट सुनिश्चित करने में एनडीटीवी जैसी मीडिया ने भूमिका निभाई।” मार्गरेट अल्वा की आत्मकथा ‘कौरेज एंड कमिटमेंट’ (2022) में भी सोनिया के मीडिया पर नियंत्रण का जिक्र है, जहां रॉय को ‘अंदरूनी सर्कल’ का सदस्य बताया गया।

एनडीटीवी ने देश को कई ‘गोदी एंकर’ दिए, जो कांग्रेस की गोद में बैठे चिल्लाते थे। रविश कुमार ने ‘प्राइम टाइम’ में यूपीए की तारीफों के पुल बांधे, जबकि बरखा दत्त ने ‘वी द पीपल’ में विपक्ष को ‘अराजक’ ठहराया। विपल मेहता और सोनाली भंसजी जैसे एंकरों ने 26/11 कवरेज (2008) में पाकिस्तान को फोकस कर कांग्रेस की ‘सॉफ्ट’ इमेज बचाई। ये एंकर आज सक्रिय हैं, लेकिन तब वे ‘सेक्युलर वारियर’ बने घूमते थे।

कांग्रेस के सत्ता हटने के बाद एनडीटीवी पर सीबीआई छापे (2017) पड़े, जो ‘विच हंट’ बताए गए। लेकिन आलोचक कहते हैं, यह ‘गोदी’ का अंतिम अध्याय था। आज अडानी समूह के अधिग्रहण (2022) के बाद चैनल बदल गया, लेकिन पुरानी ‘गोदी’ की यादें बाकी हैं।

विकास के सहभागी भी हैं, हम भारतीय राष्ट्रभक्त मुसलमान

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गौहर आसिफ

दिल्ली। 27 सितंबर 2025 को दिल्ली के तालकटोरा इंडोर स्टेडियम में एक ऐतिहासिक आयोजन होने जा रहा है-अखिल भारतीय मुस्लिम महासम्मेलन जिसका आयोजन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच (MRM) द्वारा किया जा रहा है । यह अधिवेशन भारत के विभिन्न हिस्सों से आए हुए उलेमा सूफी संत बुद्धिजीवी शिक्षाविद और मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों को एक मंच पर एकत्र करेगा।

डॉ. इन्द्रेश कुमार की अगुवाई में होने वाला यह सम्मेलन दो प्रमुख उद्देश्यों पर केंद्रित है पहला मुस्लिम समाज के आर्थिक और शैक्षिक सशक्तिकरण पर विचार करना] दूसरा “वतन से मोहब्बत“ यानी राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना को मज़बूत करना।

ऐसे समय में जब देश में धार्मिक और सामाजिक विभाजन की रेखाएँ गहरी हो रही हैं यह महासम्मेलन एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है। यह भारतीय मुसलमानों की पहचान को केवल शिकायत और हाशिये से निकाल कर सकारात्मक भागीदारी सुधार और रचनात्मक राष्ट्रनिर्माण की दिशा में ले जाने का एक प्रयास है।

संवाद और आत्ममंथन का मंच

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना 2002 में इस विचार के साथ हुई थी कि मुसलमानों और मुख्यधारा की राष्ट्रवादी विचारधारा के बीच संवाद कायम किया जाए। यह मंच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से वैचारिक रूप से जुड़ा हुआ है।

हालांकि] 27 सितंबर को होने वाला अधिवेशन केवल मंच का प्रचार नहीं है-यह मुस्लिम समाज के भीतर आत्ममंथन और आत्म-निर्णय का एक अवसर भी प्रदान करता है।

वतन से मोहब्बत एक भावनात्मक लेकिन महत्वपूर्ण संदेश

इस अधिवेशन का एक भावनात्मक पक्ष है-मुसलमानों की देशभक्ति पर ज़ोर देना है। पिछले कुछ वर्षों में देश में मुसलमानों की राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर बार-बार सवाल उठाए गए हैं-राजनीतिक, सामाजिक और मीडिया स्तर पर।

