अरविन्द केजरीवाल के कुछ गुमनाम मित्र

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कुछ मित्रों से पिछले दिनों मिला था। ये सभी अरविन्द केजरीवाल के 2011 के मित्र थे। वे जब अपना काम काज छोड़कर अरविन्द के साथ आए थे तब भी चुपके से आए थे। सोशल मीडिया पर किसी तरह की सोशेबाजी नहीं की थी। वे अपना नाम चमकाने नहीं बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई में अरविन्द का साथ देने आए थे।

अरविन्द के ये सभी मित्र आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे लेकिन आंदोलन जब राजनीतिक पार्टी में तब्दील हुआ तो इन्होंने उस वक्त भी केजरीवाल पर विश्वास किया। जब उनके इस निर्णय पर अन्ना हजारे स्वयं संदेह जता चुके थे। उनके मित्रों ने सोचा, अरविन्द जो भी करेंगे अच्छा करेंगे।

इन मित्रों का साथ बहुत अधिक दिनों तक नहीं रहा। अरविन्द मुख्यमंत्री बने। उन्हें सत्ता मिली और वे बदल गए। फिर धीरे-धीरे मित्रों का मोहभंग हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी बातचीत और व्यवहार में परिवर्तन आ गया था। जिस तरह की राजनीति का विरोध करने के लिए उन्होंने जंतर मंतर से कथित नई राजनीति की शुरूआत की। अरविन्द उसी तरह की राजनीति में मुब्तिला हो गए थे।

उनके मित्र मानते हैं कि अरविन्द ने दिल्ली की जनता के साथ विश्वासघात किया है। आने वाले सालों में किसी भी आंदोलन पर जनता को विश्वास नहीं होगा क्योंकि उनके पास अरविन्द केजरीवाल की मिसाल होगी।

इसीलिए अन्ना आंदोलन के बाद कोई भी आंदोलन जनता का विश्वास नहीं जीत पाया। इस पाप की जिम्मेवारी अरविन्द केजरीवाल को लेनी होगी। उन्होंने आंदोलन के नाम पर दिल्ली की जनता के साथ छल किया।

इस बार दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल की पुरानी टीम में शामिल ये महत्वपूर्ण मित्र नई दिल्ली सीट पर सक्रिय थे। अरविन्द केजरीवाल के प्रचार के लिए नहीं बल्कि जनता को उनकी सच्चाई बताने के लिए। वे खबर में नहीं थे लेकिन जमीन पर काम कर रहे थे।

अरविन्द के ये मित्र आंदोलन से लेकर पार्टी बनने तक साथ थे। पार्टी चलाने के तौर तरीके पर उन्होंने अपनी असहमति भर जताई थी, जिसे आप में सुना नहीं गया। मुख्यमंत्री बनने के बाद अरविन्द भी असमतियों को अधिक महत्व देने के मूड में नहीं थे। उन्होंने पार्टी के अंदर ऐसे कथित शिकायती लोगों को सुनना बंद कर दिया था। जिन्हें उन्होंने आंदोलन से जोड़ा था। वे अपनी नौकरी और कारोबार छोड़कर अरविन्द के बुलावे पर आए थे। उन्हें महत्व ना देकर अरविन्द ने उन्हें संदेश दे दिया था कि उनकी अब पार्टी को कोई जरूरत नहीं है।

इस तरह विचारवान और सार्थक काम करने वाले लोग धीरे-धीरे पार्टी छोड़कर जाते रहे। कुछ की चर्चा मीडिया में हुई। अधिकांश का लोगों ने नाम तक नहीं जाना।

2025 के विधानसभा चुनाव में अरविन्द को हराने के लिए उनके कुछ पुराने मित्र नई दिल्ली सीट पर सक्रिय थे। मीडिया में उनकी खबर नहीं आई लेकिन अपने कम संसाधनों के बीच उन्होंने मतदाताओं से ‘वास्तविक’ अरविन्द केजरीवाल का परिचय कराया। अब उनके अभियान की नई दिल्ली की सीट पर आए परिणाम में क्या भूमिका रही? यह बताना थोड़ा मुश्किल है लेकिन वह समूह कल भी गुमनाम था और आज भी उनके संबंध में लोग नहीं जानते।

‘सही प्रश्न’ में एक ग्लिच है

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राजीव मिश्र

आज एक मित्र ने एक वैलिड प्रश्न उठाया कि केजरीवाल ने अगर मोदी से शत्रुता के बजाय पार्टनरशिप की राजनीति की होती तो आज भी मजे से सत्ता भोग रहा होता. यह बात फ़ैक्चुअली सही है, लेकिन इस आकलन में सिर्फ एक बेहद महत्वपूर्ण और फंडामेंटल ग्लिच है… केजरीवाल होने के मनोविज्ञान का आकलन.

