निर्मला सीतारमण जी के नाम खुला पत्र

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विषय: टैक्स ऑडिट रिपोर्ट (Form 3CA/3CB-3CD) की अंतिम तिथि में विस्तार हेतु विनम्र निवेदन।

दिल्ली । सविनय निवेदन है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए टैक्स ऑडिट रिपोर्ट की अंतिम तिथि 30 सितंबर 2025 को बढ़ाया जाए। इस वर्ष अनेक अपरिहार्य परिस्थितियों के चलते करदाता, MSME व्यवसायी एवं हम चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के समक्ष कई व्यावहारिक एवं तकनीकी बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं, जिनके चलते समय पर और गुणवत्तापूर्ण अनुपालन कर पाना अत्यंत कठिन हो गया है।

तिथि विस्तार की आवश्यकता के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

अनेक राज्यों में बाढ़ और भारी वर्षा के कारण व्यापारिक गतिविधियां एवं दस्तावेज़ी कामकाज प्रभावित हुआ है।

ITR फॉर्म में बार-बार संशोधन होने से रिटर्न और टैक्स ऑडिट के बीच का समय अत्यधिक सीमित (केवल 12 कार्य दिवस) रह गया है।

त्योहारों का मौसम (विशेषकर दुर्गा पूजा, गणेश चतुर्थी, नवरात्रि) कार्य दिवसों को और सीमित कर रहा है।

Trusts के पंजीकरण/रिन्यूअल की अंतिम तिथि भी 30 सितंबर ही है, जिससे प्रोफेशनल्स पर अतिरिक्त कार्यभार पड़ा है।

Income Tax Portal की तकनीकी समस्याएं जैसे – लॉगआउट, OTP में देरी, डेटा सेव नहीं होना, Upload Error इत्यादि अब तक बनी हुई हैं।

GST 2.0 लागू होने के कारण व्यापारी वर्ग और पेशेवर दोनों उसमें व्यस्त हैं – यह सरकार की सराहनीय पहल है, परन्तु अनुपालन में समय लगता है।

Tax Audit की प्रक्रिया अत्यंत विस्तृत और जटिल है, जिसमें 40+ रिपोर्टिंग पॉइंट्स, GST-TDS-PF-ESI-MSME जैसे कई नियमों का समन्वय आवश्यक होता है।

COVID-19 के बाद बने हालात, स्टाफ की कमी, और अकाउंटिंग के डिजिटल ट्रांजिशन के चलते छोटे व्यापारी अभी भी पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए हैं।

कर पेशेवरों पर कार्यभार अत्यधिक है – सप्ताहांत की छुट्टियाँ नहीं, 12-14 घंटे कार्य, जिससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर हो रहा है।

नॉन-ऑडिट ITR की डेडलाइन पहले ही बढ़ा दी गई थी – ऐसे में टैक्स ऑडिट के लिए भी समान न्यायसंगत व्यवहार अपेक्षित है।

महोदया,

यह केवल एक तारीख बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह “प्राकृतिक न्याय” और “गुणवत्तापूर्ण अनुपालन” सुनिश्चित करने का विषय है।

हम चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, व्यवसायियों और करदाताओं की ओर से निवेदन करते हैं कि टैक्स ऑडिट की अंतिम तिथि में कम से कम एक महीने का विस्तार प्रदान किया जाए, ताकि पारंपरिक दो महीने का समय अंतराल फिर से स्थापित हो और सभी संबंधित पक्ष बिना त्रुटि एवं दबाव के अनुपालन कर सकें।

आपसे विनम्र निवेदन है कि इस विषय पर शीघ्र, सहानुभूतिपूर्वक विचार कर आवश्यक निर्णय लिया जाए।

सादर,
सी.ए. हर्ष मिश्रा
(एक जिम्मेदार कर पेशेवर की हैसियत से)

आलंद सीट कांग्रेस के खाते में, राहुल बतायें..क्या वोट चोरी से जीते: अनुराग सिंह ठाकुर

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दिल्ली: पूर्व केंद्रीय मंत्री,भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व सांसद श्री अनुराग ठाकुर ने आज गुरुवार को नई दिल्ली स्थित भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में एक महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता को संबोधित किया और राहुल गाँधी के झूठे दावों की एक-एक करके सच्चाई उजागर करते हुए राहुल गाँधी और कांग्रेस पार्टी पर करारा हमला बोला। प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने राहुल गांधी द्वारा चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोपों को झूठा बताते हुए कहा कि राफेल से लेकर ‘चौकीदार चोर है’ तक और सावरकर से लेकर आरएसएस से जुड़े मुद्दे तक हर बार राहुल गांधी को कोर्ट से फटकार मिली है और उन्हें कई बार माफी मांगनी पड़ी। कीचड़ उछाल कर भाग जाने वाला राहुल गांधी का ‘हिट एंड रन’ वाला रवैया आज की भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी दिखाई दिया।

श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि एक नेता जिनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी लगभग 90 चुनाव हारी, उनकी हताशा और निराशा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। चुनावी हार और जनता से नकारे जाने के बावजूद, उन्होंने आरोपों की राजनीति को अपना आभूषण बना लिया है, लेकिन जब उनके लगाए गए आरोपों को प्रमाणित करने के लिए कहा जाता है, तो वे पीठ दिखाकर भाग जाते हैं। शपथपत्र देने के लिए कहा जाए, तो वे मुकर जाते हैं। गलत और निराधार आरोप लगाना राहुल गांधी की आदत बन चुकी है। यह उनके लिए एक ऐसा व्यवहार बन गया है जिसमें वे बार-बार गलत और बेसलेस आरोप लगाते हैं, बाद में माफी मांगते हैं और कोर्ट से फटकार खाते हैं। चाहे राफेल का मामला हो, ‘चौकीदार चोर है’ का आरोप हो, या सावरकर जी या आरएसएस से जुड़ा मुद्दा हो या पेगासस के मामले, हर बार राहुल गांधी को कोर्ट से फटकार मिली है। कई बार उन्हें माफी मांगनी पड़ी और वे कीचड़ उछालने के बाद भाग खड़े हुए। यह ‘हिट एंड रन’ वाला रवैया आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी दिखाई दिया। हाइड्रोजन बम फोड़ने का दावा फुलझड़ी निकला और वह भी फुस्स साबित हुआ।

