क्या अगले 25 वर्षों में मांसाहार का अंत मुमकिन है?

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दिल्ली। यूरोप में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जो अगले 25 सालों में मांसाहार को इतिहास की किताबों में दफ़न कर सकता है। एक ऐसा महाद्वीप जो कभी मांसाहारी परंपराओं में गहराई से जुड़ा हुआ था, वह अब पौधे-आधारित इंक़लाब का अगुआ बन चुका है। आर्थिक, पर्यावरणीय और नैतिक कारणों से प्रेरित होकर, यूरोप भोजन के उत्पादन और उपभोग के तरीके को नए सिरे से परिभाषित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

जर्मन मामलों के माहिर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी बताते हैं, “मांस उद्योग, जिसे लंबे समय तक वैश्विक कृषि का आधार माना जाता था, अब अपनी अक्षमताओं के लिए जाँच के केंद्र में है। पशुधन पालन के लिए भारी मात्रा में संसाधनों की आवश्यकता होती है—ज़मीन, पानी और अनाज—जिन्हें सीधे तौर पर बढ़ती आबादी को खिलाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सिर्फ एक किलो गोमांस का उत्पादन करने में लगभग 15,000 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि पौधे-आधारित विकल्पों के लिए इसका एक छोटा सा हिस्सा ही पर्याप्त होता है। इसके अलावा, पशुओं के चारे के लिए विशाल भूमि क्षेत्र का उपयोग किया जाता है, जिसे आलोचकों का मानना है कि मानव उपभोग के लिए फसलें उगाने में अधिक कुशलता से इस्तेमाल किया जा सकता है। पशुधन को बनाए रखने का आर्थिक बोझ भी एक बढ़ती चिंता है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध के बढ़ते दौर में जानवरों को बीमारियों से मुक्त रखना अधिक चुनौतीपूर्ण और महंगा होता जा रहा है। एवियन फ्लू और स्वाइन फीवर जैसी बीमारियों के प्रकोप ने मांस उद्योग की कमजोरियों को और उजागर किया है। इन कारकों ने, जलवायु परिवर्तन और खाद्य असुरक्षा से जूझ रही दुनिया में, मांस उत्पादन की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।”
खबरों से पता चलता है कि यूरोपीय संघ ने पहले ही मांस-केंद्रित कृषि से दूर जाने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। हाल के कानूनों का उद्देश्य औद्योगिक पशुधन खेती को प्रोत्साहित करने वाली प्रथाओं को हतोत्साहित करना है, जैसे कि मांस उत्पादकों को सब्सिडी देना और पशु कल्याण पर ढीले नियम। ये नीतियाँ खाद्य उत्पादन के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने और स्थिरता को बढ़ावा देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं।

साथ ही, वैगनिज्म, या शाकाहारी आंदोलन पूरे यूरोप में अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है। एक बार जो एक विशिष्ट जीवनशैली विकल्प माना जाता था, वह अब मुख्यधारा में शामिल हो चुका है। लाखों लोग सेहत, नैतिक और पर्यावरणीय कारणों से पौधे-आधारित आहार अपना रहे हैं। यह सांस्कृतिक बदलाव पौधे-आधारित खाद्य बाजार की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता में दिख रहा है, जो अगले दशक में अरबों यूरो के मूल्य तक पहुँचने का अनुमान है।

इस इंक़लाब में सबसे रोमांचक विकास मांस के स्वाद, बनावट और पोषण प्रोफ़ाइल की नकल करने वाले पौधे-आधारित विकल्पों का उदय है। यूरोप भर की कंपनियाँ लोकप्रिय व्यंजनों के शाकाहारी संस्करण बनाने के लिए भारी निवेश कर रही हैं, जैसे बर्गर, सॉसेज और पारंपरिक व्यंजन। उदाहरण के लिए, डोनर कबाब—जर्मनी में लोकप्रिय एक मांसाहारी तुर्की व्यंजन—अब शाकाहारी रूप में उपलब्ध है, और कई लोगों का दावा है कि यह मूल से भी बेहतर स्वाद देता है।

