क्राँतिकारी वीर बुधु भगत : अंग्रेजों ने पूरे गाँव में सामूहिक नरसंहार किया था

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भारतीय स्वाधीनता के संघर्ष में कितने बलिदान हुये इसका विस्तृत वर्णन कहीं एक स्थान पर नहीं मिलता । जिस क्षेत्र के इतिहास पर नजर डालों वहाँ संघर्ष और बलिदान की रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानियाँ मिलती हैं। ऐसी ही कहानी क्राँतिकारी बुधु भगत की है जिन्होंने जीवन की अंतिम श्वाँस तक संघर्ष किया और अंग्रेजों ने उनके पूरे गाँव सिलारसाई के निवासियों को मौत के घाट उतारा ।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम में वनवासी वीर बलिदानी बुधु भगत ऐसा क्राँतिकारी नाम है जिनका उल्लेख भले इतिहास की पुस्तकों में कम हो पर छोटा नागपुर क्षेत्र के समूचे वनवासी अंचल में लोगो की जुबान पर है । उस अंचल में उन्हें दैवीय शक्ति का प्रतीक माना जाता है । वन्य क्षेत्र के अनेक वनवासी परिवार उन्हें लोक देवता जैसा मानते हैं और उनके स्मरण से अपने शुभ कार्य आरंभ करते हैं ।

क्राँतिकारी वुधु भगत के नेतृत्व में स्वत्व का यह संघर्ष तब आरंभ हुआ जब अंग्रेजों ने पूरे वन्य क्षेत्र पर अधिकार करके वनवासियों को बंधुआ मजदूर बनाकर शोषण आरंभ किया तब वीर बुधु भगत ने अपने स्वाभिमान रक्षा केलिये युवाओं की टुकड़ियाँ बनाकर छापामार लड़ाई आरंभ की । उनके साथ लगभग तीन सौ युवाओं की टोली थी । जिसका सामना करने के लिये अंग्रेजों को आधुनिक हथियारों से युक्त सेना की एक पूरी ब्रिगेड को लाना पड़ा था । क्राँतिकारी बुधु भगत की वीरता और स्वत्व वोध का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने जीवन की अंतिम श्वाँस तक संघर्ष किया और बलिदान हुये । नेतृत्व अंग्रेजों से मुकाबला कर रही इस टुकड़ी ने समर्पण नहीं किया अंतिम श्वाँस तक युद्ध किया और बलिदान हुये ।

ऐसे क्रांतिकारी बुधु भगत का जन्म 17 फरवरी 1792 में रांची के वनक्षेत्र में हुआ था । उनके गांव का नाम सिलारसाई था । अब यह क्षेत्र झारखंड प्राँत में आता है । बुधु भगत बचपन अति सक्रिय और चुस्त फुर्त थे और मल्ल युद्ध, तलवार चलाना और धनुर्विद्या का अभ्यास करते थे । वे धनुषबाण और कुल्हाड़ी सदैव अपने साथ रखते थे । अंग्रेजों ने समूचे वन्यक्षेत्रों पर अपना अधिकार कर लिया और वनवासियों को बंधुआ मजदूर बनाकर वनोपज का दोहन करने लगे । अंग्रेजों और उनके एजेंटो ने अनेक प्रकार के प्रतिबंध भी लगा दिये। वनवासियों के संघर्ष अनेक स्थानों पर आरंभ हुये जिन्हे इतिहास में अलग-अलग नामों से जाना जाता है । कहीं कोल विद्रोह, कहीं लरका विद्रोह तो कहीं संथाल विद्रोह। उस कालखंड में ऐसा कोई वनक्षेत्र नहीं जहाँ संघर्ष आरंभ न हुआ हो । सबने अपने अपने दस्ते गठित किये और संघर्ष हुये। राँची क्षेत्र में यह संघर्ष क्राँतिकारी बुधु भगत के नेतृत्व में आरंभ हुआ । उनके द्वारा गठित वनवासी युवाओं की इस टोली ने पूरे छोटा नागपुर क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाया और अंग्रेजों का जीना मुश्किल कर दिया ।

अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए एक हजार रुपये के इनाम की घोषणा की । अंग्रेजों को उम्मीद थी कि इनाम के लालच में कोई विश्वासघाती सामने आयेगा और बुधू भगत की सूचना दे देगा । पर अंग्रेजों की यह चाल सफल न हो सकी । एक स्थिति ऐसी बनी कि अंग्रेजों और उनके एजेन्टों को वनोपज बाहर ले जाना कठिन हो गया । तब फौज ने मोर्चा संभाला । अंग्रेजी ब्रिगेड ने पूरे वन क्षेत्र का घेरा डाला और घेरा कसना आरंभ किया । यह घेरा फरवरी के पहले सप्ताह आरंभ हुआ था और अंत में अंग्रेजी फौज उस चौगारी पहाड़ी के समीप 12 फरवरी को पहुंचे । इसी पहाड़ी पर क्राँतिकारियों का केन्द्र था । सेना ने पूरी पहाड़ी पर घेरा डाला और मुकाबला आरंभ हुआ । वनवासी युवाओं ने तीर कमान और कुल्हाड़ी से मुकाबला किया ।अंत में 13 फरवरी, 1832 को अपने ही गांव सिलागाई में बुधु भगत सहित सभी युवा बलिदान हुये। अंग्रेजों ने किसी को जीवित न छोड़ा । इनमें महिलायें और बच्चे भी शामिल थे । उनकी कहानियां आज भी वनवासी क्षेत्रों में सुनी जाती हैं।

आत्मनिर्भर राष्ट्र के लिए आत्मनिर्भर छात्र आवश्यक – दत्तात्रेय होसबाले

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प्रयाग। मनुष्यता को प्राचीन भारत की देन अद्भुत है, सभी क्षेत्रों में भारत के योगदान को कभी नकारा नहीं जा सकता। भारत के इस अद्भुत ज्ञान का परिचय आज की युवा पीढ़ी से कराना बहुत आवश्यक है। यह कहना है इसरो के अध्यक्ष वी नारायण का। श्री नारायण ने ज्ञान महाकुंभ 2018 के समापन अवसर पर कहा कि हमारे पास अनेक साक्ष्य हैं कि भारत में अनेक देशों के छात्र शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। हमारे यहाँ के आयुर्वेद ने सभी सीमाओं को पार कर वैश्विक मान्यता प्राप्त की थी। श्री नारायण ने कहा कि अंग्रेजों के आने के बाद भारत में शिक्षा का स्तर बढ़ा, इस कथन को मैं सिरे से नकारता हूँ। उनका कहना था कि भारतीय ज्ञान और संस्कृति उत्कृष्ट थी और इसे आक्रांताओं ने आहत किया। लेकिन आज हम सभी का कर्तव्य बनता है कि देश के प्राचीन ज्ञान और संस्कृति के आधार पर इसे विकसित राष्ट्र बनाएँ। भारत आज सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है।