वरिष्ठ भाजपा सांसद ने कहा कि चुनाव आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी वोट को ऑनलाइन किसी भी आम नागरिक द्वारा हटाया या मिटाया नहीं जा सकता। किसी भी वोट को बिना प्रभावित व्यक्ति की बात सुने, हटाया या मिटाया नहीं जा सकता। 2023 में कुछ असफल प्रयास किए गए थे, जो विफल रहे। चुनाव आयोग ने ही इन मामलों की एफआईआर दर्ज करने और जांच कराने के निर्देश दिए थे। चुनाव आयोग ने पहले ही मोबाइल नंबर और आईपी एड्रेस उपलब्ध करवा दिए हैं। यदि ये सभी डेटा उपलब्ध हैं, तो कांग्रेस शासित राज्य कर्नाटक की सीआईडी ने अब तक क्या किया? रिकॉर्ड के अनुसार, आलंद विधानसभा क्षेत्र 2023 में कांग्रेस के ही उम्मीदवार ने 10,348 मतों से जीता था। तो क्या राहुल गांधी और कांग्रेस ने वोट चोरी करके जीत हासिल की थी?

श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि चुनाव दर चुनाव हार और जनता से नकार दिए जाने पर राहुल गांधी की हताशा, निराशा दिन पे दिन बढ़ती ही जा रही है। आरोपों की राजीनीति को राहुल गांधी ने अपना आभूषण बना लिया है और जब उनसे उन्हीं के लगाये आरोपों को authenticate करने को कहा जाता है तो पीठ दिखा कर भाग खड़े होते हैं। आज राहुल गांधी ने जो बातें कहीं, उसमें वे हाइड्रोजन बम खुद पर ही फोड़ बैठे और बोले कि मैं लोकतंत्र बचाने नहीं आ रहा हूँ। क्या वे लोकतंत्र को बर्बाद करने की तैयारी कर रहे हैं? गलत और निराधार आरोप लगाना, बार-बार संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाना, चुनाव आयोग पर आरोप लगाना, कभी ईवीएम पर, कभी वीवीपैट पर, कभी चुनाव नतीजों पर और कभी टूलकिट के सहारे, क्या यह भारत के लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति उनकी आदत बन गई है? आखिर कांग्रेस पार्टी क्या चाहती है?

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सत्ता और अफसरों का दुरुपयोग करके चुनाव में लाभ उठाया, लेकिन कोर्ट ने उन्हें सही रास्ता दिखाया। राजीव गांधी की हत्या के बाद लोकसभा चुनाव स्थगित नहीं हुआ। यदि चुनाव एक महीने के लिए स्थगित किया गया होता, तो उस समय के चुनाव आयोग ने किस पार्टी को लाभ पहुँचाया? रमा देवी जी, एम.एस. गिल, टी.एन. शाशन समेत अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति किस पार्टी ने की और बाद में वे किस दल में लौट गए? सभी कांग्रेस पार्टी में। राहुल गांधी का बार-बार प्रयास यही है कि भारत के निष्पक्ष चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रहार किया जाए और लोकतंत्र को कमजोर किया जाए। राहुल गाँधी लोगों को भ्रमित करने की कोशिश करते हैं, जैसे बांग्लादेश और नेपाल में स्थितियाँ बनी, वैसी स्थिति ये भारत में करना चाहते हैं लेकिन देश की जनता उनके भ्रमजाल में नहीं फंसने वाली। देश में हाल ही में एक और उदाहरण सामने आया है। कर्नाटक हाईकोर्ट ने मलूर विधानसभा के 2023 के चुनाव को खारिज किया, जो कांग्रेस ने वोटों के गबन के साथ जीता था। कोर्ट ने भाजपा उम्मीदवार मंजूनाथ गौड़ा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि मलूर विधानसभा में मतगणना के दौरान गंभीर अनियमितताएं हुईं। क्या कांग्रेस ने फेरबदल करके सीट जीती थी?

भाजपा सांसद ने कहा कि राहुल गांधी को जवाब देना ही होगा। उन्होंने कांग्रेस पार्टी और उस समय के चुनाव आयुक्तों का जिक्र करते हुए कहा कि जब नवीन चावला की नियुक्ति हुई, तो तत्कालीन चीफ इलेक्शन कमिश्नर ने आरोप लगाया और प्रेसिडेंट को लिखा कि चावला संवेदनशील और गोपनीय जानकारी लीक कर रहे हैं। सांसद ने सवाल उठाया कि जब राहुल गांधी ने बार-बार आरोप लगाए और कोर्ट गए, तो उन्हें बार-बार माफी मांगनी पड़ी और कोर्ट से फटकार भी मिली। क्या इसी डर से राहुल गांधी शपथपत्र नहीं दे रहे हैं? मीडिया द्वारा बार-बार पूछे जाने के बावजूद उन्होंने शपथपत्र क्यों नहीं दिया? वे आए तो धमाका करने, लेकिन केवल ड्रामा करके चले गए। अगर उनके तर्कों में दम होता, तो वे कोर्ट क्यों नहीं जाते? चुनाव आयोग ने बार-बार सबूत मांगे, लेकिन वे कोई प्रमाण नहीं दे पाए और लगातार गलत आरोप लगाते रहे। संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करना कांग्रेस पार्टी और विपक्षी नेता राहुल गांधी का बड़ा षड्यंत्र है। क्या यह केवल घुसपैठिये वोट को बचाने के लिए किया जा रहा है?