यह प्रगति केवल फास्ट फूड तक सीमित नहीं है। उच्च श्रेणी के रेस्तरां भी पौधे-आधारित व्यंजनों को अपना रहे हैं, जो इस धारणा को चुनौती देते हैं कि शानदार भोजन के लिए मांस ज़रूरी है। यह वहम टूट चुका है कि मांस-मुक्त आहार स्वाभाविक रूप से अपर्याप्त होता है। मैसूर, जो भारत की योग राजधानी है, और उदयपुर, जहाँ बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक आते हैं, इन शहरों में शाकाहारी भोजन की माँग काफी बढ़ी है। ऋषिकेश, हरिद्वार, वाराणसी आदि शहरों में पर्यटक शाकाहारी खाना ही पसंद कर रहे हैं।

ग्रीन एक्टिविस्ट पद्मिनी कहती हैं कि मांसाहार से शाकाहार की ओर यूरोप का संभावित बदलाव विशेष रूप से उल्लेखनीय है, यह देखते हुए कि इसका ऐतिहासिक रूप से पशु उत्पादों पर इन्हेसार रहा है। “सदियों से, मांस को समृद्धि और शक्ति का प्रतीक माना जाता था, और कई संस्कृतियों का मानना था कि मनुष्य इसके बिना जीवित नहीं रह सकते। हालांकि, मांस उपभोग के पर्यावरणीय और नैतिक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ने के साथ यह मानसिकता तेजी से बदल रही है।”

विशेष रूप से युवा पीढ़ी इस बदलाव को आगे बढ़ा रही है। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि मिलेनियल्स और जेन जेड अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में पौधे-आधारित आहार अपनाने में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वास्तव में युवा पीढ़ी पशु कल्याण, जलवायु परिवर्तन और व्यक्तिगत सेहत के बारे में अधिक जागरूक और चिंतित है। यह पीढ़ीगत बदलाव आने वाले दशकों में मांस उपभोग में गिरावट को तेज कर सकता है।

हालांकि मांस-मुक्त यूरोप की ओर यह परिवर्तन रातोंरात नहीं होगा, लेकिन इसकी नींव पहले ही रखी जा चुकी है। सरकारें, व्यवसाय और उपभोक्ता एक स्थायी और नैतिक खाद्य प्रणाली के साझा दृष्टिकोण के इर्द-गिर्द एकजुट हो रहे हैं। 2050 तक, यह पूरी तरह संभव है कि मांस एक दुर्लभ वस्तु बन जाएगा, जिसे लोगों और ग्रह दोनों के लिए बेहतर पौधे-आधारित विकल्पों द्वारा प्रतिस्थापित किया जाएगा।

यूरोप की शाकाहारी इंक़लाब सिर्फ एक प्रवृत्ति से अधिक है—यह भविष्य के भोजन की झलक है। जैसे-जैसे यह महाद्वीप मांस के साथ अपने संबंधों को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है, यह दुनिया के बाकी हिस्सों के लिए एक उदाहरण स्थापित कर रहा है।

प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड का भेद-भाव भरा रवैया

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कई बार ऐसा लगता है कि Press Club of India और Editors guild of India जैसी संस्थाएं पत्रकारों के हित में आवाज उठाने का धर्म भूल गई हैं, इसीलिए स्टेटमेंट जारी करने से पहले चेक करती हैं कि पीड़ित पत्रकार उनके खेमे का है या नहीं! उनके खेमे का पत्रकार नहीं होने से, वे दो शब्द कहते भी नहीं पीड़ित के पक्ष में। ऐसे में इन दोनों संस्थाओं पर कैसे विश्वास किया जाए?

ऐसे दर्जनों मामले हैं, जहां पीड़ित पत्रकार के पक्ष में प्रेस क्लब और एडिटर्स गिल्ड ने चुप्पी साध ली क्योंकि पीड़ित पत्रकारों की विचारधारा उनके न्याय के अधिकार की लड़ाई के आड़े आ गई।

जब देश में राष्ट्रीयता में विश्वास रखने वाले सैकड़ों की संख्या में पत्रकार और बड़ी संख्या में संपादक हैं फिर इस दिशा में प्रयास करके दो मजबूत संगठन भी खड़े नहीं किए जा सकते क्या? ऐसे संगठन जिनसे यह विश्वास किया जा सके कि वो अपनी लड़ाई में अकेले पड़ गए पत्रकारों का साथ देंगे। आवश्यकता पड़ी तो उनके समर्थन में सड़क पर उतरेंगे। सोशल मीडिया पर अभियान चलाएंगे।

महत्वपूर्ण बात यह भी है कि वह संगठन ऐसा हो, जो पीड़ित को न्याय दिलाने के संघर्ष के दौरान अपने-पराये का भेद ना करे।

इस दिशा में एक बार सोचने का यह समय है!