वतन से मोहब्बत के माध्यम से MRM यह संदेश देना चाहता है कि भारतीय मुसलमान देशभक्त हैं और उनकी पहचान राष्ट्रविरोध नहीं] बल्कि राष्ट्रनिर्माण से जुड़ी होनी चाहिए। यह महासम्मेलन मुसलमानों की पहचान को सकारात्मक राष्ट्र निर्माण से जोड़ता है जोकि एक सकारात्मक कदम है।

मुस्लिम समाज की आंतरिक विविधताः एकजुटता की चुनौती

भारतीय मुस्लिम समाज केवल एकरूपी नहीं है। इसमें सुन्नी शिया सूफी बोहरा देवबंदी बरेलवी आदि अनेक संप्रदाय हैं। साथ ही सामाजिक दृष्टिकोण से भी यह समुदाय विविधताओं से भरा है-शहरी और ग्रामीण] शिक्षित और अल्पशिक्षित संपन्न और वंचित। महासम्मेलन की कोशिश है कि यह विविधता मंच पर भी झलके। यह अधिवेशन समाज के सभी संप्रदायों का समान रूप से प्रतिनिधित्व भी कर रहा है विशेषकर महिलाओं और युवाओं का] तो यह समाज के भीतर आंतरिक संवाद और सहयोग को बढ़ावा देगा।

27 सितंबर 2025 का यह अधिवेशन सिर्फ एक दिन का कार्यक्रम नहीं बल्कि एक सोच की शुरुआत हो सकता है। भारत जैसे विविध देश में हर समुदाय की भागीदारी ज़रूरी है। मुसलमानों को यह सोचना होगा कि अब समय आ गया है सिर्फ प्रतिक्रिया देने का नहीं बल्कि पहल करने का।

यह महासम्मेलन एक मंच हो सकता है आत्म-निर्माण का जहाँ मुसलमान अपने भविष्य को स्वयं आकार देने की दिशा में पहला कदम उठाएं- एक ऐसे भविष्य की ओर जहाँ वे गर्व से कह सकेंः

हम भारतीय हैं-मुसलमान भी राष्ट्रभक्त भी और विकास के सहभागी भी।

भारत की मूल्यहीन, अव्यवस्थित प्रगति में अनुशासनहीनता का तड़का

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भारत में अब भोर चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं, बल्कि अव्यवस्था के बेसुरे शोर से शुरू होती है। सड़क पर भोंपुओं, का कोलाहल, दफ्तर में देर से खिसकती फाइलें, स्कूलों में गायब अध्यापक और संसद में माइक टूटने की मारकाट—हर जगह अनुशासन की कमी का भूत साया डाले खड़ा है। यह कोई बिखरे हुए दृश्य नहीं, बल्कि एक सम्पूर्ण राष्ट्रीय चरित्र बन चुका है, जहां नियम कागज पर मरते हैं और “चलता है” का मंत्र हर गली-कूचे में गूंज रहा है। सवाल है—क्या यह अराजकता भारत के सपनों को निगल जाएगी, या कभी दिशा मिलेगी?
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क्लास शुरू हो चुकी थी, लेकिन मास्टर साहब गायब थे। आधे घंटे तक उनका इंतजार चलता रहा। फिर वही हंगामा: चॉक हवा में तीर की तरह चल रहे थे, पेपर रॉकेट दीवारों से टकरा रहे थे, लड़कियां सहमकर चीख रही थीं और लड़के पकड़े जाने पर खिलखिला रहे थे। हेड मास्टर जब डांटते हुए पहुंचे तो कुछ देर को सन्नाटा छा गया, मगर उनके जाते ही शोरगुल लौट आया। आखिर में आचार्यजी आए, हाजिरी ली और निकल लिए। यह दृश्य किसी अपवाद का नमूना नहीं, बल्कि हिंदुस्तान के सरकारी स्कूलों की रोजमर्रा की सच्चाई है।