श्री अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि राहुल गांधी एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों की बात करते हैं, लेकिन उन्हीं के वोटों की ताकत को कम करने का प्रयास करते हैं। क्या घुसपैठियों के वोट को बचना ही कांग्रेस की राजनीति का मूल उद्देश्य है? क्या यही उनका और कांग्रेस पार्टी का असली एजेंडा है, घुसपैठियों की सुरक्षा करना और उनके वोटिंग अधिकार सुनिश्चित करना, जबकि देश के वास्तविक नागरिकों के वोटों की ताकत को कम करना। राहुल गांधी के बयानों ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि वे घुसपैठियों के साथ हैं और देश के एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों के वोटों को कमजोर करना चाहते हैं। जो आरोप राहुल गांधी ने लगाए, उन पर जवाब देना आवश्यक है। क्या 6,000 वोट डिलीट हुए भी थे या नहीं क्योंकि राहुल गाँधी ने प्रेस कांफ्रेंस में जो तीन नाम लिए, वे अभी भी वैध वोटर हैं, उनका वोटर लिस्ट से नाम काटा नहीं गया है। बी.आर. पाटिल जैसे कांग्रेस के विधायकों द्वारा जीती गई सीटों में क्या कांग्रेस ने वोट चोरी करके जीत हासिल की? राहुल गांधी को अराजकता फैलाना और लोकतंत्र के खिलाफ षड्यंत्र बंद करना चाहिए। उनकी राजनीति का मूल उद्देश्य केवल “विक्टिम कार्ड” बनाना और लोकतंत्र को कमजोर करना है।

भाजपा सांसद ने कहा कि राहुल गांधी शपथपत्र नहीं देते, सबूत नहीं पेश करते और केवल आरोप लगाते हैं। इसका मतलब है कि कांग्रेस का भारतीय लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं में विश्वास नहीं है। उनका मकसद केवल अराजकता फैलाना, अव्यवस्था पैदा करना और देश को अस्थिर करना है, और यह सब उन्होंने टूलकिट गैंग के माध्यम से किया। कांग्रेस चाहे जितना प्रयास करे, भारतीय जनता पार्टी भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने के हर कदम उठाएगी और घुसपैठियों को, जिनके वोट राहुल गांधी और कांग्रेस बचाना चाहते हैं, बेनकाब करने का काम करेगी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की घुसपैठियों को बचाने की राजनीति पहले ही बेनकाब हो चुकी है और आगे भी बेनकाब होती रहेगी।

मोदी का कार्यकाल और भारत की विदेश नीति

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-शंभू शिखर

दिल्ली : पिछले 11 वर्षों में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति इतनी मजबूत कर ली है कि उसे नज़र-अंदाज नहीं किया जा सकता। नरेंद्र मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्हें समझ पाना हर किसी के वश की बात नहीं है।वे कब राष्ट्रहित का कौन सा फैसला लेंगे, उनके करीबी लोग भी नहीं जान पाते। फौरी तौर पर उसमें जोखिम का आभास होता है लेकिन उसका फलाफल बाद में सामने आता है।मोदी सरकार की विदेश नीति की बात करें तो बहुत से लोग उसकी आलोचना करते हैं लेकिन उनकेआलोचक भी इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि 2014 के बाद विश्व पटल पर भारत की धमक बढ़ी है, वैश्विक मामलों में उसकी राय कहीं ज्यादा अहमियत रखती है।

अब वैश्विक स्थितियां बदल चुकी हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद शुरू हुआ शीतयुद्ध का दौर कबका समाप्त हो चुका है।अभी वैश्वीकरण का दौर चल रहा है। अमेरिका खुदाई फौजदार बनकर पूरी दुनिया को अपने इशारे पर नचाने का प्रयास कर रहा है। इस बदलती हुई विश्व व्यवस्था में भारत की गुट निरपेक्षता की नीति में बदलाव जरूरी हो गया था। मोदी सरकार ने उसे समय-काल-परिस्थिति के मुताबिक नए रूप में ढाला। उन्होंने ना काहू से दोस्ती ना काहू से वैर की नीति अपना रखी है। आज अमेरिका, रूस और चीन के बाद दुनिया की महाशक्तियों में भारत का शुमार होने लगा है। वह वैश्विक मामलों में एक निर्णायक ताकत बन चुका है।

मोदी जी दोस्ती और दुश्मनी में एक मर्यादा का ध्यान रखते हैं लेकिन किसी तरह का प्रतिबंध स्वीकार नहीं करते। चीन और पाकिस्तान भारत के पारंपरिक शत्रु माने जातेहैं लेकिन उनके साथ भी मोदी जी अपना व्यवहार भारतीय संस्कारों के अनुरूप ही रखते हैं। पाकिस्तान में कोई मानवीय संकट खड़ा होने पर मदद करने से भी पीछे नहीं हटते और उसके हुक्मरानों की उदंडता का भी कठोरता से माकूल जवाब देने में संकोच नहीं करते।

आज विदेश नीति की आलोचना खासतौर पर ट्रंप के भारी भरकम टैरिफ के कारण की जा रही है। जबकि स्वयं अमेरिका के अर्थशास्त्री, रक्षा विशेषज्ञ और वैश्विक मामलों के एक्सपर्ट ट्रंप को कोस रहे हैं। उनका स्पष्ट तौर पर कहना है कि दो दशकों की निरंतर कोशिशों के जरिए उन्होंने भारत को अपना मजबूत रणनीतिक साझेदार बनाने का जो प्रयास किया और सफलता पाई, ट्रंप ने अपनी सनक और मूर्खता से उसपर पानी फेर दिया है। ट्रंप की नीतियों के खिलाफ अमेरिका के आमजन भारी संख्या में सड़कों पर उतर चुके हैं। टैरिफ के कारण स्वयं अमेरिकी अर्थव्यवस्था डावांडोल हो रही है। कई ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हो चुका है। अगर ट्रंप के पागलपन पर अंकुश नहीं लगा तो अमेरिकाका आर्थिक और सामरिक दबदबा मिट्टी में मिल सकता है। अमेरिका की दो अदालतों ने ट्रंप की टैरिफ नीति को असंवैधानिक करार दिया है। अब अंतिम फैसला अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट का होना है। अगर वहां भी फैसला ट्रंप के खिलाफ आया तो न सिर्फ उनके द्वारा लगाए सारे टैरिफ रद्द हो जाएंगे बल्कि इस मद में वसूली गई सारी राशि वापस लौटानी होगी। ट्रंप स्वयं चौतरफा घिर चुके हैं।