क्या ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीतियाँ दुनिया को तबाही की ओर ले जा रही हैं?

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीतियों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक ज़लज़ला ला दिया है। शेयर बाजार में खौफ़ का माहौल है और अर्थशास्त्री ग्लोबल साउथ पर इसके विनाशकारी प्रभावों की चेतावनी दे रहे हैं। भारत जैसे देश, जो अभी आर्थिक विकास की राह पर चले ही थे, अब इस तूफ़ान की चपेट में आ रहे हैं। क्या धमकियों और लेन-देन पर आधारित विदेश नीति से अमन कायम हो सकता है या फ़जीते का रायता फैलता चला जाएगा? यह सवाल दुनिया भर के नेताओं के ज़ेहन में गूंज रहा है।

ट्रम्पवाद, अपने मूल में, एक कट्टरपंथी विचारधारा है जो मध्यकालीन पूंजीवाद की असफलताओं का समाधान पेश करती है। प्रोफेसर परस नाथ चौधरी कहते हैं, “यह राष्ट्रीय हितों और अहंकार को प्राथमिकता देता है, जो राज्य के प्रति निष्ठा को सबसे ऊपर रखता है। यह घरेलू सरमायेदारों को बढ़ावा देता है, जो स्थानीय अभिजात वर्ग को फायदा पहुंचाने वाली आर्थिक नीतियों का समर्थन करते हैं। वर्तमान हालात संकेत देते हैं कि वैश्वीकरण, जो कभी समृद्धि का ज़रिया था, अब कमजोर हो रहा है। नव राष्ट्रवाद का उदय तनाव का सबब बन सकता है। अंकल सैम का ट्रम्पवाद जलवायु परिवर्तन या गरीब देशों में भूख और बीमारियों से पीड़ित लाखों लोगों के प्रति बेपरवाह है।”

ट्रम्पवाद के समर्थक तर्क देते हैं कि स्थानीय व्यवसायों और एलन मस्क जैसे शक्तिशाली व्यक्तियों को प्राथमिकता देने से अर्थव्यवस्थाओं को नई ऊर्जा मिलेगी। हालांकि, व्यवसायी राजीव गुप्ता चेतावनी देते हैं कि यह दृष्टिकोण एक खतरनाक तंग-नज़री को जन्म देता है, जो देशों को अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से दूर करता है।

सामाजिक कार्यकर्ता चतुर तिवारी कहते हैं, “घरेलू सरमायेदारों को बढ़ावा देने से असमानता बढ़ती है और प्रतिस्पर्धा कम होती है। यह माहौल कुछ लोगों को फायदा पहुंचा सकता है, लेकिन यह समाज के लिए हानिकारक भी है।”

आंतरिक रूप से, ट्रम्पवाद असहमति को दबाकर और विभाजन को बढ़ावा देकर तनाव बढ़ा रहा है। समाज शास्त्री त्रिलोक स्वामी के मुताबिक “इस तरह की विचारधाराएं नाकाम हैं और समाज को बांटती हैं। राष्ट्र के प्रति गर्व लोकतांत्रिक सिद्धांतों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।”

वैश्विक स्तर पर, ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीतियों ने अमेरिका की विश्वसनीयता को कम किया है। उनकी लेन-देन वाली विदेश नीति ने पुराने सहयोगियों को दूर किया है और प्रतिद्वंद्वियों को मजबूत किया है। समाजवादी विचारक राम किशोर कहते हैं, “अमेरिकन ड्रीम अब टूट चुका नाइटमेयर बनकर रह गया है।”