कोई केजरीवाल क्यों बनता है? केजरीवाल की सबसे मूल ग्रंथि है उसकी गहनतम हीन भावना.
केजरीवाल के बचपन की कल्पना कीजिए… वह अवश्य एक मरियल, दब्बू, झगड़ालू और ईर्ष्यालु बच्चा रहा होगा जिसको मोहल्ले के बच्चे साथ में खेलने नहीं देते होंगे. तो उसने सोचा, चलो इन सबको दिखा देता हूँ कि मैं कितना खास हूँ.. और वह पढ़ कर, एग्जाम पास करके आईआईटी में चला गया.
लेकिन आईआईटी पहुँचा तो पाया, वहाँ तो सभी आईआईटियन ही थे… वहां कौन इस बात की घास डालता. तो वहां वह पढ़ाई लिखाई छोड़कर एक्टिविज्म में लग गया. आईआईटी से निकल कर टाटा स्टील की नौकरी की तो वहां वह टाटा के CSR डिपार्टमेंट से जुड़ गया… उसमें उसे सीएसआर की फंडिंग और एक्टिविज्म की मलाई का रहस्य समझ में आया. टाटा में न टिक कर वह आईएएस बनने चला, जहां से सारी मलाई बंटती है… आईएएस बन नहीं पाया, रेवेन्यू सर्विसेज से संतोष करना पड़ा. तब वह फुल टाइम एक्टिविज्म में कूद पड़ा.

यानि यह व्यक्ति जहां भी रहा, इस कुंठा से ग्रस्त रहा कि वह अपने आस पास के लोगों से कमतर है. इसलिए वह एक फील्ड से दूसरे में कूदता रहा कि इस बार वह अपने को प्रूव कर देगा. उसे और किसी तरह की सुपीरियरिटी नहीं मिली तो मॉरल सुपीरियरिटी का क्लेम करता रहा. पर सेल्फ एस्टीम की कमी आसानी से दूर होने वाली कमी नहीं है. बचपन के मारियल, दब्बू, उपेक्षित अरविंद ने केजरीवाल का पीछा कभी नहीं छोड़ा. आपको कभी भी केजरीवाल के साथ उसका कोई बचपन का साथी नहीं मिलेगा. कोई भी, जो उसे पहले से और व्यक्तिगत रूप से जानता है वह उसके आसपास नहीं फटकेगा.

केजरीवाल का वामपंथी होना सिर्फ एक पॉलिटिकल आइडियोलॉजी का प्रश्न नहीं है, उसकी पूरी पर्सनालिटी का प्रश्न है…उसके चरित्र का भाग है. यह उसकी हीनभावना की उपज है. वह हमेशा उन सभी से द्वेष रखता है जो उससे बेहतर हैं. वह किसी भी अपने से योग्य व्यक्ति का मित्र हो ही नहीं सकता. केजरीवाल सत्ता के लिए भी मोदी से हाथ नहीं मिला सकता. मोदी के बगल में खड़े होने से ही वह हीन भावना से मर जाएगा. उसके जीवन की व्यर्थता, उसके चरित्र की तुच्छता उसे कभी मोदी के साथ खड़ा होने ही नहीं देगी.

केजरीवाल सही कहता है कि वह राजनीति में सत्ता का सुख लेने नहीं आया है… इसके लिए जो पर्सनल एंबीशन, जो महत्वाकांक्षा होनी चाहिए वह उसमें है ही नहीं. वह कोई भी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा रखने की चारित्रिक क्षमता ही नहीं रखता. सत्ता वह सत्ता का सुख भोगने के लिए नहीं खोजता. वह अपने जीवन की निरर्थकता का उत्तर सत्ता में खोजता है.

10 फरवरी 1993 : सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी डा गयाप्रसाद कटियार का निधन

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भारतीय स्वाधीनता संग्राम में कुछ ऐसे सेनानी हुये जिनका पूरा जीवन संघर्ष में बीता । पहले स्वतंत्रता के लिये अंग्रेजों से संघर्ष किया और स्वतंत्रता के बाद जन समस्याओं के निवारण के लिये अपनी ही सरकार से । सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ.गया प्रसाद कटियार ऐसे ही संघर्षशील सेनानी थे । स्वतंत्रता के लिये वे दोनों संघर्ष में सहभागी रहे । अहिसंक आँदोलन में भी और क्राँतिकारी गतिविधियों में भी ।

