दो हजार सैनिकों की टुकड़ी बनाई : मुक्ति के लिये अंग्रेजी सेना से गुरिल्ला युद्ध किया

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अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 की सशस्त्र क्रान्ति के बारे सब जानते हैं। निसंदेह वह एक संगठित अभियान था । पर इससे पहले भी स्थानीय स्तर पर अनेक सशस्त्र संघर्ष हुये हैं। इससे पहले ऐसा ही एक सशस्त्र आन्ध्र प्रदेश में हुआ था जिसके नायक थे नरसिंह रेड्डी। क्रांति से अंग्रेजी सेना में अधिकारी रहे थे । उनकी कमान में दो हजार सैनिक थे । लेकिन जब अंग्रेजों ने किसानों से जबरन बसूली आरंभ की तब उन्होंने विद्रोह कर दिया और अंग्रेजों से तीन किले छीनकर स्वतंत्र ध्वज फहरा दिया था ।

ऐसे सशस्त्र क्रांति के नायक उय्यालवड़ा नरसिंह रेड्डी का जन्म आन्ध्रप्रदेश के कुर्नूल जिला अंतर्गत उय्यालवड़ा मे 24 नवंबर 1806 को हुआ था । उय्यालवड़ा उनका जन्म स्थान था । इसलिये अपने नाम के आगे वे सदैव उय्यलावड़ा लगाते थे ।

उनके परिवार की पृष्ठभूमि कृषि और सेना की रही थी । उनके पूर्वज पहले कृषि करते थे । समय के साथ परिवार की शिक्षा बढ़ी और दादा जयारामी रेड्डी एवं पिता उय्यलावडा पेडडामल्ला रेड्डी भी सेना में रहे थे । परिवार की सैन्य पृष्ठभूमि के कारण नरसिम्हा रेड्डी को सेना में उच्चपद मिला । उन्हें कदपा, अनंतपुर, बेल्लारी और कुर्नूल जैसे 66 गांवों में अंग्रेजी शासन का वर्चस्व बनाने की कमान सौंपी गई। और उनकी सैन्य टुकड़ी को धन संग्रह का लक्ष्य देकर बल पूर्वक बसूली का काम सौंपा गया । नरसिम्हा रेड्डी जी कृषकों से कर तो बसूलना चाहते थे । लेकिन बल पूर्वक नहीं। विशेषकर उन किसानों को राहत देना चाहते थे जिनकी फसल खराब हो गई। उन्होंने अपने उच्च अधिकारियों के सामने अपना पक्ष रखा पर बात न बनी । अंततः उन्होंने अपनी कमान के सैनिकों से विद्रोह का आव्हान किया । जो सहमत हो गये और 10 जून 1846 को उनकी कमान में एक सशस्त्र टुकड़ी ने कोइलकुंटला में खजाने पर हमला किया, खजाना लूटा और सूखा पीड़ित किसानों में धन बाँट दिया । उसके बाद वे कंबम की ओर रवाना हुये जहाँ अंग्रेज अधिकारी को मारकर वह क्षेत्र को अंग्रेजों से मुक्त घोषित कर दिया । इस घटना को अंग्रेज सरकार ने गंभीरता से लिया और कैप्टन नॉट और कैप्टन वॉटसन की कमान में दो सैन्य टुकड़ियाँ नरसिम्हा रेड्डी को पकड़ने के लिये भेजी । लेकिन सफलता नहीं मिली । सैन्य संचालन में दक्ष नरसिम्हा रेड्डी ने छापामार शैली अपनाई । वे अंग्रेज कैंप पर हमला करते और भाग जाते । उनकी इस छापामार शैली से आतंकित अंग्रेज सरकार ने उनपर नरसिम्हा रेड्डी की सूचना देने वाले को 5000 रुपये और सिर लाकर देने वाले को दस हजार रुपये का ईनाम देने की घोषणा की । ईनाम की इस राशि से ही यह अनुमान सहज लगाया जा सकता है कि क्राँतिकारी नरसिम्हा रेड्डी का अंग्रेजों पर कितना भय होगा । पर अपने ऊपर ईनाम और अंग्रेजों की किसी कार्यवाही की बिना परवाह किये नरसिम्हा रेड्डी ने 23 जुलाई 1846 को गिद्दलूर में सेना के कैंप पर आक्रमण कर दिया । यह हमला इतना प्रबल था कि अंग्रेज सेना को कैंप छोड़कर भागना पड़ा । नरसिम्हा रेड्डी को यहाँ भारी मात्रा में हथियार और धन मिला । इससे उन्होने अपनी टुकड़ी में सैनिकों की संख्या बढ़ाकर तीन हजार कर कर ली ।