अगर इसे बढ़ाकर सरकारी दफ्तरों तक ले जाएं, तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। दफ्तर भले ही दस बजे खुलते हों, काम ग्यारह बजे शुरू हो जाए तो उसे उपलब्धि माना जाता है। कर्नाटक का उदाहरण तो दिलचस्प है, जहां ग्यारह बजे ‘केला ब्रेक’ जैसी परंपरा बनी हुई है। पूरे देश का माहौल शासन और व्यवस्था के विपरीत, अव्यवस्था और ढीलेपन में सांस लेता है। जानकार साफ कहते हैं कि भारत की सबसे बड़ी समस्या गरीबी या बेरोजगारी नहीं, बल्कि अनुशासनहीनता है—जो हर क्षेत्र में जड़ तक समाई हुई है।

रिटायर्ड टीचर मीरा जी कहती हैं, “सड़कें हों, अस्पताल हों, अदालतें हों या फिर लोकतंत्र का गर्व मानी जाने वाली संसद—किसी जगह अनुशासन की झलक नहीं मिलती। कतारें टूटती हैं, नियम केवल कागज पर लिखे रहते हैं, समय की कीमत को शून्य मान लिया गया है। यह “कुछ भी चलेगा” वाला रवैया केवल आदतन आलस्य नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच का प्रतीक है जिसमें व्यक्तिगत उल्लंघन को सामान्य बना दिया गया है। यहां शॉर्टकट की पूजा होती है और सामूहिक भलाई को हमेशा निजी लाभ के नीचे दबा दिया जाता है।”

भारत की सड़कों पर नज़र डाल लीजिए। ट्रैफिक नियम केवल साइनेज पर दर्ज रहते हैं, व्यवहार में नहीं। लेन बदलना एक सहज कला है, लाल बत्ती तोड़ना किसी खेल की तरह लिया जाता है। कुछ सेकंड बचाने के लिए ड्राइवरों की यह अव्यवस्थित भागदौड़ अक्सर जाम और हादसों में बदल जाती है। यह स्वार्थ पैदल यात्रियों तक फैला है, जो बेखौफ सड़क पार करते हैं, और उन वाहनों तक जो सिग्नल के नियमों को चुटकियों में तोड़ देते हैं। यही नहीं, रेलवे स्टेशन और सरकारी दफ्तरों पर कतारें भी हमेशा टूटती दिखाई देती हैं। लोग धक्का देकर आगे निकलते हैं, रिश्वत देकर अपना काम पहले करवाते हैं और थोड़े से अधिकार या ताकत के बल पर वीआईपी कल्चर का सहारा लेते हैं।

लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था संसद का नजारा भी अनुशासनहीनता का सबसे बड़ा प्रतीक है। वह जगह, जहां साफ-सुथरी बहस और तार्किक तर्कों से जनहित के फैसले होने चाहिए, अक्सर अखाड़े में बदल जाती है। गाली-गलौज, माइक तोड़ना, कुर्सियां खींचना और बिलों पर हाथापाई, ये सब किसी लोकतंत्र का गौरव नहीं बल्कि उसकी विडंबना बन चुके हैं, ये कहना है पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी का।

“लेट-लतीफ” का मुहावरा केवल मजाक नहीं, बल्कि भारतीय रोज़मर्रा की मानसिकता है। यहां देरी पर किसी प्रकार का अपराधबोध नहीं होता। काम समय पर न करना और वादों का पूरा न होना सार्वजनिक जीवन की पहचान बन गया है। यही ढीलापन सामूहिक समय की भारी बर्बादी का कारण है। जब इस संस्कृति पर भ्रष्टाचार का तड़का लगता है, तो स्थिति और भी बदतर हो जाती है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्टें बार-बार साबित करती हैं कि पुलिस से लेकर न्यायपालिका तक रिश्वत आम है, और शॉर्टकट को ही नियम बना लिया गया है।