आर्थिक रूप से, ट्रम्प की नीतियां अमेरिका को एक बहुध्रुवीय दुनिया में हाशिए पर धकेलने की तरफ अग्रसर हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था इंटरडिपेंडेंट यानी एक दूसरे से जुड़ी हुई है, और कोई भी देश अकेले नहीं फल-फूल सकता है। बिहार के विद्वान टी.पी. श्रीवास्तव कहते हैं, “दुनिया ज्ञानोदय के युग में प्रवेश कर चुकी है, जहां सहयोग महत्वपूर्ण है। पुराने मॉडलों से चिपके रहकर, अमेरिका पीछे रह जाएगा।”

ट्रम्प के विस्तारवादी रुझान वैश्विक तनाव को उकसा रहे हैं। उनकी लेन-देन वाली कूटनीति संप्रभुता का उल्लंघन करती है। बुद्धिजीवी टी.एन. सुब्रमण्यम कहते हैं, “पुतिन के प्रति ट्रम्प का रवैया चिंताजनक है।” यूक्रेन में बेवजह दाखिल होना और युद्ध थोपने के लिए, रूसी राष्ट्रपति पुतिन का बहिष्कार ही नहीं, कार्यवाही भी होनी चाहिए थी, लेकिन ट्रंप ने हमलावर से हाथ मिलाकर गलत संदेश दिया है।

उधर मध्य पूर्व में, ट्रम्प की नीतियां समाधान कम, तनाव को ज्यादा बढ़ा रही हैं। मानवीय संकटों से निपटने की उनकी रणनीति में कमी है, जिससे अमेरिका की नैतिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। जाहिर है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब अमेरिका की सुपर पावर की छवि विकृत हो रही है।

ट्रम्पवाद का वैश्विक प्रभाव एक चेतावनी है कि संकीर्ण सोच वाली नीतियां विभाजन, असमानता और घटती वैश्विक प्रतिष्ठा की ओर ले जाती हैं। जैसे-जैसे देश इसके परिणामों से जूझ रहे हैं, दुनिया को सहयोग और समावेशिता के लिए प्रयास करना होगा ताकि ऐसी विचारधाराओं से उत्पन्न चुनौतियों का सामना किया जा सके। लेकिन विश्व शांति के पनघट की ये डगर आसान नहीं है।

ट्रम्प प्रशासन के टैरिफ सम्बंधी निर्णयों से कैसे निपटे भारत

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ट्रम्प प्रशासन अमेरिका में विभिन्न उत्पादों के हो रहे आयात पर टैरिफ की दरों को लगातार बढ़ाते जाने की घोषणा कर रहा है क्योंकि ट्रम्प प्रशासन के अनुसार इन देशों द्वारा अमेरिका से किए जा रहे विभिन्न उत्पादों के आयात पर ये देश अधिक मात्रा में टैरिफ लगाते हैं। चीन, कनाडा एवं मेक्सिको से अमेरिका में होने वाले विभिन्न उत्पादों के आयात पर तो टैरिफ को बढ़ा भी दिया गया है। इसी प्रकार भारत के मामले में भी ट्रम्प प्रशासन का मानना है कि भारत, अमेरिका से आयातित कुछ उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक का टैरिफ लगाता है अतः अमेरिका भी भारत से आयात किए जा रहे कुछ उत्पादों पर 100 प्रतिशत का टैरिफ लगाएगा। इस संदर्भ में हालांकि केवल भारत का नाम नहीं लिया गया है बल्कि “टिट फोर टेट” एवं “रेसिप्रोकल” आधार पर कर लगाने की बात की जा रही है और यह समस्त देशों से अमेरिका में हो रहे आयात पर लागू किया जा सकता है एवं इसके लागू होने की दिनांक भी 2 अप्रेल 2025 तय कर दी गई है। इस प्रकार की नित नई घोषणाओं का असर अमेरिका सहित विभिन्न देशों के पूंजी (शेयर) बाजार पर स्पष्टतः दिखाई दे रहा है एवं शेयर बाजारों में डर का माहौल बन गया है।