जब उन्हें पकड़ने के लिये अंग्रेज सरकार के सभी प्रयास विफल हो गये तब अंग्रेजी सेना ने इनके पूरे परिवार और अनेक रिश्तेदारों को भी बंदी बना लिया । जब यह सूचना क्राँतिकारी नरसिम्हा रेड्डी को मिली तब नल्लामला वन क्षेत्र में थे । उन्होंने सेना के कैंप पर हमला करके परिवार जनों को मुक्त करने की योजना बनाई और नल्लामला वन क्षेत्र से कोइलकुंतला क्षेत्र आए । इसके समीप ही रामबाधुनीपल्ले गांव में सैन्य छावनी थी जहाँ उनका परिवार बंदी था । नरसिम्हा रेड्डी ने इस गाँव के पास जगन्नाथ कोंडा गांव में अपनी एक टोली तैनात की और समय की प्रतिक्षा करने लगे । संभवतः यह अंग्रेजों की ही कूटनीति थी । उनका कोई भेदिया क्राँतिकारी नरसिम्हा रेड्डी की टोली में होगा । चूँकि जगन्नाथ कोंडा गाँव के आसपास सेना ने अपनी जमावट कर रखी थी ।

अंग्रेज सेना ने रातों रात वह क्षेत्र घेरा और 6 अक्टूबर 1846 की रात में सोते समय उन्हें बन्दी बना लिया गया। उनके साथ अमानुषिक व्यवहार हुआ । अनेक प्रकार की शारीरिक यातनाएँ दीं गई। फिर जंजीरों में बाँधकर पूरे क्षेत्र में घुमाया गया । चौराहो पर खड़ा करके सबके सामने यातनाएँ दी जाती । अंग्रेज इन्हे प्रताड़ित करके अपना भय बनाना चाहते थे ताकि उस क्षेत्र में फिर कभी कोई विद्रोह का साहस न कर सके ।

उनके साथ कुल 901 लोग बंदी बनाये गये थे । प्रताड़नाओं से कुछ लोग टूटे उन्होने वफादारी की सौगंध खाई ऐसे 412 लोगों को मुक्त दिया गया । अन्य को अलग-अलग दंड मिला । कुछ को अंडमान जेल में भेजा गया और कुछ अन्य जेलों में भेजे गये । यह सब कार्रवाई लगभग साढ़े तीन महीने चली । अंत में क्राँतिकारी नरसिम्हा रेड्डी को कुर्नूल जिला अंतर्गत जुर्रेती कोइलकुंटला में भारी भीड़ के सामने फांसी दी गई। वह 22 फ़रवरी 1847 का दिन था ।

वे भले दुनियाँ से चले गये । पर उस पूरे क्षेत्र में उनकी स्मृति एक लोक नायक के रूप में है ।

उच्च शिक्षा सुधार: कुलपति चयन में पारदर्शिता से खत्म होगा ‘शिक्षा माफिया’

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भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग लंबे समय से हो रही थी। मोदी सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के हालिया सुधार इस दिशा में अहम कदम साबित हो सकते हैं। हालांकि, कुछ राज्यों में इन सुधारों का विरोध हो रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि ये बदलाव शिक्षा माफिया के प्रभाव को खत्म करने और विश्वविद्यालयों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाने में मदद करेंगे।

पिछले कुछ दशकों में भारत में कुलपतियों (Vice Chancellors) की नियुक्ति में राजनीतिक दखल एक गंभीर समस्या रही है। अखिल भारतीय सर्वेक्षण ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2022 के अनुसार, भारत में 1,100 से अधिक विश्वविद्यालय हैं, लेकिन इनकी शैक्षणिक गुणवत्ता में भारी असमानता है। 70% से अधिक विश्वविद्यालयों में कुलपति चयन में राजनीतिक सिफारिशों की भूमिका अहम रही है। योग्यता के बजाय प्रभावशाली रिश्तों को प्राथमिकता देने से अकादमिक उत्कृष्टता पर असर पड़ा है। अनुपयुक्त नेतृत्व के कारण कई विश्वविद्यालय शोध और नवाचार के मामले में वैश्विक स्तर पर पिछड़ गए हैं।
UGC ने हाल ही में कुलपति चयन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और योग्यता-आधारित बनाने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अब कुलपतियों का चयन एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति करेगी, जिसमें प्रतिष्ठित शिक्षाविद, प्रशासक और उद्योग विशेषज्ञ शामिल होंगे। शैक्षणिक उपलब्धियों, नेतृत्व क्षमता और प्रशासनिक अनुभव को प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे योग्य और दूरदर्शी नेतृत्व उभरकर सामने आएगा।

चयन प्रक्रिया को पारदर्शी और सार्वजनिक बनाया जाएगा, जिससे किसी भी प्रकार की पक्षपातपूर्ण नियुक्तियों पर रोक लगेगी।