ऐसे विलक्षण स्वाधीनता संग्राम सेनानी डाक्टर गया प्रसाद कटियार का जन्म 20 जून 1900 को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिला अंतर्गत बिल्हौर तहसील के ग्राम जगदीशपुर में हुआ था। उनके पिता मौजीराम भारतीय औषधियों के वैद्य थे और माता नंदरानी भारतीय परंराओं के अनुरूप अपना जीवन निर्वाह करने वाली सुघड़ गृहस्थ थीं । परिवार आर्यसमाज से जुड़ा था । हाई स्कूल की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने कानपुर में मेडिसिनल प्रैक्टिस कोर्स किया और नाम के आगे डाक्टर उपाधि लगी । अपनी आजीविका और जनसेवा के लिये उन्होंने कानपुर में चिकित्सक व्यवसाय अपनाया । 1919 में उनका विवाह रज्जो देवी से हुआ । परिवार दायित्व और चिकित्सा व्यवसाय के साथ वे कानपुर आर्यसमाज शाखा से जुड़े । उन दिनों कानपुर आर्यसमाज भारतीय स्वाधीनता आँदोलन केलिये एक वैचारिक केन्द्र था । यहाँ उनकी भेंट अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों से हुई और वे अहिसंक आँदोलन से जुड़ गये । कानपुर में होने वाली प्रभात फेरी एवं सभाओं के आयोजन में सक्रिय हुये । असहयोग आँदोलन आरंभ हुआ तो डाक्टर गयाप्रसाद ने आँदोलन में भाग लिया और गिरफ्तार हुये । तभी चौरी चौरा काँड हुआ और गाँधीजी ने आँदोलन स्थगित कर दिया । डाक्टर गयाप्रसाद कटियार गाँधी जी के इस निर्णय से सहमत नहीं हुये । वे संघर्ष निरन्तर रखना चाहते थे । कानपुर आर्य समाज में उनका परिचय उस समय के सुप्रसिद्ध पत्रकार गणेशशंकर विद्यार्थी से हुआ था। विद्यार्थी प्रताप समाचार पत्र के संपादक थे । यह समाचार पत्र क्राँतिकारियों का एक प्रमुख मिलन केन्द्र था । विद्यार्थी के माध्यम से डाक्टर गयाप्रसाद जी क्राँतिकारी आँदोलन से जुड़े। यहाँ उनका परिचय क्राँतिकारी आँदोलन का नेतृत्व कर रहे चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु जैसे क्राँतिकारियों से बना और डा गयाप्रसाद कटियार का चिकित्सा केन्द्र भी इस क्राँतिकारी आँदोलन का गुप्त केन्द्र बन गया । डाक्टर गयाप्रसाद जी के लगभग सभी क्राँतिकारियों से गहरे संबंध थे । भगत सिंह और राजगुरु दोनों होली मनाने के लिए 20 मार्च, 1926 को डॉ. गया प्रसाद के गाँव जगदीशपुर भी गए थे ।

क्रांतिकारियों ने गया प्रसाद को बम तथा अन्य हथियार बनाने की फैक्ट्री बनाने का काम सौंपा। डा कटियार ने क्राँतिकारी बीएस निगम के नाम को आगे करके औषधि निर्माण कारखाने के नाम पर यह बम फैक्ट्री शुरू की । यह फैक्ट्री 10 अगस्त 1928 से 9 फरवरी 1929 तक चालू रही । कारखाने में छ्द्म नाम से अन्य क्रांतिकारी भी सक्रिय रहे जैसे क्राँतिकारी शिव वर्मा का नाम राम नारायण कपूर, चन्द्रशेखर आजाद का संबोधन पंडित जी, सुखदेव को बलेजर, महावीर सिंह को प्रताप सिंह, जयगोपाल को गोपाल और बच्चू की भूमिका में विजय कुमार सिन्हा के रूप में पहचान बनी । कहने के लिये यह औषधालय था पर इसका उपयोग बम बनाने के लिए था। कारखाने से अक्सर रासायनों की गंध आती थी पर पड़ोसी समझते थे कि यह औषधियों के निर्माण से उठने वाली गंध है ।

डाक्टर गयाप्रसाद कटियार को क्राँतिकारी आँदोलन के प्रमुख रणनीतिकारों में थे । माना जाता है कि सांडर्स वध की योजना एवं क्राँतिकारी भगतसिंह का नाम और स्वरूप बदलकर गुप्त केंद्रीय कार्यालय संचालन करने की रणनीति डा कटियार ने ही बनाई थी । दिल्ली की पार्लियामेंट में फेंके गए बम निर्माण आदि कार्यों में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा ।