ज्ञान महाकुंभ के समापन सत्र के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत में समस्याओं की कमी नहीं है, लेकिन समस्याओं की ही चर्चा करते रहे तो देश आगे बढ़ ही नहीं सकता। यही कारण है कि शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने अपना जो ध्येय वाक्य रखा है, उसमें प्रमुख है कि समस्या नहीं समाधान की चर्चा करें। श्री होसबाले ने कहा कि देश के शिक्षा क्षेत्र में ऐसा बदलाव चाहिए, जिससे भारत में भविष्य निर्माता, विद्यार्थियों में ज्ञान और जीवन मूल्य को स्थापित कर सके। श्री होसबाले के अनुसार, भारतीय दृष्टि से क्या होना चाहिए, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास ने इसकी न तो केवल सरकार से अपेक्षा रखी, बल्कि ऐसी मांग ही नहीं की। बल्कि न्यास ने समाज में प्रबोधन का कार्य भी किया है। श्री होसबाले ने कहा कि न्यास द्वारा भारत के शिक्षाविदों, चिंतकों, विद्वत्-जनों को एक मंच पर लाकर इस विषय के समाधान को लेकर समय-समय पर मंथन किया है। इसके साथ ही न्यास ने शिक्षण संस्था संचालित करने वालों को भी आवश्यक परिवर्तन की भूमिका से परिचित कराया और इस दृष्टि से शैक्षिक संस्थान चलाने के लिए प्रेरित किया। श्री होसबाले ने आगे कहा कि भारतीय मूल्यों के लिहाज से संस्कार देने वाली शिक्षा के साथ ही चरित्र निर्माण को लेकर भी न्यास ने कार्यक्रम चलाए। इसके साथ ही पर्यावरण, भारतीय भाषा जैसे अनेक आयामों पर कार्यक्रम करते हुए और आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयों में संघर्ष के साथ ही आवश्यक होने पर शासन के सामने विचार रखते हुए न्यास ने ना केवल योग्य वातावरण बनाने का प्रयत्न किया है, बल्कि विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों, संचालकों, शिक्षाविदों के लिए शैक्षिक परिवर्तन के राष्ट्रव्यापी आंदोलन में उनकी सहभागिता और भूमिका को लेकर जागृति लाने का भी प्रशंसनीय कार्य किया है।

ज्ञातव्य है कि ‘न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ अर्थात् दुनिया में ज्ञान के समान पवित्र और कुछ नहीं है। श्रीमद्भगवद् गीता की इस पंक्ति की सार्थकता को व्यापक रूप देने को लेकर प्रयागराज में ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ ने ज्ञान महाकुंभ – 2081 का आयोजन किया, जो 10 जनवरी से शुरू होकर 10 फरवरी तक चला। जिसका उद्घाटन उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री श्री केशव प्रसाद मौर्य ने किया।

इस ज्ञान महाकुंभ में 01 फरवरी 2025 को भारत को इंडिया कहे जाने की सार्थकता को लेकर मंथन हुआ। इस विशिष्ट कार्यक्रम के संयोजक डॉ. मोतीलाल गुप्ता ने कहा कि ‘इंडिया’ शब्द सिर्फ़ नाम तक सीमित है, जबकि ‘भारत’ हमारे लिए भावना है, हमारे पूर्वजों की विरासत है। यह मात्र एक भू-भाग नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रतिबिंबित करता है। इस आयोजन में श्री एम. गुरु जी ने कहा कि “ये भारत है, हम भारतीय हैं और हम भारत की ही चिंता करते हैं, ‘इंडिया’ शब्द से हमारा कोई संबंध नहीं, हम भारत के जन कभी भी इसे मान्यता नहीं दे सकते।”

ज्ञान महाकुंभ में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास और पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के संयुक्त तत्वावधान में हरित महाकुंभ-2081 का 5 और 6 फरवरी को आयोजन किया गया। इसमें न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने हरित महाकुंभ की संकल्पना साझा की। डॉ कोठारी ने कहा, “पर्यावरण की इस हालत के लिए सिर्फ़ हम ज़िम्मेदार हैं और इसके दुष्परिणाम से हमें और कोई नहीं बल्कि स्वयं हम ही बचा सकते हैं।” इस आयोजन में मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय तकनीकी संस्थान के निदेशक प्रो. आर एस वर्मा ने उपस्थित प्रतिभागियों को पर्यावरण के प्रति सजग करते हुए कहा कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट से ही हम डेवलपमेंट रिटेन कर सकते हैं। प्रो. वर्मा ने प्लास्टिक के प्रयोग के दुष्परिणामों से आगाह करते हुए उसके न्यूनतम इस्तेमाल पर बल‌ दिया। इस दौरान गोपाल आर्य ने पर्यावरण को मातृभाषा हिंदी की समृद्धि से जोड़ते हुए कहा कि हरित से हरि को पाया जा सकता है, और ‘ग्रीन’ अंग्रेज़ी शब्द ‘ग्रीड’ का पर्याय-सा लगता है।