UGC ने उच्च शिक्षा को अधिक समावेशी और व्यवहारिक रूप से प्रभावी बनाने के लिए कई अन्य सुधार भी किए हैं:
संकाय भर्ती में महिलाओं, हाशिए के समुदायों और विकलांग व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। उद्योग और प्रशासन के पेशेवरों को शिक्षण और विश्वविद्यालय प्रशासन में शामिल करने से छात्रों को व्यवहारिक ज्ञान मिलेगा।

प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन और शिक्षकों की एक राष्ट्रीय रजिस्ट्री से शिक्षण की गुणवत्ता में सुधार होगा। विश्वविद्यालयों को अधिक स्वायत्तता दी गई है, जिससे वे स्थानीय जरूरतों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप नीतियां बना सकें।

शिक्षाविद प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं, “आज के वैश्विक परिदृश्य में उच्च शिक्षा केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित नहीं रह सकती। भारत में 80% से अधिक स्नातक रोजगार के लिए जरूरी कौशल से वंचित होते हैं (India Skills Report 2023)। विश्वविद्यालयों को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो उद्योगों के साथ मजबूत साझेदारी बना सके और छात्रों को बाजार की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षित कर सके।”

नए सुधारों के तहत विश्वविद्यालयों को अनुसंधान और नवाचार के लिए अधिक स्वतंत्रता दी जा रही है, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें।
कुछ राज्य सरकारें इन सुधारों को अपनी स्वायत्तता पर हमला मान रही हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि ये बदलाव शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त निहित स्वार्थों को खत्म करने और गुणवत्ता सुधारने के लिए आवश्यक हैं।

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली अब भी औपनिवेशिक युग की रटंत-आधारित प्रणाली पर टिकी हुई है, जो 21वीं सदी की जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है। NEP और UGC के ये सुधार एक आधुनिक, समावेशी और नवाचार-आधारित शिक्षा प्रणाली की नींव रखते हैं।

समय आ गया है कि हम इन सुधारों को खुले दिल से अपनाएं। राजनीतिक हस्तक्षेप और शिक्षा माफिया के प्रभाव को खत्म कर, विश्वविद्यालयों को नवाचार और सामाजिक परिवर्तन के केंद्रों में बदलने की जरूरत है। इससे भारत वैश्विक उच्च शिक्षा परिदृश्य में अपनी जगह मजबूत कर सकेगा और भविष्य के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी कार्यबल तैयार कर पाएगा।

महाकुंभ के बहाने सनातन के अपमान की पराकाष्ठा

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प्रयागराज में दिव्य- भव्य महाकुंभ के आयोजन की तैयारियों के समय से ही इंडी गठबंधन के सभी दलों के नेता किसी न किसी बहाने इसकी आलोचना कर रहे थे किन्तु इसके सफलतापूर्वक संचालित होते हुए देखने के बाद तो वो इसको विफल करने के लिए तरह तरह के प्रयास कर रहे हैं और अपने वक्तव्यों से महाकुम्भ मेले की आड़ में सनातन धर्म और हिन्दू आस्था का निरंतर अपमान कर रहे हैं।

खडगे के क्या कुम्भ में नहाने से गरीबी दूर होगी, से शुरू हुआ ये अपमान अब महाकुम्भ को मृत्यु कुम्भ कहने तक जा पंहुचा है। बिहार के चारा घोटाले के मुख्य आरोपी न्यायपालिका की दया से जमानत पर बाहर घूम रहे बिहार के पूर्व मुख्यमं.त्री लालू प्रसाद यादव ने महाकुंभ को फालतू का कुंभ कहा और फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सभी सीमाओं को पार करते हुए महाकुंभ को मृत्युकुंभ कह डाला जिससे संपूर्ण हिंदू समाज आक्रोशित है।
मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति में अंधे हो चुके इन सभी दलों के नेताओं को यह महाकुंभ इसलिए रास नहीं आ रहा है क्योंकि यह अब तक का सर्वाधिक सफल महाकुंभ बनने जा रहा है। इस महाकुंभ से सनातन हिंदू समाज की एकता का जो ज्वार उभरा है उससे मुस्लिम परस्त दलों को अपना भविष्य अंधकारमय दिख रहा है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिस प्रकार से महाकुंभ को मृत्युंकुभ कहा है उससे यह साफ प्रतीत हो रहा है कि उन्हें अब 2026 में राज्य के विधानसभा चुनावों में संभावित हिन्दू एकता से भय लगने लगा है।