भारत ने वर्ष 2024 में अमेरिका को लगभग 74,000 करोड़ रुपए की दवाईयों का निर्यात किया है। 62,000 करोड़ रुपए के टेलिकॉम उपकरणों का निर्यात क्या है, 48,000 करोड़ रुपए के पर्ल एवं प्रेशस स्टोन का निर्यात किया है, 37,000 करोड़ रुपए के पेट्रोलीयम उत्पादों का निर्यात किया है, 30,000 करोड़ रुपए के स्वर्ण एवं प्रेशस मेटल का निर्यात किया है, 26,000 करोड़ रुपए की कपास का निर्यात किया है, 25,000 करोड़ रुपए के इस्पात एवं अल्यूमिनियम उत्पादों का निर्यात किया है, 23,000 करोड़ रुपए सूती कपड़े का निर्यात का किया है, 23,000 करोड़ रुपए की इलेक्ट्रिकल मशीनरी का निर्यात किया है एवं 22,000 करोड़ रुपए के समुद्रीय उत्पादों का निर्यात किया है। इस प्रकार, विदेशी व्यापार के मामले में अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा साझीदार है।

अमेरिका अपने देश में विभिन्न वस्तुओं के आयात पर टैरिफ लगा रहा है क्योंकि अमेरिका को ट्रम्प प्रशासन एक बार पुनः वैभवशाली बनाना चाहते हैं परंतु इसका अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर ही विपरीत प्रभाव होता हुआ दिखाई दे रहा है। अमेरिकी बैंकों के बीच किए गए एक सर्वे में यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि यदि अमेरिका में विभिन्न उत्पादों के आयात पर टैरिफ इसी प्रकार बढ़ाते जाते रहे तो अमेरिका में आर्थिक मंदी की सम्भावना बढ़कर 40 प्रतिशत के ऊपर पहुंच सकती है, जो हाल ही में जे पी मोर्गन द्वारा 31 प्रतिशत एवं गोल्डमैन सैचस 24 प्रतिशत बताई गई थी। इसके साथ ही, ट्रम्प प्रशासन के टैरिफ सम्बंधी निर्णयों की घोषणा में भी एकरूपता नहीं है। कभी किसी देश पर टैरिफ बढ़ाने के घोषणा की जा रही है तो कभी इसे वापिस ले लिया जा रहा है, तो कभी इसके लागू किए जाने के समय में परिवर्तन किया जा रहा है, तो कभी इसे लागू करने की अवधि बढ़ा दी जाती है। कुल मिलाकर, अमेरिकी पूंजी बाजार में सधे हुए निर्णय होते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं इससे पूंजी बाजार में निवेश करने वाले निवेशकों का आत्मविश्वास टूट रहा है। और, अंततः इस सबका असर भारत सहित अन्य देशों के पूंजी (शेयर) बाजार पर पड़ता हुआ भी दिखाई दे रहा है।

हालांकि, ट्रम्प प्रशासन द्वारा टैरिफ को बढ़ाए जाने सम्बंधी लिए जा रहे निर्णयों का भारत के लिए स्वर्णिम अवसर भी बन सकता है। क्योंकि, भारतीय जब भी दबाव में आते हैं तब तब वे अपने लिए बेहतर उपलब्धियां हासिल कर लेते हैं। इतिहास इसका गवाह है, कोविड महामारी के खंडकाल में भी भारत ने दबाव में कई उपलब्धयां हासिल की थीं। भारत ने कोविड के खंडकाल में 100 से अधिक देशों को कोविड बीमारी से सम्बंधित दवाईयां एवं टीके निर्यात करने में सफलता हासिल की थी।

विदेशी व्यापार के मामले में चीन, कनाडा एवं मेक्सिको अमेरिका के बहुत महत्वपूर्ण भागीदार हैं। वर्ष 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार, उक्त तीनों देश लगभग 65,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का व्यापार प्रतिवर्ष अमेरिका के साथ करते हैं। इसके बावजूद अमेरिका ने उक्त तीनों के साथ व्यापार युद्ध प्रारम्भ कर दिया है। भारत के साथ अमेरिका का केवल 11,300 करोड़ अमेरिकी डॉलर का ही व्यापार था। अब ट्रम्प प्रशासन की अन्य देशों से यह अपेक्षा है कि वे अमेरिकी उत्पादों के आयात पर टैरिफ कम करे अथवा अमेरिका भी इन देशों से हो रहे विभिन्न उत्पादों पर उसी दर से टैरिफ वसूल करेगा, जिस दर पर ये देश अमेरिका से आयातित उत्पादों पर वसूलते हैं। यह सही है कि भारत अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर अधिक टैरिफ लगाता है क्योंकि भारत अपने किसानों और व्यापारियों को बचाना चाहता है। भारत में कृषि क्षेत्र के उत्पादों पर 25 से 100 प्रतिशत तक आयात कर लगाया जाता है जबकि कृषि क्षेत्र के अतिरिक्त अन्य उत्पादों पर कर की मात्रा बहुत कम हैं। भारत ने विनिर्माण एवं अन्य क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ा ली है परंतु कृषि क्षेत्र में अभी भी अपनी उत्पादकता बढ़ाना है। हाल ही के समय में भारत ने कई उत्पादों के आयात पर टैरिफ की दर घटाई भी है।