नरेंद्र मोदी की सरकार इस बात को अच्छी तरह जानती है कि भारी-भरकम टैरिफ एक अस्थाई संकट है।कुछ ही समय में इसका निवारण हो जाना है। इसीलिए वे प्रतिकूल दिखती स्थिति को बड़ी होशियारी के साथअनुकूल बनाते जा रहे हैं। उन्होंने ट्रंप के खिलाफ न कोई अपशब्द कहे न अमेरिकी अवाम के खिलाफ कोई चुभने वाला बयान दिया।बस ट्रंप की सनक भरी दादागीरी के खिलाफ पूरी मजबूती से खड़े रहे। इसका असर यह हुआ कि अमेरिका में भारत के प्रति सहानुभूति की लहर दौड़ पड़ी। आम जनता और बौद्धिक जगत में भारत के प्रति समर्थन का भाव बढ़ा जबकि ट्रंप के प्रति आक्रोश उमड़ पड़ा। ट्रंप जो अमेरिका फर्स्ट का नारा उछाल कर वैश्विक नायक बनने चले थे, अपने घर में हीखलनायक बना दिए गए।

अमेरिकी लोग जानते हैं, और मोदी जी को भी पता है कि ट्रंप अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकाने के लिए अमेरिकी हितों की बलि चढ़ाने पर तुले हैं। लगातार संविधान का उल्लंघन कर रहे हैं। न अमेरिकी कांग्रेस की राय लेने की जरूरत समझ रहे हैं, न विशेषज्ञों की आशंकाओं को महत्व दे रहे हैं। उनकी खुन्नस मुख्य रूप से भारत, रूस और चीन जैसे ताकतवर देशों से रही है। खासतौर पर नरेंद्र मोदी से जो पिछले कार्यकाल में उनके सबसे करीबी दोस्त रहे थे। लेकिन दूसरे कार्यकाल के चुनाव के दौराम अमेरिका में मौजूद रहते हुए भी मिलने नहीं आए। जबकि ट्रंप चुनावी मंचोंपर सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा कर चुके थे। मोदी के इस व्यवहार से उनकी जगहंसाई हुई। चुनाव तो वे जीत गए लेकिन उनकी नाराजगी कायम रही।ट्रंप की यह खुन्नस उनके सपथ ग्रहण समारोह से ही दिखने लगी। उन्होंने उसमें नरेंद्र मोदी को आमंत्रित तक नहीं किया।मोदी के साथ उनकी दूसरी खुन्नस भारत-पाक के बीच युद्धविराम कराने का श्रेय नहीं लेने देने कारण थी। इससे शांति का नोबेल प्राइज पाने की उनकी प्रबल इच्छा पर तुषारपात हो गया,जबकि पाकिस्तान उनके लिए नोबेल प्राइज की अनुशंसा कर उन्हें लिखित रूप से श्रेय दे चुका था। मोदी जी से नाराजगी का तीसरा कारण रूस के साथ संबंधों में बढ़ती प्रगाढ़ता और प्रतिबंध के बावजूदउससे सस्ता तेल खरीदना था।

वे रूस-युक्रेन के बीच मध्यस्थता कर युद्ध समाप्त कराना और 21 वीं सदी का शांतिदूत बनना चाहते थे। लेकिन पुतिन जैसे मंझे हुए नेता के सामने उनकी एक न चली। पुतिन ने युद्धविराम के प्रस्ताव को स्वीकार तो किया लेकिन इसके लिए ऐसी शर्तें रख दीं कि युक्रेन ने उन्हें मानने से साफ मना कर दिया। इस युद्ध में ट्रंप कीदाल नहीं गलनी थी, नहीं गली। अब पूरी दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी हो चुकी है। अब ट्रंप की बात को कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है। न अमेरिका के अंदर, न उसके बाहर।

अब जबकि विश्व में युद्ध के कई मोर्चे खुल गए हैं और पूरा आसमान ड्रोन और मिसाइलों से भरता जा रहा है, मोदी जी कहते हैं कि यह युद्ध का नहीं बुद्ध का समय है। दिलचस्प बात यह है कि मोदी जी का संबंध सबके साथ मधुर बना हुआ है। रूस पारंपरिक मित्र है तो युक्रेन का भी भारत पर भरोसा है। इजराइल के साथ भी अच्छे संबंध हैं तो ईरान के साथ भी घनिष्टता है। निःसंदेह आने वाले समय में जब युद्ध समझौते होंगे तो उसमें सबसे बड़ी भूमिका भारत की होगी। सभी पक्ष उसकी बात मानेंगे।

बहरहाल, भारत से अपनी खुन्नस निकालने के लिए ट्रंप ने मनगढ़ंत आरोप लगाकर पहले 25 प्रतिशत, फिर अतिरिक्त 25 प्रतिशत, कुल 50 प्रतिशत टैरिफ मढ़ दिया। यह अपनी शर्तों पर ट्रेड डील पर सहमति बनाने के दबाव का हथियार था। ट्रंप की सनक रूस और चीन के सामने फीकी पड़ती जा रही है।उनसे सीधे पंगा लेने में वे बच रहे हैं। चीन से पंगा लेने में रेयर अर्थ मेटल की आपूर्ति बाधित होने का खतरा है। रूस की सामरिक शक्ति का अंदाजा लगाना मुश्किल है, इसलिए ट्रंप उनपर दबाव बनाने का साहस नहीं कर पा रहे हैं। ब्राजील और भारत पर उन्होंने 50 प्रतिशत का भारी टैरिफ लगाया है। लेकिन उनके सामने कोई भी झुकने को तैयार नहीं हो रहा है। दूसरी तरफ अमेरिकी बाजार में हाहाकार मचाहुआ है। कीमतें बढ़ती जा रही हैं।ट्रंप ने अपने मित्र देशों पर भी टैरिफ लगाया लेकिन उन्हें 10-15 प्रतिशत पर समेट लिया।फिर भी कई आवश्यक वस्तुएं हैं जिनकी आपूर्ति मित्र देशों से संभव नहीं हो पा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि टैरिफ की रकम अंततः अमेरिकी आयातकों और उपभोक्ताओं की जेब से ही जानी हैं। इस नीति से निर्यातक देशों के माल की मांग और खपत में कमी आ सकती है लेकिन उनके लिए वैकल्पिक बाजार भी मौजूद हैं जबकि अमेरिकी जनता की जरूरतों की आपूर्ति पर संकट बढ़ते जाने की आशंका है।