ज्ञान महाकुंभ में ‘भारतीय शिक्षा : राष्ट्रीय संकल्पना’ पर केंद्रित तीन दिवसीय आयोजन भी हुआ। इसके उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव डॉ. अतुल कोठारी ने ज्ञान महाकुंभ की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, इस अलौकिक महाकुंभ में ज्ञान महाकुंभ का आयोजन अपने आप में ही अद्भुत संयोग है। इस कार्यक्रम से पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को एक नई ऊर्जा और भारतीय ज्ञान परंपरा से युक्त दिशा मिलेगी। इस सत्र के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह डॉ कृष्ण गोपाल ने कहा कि हमारी ज्ञान परंपरा में एकांगी शिक्षा नहीं दी जाती थी, परंतु आज संपूर्ण विश्व एकांगी शिक्षा व्यवस्था से ग्रसित है। हमें समाज में एक बार फिर भारतीय ज्ञान परंपरा की चेतना का जागरण करना होगा। इस आयोजन में उपस्थित विशिष्ट अतिथि यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डी. पी. सिंह ने शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास की सराहना करते हुए कहा कि अध्यात्म विद्या सभी विद्याओं में सर्वश्रेष्ठ है। भारतीय ज्ञान परंपरा आध्यात्म और शिक्षा का अद्भुत मिश्रण कर रही है और हमें इस परंपरा को एक बार फिर बल देना होगा।

तीन दिवसीय इस आयोजन में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, विश्व जागृति फाउंडेशन के वागीश स्वरूप, विनय सहस्रबुद्धे, साध्वी ऋतंभरा, राष्ट्रीय सेविका समिति की सीता अक्का, एनआईटी प्रयागराज के निदेशक प्रो आर.एस. शर्मा, मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त मनोज श्रीवास्तव, राजस्थान उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त ओमप्रकाश बैरवा, हरियाणा उच्च शिक्षा आयोग के अध्यक्ष प्रो कैलाश शर्मा, इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव, नीति आयोग के शिक्षा निदेशक डॉ शेषांक शाह, पद्मश्री आनंद कुमार की उपस्थिति विशेष रही।

तीन दिन चले इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में निजी शैक्षिक संस्थाओं की शिक्षा में भूमिका, शासन-प्रशासन की शिक्षा में भूमिका, विकसित भारत और भारतीय भाषाएं जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ। इस कार्यक्रम में पूर्व से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक के सभी प्रांतों के शिक्षा क्षेत्र से जुड़े दस हजार से अधिक विद्यार्थी, शिक्षाविद, आचार्य आदि ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जिसमें 100 से अधिक केंद्रीय और राजकीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों के कुलपति, निदेशक, अध्यक्ष शामिल रहे। देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने सोशल इंटर्नशिप के माध्यम से इस ज्ञान महाकुंभ में अपनी सेवाएँ दी तथा विद्यार्थियों हेतु विभिन्न कक्षाओं जैसे वैदिक गणित, दैनिक योग अभ्यास व संस्कृत कार्यशाला आदि का आयोजन भी हुआ।

दुनिया में बढ़ रहा है भारतीय संस्कृति का महत्त्व- शेखावत

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नई दिल्ली: भारत की बढ़ती समुद्री साझेदारी और सुरक्षा पहलों की पृष्ठभूमि में, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय की अंतरराष्ट्रीय पहल ‘प्रोजेक्ट मौसम’ के तहत ‘मानसून: द स्फीयर ऑफ कल्चरल एंड ट्रेड इन्फ्लुएंस’ शीर्षक से दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर रहा है। सेमिनार का आयोजन एसजीटी विश्वविद्यालय के एडवांस स्टडी इंस्टीट्यूट ऑफ एशिया के सहयोग से किया जा रहा है। उद्घाटन सत्र में केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेन्द्र सिंह शेखावत मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। आधार वक्तव्य (कीनोट एड्रेस) डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने दिया, जबकि आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने स्वागत भाषण दिया। इस अवसर पर ‘एशिया’ के शोध निदेशक प्रो. अमोघ राय ने भी अपने विचार प्रकट किए। अंत में, आईजीएनसीए के प्रोजेक्ट मौसम के निदेशक डॉ. अजित कुमार ने गणमान्य व्यक्तियों और अतिथियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। दो दिनों के इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान कुल 38 शोधपत्र प्रस्तुत किए जाएंगे। इन शोधपत्रों के माध्यम से विद्वान तथा विशेषज्ञ हिंद महासागर क्षेत्र में ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संबंधों की पड़ताल करेंगे।