इंडी गठबंधन के कई दलों के प्रमुख नेता जहाँ महाकुंभ की आलोचना कर रहे हैं वहीं उन्हीं दलों के बहुत से नेता वीवीआईपी टीट्रमेंट के साथ गंगा नदी में पुण्य की डुबकी लगा रहे हैं। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, डी.के. शिवकुमार, अजय राय, सचिन पायलट यह सभी माँ गंगा में डुबकी लगा चुके हैं ।
यूपी में समाजवादी पार्टी ने तो महाकुंभ के खिलाफ एक नियमित अभियान ही चला दिया है। सपा के प्रवक्ता टीवी चैनलों पर कह रहे है कि हम विरोधी दल हैं हमारा तो काम ही सरकार से व्यवस्थाओं पर सवाल करना है । तो सरकार पर सवाल करो ना, सनातन पर क्यों कर रहे हो? सपा के सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी महाकुंभ के खिलाफ खूब दुष्प्रचार किया जा रहा है। महाकुंभ -2025 पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के लिए सपा सांसद अफजाल अंसारी पर मुकदमा तक दर्ज हुआ है क्योंकि उन्होंने कहा था कि संगम पर भीड़ देखकर लगता है कि स्वर्ग हाउसफुल हो जायगा।

उत्तर प्रदेश विधान सभा सत्र में बोलते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महाकुंभ को फालतू कुंभ और मृत्यु कुंभ बताने वालों को सटीक और कड़ा जवाब दिया। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में कहा कि सनातन का आयोजन भव्यता से करना अगर अपराध है तो ये अपराध मेरी सरकार ने किया है आगे भी करेगी। मुख्यमंत्री ने अपने बयान में सपा पर हमलावार होते हुए कहाकि सोशल मीडिया हैंडल देखें तो वहां की भाषा उनके संस्कारों को प्रदर्शित करती है यह भाषा किसी सभ्य समाज की नहीं हो सकती। ये लोग अकबर का किला जानते थे लेकिन अक्षयवट और सरस्वती कूप नहीं जानते थे, ये इनके सामान्य ज्ञान का स्तर है। मुख्यमंत्री ने कहा इतने बड़े सनातन धर्म के आयोजन में कोई भूखा नहीं रहा, महाकुंभ में जो आया वो भूखा नहीं गया।

मुख्यमंत्री ने संगम जल की गुणवत्ता पर उठाये जा रहे सभी सवालों का जवाब देते हुए कहाकि संगम का पानी न केवल नहाने के लिए अपितु आचमन के लिए भी उपयुक्त हैं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि संगम व महाकुंभ को बदनाम करने के लिए लगातार झूठा अभियान चलाया जा रहा है।मुख्यमंत्री ने कहा कि संगम और उसके आसपास के सभी पाइप और नलों को टेप कर दिया गया है और पानी को शुद्ध करने के बाद ही छोड़ा जा रहा है। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पानी की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए लगातार निगरानी कर रहा है। आज की रिपोर्ट के अनुसार संगम के पास बीओडी की मात्रा 3 से कम है और घुलित ऑक्सीजन 8-9 के आसपास है। इसका तात्पर्य यह है कि संगम का पानी न केवल नहाने के लिए अपितु आचमन के लिए भी उपयुक्त है।

हिंदू विरोधी इंडी गठबंधन के नेताओं की हिंदू आस्था पर आघात करने की आदत बन चुकी है। यह सभी दल हीन भावना से ग्रसित हो चुके हैं इन्हें हिंदू समाज का उत्थान, हिंदू समाज का वैभव पसंद नहीं आ रहा है, जाग्रत, एकता से युक्त, एकरस हिंदू समाज इनको पसंद नही आ रहा है इन सभी दलों को मां गंगा की अविरल धारा में अपनी राजनीति समाप्त होती नजर आ रहा है जिस कारण यह सभी एक स्वर में महाकुंभ को मृत्युकुंभ बताने लग गये हैं।

वास्तविकता यह है कि समरसता के इस समागम में सनातन संस्कृति साकार हो रही है आम हिंदू जन पहली डुबकी शुचिता की, दूसरी भक्ति की और तीसरी ज्ञान की लगा रहे हैं। यह महाकुंभ- 2025 और संगम एकता ,प्रेम, त्याग तपस्या का प्रतीक बन चुका है। यह महाकुंभ श्रद्धा और विश्वास का समागम बन चुका है।आज संपूर्ण वैश्विक जगत महाकुंभ 2025 के आयोजन को अद्वितीय, अकल्पनीय बताकर व्यवस्थाओं की सराहना कर रहा है। महाकुंभ में सनातन की हर धारा दृश्यमान है।

महाकुंभ की यात्रा अंतर्मन की यात्रा है और यहां पर आने वाला हर श्रद्धालु निष्कपट भाव से एकरस होकर एक विचार के साथ पवित्र संगम की डुबकी लगाने के लिए आ रहा है और विरोधी दलों के नेता उन सभी श्रद्धालुओं की सेवा और सत्कार करने के बजाय उन सभी की आस्था का घोर अपमान कर रहे है। दूर दराज से आ रहे श्रद्धालुओं के चेहरे पर कोई शिकन नहीं है अपितु उनके मन में एक संकल्प है ओैर वह अपने संकल्प की सिद्धि के लिए पूर्ण अनुशासन, धैर्य , संयम के साथ आगे बढ़ते जाते हैं।

स्वतंत्रता के बाद समाज-संस्कृति प्रतिष्ठा का संघर्ष..