ट्रंप ने भारत पर कृषि व डेयरी उत्पाद, रक्षा सामग्री और तेल की अमेरिका से खरीद पर सहमति के साथ ट्रेड डील करने पर दबाव डाला तो मोदी जी ने इससेसाफ मना कर दिया, और भारतीय उत्पाद के लिए नए बाजारों की तलाश शुरू कर दी। इसमें खासी सफलता भी मिली। बहुत सारे देशों ने भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने में दिलचस्पी दिखाई। इससे टैरिफ का झटका लगने की जगह व्यापारिक सौदों के विस्तार का रास्ता खुला।

वैश्विक महाशक्तियों की बात करें तो रूस के साथ लंबे समय से भारत की मित्रता रही है। ब्रिक्स देशों का साझेदार होने के नाते चीन के साथ भी दोस्ती का हाथ बढ़ाने में समस्या नहीं थी। उत्तर कोरिया के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। खाड़ी देशों के साथ अच्छी साझेदारी रही है। मोदी जी ने अपने कूटनीतिक प्रयासों के जरिए अमेरिका के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन खड़ा कर लिया है।अमेरिकी दादागीरी को माकूल जवाब देने की व्यूह रचना तैयार कर ली है। यह भी स्पष्ट है कि टैरिफ लगाने के बाद भारत पर उतना नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा जितना स्वयं अमेरिका पर पड़ा। भारत ने तो नए बाजारों की तलाश कर संभावितनुकसान की भरपाई कर ली। कुछ लाभ भी कमा लिया। लेकिन अमेरिका को कई ट्रिलियन डॉलर की चपत लग गई।

ट्रंप चाहते थे कि भारत रूस और चीन के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ दे और पूरी तरह अमेरिका की शरण में चला आए। उसके इशारों पर नाचे। उसके कृषि और डेयरी उत्पाद की खरीद करे। डेयरी उत्पाद में मांसाहारी दूध भी शामिल था। अर्थात उन गायों का दूध जिन्हें मांसाहारी खुराक देकर पाला गया है। यह सनातन आस्था के खिलाफ था। जबकि डेयरी और कृषि उत्पादों के मामलों में भारत आत्मनिर्भर है। उसे बाहर से कुछ भी आयात करने की जरूरत नहीं है। इसलिए ट्रंप की डील पर राजी होने का कोई सवाल ही नहीं था। रक्षा हथियारों के मामले में रूस के साथ पुरानी संधि रही है। ऑपरेशन सिंदूर के समय चीन के हथियारों को रूसी सहयोग से बने हथियारों ने पूरी तरह नाकाम कर दिया। इसलिए सामरिक तौर पर रूस पर भरोसे में कोई कमी नहीं आनी थी। जाहिर तौर पर अमेरिका के साथ रक्षा सौदों की कोई विवशता नहीं थी। अन्य विकल्पों की जरूरत ही नहीं थी। जाहिर तौर पर अमेरिका के साथ उसकी शर्तों पर ट्रेड डील करने से मना करना भारत के कूटनीतिक आत्म-सम्मान का प्रतीक बन गया। इसे विदेश नीति की सफलता नहीं तो और क्या कहेंगे।

किसी भी देश की विदेश नीति वैश्विक परिस्थितियों, नेतृत्व की दृष्टि और वैश्विक घटनाक्रम के अनुसार बदलती रही है। पं.जवाहरलाल नेहरू के समयभारत ने तीसरी दुनिया के देशों को संगठित कर गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया। इंदिरा गांधी के समय पाकिस्तान के दो टुकड़े कर बांग्लादेश का निर्माण किया। अटल बिहारी वाजपेयी के समय परमाणु परीक्षण किया और मनमोहन सिंह के समय परमाणु समझौता कर भारतीय विदेश नीति को नए आयाम तक पहुंचाया। सच्चाई यही है कि नरेंद्र मोदी के 11 वर्षों के कार्यकाल मेंभारत कीविदेश नीति ने आक्रामक और बहुआयामी स्वरूप धारण किया है।

मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद विदेश नीति में पड़ोसी प्रथम की नीति अपनाई। 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रमुखों को आमंत्रित किया। नेपाल के साथ संबंध सुधारने की पहल की। डेढ़ दशक बाद नेपाल का दौरा करने वाले पीएम बने। नेपाल के संविधान निर्माण में सहयोग किया। हालांकि बाद में मधेसी आंदोलन और नक्शा विवाद के कारण थोड़ा तनाव बढ़ा। लेकिन परस्पर सांस्कृतिक संबंध कायम हैं।

मोदी जी ने भूटान का भी दौरा किया। उसे हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट की सौगात दी। शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में सहयोग किया। सांस्कृतिक संबंधों को मजबूती दी।

मोदी के कार्यकाल के दौरान 2015 में बांग्लादेश के साथ सीमा समझौता एक ऐतिहासिक घटना थी जिसके जरिए दशकों पुराना सीमा विवाद समाप्त हुआ।