कुछ वर्ष पूर्व मुझे जापान जाने का मौका मिला। स्कूल्स और दफ्तरों को विजिट करने के बाद अनुभव हुआ कि जापान अनुशासन और समर्पण का जीवंत उदाहरण है। वहां बच्चों को प्राथमिक विद्यालय से ही जिम्मेदारी और अनुशासन का महत्व सिखाया जाता है। छोटे-छोटे काम जैसे—कक्षा की सफाई, साझा कामों में सहभागिता और दूसरों की भलाई के लिए त्याग—यह सब उनकी शिक्षा का हिस्सा है। यही संस्कार “राष्ट्र पहले” की भावना पैदा करते हैं। जापानी समाज में अनुशासन केवल पालन करने का नियम नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन का नैतिक कर्तव्य है। यही कारण है कि उनकी शिनकानसेन ट्रेनें कभी एक मिनट भी लेट नहीं होतीं। यही कारण है कि परमाणु हमले के खंडहरों से निकलकर जापान आर्थिक महाशक्ति बन सका।

भारत और जापान के बीच यह तुलना दर्दनाक है। भारत की संभावनाएं अनुशासनहीनता और अव्यवस्था से दब गई हैं जबकि जापान ने वही अनुशासन टिकाऊ विकास की इंजन बना लिया है। सवाल यह है कि क्या भारत कभी इस दिशा में गंभीरता से बढ़ेगा?

भारत के पास संसाधन हैं, प्रतिभा है और अवसरों की कमी नहीं है। कमी है तो केवल अनुशासन की। यही हमारी प्रगति की सबसे बड़ी बाधा है और सबसे बड़ा उपाय भी। अगर भारत ने जापान और सिंगापुर जैसे मॉडलों से सीखा, और नियमों को अपवाद नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा बना लिया, तो राह बदलेगी।

पर्यावरण संरक्षण के लिये आयुर्वेद

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धीप्रज्ञ द्विवेदी

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जहाँ स्वास्थ्य और प्रकृति के बीच का संतुलन बिगड़ रहा है, वहीं आयुर्वेद हमें एक नया रास्ता दिखाता है। यह सिर्फ एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है जो हमें प्रकृति से जुड़ना सिखाती है।
आयुर्वेद मानता है कि हमारा शरीर, मन और आत्मा, ये तीनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और प्रकृति का ही हिस्सा हैं। जब तक ये तीनों संतुलित रहते हैं, हम स्वस्थ रहते हैं। इसीलिए, यह सिर्फ बीमारियों का इलाज नहीं करता, बल्कि हमें यह भी सिखाता है कि हम कैसे अपनी जीवनशैली, खान-पान और दिनचर्या को बेहतर बनाकर बीमारियों से दूर रह सकते हैं। आयुर्वेद की सबसे खास बात यह है कि यह हर व्यक्ति को अलग मानता है। यह समझता है कि हर किसी का शरीर अलग होता है, इसलिए हर किसी के लिए स्वस्थ रहने के नियम भी अलग होते हैं। इस तरह, आयुर्वेद हमें केवल शरीर से ही नहीं, बल्कि मन से भी स्वस्थ रहने की शिक्षा देता है। यह हमें प्रकृति के साथ कदम मिलाकर चलने और एक खुशहाल, संतुलित और सुरक्षित जीवन जीने का तरीका सिखाता है।आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार का विज्ञान नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की वह पद्धति है जो प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करती है। यही कारण है कि आज जब स्वास्थ्य संकट और पर्यावरण असंतुलन दोनों ही बड़ी चुनौतियों के रूप में सामने हैं, तब आयुर्वेद की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हो उठती हैं।