पुलिस ने इस टोली की तलाश में रातदिन एक कर दिये । इसका संकेत क्राँतिकारियों को मिल गया था । सावधानी के बतौर उन्होंने यह बम फैक्ट्री सहारनपुर स्थानांतरित कर ली। लेकिन पुलिस को सूचना मिल गई । पुलिस ने छापा मारा और 15 मई 1929 को कटियार जी को बंदी कर लाहौर भेज दिये गये। उन्होंने यहां अन्य क्रांतिकारियों के साथ भूख हड़ताल आरंभ की। उन पर लाहौर षडयंत्र केस में शामिल होने का आरोप लगा और मुकदमा चला । उन्हे आजीवन कारावास की सजा सुनाकर लाहौर से अंडमान सेलुलर जेल दिया गया। अंडमान की जेल काला पानी के नाम से कुख्यात थी । जहाँ कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार होता था । डाक्टर गयाप्रसाद कटियार ने इसके विरोध में यहाँ भी भूख हड़ताल आरंभ की जो 46 दिन चली । इसी भूख हड़ताल में क्राँतिकारी महावीर सिंह का बलिदान हुआ था । उनके मुँह में बल पूर्वक भोजन खिलाने का प्रयास में ही उनका प्राणांत हो गया था । महावीर सिंह के बलिदान के बाद डाक्टर गयाप्रसाद कटियार को पहले अन्य जेल भेजा लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से सेलुलर जेल लाया गया । जब भारत की स्वतंत्रता लगभग सुनिश्चित हुई तब अंग्रेजों ने सभी राजनैतिक बंदी रिहा किये थे । 1946 में डाक्टर गयाप्रसाद जी भी रिहा हो गये ।

सेलुलर जेल से रिहा हुये तब शारीरिक रूप से बहुत कमजोर थे । उन्हें स्वस्थ होने में लगभग दो वर्ष लगे ।

स्वस्थ होने के बाद वे सामाजिक कार्यों में सक्रिय हुये और समाजवादी आँदोलन से जुड़ गये । इसके माध्यम से उन्होंने किसानों और श्रमिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष आरंभ किया। इन आँदोलनों में वे दो बार जेल गये । पहली बार 1958 में 6 महीने के लिए और फिर 1966 में डेढ़ साल के लिए। जेल से रिहा होकर उन्हें अनेक बीमारियों ने घेर लिया इससे सामाजिक आयोजनों में उनकी सक्रियता कम हुई और अंततः एक लंबी बीमारी के बाद 10 फरवरी 1993 को 93 वर्ष की आयु में उन्होंने संसार से विदा ली ।

भारत सरकार ने 26 दिसंबर 2016 को उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया। इसके लिये आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री सुश्री अनुप्रिया पटेल ने की थी ।

विकास, सुशासन और राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक जीत पर जेएनयू में स्नेहमिलन समारोह

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नई दिल्ली, जेएनयू | विकास, सुशासन और राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक विजय के शुभ अवसर पर आज शाम 04:00 बजे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में JNUTF के नवनियुक्त पदाधिकारियों द्वारा एक स्नेहमिलन समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्रों ने गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई और राष्ट्रहित में योगदान देने की प्रेरणा ली।

उल्लेखनीय उपस्थिति:

इस कार्यक्रम में प्रमुख रूप से डॉ. अंशु जोशी, डॉ. आयुषी केतकर, डॉ. ज्योति, डॉ. पूनम मेहता, डॉ. पल्लवी, प्रो. पवन कलेरिया, प्रो. केदार सिंह, प्रो. सुनील कटारिया, डॉ. आशीष, डॉ. अनिल कुमार सिंह, डॉ. लक्ष्मण बेहरा, डॉ. अभिषेक बंसल, डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव, डॉ. विजेंद्र, डॉ. दीप नारायण पांडेय, डॉ. नरेश वर्मा, डॉ. राम प्रवेश, डॉ. बुद्ध सिंह, डॉ. रामोतार मीणा एवं जेएनयू के अनेक छात्रों ने सहभागिता की।

सभी आमंत्रित अतिथियों ने इस स्नेहमिलन को एक महत्वपूर्ण अवसर बताया, जहां शिक्षकों और छात्रों ने अपने विचार साझा किए और इस ऐतिहासिक उपलब्धि की महत्ता को रेखांकित किया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी शिक्षकों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों ने राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका को और अधिक प्रभावी बनाने का संकल्प लिया।

इस आयोजन के सफल संचालन हेतु प्रो. सपना रतन शाह (JNUTF अध्यक्ष), डॉ. रवि वर्मा (JNUTF उपाध्यक्ष) और डॉ. गोपाल राम (JNUTF सह-सचिव) ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया और भविष्य में भी इसी ऊर्जा और समर्पण के साथ राष्ट्रहित में कार्य करने की प्रेरणा दी।

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