यह सेमिनार समुद्री संपर्कों के माध्यम से हिंद महासागर के देशों के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों की खोज करते हुए हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार, परंपराओं और संबंधों को आकार देने में भारत की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करेगा। यह पहल विशेष रूप से सामयिक है, क्योंकि भारत और फ्रांस ने हाल ही में नई दिल्ली में समुद्री सहयोग वार्ता संपन्न की, जिसमें हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा के लिए खतरों का आकलन करने और उनका मुकाबला करने के लिए संयुक्त उपायों पर सहमति व्यक्त की गई। इसके साथ ही, भारतीय नौसेना का ‘2025 कैपस्टोन थिएटर लेवल ऑपरेशनल एक्सरसाइज’ (TROPEX) चल रहा है, जो हिंद महासागर में भारत की तैयारियों को प्रदर्शित करता है।

‘प्रोजेक्ट मौसम’ न केवल भारत के ऐतिहासिक समुद्री प्रभाव पर जोर देता है, बल्कि इस क्षेत्र में देश की विकसित हो रही भू-राजनीतिक रणनीति को भी प्रतिध्वनित करता है। यह प्राचीन नौवहन मार्गों, बंदरगाह शहर नेटवर्क और तटीय बस्तियों जैसे प्रमुख विषयों पर ध्यान केंद्रित करता है। ‘प्रोजेक्ट मौसम’ मूर्त और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को एकीकृत करके कनेक्टिविटी और समुद्री साझेदारी को बढ़ावा देने में भारत के निरंतर नेतृत्व को भी रेखांकित करता है, जो यूनेस्को के समुद्री विरासत अध्ययनों (मेरीटाइम हेरिटेज स्टडीज) में योगदान देता है। इस दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का उद्देश्य भविष्य की नीतिगत बातचीत के लिए मार्ग प्रशस्त करने वाले अकादमिक सहयोग और विरासत संरक्षण के साथ गहन सांस्कृतिक कूटनीति को बढ़ावा देना है।

उद्घाटन सत्र में केन्द्रीय संस्कृति मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा, “हमारे यहां से लेकर के सेंट्रल एशिया तक, सब देशों के बीच हमारी संस्कृति का प्रभाव निर्विवाद रूप से दिखाई देता है। और उसके चलते जो वृहत्तर भारत की कल्पना है, उसका मूल आधार भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक संपन्नता है। हजारों साल पहले जब दुनिया में बाकी सब देश अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे और एक सभ्यता के रूप में विकसित हो रहे थे, तब भारत समृद्धि के शिखर पर था। भारत व्यापार का केन्द्र था। इस नाते जो लोग भारत में आए, ज्ञान प्राप्त करने के दृष्टिकोण से हजारों साल तक आए, विद्यार्थियों की तरह आए, शिक्षकों की तरह आए, भिक्षुकों की तरह आए और आक्रांताओं की तरह भी आए, वह भारत से जो पदचिह्न लेकर गए, उसका प्रभाव पूरे विश्व के अनेक देशों में दिखाई देता है। अब भारत का सामर्थ्य बढ़ रहा है, भारत की पहचान बदल रही है, भारत की जनशक्ति बढ़ रही है और पूरे विश्व भर में भारत की क्षमताओं का प्रभुत्व नए सिरे से स्थापित हो रहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में भारत ने आर्थिक दृष्टिकोण से, सामरिक दृष्टिकोण से, तकनीकी दृष्टिकोण से प्रगति की है और आज पूरा विश्व एक बार फिर नए सिरे से भारत की तरफ आशा की दृष्टि से देख रहा है और जब भारत की ये महत्ता स्थापित होती है, तो निश्चित रूप से हमारी सांस्कृतिक महत्ता भी स्थापित होती है।”