आयुर्वेद स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों की रक्षा के लिए विज्ञान और दर्शन का अद्वितीय संगम है। यह हमें सिखाता है कि स्वस्थ शरीर तभी संभव है जब हम प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन जिएँ। आज की बदलती जीवनशैली और प्रदूषण-युक्त वातावरण में, आयुर्वेद के सिद्धांतों को अपनाना न केवल हमारे व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए, बल्कि संपूर्ण पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की रक्षा के लिए भी आवश्यक है।

आज की दुनिया में पर्यावरण संकट सबसे गंभीर चिंताओं में से एक है। बढ़ते प्रदूषण, अव्यवस्थित जीवनशैली और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने न केवल प्रकृति की पवित्रता को नुकसान पहुँचाया है बल्कि मानव स्वास्थ्य को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। ऐसे समय में आयुर्वेद, जो प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने की कला और विज्ञान है, हमें एक नया दृष्टिकोण प्रदान करता है। आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति ही नहीं, बल्कि जीवनदर्शन है, जिसमें स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण दोनों की समग्र समझ निहित है।

आयुर्वेद और पर्यावरण का अंतःसंबंध

आयुर्वेद का मूल दर्शन ‘पंचमहाभूत’ की प्राचीन अवधारणा पर आधारित है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – इन पाँच तत्वों से ही न केवल संपूर्ण ब्रह्मांड बल्कि मानव शरीर की भी रचना हुई है। इस गहन समझ के कारण, आयुर्वेद मानता है कि मनुष्य का स्वास्थ्य सीधे तौर पर बाहरी पर्यावरण के संतुलन से जुड़ा हुआ है। जब प्रकृति के इन तत्वों में असंतुलन आता है, तो इसका सीधा प्रभाव हमारे शरीर के भीतर भी दिखाई देता है।

यह अंतर्संबंध आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गया है, जब पर्यावरण प्रदूषण अपने चरम पर है। उदाहरण के लिए:

जल प्रदूषण: जब जल का तत्व प्रदूषित होता है, तो यह जलजनित रोगों जैसे टाइफाइड और हैजा का कारण बनता है। आयुर्वेद में जल को जीवन का आधार माना गया है और दूषित जल से शरीर के भीतरी दोषों (वात, पित्त, कफ) में असंतुलन पैदा होता है।

वायु प्रदूषण: दूषित वायु सीधे हमारे फेफड़ों और हृदय को प्रभावित करती है, जिससे श्वसन संबंधी बीमारियाँ जैसे अस्थमा और दिल की समस्याएँ बढ़ती हैं। वायु को प्राण का स्रोत माना गया है, और जब यह प्रदूषित होती है, तो शरीर की ऊर्जा प्रणाली बाधित होती है।

भूमि क्षरण: रसायनों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भूमि की उर्वरता और शुद्धता नष्ट हो जाती है, जिससे उपजाऊ मिट्टी के अभाव में उगाया गया भोजन विषैला हो जाता है। यह भोजन हमारे शरीर को पोषण देने की बजाय, धीमा जहर बन जाता है।

आयुर्वेद का सबसे क्रांतिकारी विचार यही है कि प्रकृति और मनुष्य में कोई विभाजन नहीं है। हम प्रकृति का ही एक सूक्ष्म रूप हैं। इस एकीकृत दृष्टिकोण के आधार पर ही हम पर्यावरण के संरक्षण और शुद्धिकरण के लिए प्रभावी आयुर्वेदिक उपाय अपना सकते हैं। यह हमें केवल एक स्वस्थ जीवन जीने का मार्ग नहीं दिखाता, बल्कि हमें यह भी सिखाता है कि हमारे ग्रह को कैसे बचाना है। यह दर्शन हमें याद दिलाता है कि हमारा स्वास्थ्य और हमारे ग्रह का स्वास्थ्य एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।

औषधीय पौधों का महत्व

आयुर्वेद औषधियों का निर्माण वनस्पतियों और प्राकृतिक खनिजों से करता है।

यदि औषधीय पौधों के संरक्षण और संवर्धन पर बल दिया जाए, तो यह न केवल स्वास्थ्य के लिए औषधियाँ प्रदान करेगा बल्कि पर्यावरण में हरियाली और ऑक्सीजन संतुलन भी बनाएगा।