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भाई उद्धवदास जी मेहता देश के उन विरले स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में एक हैं जो दस वर्ष की बालवय में स्वाधीनता संघर्ष केलिये सामने आये और पन्द्रह वर्ष की आयु में बंदी बनाये गये । उनका सारा जीवन समाज, संस्कृति और राष्ट्र की सेवा और संघर्ष में बीता ।

स्वाधीनता के पूर्व जहाँ उनकी जेल यात्राएँ मानों घर आँगन हो गयीं थीं तो स्वाधीनता के बाद उनका जीवन समाज के संगठन, और संस्कृति की प्रतिष्ठापना के लिये समर्पित रहा । वे अपने जीवन में 1926 से 1949 के बीच कुल नौ बार गिरफ्तार हुये, कम आयु के कारण दो बार जंगल में छोड़ा गया और सात बार जेल भेजा गया । स्थानीय प्रशासन उनसे कितना रुष्ट था इस बात का अनुमान केवल इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उन्हें उनकी बेटी के विवाह में कन्यादान करने केलिये पेरोल भी न मिला था वे हथकड़ी और बेड़ी में लाये गये और उसी अवस्था में भाई जी ने अपनी बेटी का कन्यादान किया । स्वाधीनता की अग्नि को प्रज्जवलित रखना उन्हें विरासत में मिला था । राष्ट्र की सेवा में उनकी अनेक पीढ़ियों का बलिदान हुआ था । संस्कृत और आयुर्वेद के विद्वान उनके दादा टीकाराम जी ने 1857 की क्राँति का अलख जगाने के लिये पूरे मालवा क्षेत्र में गाँव गाँव की यात्रा की थी । उसी संदर्भ यह परिवार भोपाल आया और यहीं 9 अगस्त 1911 को भाई उद्धवदास जी मेहता का जन्म हुआ । पिता बूलचंद जी भी आयुर्वेद चिकित्सक और संस्कृत के आचार्य थे । माता गेंदा बाई भी संस्कृतविद् और आयुर्वेद की जानकार थीं । जब भाई जी केवल सात वर्ष के थे तब 1918 में पिता का निधन हो गया । परिवार संचालन का दायित्व माता के कंधे पर आया उन्होंने अपने पति का औषधालय स्थावत रखा और बालक उद्धव दास को बालवय में ही परिपक्वता का बोध होने लगा ।