आधार वक्तव्य (कीनोट एड्रेस) देते हुए डॉ. विनय सहस्रबुद्धे ने कहा कि यह संस्कृति ही थी, जिसने भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच संबंधों की संरचना को बुना था। और, मजबूत सांस्कृतिक संबंधों के लिए अलग प्रकार के निवेश की आवश्यकता होती है। वित्तीय संसाधनों के अलावा, हमें बौद्धिक और भावनात्मक, दोनों तरह से निवेश करने की आवश्यकता है। यह केवल सरकारी नीतियों की नही, बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया को हमारी लोक-सुलभ चेतना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की गहरी इच्छा और दृढ़संकल्प की मांग करता है।

डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने इस बात पर प्रकाश डाला कि प्रोजेक्ट मौसम में शुरुआत में 39 देशों की पहचान की गई थी, लेकिन आईजीएनसीए पहले से ही दक्षिण और मध्य एशिया पर ध्यान केंद्रित करते हुए क्षेत्र अध्ययन कर रहा था। आईजीएनसीए में क्षेत्र अध्ययन कार्यक्रम के तहत वृहत्तर भारत की अवधारणा विकसित की गई, जिसका उद्देश्य इन देशों को जोड़ने वाले सांस्कृतिक मार्गों और संपर्कों की खोज और पहचान करना था।

माधव संगति सरनी तुम्हारी

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मनोज श्रीवास्तव

अपना विभाजक एजेंडा चलाने के लिए लोग संत रैदास का भी उपयोग कर लेते हैं। एक सज्जन ने तो यह सैद्धांतिकी प्रतिपादित की कि रैदास निर्गुण होने के लिए इस कारण बाध्य हुए क्योंकि उन्हें मंदिर प्रवेश की अनुमति नहीं थी। एक कहते हैं कि रैदास आजीवक थे। एक उन्हें निर्वाण संप्रदाय का बताते हैं। एक उन्हें तुलसीदास की तुलना में देखकर तुलसी-विरोध की अपनी खुजली मिटाते हैं। एक के हिसाब से रैदास के राम निर्गुण राम थे, सगुण को उन्होंने स्वीकारा ही नहीं। एक तो उन्हें दलित धर्म का पैरोकार ही मानते हैं। एक उन्हें वेद के विरोध में खड़ा करते हैं :

इनमें से कोई संत नहीं है, इसलिए रैदास की ऊँचाई तक पहुँचना इनमें से किसी को संभव नहीं है। सबको अपनी अपनी राजनीति चलाना है और भिन्नता का एक dialectics तैयार करना है।

पर यदि रैदास को सगुण निर्गुण का आवश्यक तौर पर विरोधी लग रहा होता क्योंकि निर्गुण संत मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते थे तो इस सम्पूर्ण कथित रूप से निर्गुण साहित्य में ऐसी किसी घटना का कोई तो विवरण होता। लेकिन कुछ लोगों की वैचारिक पूर्वांधता उन्हें बिना किसी ऐतिहासिक प्रमाण के ऐसी बकवास करने की छूट दे देती है। ये रैदास ही थे जो सगुण कृष्ण की यों याद कर रहे थे:

माधौ संगति सरनि तुम्हारी।
जगजीवन कृश्न मुरारी।।
तुम्ह मखतूल गुलाल चत्रभुज, मैं बपुरौ जस कीरा।
पीवत डाल फूल रस अंमृत, सहजि भई मति हीरा।

अब यह माधव, यह कृष्ण मुरारी कौन थे? और ये बनवारी :

ऐसा ध्यान धरूँ बनवारी।
मन पवन दिढ सुषमन नारी।।

और यहां माधव के हवाले से वेद की बात भी रैदास ही कह रहे :