भारत के साथ दूसरी समस्या यह भी है कि यदि भारत आयातित उत्पादों पर टैरिफ कम करता है तो भारत में इन उत्पादों के आयात बढ़ेंगे और भारत को अधिक अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता पड़ेगी इससे भारतीय रुपये का और अधिक अवमूल्यन होगा तथा भारत में मुद्रा स्फीति का दबाव बढ़ेगा। विदेशी निवेश भी कम होने लगेगा और अंततः भारत में बेरोजगारी बढ़ेगी। भारत में सप्लाई चैन पर दबाव भी बढ़ेगा। इन समस्त समस्याओं का हल है कि भारत अन्य देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते करे। परंतु, अन्य देश चाहते हैं कि द्विपक्षीय समझौतों में कृषि क्षेत्र को भी शामिल किया जाय, इसका रास्ता आपसी चर्चा में निकाला जा सकता है। अमेरिका एवं ब्रिटेन के साथ भी द्विपक्षीय व्यापार समझौते सम्पन्न करने की चर्चा तेज गति से चल रही है। हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान यह घोषणा की गई थी कि भारत और अमेरिका के बीच विदेशी व्यापार को 50,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर प्रतिवर्ष के स्तर पर लाए जाने के प्रयास किए जाएंगे। इस सम्बंध में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर तेजी से काम चल रहा है।

दूसरे, अब भारत को उद्योग एवं कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ानी होगी। हर क्षेत्र में लागत कम करनी होगी ताकि भारत में उत्पादित वस्तुएं विश्व के अन्य देशों के साथ प्रतिस्पर्धा में खाड़ी हो सकें। भारत में रिश्वतखोरी की लागत को भी समाप्त करना होगा। भारत में निचले स्तर पर घूसखोरी की लागत बहुत अधिक है। भूमि, पूंजी, श्रम, संगठन एवं तकनीकि की लागत कम करनी होगी। कुल मिलाकर व्यवहार की लागत को भी कम करना होगा। भारतीय उद्योगों को अन्य देशों के उद्योगों के साथ प्रतिस्पर्धी बनाना ही इस समस्या का हल है ताकि भारतीय उद्योगों द्वारा निर्मित उत्पाद अन्य देशों के साथ विशेष रूप से गुणवत्ता एवं लागत के मामले में प्रतिस्पर्धा कर सकें। निजी क्षेत्र को लगातार प्रोत्साहन देना होगा ताकि निजी क्षेत्र का निवेश उद्योग के क्षेत्र में बढ़ सके। आज भारत में पूंजीगत खर्चे केवल केंद्र सरकार द्वारा ही बहुत अधिक मात्रा में किए जा रहे हैं। आज देश में हजारों टाटा, बिरला, अडानी एवं अम्बानी चाहिए। केवल कुछ भारतीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से अब काम चलने वाला नहीं हैं। भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था बनाने का समय अब आ गया है।

तीसरे, मेक इन इंडिया ट्रम्प के टैरिफ युद्ध का सही जवाब है। आज भारत को सही अर्थों में “आत्मनिर्भर भारत” बनाए जाने की सबसे अधिक आवश्यकता है। भारत के लिए केवल अमेरिका ही विदेशी व्यापार के मामले में सब कुछ नहीं होना चाहिए, भारत को अपने लिए नित नए बाजारों की तलाश भी करनी होगी। एक ही देश पर अत्यधिक निर्भरता उचित नहीं है। स्वदेशी उद्योगों को भी बढ़ावा देना ही होगा।

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