तुलसी, नीम, अश्वगंधा, आंवला, गिलोय जैसे पौधे प्रदूषण को शुद्ध करने के साथ-साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ाते हैं।

नगर व ग्रामीण क्षेत्रों में औषधीय उद्यान विकसित करने से जैव विविधता का संरक्षण संभव है।

इस प्रकार औषधीय पौधों की खेती पर्यावरण संतुलन और स्वास्थ्य दोनों का सेतु बन सकती है।

पर्यावरण-मित्र जीवनशैली

आयुर्वेद स्वास्थ्य के लिए “दिनचर्या” और “ऋतुचर्या” का महत्व बताता है। यह केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को ही नहीं, बल्कि सामूहिक पर्यावरण संरक्षण को भी प्रभावित करता है।

प्लास्टिक और कृत्रिम पदार्थों के प्रयोग से बचकर मिट्टी और धातु के बर्तनों का उपयोग पर्यावरण के लिए बेहतर है।

स्थानीय और मौसमी आहार ग्रहण करने से न केवल शारीरिक संतुलन बना रहता है बल्कि परिवहन और संरक्षण में ऊर्जा की बर्बादी भी कम होती है।

पंचकर्म जैसी आयुर्वेदिक परंपराएँ शरीर को शुद्ध करती हैं, तो पर्यावरणीय संदर्भ में “शुद्धिकरण” की यही अवधारणा घर और समाज में प्राकृतिक सफाई पद्धतियों को बढ़ावा देती है।

रसायन-मुक्त कृषि और स्वास्थ्य

आयुर्वेद का एक मूलभूत सिद्धांत है: भोजन ही औषधि है। यह मानता है कि हम जो खाते हैं, वह सीधे तौर पर हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। हालाँकि, आज के समय में रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से हमारा भोजन धीरे-धीरे जहरीला होता जा रहा है।

ऐसे में, यदि हम आयुर्वेदिक सिद्धांतों पर आधारित जैविक खेती को अपनाएँ, तो यह न केवल हमारे भोजन को शुद्ध करेगा, बल्कि पर्यावरण को भी रसायन-मुक्त बनाएगा। जैविक खेती मिट्टी, जल और वायु की गुणवत्ता को सुधारने में मदद करती है।

इस पद्धति में, गोबर, गोमूत्र और वनस्पति-आधारित उर्वरकों व कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। ये प्राकृतिक तत्व मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाते हैं और फसलों को बिना किसी नुकसान के कीटों से बचाते हैं।

इस तरह, कृषि में आयुर्वेदिक दृष्टिकोण अपनाना पर्यावरण की रक्षा और टिकाऊ विकास की दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। यह हमें एक स्वस्थ, प्राकृतिक और सुरक्षित जीवन जीने का रास्ता दिखाता है।

औषध निर्माण और पर्यावरणीय दृष्टिकोण

आज की दुनिया में, जहाँ आधुनिक फार्मा उद्योग अपनी दक्षता के लिए जाना जाता है, वहीं इसके पीछे का एक स्याह पहलू भी है: पर्यावरण प्रदूषण। इन उद्योगों से निकलने वाला रासायनिक कचरा (chemical waste) नदियों, मिट्टी और हवा को दूषित कर रहा है, जो न केवल प्राकृतिक जीवन बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी एक गंभीर खतरा है।

इसके बिल्कुल विपरीत, सदियों पुरानी भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद एक ऐसा मार्ग दिखाती है जो स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों का ख्याल रखता है। आयुर्वेद में औषधियों का निर्माण प्रकृति से प्राप्त वनस्पतियों, खनिजों, धातुओं और पशु-उत्पादों से होता है। यह प्रक्रिया केवल उपचार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण-अनुकूलता (eco-friendliness) को भी प्राथमिकता देती है।