पांवन जस माधो तोरा।
तुम्ह दारन अघ मोचन मोरा।।
कीरति तेरी पाप बिनासै, लोक बेद यूँ गावै।
जो हम पाप करत नहीं भूधर, तौ तू कहा नसावै।।

और गोविन्द से ही उनकी समाधि लगती है और उसी में उन्हें शिवरूप भी ध्यान आता है :

गोबिंदे तुम्हारे से समाधि लागी।
उर भुअंग भस्म अंग संतत बैरागी।।
जाके तीन नैन अमृत बैन, सीसा जटाधारी, कोटि कलप ध्यान अलप, मदन अंतकारी।।
जाके लील बरन अकल ब्रह्म, गले रुण्डमाला, प्रेम मगन फिरता नगन, संग सखा बाला।।
अस महेश बिकट भेस, अजहूँ दरस आसा, कैसे राम मिलौं तोहि, गावै रैदासा।।

और राम यदि निर्गुण थे तो उनके वे चरण कौन से थे जिसके लिए रैदास लिख रहे थे:

तुझहि चरन अरबिंद भँवर मनु।
पान करत पाइओ, पाइओ रामईआ धनु।

और रैदास के राम यदि निर्गुण थे तो वे राजा कैसे थे :

रांम राइ का कहिये यहु ऐसी।
जन की जांनत हौ जैसी तैसी।

या फिर ऐसे :

न बीचारिओ राजा राम को रसु।
जिह रस अनरस बीसरि जाही।।

और ये कैसा निर्गुण है जो सारी सगुण संज्ञाएँ प्रयुक्त करता है:

राम बिन संसै गाँठि न छूटै।
कांम क्रोध मोह मद माया, इन पंचन मिलि लूटै।

ही नहीं बल्कि विष्णु के अवतार भी :

एक अधार नांम नरहरि कौ, जीवनि प्रांन धन मोरै।

या :

नरहरि प्रगटसि नां हो प्रगटसि नां।
दीनानाथ दयाल नरहरि।।

ये रैदास को जिस दलित धर्म का पैरोकार बताते हैं, उसकी प्रतिज्ञाओं में तो राम और कृष्ण को नहीं मानना था। उन प्रतिज्ञाओं में ये कब कहा गया था कि निर्गुण राम को मानना है और सगुण राम को नहीं मानना है।

जब रैदास यह कहते हैं कि

तब रांम रांम कहि गावैगा।
ररंकार रहित सबहिन थैं, अंतरि मेल मिलावैगा।

तो वे उन तुलसीदास से कहाँ भिन्न हैं जो कहते हैं :

राम नाम मनिदीप धरु, जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुँ, जौं चाहसि उजिआर॥

और राजा राम की सेवा न कर पाने का वह मूर्खतापूर्ण गर्व रैदास में नहीं है जो आजकल के इन बुद्धिरिपुओं में दिखता है, बल्कि उसका खेद है :

जाती ओछा पाती ओछा, ओछा जनम हमारा।
राजा राम की सेव न कीनी, कहि रैदास चमारा॥

जब वे यह कह रहे थे कि :

मन हीं पूजा मन हीं धूप, मन ही सेऊँ सहज सरूप।।
पूजा अरचा न जांनूं रांम तेरी, कहै रैदास कवन गति मेरी।

तो वे ऐसी कोई गैरब्राह्मणवादी बात नहीं कह रहे थे। मानसपूजा भारत में बहुत पुराने समय से मान्य चली आई है। हर पूजा के अंत में ब्राह्मणादि हिन्दू ‘आवाहनं न जानामि न जानामि तवार्चनं/ पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर’ कहता ही कहता है।

और जैसे रैदास कलिकाल का वर्णन करते हैं, तुलसी भी करते हैं।

बल्कि रैदास कुछ मामलों में कबीर की याद दिलाते हैं:

रैदास जीव कूं मारकर कैसों मिलहिं खुदाय।
पीर पैगंबर औलिया, कोए न कहइ समुझाय॥
या

देता रहै हज्जार बरस, मुल्ला चाहे अजान।
रैदास खोजा नहं मिल सकइ, जौ लौ मन शैतान॥

पर रैदास के ऐसे पद याद करने में भीम-मीम समीकरण में बाधा न आ जाये, इसका एहतियात हमारे बुद्धिरिपु बराबर रखते हैं। रैदास का उस काल में यह कहना धर्मांतरणकारियों को चुनौती था :

जब सभ करि दोए हाथ पग, दोए नैन दोए कान।
रैदास प्रथक कैसे भये, हिन्दू मुसलमान॥

और धर्मरक्षा का भाव रैदास में किसी से कम नहीं है:

रैदास सोई सूरा भला, जो लरै धरम के हेत।
अंग−अंग कटि भुंइ गिरै, तउ न छाड़ै खेत॥

ध्यान दें कि रैदास किसी दलित धर्म की बात नहीं कर रहे हैं। वे उसी धर्म की बात कर रहे हैं जिसके दश लक्षण मनु ने गिनाए थे। और दलित धर्म जैसी किसी मनमानी की जगह वे तो यह कह रहे थे कि : वेद धर्म छोडूं नहीं चाहे गले चले कटार।

यह भी कि : वेद धर्म छोडूं नही कोसिस करो हजार /तिल-तिल काटो चाहि गोदो अंग कटार

और यह कोई निर्वाण संप्रदाय या आजीवक संप्रदाय की मनगढ़ंत नहीं थी। वे वैदिक धर्म के आगे किसी को नहीं गिनते थे :

वेद धर्म सबसे बड़ा अनुपम सच्चा ज्ञान,
फिर क्यों छोड़ इसे पढ़ लूं झूठ कुरान

वर्ण व्यवस्था को वे समझते थे कि वह कर्ममूलक है, जन्मना नहीं है:

बेद पढ़ई पंडित बन्यो, गांठ पन्ही तउ चमार।
रैदास मानुष इक हइ, नाम धरै हइ चार॥

यही स्टैंड मनु का था और यही गीता का।

संत रैदास को जो आदर मिला वह इतना था कि स्वयं राजपूतानी मीरा ने उन्हें अपना गुरु बनाया और यहाँ आधुनिक समय की संकीर्णताएँ उन पर थोपी जा रही हैं।आज के मान से तो उनकी ये पंक्तियाँ तो खासी ब्राह्मणवादी हैं :

सकल सुमृति जिती, संत मिति कहैं तिती, पाइ नहीं पनंग मति परंम बेता।
ब्रह्म रिषि नारदा स्यंभ सनिकादिका, राम रमि रमत गये परितेता।।

यदि रैदास यह कहते हैं कि ‘बरन रहित कहै जे रांम, सो भगता केवल निहकांम’

तो तुलसी के राम भी जात-पाँत नहीं मानते। सिर्फ़ भक्ति के नाते को मानते हैं:

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।।

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।।

भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।

तुलसी भी कहते हैं:

स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात।
रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात॥

और इसलिए यदि रैदास यह कहते थे कि:

माथे तिलक हाथ जपमाला, जग ठगने कूं स्वांग बनाया।
मारग छाड़ि कुमारग उहकै, सांची प्रीत बिनु राम न पाया॥

तो दुष्ट ब्राह्मण से तुलसी भी कोई सहानुभूति नहीं करते :

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना।
तजि निज धरमु बिषय लयलीना।

या

विप्र निरच्छर लोलुप कामी।
निराचार सठ बृषली स्वामी।

वे रैदास अपने समय की पराधीनताओं की प्रकृति को पहचानते थे:

पराधीनता पाप है, जान लेहु रे मीत।
रैदास दास पराधीन सौं, कौन करैहै प्रीत॥

और तुलसी भी ‘पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ की त्रासदी जानते थे। पर आज जिन्होंने भारत के बाल्कनाइजेशन के विदेशी विचार को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरह से अपना लिया है वे पराधीनमनस्क लोग स्वतंत्र चेतना के रैदास के शुभचिंतक कभी हो ही नहीं सकते।

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