श्रीलंका,मालद्वीप जैसे देशों के साथ आर्थिक, सामरिक सहयोग बढ़ाए। पाकिस्तान के साथ भी बेहतर संबंध बनाने की कोशिश की। अमेरिका, रूस और चीन जैसी महाशक्तियों के साथ समन्वय बनाए रखा।

आतंकवाद के खिलाफ भारत ने अपने अभियान को ऊंचाइयों तक पहुंचाया।

आज जबकि दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी है, भारत ने एक तटस्थ देश की भूमिका बनाए रखी है। निश्चित रूप में आगामी समय की विश्व व्यवस्था के निर्धारण और संचालन में भारत की भूमिका अहम रहने वाली है। इसे मोदी के कार्यकाल में विदेश नीति की सफलता के एक नए अध्याय के रूप में देखा जाएगा। इसमें कोई संदेह नहीं है।

मोदी के कार्यकाल में आदिवासी समाज

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शंभू शिखर

दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज जिस मुकाम पर हैं, वह न तो उन्हें विरासत में मिला है, न ही किसी की अनुकंपा पर।वे एक साधारण परिवार में जन्मे थे। काफी उतार-चढ़ाव और संघर्षों के बाद वे भारत के प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचे हैं। वे ज़मीन से जुड़े नेता हैं। उन्होंने गरीबी देखी है। बदहाली झेली है। भारतीय समाज को बारीकी से देखा है। समझा है। इसीलिए गरीबों के प्रति उनके मन में करुणा का भाव रहा है। वे बचपन से ही भारतीय समाज की विसंगतियों को महसूस करते थे। उसे समाप्त करने के उपायों पर चिंतन करते थे। दलितों और आदिवासियों के प्रति उनका शुरू से झुकाव रहा है। अपने युवावस्था में वे साइकिल पर सवार होकर दूर-दराज की दलित बस्तियों और आदिवासी गांवों में निकल जाया करते थे। उनकी झोपड़ियों में जाकर उनके परिजनों की तरह घुल-मिल जाया करते थे। उनके जीवन की कठिनाइयों को देखते थे और सोचते थे कि ऊपरवाले ने कभी मौका दिया तो उनके उत्थान के लिए कुछ करेंगे।

संघ का कार्यकर्ता बनने के बाद उन्हें समाज के हर तबके के बीच जाने का और मौका मिला। राजनीति में आने के बाद वे अपनी क्षमता के मुताबिक अंतिम पायदान पर खड़े लोगों की मदद करते रहे लेकिन असली मौका उन्हें 2014 में मिला जब केंद्र में उनके नेतृत्व में भाजपानीत एनडीए की सरकार बनी। अब वे स्वयं फैसले ले सकते थे। उन्हें ज़मीन पर उतार सकते थे। उन्होंने आदिवासी समाज के विकास और उत्थान को प्राथमिकता में रखा। आदिवासी समाज के जीवन को बेहतर बनाकर उन्हे मुख्यधारा में लाने का संकल्प लिया। उनके उत्थान और कल्याण के काम करना शुरू किया। उनके नेतृत्व में आदिवासी मामलों के मंत्रालय ने नई-नई योजनाओं का प्रारूप तैयार किया। पीएमओ और कैबिनेट की मंजूरी ली और उनका क्रियान्वयन किया। आदिवासी समाज के सशक्तीकरणके साथ उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया।

पीएम मोदी के 11 वर्षों के कार्यकाल में आदिवासियों के उत्थान के लिए जितने कार्य किए गए उतने आजादी के बाद किसी प्रधानमंत्री के कार्यकाल मेंनहीं हुए थे। जनजातीय लोगों के विकास के साथ ही उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्वायत्तता की सुरक्षा के लिए भी मोदी सरकार के कार्यकाल में कई ठोस कदम उठाए गए। मोदी सरकार की तत्परता के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ दूर-दराज के इलाकों में बसे जनजातीय लोगों को मिलने लगा। इसी का परिणाम है कि अब वे देश के अन्य लोगों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने लगे हैं।

बजट में बढ़ोतरी
ऐसा नहीं है कि पूर्व की सरकारों ने आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया। आजाद भारत के संविधान में उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया। आरक्षण का लाभ दिया। लेकिन उनका उद्देश्य आदिवासियों का उत्थान कम और उन्हें वोट बैंक के रूप में बनाए रखना ज्यादा रहा। उनके लिए विकास योजनाएं भी बनीं लेकिन उनके मद में आवंटित राशि का अधिकांश हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता रहा।

मोदी सरकार ने आदिवासियों के उत्थान के प्रति जो भी किया वह पूरी प्रतिबद्धता के साथ किया। लाभार्थियों से सीधा संपर्क साधा। बिचौलियों को रास्ते से हटाया। उनपर अंकुश लगाया। इसीलिए पिछले 11 सालों में केंद्र की ओर से चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं का आदिवासी समाज को भरपूर लाभ मिला। इससे आदिवासी समाज के जीवनस्तर में खासा सुधार आया। मोदी सरकार ने उनके लिए बजटीय आवंटन में निरंतर इजाफा किया। 2025-26 के केंद्रीय बजट में जनजातीय विकास के मदके आवंटन में तीनगुना इजाफा किया गया ।2013-14 के वित्तीय वर्थ में यूपीए सरकार ने आदिवासी कल्याण के मद में 4295.94 करोड़ रुपये का बजट दिया था जो मोदी जी के आने के बाद बढ़ता गया और 2025-26तक बढ़कर 14926करोड़ रुपये हो गया। मतलब करीब चार गुना इजाफा।