भोपाल में तब का सामाजिक वातावरण तब दोहरे दबाव का था । भोपाल राज्य की जनता नबाब के आधीन थी और नबाब अंग्रेजों का । भोपाल रियासत इस्लाम केलिये बहुत कट्टर थी । अंग्रेजों का पोलिटिकल एजेन्ट सीहोर में रहता था । नबाब के माध्यम से अंग्रेजों के जुल्म से त्रस्त थी जनता । लेकिन गैर इस्लामिक समिज पर नबाब और उसके कारिन्दों का अतिरिक्त दबाव था । जिन दिनों भाई जी होश संभाल रहे थे उन दिनों देश के बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि अनेक स्थानो में स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ने लगा था । महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से लौटकर स्वाधीनता के लिए अहिसंक आँदोलन का सूत्रपात कर चुके थे । गाँधी जी के अहिंसक आंदोलन का प्रभाव भोपाल में भी आया । यहाँ उस समय की पीढ़ी सक्रिय हो गयी थी, लेकिन खुलकर सामने आने में संकोच हो रहा था । फिर भी सीहोर रायसेन आदि क्षेत्रों में प्रभात फेरियाँ निकलने लगी थीं लेकिन भोपाल नगर में दबाब अधिक था । भोपाल में आर्यसमाज अस्तित्व में आ गई थी । जो सामाजिक जाग्रति और सांस्कृतिक मूल्यों के लिये काम कर रही थी । तब एक योजना बनी कि बच्चों की प्रभात फेरी निकाली जाये । यह काम बालक उद्धव दास मेहता को सौंपा गया । सब लोगों ने माता गेंदाबाई से बात की फिर बालक उद्धव दास मेहता को समझाया । यह बात 1921 की है । तब भाई उद्धवदास जी मेहता मात्र दस वर्ष के थे और छठवीं कक्षा के विद्यार्थी । कक्षा और विद्यालय के सभी विद्यार्थियों को निकाल कर प्रभात फेरी निकालने की योजना बनी । भाई उद्धवदास जी मेहता ने यह काम बड़ी खूबी से किया । उनकी पहल पर विद्यालय के अधिकांश विद्यार्थी सम्मिलित हुये । यह समाचार आग की भाँति पूरे क्षेत्र में फैला और सूचना गाँधी जी को भी भेजी गयी । इससे परिवार पर बहुत दबाब बना । परिवार को धमकियाँ मिलने लगीं । प्रशासन और नबाब समर्थकों की नजर में बालक उद्धव खटकने लगा । माता को चिंता हुईं । जैसे तैसे छठवीं कक्षा उत्तीर्ण की और माता ने पढ़ने के लिये बनारस भेज दिया । वे बनारस में चार वर्ष रहे । इन चार वर्षों में जहाँ उन्होंने संस्कृत के आचार्य और आयुर्वेद आचार्य दोनों परीक्षा उत्तीर्ण की नहीं की अपितु राष्ट्रभाव से संबंधित पाठ भी वहीं पढ़े । वे अवकाश के दिनों में चार साल बाद 1926 में भोपाल लौटे । इसी वर्ष उनका विवाह शकुन्तला देवी से हुआ । शकुन्तला देवी के पिता पं हजारीलाल जी मेहता भी संस्कृत और आयुर्वेद की पृष्ठभूमि के थे । यह संस्कार शकुन्तला देवी में भी थे । इस कारण भाई जी को पूरा सहयोग मिला और समाज सेवा के लिये वे अपना समय निकाल सके । जिन दिनों भाई जी बनारस में थे उन चार वर्षों में भोपाल के वातावरण में बड़ा परिवर्तन आया । भोपाल नबाब ने अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति पर अमल करते हुये हिन्दु और मुसलमानों को लड़ाना आरंभ कर दिया । कुछ लोगों को बाहर से लाकर बसाया जाने लगा तथा गुंडागर्दी के नाम पर कुछ लोगों को छूट दी गयी । इसके मुकावले के लिये भाईजी ने नौजवानों की एक टोली तैयार की जो इस तरह के असमाजिक तत्वों से सामना कर सके । इस टोली ने 1926 भोपाल स्टेशन पहुँच कर ट्रेन में गाँधी जी एक पत्र दिया जिसमें भोपाल के हालात का वर्णन था । गाँधी जी की सलाह पर भाई जी के नेतृत्व नौजवानों ने एक ज्ञापन उस समय के अपराध नियंत्रक मोहम्मद अली को सौंपा । मोहम्मद अली ने बात सुनने और समझने की बजाय गिरफ्तार करने के आदेश दे दिये । पाँच नौजवान पकड़े गये । दो दिन कैद में भूखा रखा और फिर जंगल में छोड़ दिया गया । यह भाई जी की पहली गिरफ्तारी थी तब उनकी आयु केवल पन्द्रह वर्ष थी । घटना से माताजी चिंतित हुईं और उन्होंने अवकाश के दिन शेष रहने के बाद भी वापस बनारस भेज दिया । इस बार भाईजी ने अपनी पढ़ाई के साथ मन स्वाधीनता संघर्ष का संकल्प लिया और ऐसा साहित्य संकलन आरंभ किया जिससे उनकी संकल्पशक्ति और सशक्त बने । इनमें स्वामी दयानंद, विवेकानंद, तिलकजी, सावरकर जी और मदनमोहन मालवीय जैसे महामनाओं साहित्य था । इस साहित्य से जहाँ उन्हें संकल्प शक्ति मिली वहीं गाँधी जी का अहिंसा पर अडिग रहकर काम करने का मार्ग अपनाया । भाई जी ने भोपाल में घटी घटनाओं का विवरण तैयार किया और पत्र भेजकर काँग्रेस आर्य समाज तथा अन्य प्रमुख लोगों को अवगत कराया । एक वर्ष पश्चात 1927 में अवकाश के दिनों में पुनः भोपाल आये । अपनी इस यात्रा में भोपाल के उन पीड़ितों से मिले जिन्हें नबाब के धार्मिक कानून के बहाने असामाजिक तत्व उत्पीड़ित किया करते थे । भाई जी ने इस कानून का विवरण और पीड़ितों के नाम गाँधी जी को भेजे । 1928 में वे तीसरी बार अवकाश पर भोपाल आये और आर्यसमाज के सहयोग से उन पाँच स्त्रियों का शुद्धिकरण किया जिनका अपहरण और बलात्कार हुआ था । इस घटना के कारण वे पुनः गिरफ्तार कर लिये उनके आचरण को धर्म विरोधी माना गया । तथा ईशनिंदा कानून की धारा लगी । उनके साथ गिरफ्तार होने वालों में मास्टर लाल सिंह, शिवनारायण जी वैद्य, विट्ठल दास, मूलचंद ललवानी, भाऊलाल, भगवान दीन, राजेन्द्र वर्मा आदि कुल बारह लोग थे । भाई जी को आयु का लाभ मिला उन्हे छोड़ दिया गया अन्य सभी छै माह बाद ही जेल से छूट सके । 1929 में गाँधी जी की भोपाल यात्रा हुई । बेनजीर मैदान में सभा हुई और वे लोगों से भी मिले । भाई उद्धवदास जी मेहता सहित एक प्रतिनिधि मंडल ने गाँधी जी से भेंट की और उस ईशनिंदा कानून से अवगत कराया जिसके बहाने भोपाल में गैर मुस्लिम समाज पर अत्यचार होने लगे थे । गाँधी जी सहमत हुये उन्होंने भोपाल नबाब को समझाया और लेख भी लिखा । गाँधी जी सलाह पर नबाब ने वह कानून बदला । इस तरह भाई उद्धवदास जी मेहता की रणनीति और संघर्ष के चलते नबाब को ईशनिंदा कानून बदलना पड़ा ।