आयुर्वेदिक औषधियों का निर्माण ‘जीरो वेस्ट’ के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि निर्माण प्रक्रिया में कोई हानिकारक रासायनिक कचरा उत्पन्न नहीं होता। उदाहरण के लिए, जड़ी-बूटियों का जो हिस्सा औषधि के लिए उपयोग नहीं होता, उसे खाद के रूप में या अन्य प्राकृतिक तरीकों से फिर से उपयोग में लाया जा सकता है।

इसके अलावा, आयुर्वेदिक ग्रंथों में सतत विकास के सिद्धांतों का भी वर्णन है। इसमें बताया गया है कि वनस्पतियों को किस समय और किस तरह से इकट्ठा करना चाहिए ताकि उनकी संख्या पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े। जड़ी-बूटियों को हमेशा उचित मात्रा में और सही मौसम में ही संकलित करने की सलाह दी जाती है, जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहे।

इस तरह, आयुर्वेद का औषध-निर्माण मॉडल एक आदर्श उदाहरण पेश करता है, जहाँ स्वास्थ्य और पर्यावरण एक दूसरे के पूरक हैं। यह हमें सिखाता है कि हम अपने उपचार के लिए प्रकृति का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन इस तरह से कि हम उसे कोई नुकसान न पहुँचाएँ। यह केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि एक समग्र जीवन शैली (holistic lifestyle) है जो हमें प्रकृति से जोड़ती है और हमें भविष्य के लिए एक स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण देने की प्रेरणा देती है।

रोग निवारण और पर्यावरण

आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों का मुख्य ध्यान अक्सर बीमारी होने के बाद उसके उपचार पर होता है। इसके विपरीत, आयुर्वेद एक ऐसा विज्ञान है जो रोगों की रोकथाम को सबसे अधिक प्राथमिकता देता है। यह मानता है कि एक स्वस्थ जीवनशैली और प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर हम बीमारियों से बच सकते हैं। यह दृष्टिकोण न केवल हमारे शरीर को स्वस्थ रखता है, बल्कि पर्यावरण को भी हानि नहीं पहुँचाता।

आज, जब वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं, तब श्वसन रोग (जैसे अस्थमा), त्वचा संबंधी समस्याएँ और मानसिक तनाव जैसी बीमारियाँ आम हो गई हैं। आयुर्वेद हमें इन समस्याओं से निपटने के लिए प्रकृति के सरल और प्रभावी उपाय सुझाता है। तुलसी, नीम और पिप्पली जैसी जड़ी-बूटियाँ, जिनका जिक्र आपने किया, आयुर्वेद में रोगों से बचाव के लिए सदियों से उपयोग हो रही हैं। इन्हें दैनिक जीवन में शामिल करना एक पर्यावरण-अनुकूल तरीका है, क्योंकि ये रासायनिक दवाओं की तरह कोई साइड-इफेक्ट नहीं छोड़तीं और न ही इनके उत्पादन में पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है।

इसके अलावा, आयुर्वेद केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं है। यह मानता है कि मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। योग और प्राणायाम इस पद्धति के अभिन्न अंग हैं। ये अभ्यास शरीर और मन को शांत और संतुलित रखते हैं। सबसे खास बात यह है कि योग और प्राणायाम करने के लिए न तो किसी विशेष संसाधन की आवश्यकता होती है और न ही ये किसी भी प्रकार का प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। ये हमें हमारे भीतर की शक्ति को पहचानने और तनाव को दूर करने में मदद करते हैं, जिससे हमारा समग्र स्वास्थ्य बेहतर होता है।