मोदी सरकार ने वर्ष 2017-18 के बजट में जनजातीय मंत्रालय के आवंटन में 10 फीसदी की बढ़ोतरी की थी। इस मद में कुल 5329 करोड़ रुपये के बजट का आवंटन किया था, जबकि 2016-17 के वित्तीय वर्ष में 4847 करोड़ रुपये आवंटित किए थे। इतना ही नहीं, केंद्र सरकार ने सभी मंत्रालयों में अनुसूचित जन-जातियों के कल्‍याण के लिए भी बजट आवंटन में 30 प्रतिशत से अधिक वृद्धि की। इस मद के लिए 24005 करोड़ रुपये की राशि को बढ़ाकर 31920 करोड़ रुपये का बजट आवंटन किया। अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों के लिए उच्‍चतर शिक्षा संबंधी नेशनल फेलोशिप और स्‍कॉलरशिप हेतु बजट में 140 प्रतिशत की वृद्धि की। इसके लिए वर्ष 2016-17में यह50 करोड रूपये था।2017-18 के वित्तीय वर्ष नें इसे बढ़ाकर 120 करोड़ रुपये का प्रावधान किया।

आदिवासी समाज की बात करें तो कम ही लोगों को पता होगा कि आज़ादी के बाद 1951की जनगणना तक आदिवासियों की गिनती एक स्वतंत्र समूह के रूप में होती थी। लेकिन इसके बाद उन्हें अलग से गिनना बंद कर दिया गया। 1951 की जनगणना के अनुसार आदिवासियों की संख्या 9,91,11,498 थी, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर12,43,26,240 हो गई। यह देश की जनसंख्या का 8.।2 प्रतिशत थी। लेकिन उनकी जनसंख्या वृद्धि की दर अन्य समुदायों से कम थी। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के मुताबिक देश के 30राज्यों में कुल 705तरह की जनजातियां रहती हैं। संस्कृत के विद्वानों ने आदिवासियों को अत्विका और वनवासी लिखा। महात्मा गांधी ने गिरिजन कह कर पुकारा। भारतीय संविधान में ‘अनुसूचित जनजाति’ पद का उपयोग किया गया।

भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों में संथाली, उरांव, भील, धानुक,, गोंड, मुंडा, खड़िया, हो, बोडो, कोल, भील, कोली, फनात, सहरिया, कुड़मी महतो, मीणा, उरांव, लोहरा, परधान, बिरहोर, पारधी, आंध, टाकणकार आदि शामिल हैं। उनका निवास मुख्य रूप से झारखंड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि में है। गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल में भी उनकी मौजूदगी है लेकिन वहां उनकी संख्या बहुत कम है।जबकि पूर्वोत्तर के राज्यों में जनजातीय आबादी बहुसंख्यक हैं। इन्हें भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची में ‘अनुसूचित जनजातियों’ के रूप में मान्यता दी गई है।लेकिन उनकी बड़ी संख्या और मानव सभ्यता के प्रारंभिक चरण का वाहक होने के बावजूद उन्हें वह सम्मान नहीं मिला था जिसके वे हक़दार है। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार उन्हें उनका सम्मान दिलाने का निरंतर प्रयास किया। 2022 में तो आदिवासी समाज की महिला नेत्री द्रौपदी मुर्म को प्रथम आदिवासी महिला राष्ट्रपति के रूप में चुना। उन्हें भारत के प्रथम नागरिक का दर्जा देकर आदिवासी समाज को गौरवान्वित किया।

नरेंद्र मोदी के प्रयास से भव्य आदिवासी महोत्सवों का आयोजन होने लगा जिसमें वे स्वयं मौजूद रहते हैं। 2018 में यह आयोजन मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में हुआ था। उसका उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि “पहले जो खुद को दूर-सुदूर समझता था अब सरकार उसके द्वार पर जा रही है, उसको मुख्यधारा में ला रही है। आदिवासी समाज का हित मेरे लिए व्यक्तिगत रिश्तों और भावनाओं का विषय है। 21 वीं सदी का नया भारत ‘सबका साथ सबका विकास’ के दर्शन पर काम कर रहा है।”

प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं कि आदिवासी समाज के विकास से ही “सबका साथ, सबका विकास” संभव होगा और इसी कारण केंद्र सरकार बीते कुछ वर्षो ने आदिवासी जनजातीय समाज के लिए मिशन मोड में काम कर रही है ताकि उनके जीवन के सभी आयामों को बेहतर किया जा सके।

इसका फलाफल दिखा भी है। जनजातीय लोगों का जीवन स्तर पहले से अधिक उन्नत हुआ है। शिक्षा के प्रति उनका रूझान बढ़ा है। प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक में आदिवासी बच्चों की भागीदारी बढ़ी है। 2004से 2014 के बीच भारत में केवल 90 ‘एकलव्य स्कूल’ खुले थे, जबकि 2014 से 22 तक की अवधि में मोदी सरकार ने 500से ज्यादा ‘एकलव्य स्कूल’ स्वीकृत किए, जिनमें पढ़ाई बखूबी चल रही है। उनमें एक लाख से ज्यादा जनजातीय छात्र शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। आदिवासी युवाओं के सामने शिक्षा के दौरान सबसे बड़ी चुनौती भाषा की होती थी लेकिन 2020 की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा में पढ़ाई का विकल्प भी खोल दिया गया है। जिस कारण आदिवासी बच्चे, आदिवासी युवा अपनी मातृभाषा में पढ़ पा रहे हैं।

स्वास्थ्य सुविधाओं की बात करें तो “आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना” में करीब 91.93 लाख आयुष्मान कार्ड के लाभार्थी जनजातीय वर्ग से हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 68लाख जनजातीय लोग प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के तहत आवास के लिए पंजीकृत हैं, जिनमें लगभग 63 लाख आवास मंजूर हो चुके हैं। इनमें से भी 47.17लाख आवासों का निर्माण पूरा हो चुका है। इसके अतिरिक्त स्वच्छता मिशन के तहत 2014-2015 से लेकर अभी तक जनजातीय वर्ग के 1.47 करोड़ घरों में शौचालय का निर्माण हुआ है। इसके बाद के तीन वर्षों में 3।5 लाख आदिवासी छात्रों वाले 740 एकलव्य माडल आवासीय विद्यालयों के लिए 38,800 शिक्षकों और सहायक कर्मचारियों की केंद्रीय रूप से भर्ती की मुहीम चली। इसके अलावा अब पांच छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत 2500करोड़ रुपये से अधिक के वार्षिक बजट के साथ प्रत्येक वर्ष 30लाख से अधिक छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है।