1931 में भाई जी अपनी पढ़ाई पूरी करके बनारस से भोपाल में लौटे । उन्होंने अपने पूर्वजों की विरासत अपना औषधालय तो संभाला ही साथ ही सामाजिक जाग्रति अभियान भी छेड़ दिया । उन्होंने शिवनारायण जी वैद्य के साथ मिलकर एक संस्था हिन्दु सेवा संघ का गठन किया और एक सामाजिक समरसता सम्मेलन आयोजित किया जिसमें सभी वर्गों, उपवर्गो और जातियों के प्रतिनिधियों को बुलाया । और हर मोहल्ले में व्यायाम शालाएँ स्थापित करने का अभियान छेड़ा ताकि असामाजिक तत्वों के हमलों पर स्वयं की सुरक्षा की जा सके । इसी वर्ष भाई जी और कुछ अनय प्रमुख जनों ने मुम्बई जाकर सावरकर जी भेंट की और भोपाल लौटकर हिन्दु महासभा की इकाई का गठन किया, जिसके मंत्री भाई उद्धवदास जी मेहता बने ।

1932 में भाई जी ने मंदिर कमाली परिसर में हनुमान व्यायाम शाला आरंभ की । एक वर्ष के भीतर चार व्यायाम शालाओ की शुरुआत हो गयी, मंदिर कमाली के अतिरिक्त एक व्यायाम शाला बड़बाले महादेव मंदिर, एक लखेरापुरा और एक भोईपुरा में आरंभ हुई । तभी 1934 बीच सड़क से एक महिला के अपहरण और बलात्कार की घटना घटी । भाई जी ने सभाएं कीं आंदोलन शुरु किया । भाई जी सहित सभी व्यायाम शाला संचालक बंदी बना लिये गये । व्यायाम शालाएँ बंद हो गयीं । रिहाई 15 दिन बाद हो सकी । रिहाई के बाद भाई जी ने तीन काम किये । एक तो पुनः व्यायाम शालायें आरंभ करवाई और दूसरा समाचार पत्र प्रकाशन आरंभ किया । जिसका नाम “प्रजा पुकार” था । भाई जी इसके प्रकाशक बने । इस समाचार पत्र में अंग्रेजों और नबाब शासन के अत्यचारो का समाचार छपते । तीसरा काम एक विशाल हिन्दू सम्मेलन आरंभ किया । वस्तुतः भाईजी की नीति या आंदोलन का रास्ता साम्प्रदायिक नहीं था लेकिन वे भोपाल शासक और अंग्रेजों के समान धार्भिक आधार पर भेदभाव बंद करने और सभी नागरिकों को समान अधिकार के लिये संघर्ष कर रहे थे । भाई जी पुनः गिरफ्तार हुये और इस बार उन्हें जेल से छूटने में तीन माह लगे । 1936 में प्रजा पुकार में छपे एक समाचार के कारण पुनः गिरफ्तार हुये, इस बार सात दिन बाद जमानत पर रिहा हो सके । 1937 में सभी नागरिकों को समान अधिकार के लिये आंदोलन किया बंदी बनाये गये । इस बार जेल से बाहर आने में छै माह लगे । इस आँदोलन में पुलिस प्रताड़ना के चलते एक आँदोलन कारी भगवान दास राठी का जेल में ही निधन हो गया ।
1937 में सामाजिक जागरण के लिये सार्वजनिक रूप से गणपति उत्सव मनाने का निर्णय हुआ लेकिन अनुमति न मिली । तब प्रतीक के तौर पर पीपल चौक में भाई जी ने एक निजी दुकान लेकर गणपति जी की स्थापना की । जिसमें भजन कीर्तन पर तो पावंदी रही पर दर्शन खुले में होते । फिर 1938 में सार्वजनिक रूप से रंगपंचमी बनाने की तैयारी की गयी । भाई जी पुनः गिरफ्तार हुये और एक माह बाद रिहा हो सके ।