इस प्रकार, आयुर्वेद हमें सिखाता है कि हम कैसे अपनी जीवनशैली में बदलाव लाकर, प्राकृतिक संसाधनों का सदुपयोग करके और मानसिक संतुलन बनाकर बीमारियों से दूर रह सकते हैं। यह एक ऐसा मॉडल है जो व्यक्तिगत स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्थिरता दोनों को एक साथ बढ़ावा देता है, जिससे एक स्वस्थ और स्थायी भविष्य का निर्माण हो सके।

शहरी और ग्रामीण स्तर पर अनुप्रयोग

पर्यावरण सुधार हेतु आयुर्वेद का प्रयोग व्यक्तिगत जीवन तक सीमित न रखकर, सामुदायिक स्तर पर भी किया जा सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में पंचवटी परंपरा (पाँच पवित्र वृक्षों का रोपण) को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

शहरी क्षेत्रों में छतों व उद्यानों में औषधीय पौधों की खेती अपनाई जा सकती है।

विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में आयुर्वेदिक जीवनशैली और पौधा-संरक्षण को स्वच्छ भारत अभियान से जोड़ा जा सकता है।

आयुर्वेद और जलवायु परिवर्तन

आज जब जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, तब आयुर्वेद हमें एक नया और प्रभावी रास्ता दिखाता है। यह सिर्फ एक चिकित्सा पद्धति नहीं है, बल्कि एक ऐसा दर्शन है जो प्राकृतिक संसाधनों के संयमित उपयोग और संरक्षण पर ज़ोर देता है।

आयुर्वेद के अनुसार, हमारा स्वास्थ्य प्रकृति के संतुलन से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि यह पद्धति औषधीय जंगलों के विस्तार को बढ़ावा देती है। ये जंगल कार्बन सिंक के रूप में काम करते हैं, जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसों को सोखकर ग्रीनहाउस प्रभाव को कम करने में मदद करते हैं।

इसके अलावा, वर्षा जल संरक्षण, प्राकृतिक खाद का उपयोग और वनस्पति संवर्धन जैसे उपाय सीधे तौर पर आयुर्वेदिक जीवनशैली से जुड़े हैं। ये पारंपरिक पद्धतियाँ न केवल पर्यावरण को बचाती हैं, बल्कि टिकाऊ विकास को भी बढ़ावा देती हैं।

आयुर्वेद हमें लो-कार्बन जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करता है। इसमें संतुलित और सादा आहार, सरल जीवन और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहना शामिल है। इस तरह, आयुर्वेद हमें सिखाता है कि हम कैसे अपनी जीवनशैली में बदलाव लाकर जलवायु परिवर्तन से लड़ सकते हैं और एक स्वस्थ, हरित भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।

हम कह सकते हैं कि आयुर्वेद का लक्ष्य केवल रोगों का उपचार करना नहीं है, बल्कि जीवन को संतुलित, स्वस्थ और प्रकृति-संगत बनाना है। यदि हम आयुर्वेद को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँ तो—

भोजन रसायन-मुक्त और पौष्टिक होगा।

पर्यावरण हरित और स्वस्थ होगा।

औषधियों का संग्रह और उपयोग टिकाऊ पद्धति से होगा।

व्यक्तिगत स्वास्थ्य और सामुदायिक कल्याण दोनों सुनिश्चित होंगे।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि आयुर्वेद पर्यावरण सुधार का मार्गदर्शक दर्शन है। आधुनिक समय की चुनौतियों का समाधान तभी संभव है, जब हम प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संतुलित प्रयोग करें। आयुर्वेद हमें यही शिक्षा देता है कि मनुष्य और प्रकृति का संतुलित सह-अस्तित्व ही पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों की कुंजी है।

(लेखक पर्यावरण में स्नातकोत्तर हैं, पर्यावरण विषयों के जानकार हैं और प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए पर्यावरण पढ़ाते हैं। साथ ही साथ पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर कई सारे आलेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। स्वस्थ भारत न्यास के संस्थापक ट्रस्टी हैं। शोध पत्रिका सभ्यता संवाद के कार्यकारी संपादक हैं।)

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