आदिवासी समाज के व्यापारिक उत्कर्ष का भी सुनहरा दौर मोदी के कार्यकाल में ही आया। देश के अलग-अलग राज्यों में तीन हजार से अधिक ‘वन धन विकास केंद्र’ स्थापित किए गए हैं। लगभग 90लघु वन उत्पादों पर सरकार एमएसपीदे रही है। 80 लाख से ज्यादा सेल्फ हेल्फ ग्रुप आज अलग-अलग राज्यों में काम कर रहे हैं जिसमें सवा करोड़ से ज्यादा सदस्य जनजातीय समाज से हैं और इनमें भी बड़ी संख्या महिलाओं की है। मोदी सरकार का जोर जनजातीय शिल्पकला को प्रोत्साहित करने, और युवाओं के कौशल को बढ़ाने पर भी है। देश में नए जनजातीय शोध संस्थान खोले जा रहे हैं। इन प्रयासों से जनजातीय युवाओं के लिए उनके अपने ही क्षेत्र में नए अवसर बन रहे हैं। इसी कारण आज भारत के जनजातीय समाज द्वारा बनाए जाने वाले हस्तशिल्प के लिए नए बाजारों के ध्वार खोले गए।उनकी मांग न केवल भारत में लगातार बढ़ रही है बल्कि विदेशों में भी उनके निर्यात को बल मिला है। आदिवासी उत्पाद ज्यादा से ज्यादा बाजार तक आयें, उनकी पहचान बढ़े, उनकी मांग बढ़े, केंद्र सरकार इस दिशा में भी लगातार काम कर रही है।

बीते 11वर्षों में आदिवासी समाज से जुड़े आदिवासी महोत्सव जैसे कार्यक्रम एक अभियान की तरह चले। आज़ादी के अमृत महोत्सव में आदिवासी महोत्सव के जरिए देश की आदिवासी विरासत की भव्यता को पेश किया गया। भिन्न-भिन्न कलाएं, भिन्न-भिन्न कलाकृतियां! भांति-भांति के स्वाद, तरह-तरह का संगीत, भारत की अनेकता, उसकी भव्यता, कंधे से कंधा मिलाकर एक साथ खड़ी हो गई। आदिवासी महोत्सव में जनजातीय संस्कृति, शिल्प, खान-पान, वाणिज्य और पारंपरिक कला को प्रदर्शित किया गया। जिससे आदिवासी समुदाय की समृद्धि के द्वार खुले।

आज भारत के पारंपरिक, और ख़ासकर जनजातीय समाज द्वारा बनाए जाने वाले हस्तशिल्प की मांग लगातार बढ़ रही है। पूर्वोत्तर के उत्पाद विदेशों में भी निर्यात हो रहे हैं। बांस से बने उत्पादों की लोकप्रियता में तेजी से वृद्धि हो रही है। आदिवासी उत्पाद ज्यादा से ज्यादा बाज़ार तक आए, इनकी पहचान बढ़े, इनकी डिमांड बढ़े, सरकार इस दिशा में भी लगातार काम कर रही है।

देश के अलग-अलग राज्यों में तीन हजार से ज्यादा वनधन विकास केंद्र स्थापित किए गए हैं। 2014 से पहले ऐसे बहुत कम, लघु वन उत्पाद होते थे, जो एमएसपी के दायरे में आते थे। अब ये संख्या बढ़कर 7 गुना हो गई है। ऐसे करीब 90 लघु वन उत्पाद हैं, जिन पर सरकार एमएसपी प्राइस दे रही है। 50 हजार से ज्यादा वनधन स्वयं सहायता समूहों के जरिए लाखों जनजातीय लोगों को लाभ मिल रहा है। 80 लाख से ज्यादा स्वयं सहायता समूह, सेल्फ़ हेल्प ग्रुप्स, अलग-अलग राज्यों में काम कर रहे हैं। इन समूहों में सवा करोड़ से ज्यादा आदिवासी सदस्य हैं। इसका भी बड़ा लाभ आदिवासी महिलाओं को मिल रहा है।

सरकार का जोर जनजातीय आर्ट्स को प्रमोट करने हुए, जनजातीय युवाओं के स्किल को बढ़ाने पर भी है। इसी वजह से बजट में पारंपरिक कारीगरों के लिए पीएम-विश्वकर्मा योजना शुरू की गई है। पीएम-विश्वकर्मा योजना के तहत आर्थिक सहायता, स्किल ट्रेनिंग दी जा रही है, कला और हस्तशिल्प की मार्केटिंग के लिए सपोर्ट किया जा रहा है। इसका बहुत बड़ा लाभ आदिवासी समुदाय के युवाओं को भी मिल रहा है। देश में नए जनजातीय शोध संस्थान भी खोले जा रहे हैं। इन प्रयासों से ट्राइबल युवाओं के लिए अपने ही क्षेत्रों में नए अवसर बन रहे हैं।

देश में कई जनजाति अनुसंधान संस्थान थे, लेकिन जनजातीय समाज की विविधताओं को जोड़ने के लिए कोई राष्ट्रीय लिंक नहीं था। पीएम मोदी के विजन के अनुरूप लिंक बनाया गया यह संस्थान इसी लिंक का काम करेगा।

वर्ष 2022 आदिवासी समाज के उत्थान की दृष्टि से मील का पत्थर साबित हुआ। मोदी सरकार ने देश को पहला आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दिया। आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू ने 25 जुलाई 2022 को भारत के 15वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण किया। वे देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बन गईं। वे एनडीए की उम्मीदवार थी, उन्होंने यशवंत सिन्हा के खिलाफ भारी अंतर से जीत हासिल की।

इस तरह नरेंद्र मोदी के 11 वर्षों कार्यकाल मेंआदिवासी समाज को चदुर्दिक विकास का वह उजाला मिला जो देश की मुख्यधारा को प्रज्वलित करता रहा है।

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