1940 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की गई और भाईउद्धवदास जी मेहता नगर संघचालक बने । 1942 में गांधी जी के अव्हान पर सीहोर जाकर अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन का संयोजन किया । इस आँदोलन में सभी राजनैतिक दलों, मत मतान्तरो के लोग समम्लित हुये । गिरफ्तार किये गये । 1946 में मुस्लिम लीग के डायरेक्ट एक्शन में हिन्दु समाज को हुये नुक्सान का व्यौरा तैयार किया और सरदार वल्लभभाई पटेल को सौंपा । इसका विवरण पं जवाहरलाल नेहरु को भी दिया । भाई जी की मुलाकात नेहरु जी न हो सकी विवरण ज्ञापन उनके सचिव को सौंपा । 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ पर भोपाल नबाब ने न केवल भोपाल को स्वतंत्र करने से इंकार कर दिया बल्कि भोपाल रियासत को पाकिस्तान में मिलाने की खुली घोषणा कर दी । भाई उद्धवदास जी मेहता ने इसके विरुद्ध सीहोर में एक बड़ी बैठक का आयोजन किया । बैठक गौरीशंकर जी समाधिया के निवास पर हुई । संघर्ष के लिये बनी सर्वदलीय समिति के संयोजक भाई उद्धवदास जी मेहता बनाये गये । 1948 में गाँधी जी की हत्या हुई । नबाब को बहाना मिला । फरवरी 1948 में पूरी रियासत में हिन्दु महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संघ से संबंधित लोगों की सामूहिक गिरफ्तारी हुई । इससे विलीनीकरण आँदोलन में गतिरोध आया । भाई जी रिहाई छै माह बाद रिहा हो सके । रिहाई के बाद भोपाल रियासत को भारतीय गणतंत्र में विलीन करने के आँदोलन में पुनः जुट गये ।भाईजी ने अनशन किया । इस अनशन से चेतना जाग्रत हुई और पूरी रियासत में विलीनीकरण आंदोलन पुनः तीव्र हुआ । अंततः जून 1949 में भोपाल रियासत भारतीय गणतंत्र में विलीन हुई तब भाई जी ने पहली बार हिन्दु उत्सव समिति को व्यवस्थित रूप देकर पीपल के नीचे गणेशोत्सव मनाने की परंपरा आरंभ की । और इसी वर्ष सार्वजनिक दशहरा उत्सव को भव्यता मिली ।

1956 में मध्यप्रदेश का गठन हुआ तब भोपाल को राजधानी बनाने के लिए भाई जी ने अनशन किया और भाई जी के आग्रह पर डा शंकरदयाल शर्मा ने एक प्रतिनिधि मंडल के साथ नेहरूजी से भेंट की और भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी बना । 1962 में चीन आक्रमण के समय सामाजिक जाग्रति के लिये सर्वदलीय समिति बनी जिसके संयोजक भाई उद्धवदास जी मेहता बनाये गये । इस समिति में काँग्रेस जनसंघ, हिन्दु महासभा आदि सभी राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि थे । 1965 में पाकिस्तानी आक्रमण के समय भी पुनः सर्वदलीय समिति बनीं जिसके संयोजक भाई उद्धवदास जी मेहता ही बने । 1967 में भाईजी हिन्दु महासभा छोड़कर भारतीय जनसंघ के सदस्य बने । श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भोपाल आकर भाई जी को जनसंघ की सदस्यता दिलाई थी । 1972 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में उनका सम्मान किया । 1973 में महंगाई विरोधी आँदोलन के लिये गठित सर्वदलीय समिति के संयोजक भी भाई उद्धवदास बने । 1975 में आपातकाल लागू हुआ और भाई जी गिरफ्तार कर लिये गये । उन दिनों उनका स्वास्थ्य खराब था । उनकी गिरफ्तारी का समाचार मुख्यमंत्री प्रकाश चंद सेठी जी को मिला तो उन्होनें तुरन्त रिहा करने के आदेश दिये । भाईजी को गले के कैंसर ने जकड़ लिया था । जिस प्रकार उनका जीवन कभी जेल, तो कभी घर में बीता वैसे ही उनके जीवन का अंतिम समय कभी अस्पताल तो कभी घर में बीता । 1983 के बाद स्वास्थ्य में भारी गिरावट आई । उनका अधिकांश समय विस्तर पर बीता । उन दिनों उनसे मिलने आने वालों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक बाला साहब देवरस जी, डा शंकरदयाल शर्मा, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, बद्रिकाश्रम के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी आदि प्रमुख थे । और 20 फरवरी 1986 को उन्होने संसार से विदा ली ।

भोपाल में भाई उद्धवदास मेहता अकेले ऐसे समाज सेवी थे जिनका आदर राजनैतिक सीमाओं से ऊपर था । हर छोटी बड़ी सामाजिक समस्या पर सभी प्रमुख लोग उन्ही से संपर्क रखते थे । और उनकी राय अंतिम हुआ करती थी ।

ऐसे महान समाज सेवी और स्वाधीनता संग्राम सेनानी भाई जी साहब को शत शत नमन्।

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