धर्म के नाम पर झूठ और कट्टरता का खतरनाक उदय

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आज का दिखावटी आधुनिक समाज झूठ और गलत सूचनाओं से तेजी से ग्रस्त हो रहा है, खास तौर पर सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानबाजी से। सच्चाई का यह क्षरण लोकतंत्र को कमजोर करता है और समुदायों में विश्वास की खाई को और चौड़ा करता है। विडंबना देखिए, जबकि धार्मिक प्रथाएं और अनुष्ठान बढ़ रहे हैं, सहिष्णुता, सहानुभूति और सह-अस्तित्व के मानवीय मूल्य कम हो रहे हैं। 
प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि धार्मिक मान्यताओं को आधुनिक बनाने के प्रतिरोध से यह और बढ़ जाता है, “समकालीन समाज में, झूठ का आलिंगन जीवन के विभिन्न पहलुओं में घुसपैठ कर चुका है, जिससे हम एक नए प्रतिमान में प्रवेश कर चुके हैं, जहां अक्सर धोखा सच्चाई की जगह ले लेता है। गलत सूचनाओं का प्रसार एक ऐसे माहौल को बढ़ावा देता है जिसमें तथ्य और मनगढ़ंत बातों के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।”
 यह खतरनाक प्रवृत्ति न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करती है, बल्कि सामाजिक सामंजस्य को भी बाधित करती है।  कट्टरता का पुनरुत्थान,  विभाजन को मजबूत करने और सत्ता की गतिशीलता को मजबूत करने के लिए हथियार बन जाता है। समाजवादी विचारक राम किशोर बताते हैं कि “धार्मिकता और इससे जुड़ी गतिविधियों में वृद्धि के बावजूद – जैसे यात्रा, परिक्रमा, भंडारा, जागरण, मार्च, रैलियाँ, नारे लगाना और सभी धर्मों के अनुयायियों द्वारा बड़ी सभाएँ – सह-अस्तित्व, सहिष्णुता और चरित्र विकास को बढ़ावा देने वाले आवश्यक मूल्यों में भारी गिरावट आई है। जबकि धार्मिक संस्थाएँ बढ़ती जा रही हैं और अनुष्ठान फल-फूल रहे हैं, आध्यात्मिक सार जिसे इन प्रथाओं को विकसित करने के लिए बनाया गया था, अक्सर किनारे पर गिर जाता है। व्यक्ति दूसरों के प्रति अपने कार्यों को निर्देशित करने वाले आंतरिक नैतिक कम्पास की तुलना में आस्था के बाहरी प्रदर्शन में अधिक व्यस्त दिखाई देते हैं।”
आस्था का राजनीतिक विचारधारा में परिवर्तन विशेष रूप से कपटी है। विभिन्न धर्मों के अनुयायी, समुदाय और सम्मान की भावना को बढ़ावा देने के बजाय, अक्सर हठधर्मिता का सहारा लेते हैं, अपने विश्वासों का उपयोग दूसरों पर प्रभुत्व स्थापित करने के साधन के रूप में करते हैं। धार्मिकता के अधिक आक्रामक रूप की ओर यह बदलाव धार्मिक औचित्य की आड़ में अनगिनत लोगों के जीवन को खतरे में डालता है, ये कहते हैं समाज शास्त्री टी पी श्रीवास्तव।”परिणामस्वरूप, विभिन्न धर्मों के बीच वास्तविक संवाद प्रभावित होता है, क्योंकि व्यक्ति अपने खुद के बनाए गए प्रतिध्वनि कक्षों में वापस चले जाते हैं। “
कट्टरपंथी धार्मिक संस्थाएँ पुरानी व्याख्याओं से चिपकी रहती हैं जो विकसित होते मानवीय मूल्यों और ज्ञान की निरंतर खोज को प्रतिबिंबित करने में विफल रहती हैं।
“समकालीन नैतिक मानकों के अनुसार सिद्धांतों को अनुकूलित करने की अनिच्छा सामाजिक प्रगति को रोकती है और अधिक समावेशी विश्वदृष्टि की क्षमता को बाधित करती है,” एक अमेरिकी लेखक ने कहा है। यह ठहराव एक ऐसे वातावरण को बढ़ावा देता है जहाँ अज्ञात के डर और अन्य विश्वासों के प्रति समझ की कमी के कारण कट्टरता पनपने लगती है।
अनुभव बताता है कि अधिकांश धर्मों के मूल में निहित करुणा, प्रेम और समझ के सिद्धांतों को नियमित रूप से अनदेखा किया जा रहा है। कंपटीशन है वर्चस्व का।  ब्रेन वाश के बाद हम दोहरे मानदंडों के आगे झुक जाते हैं, और खुद को ऐसे व्यवहार की अनुमति देते हैं जिसकी हम दूसरों में निंदा करते हैं, ये कहना है सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर का।”इस परिवर्तन के लिए व्यक्तियों को झूठ को नकारना होगा और व्यक्तिगत और सामुदायिक पहचान की आधारशिला के रूप में सत्य को अपनाना होगा।”
हकीकत ये है कि कट्टरपंथ का उदय एक कठिन चुनौती प्रस्तुत कर रहा है।  सभ्य समाज को इसे खत्म करने के प्रयास करने चाहिए।

पटना पुस्तक मेला – कभी ना भूलने वाला अनुभव

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शंभू शिखर
चालीस सालों से लगातार पटना में पुस्तक मेला आयोजित होता रहा है ।शहर वासियों के लिए यह किसी उपहार से कम नहीं है ।पुस्तक मेले में पाठकों की भीड़ भी प्रकाशकों को उत्साहित करती है । 
मेरा यह पहला अनुभव था । पहले काव्य पाठ का जहाँ ऐसा लग रहा था कि पुस्तक मेले की पूरी भीड़ कुछ देर के लिए सिर्फ़ कविता सुनने के लिए रुक सी गई है ।हर चेहरे पर हँसी ,सभी चेहरे पर वाह वाही और सभी साथ तालियों का ताल ठोकते दिख रहे थे ।
कवि सम्मेलन के तुरंत बाद मैं “प्रभात प्रकाशन “ के स्टॉल पर गया जहाँ मेरी छठी पुस्तक “चाँद पर प्लॉट “ बिक्री ले लिए उपलब्ध थी ।
किसी हिंदी कवि या लेखक के लिए यह सौभाग्य की बात ही होगी कि उसके पहुँचने के पहले पाठक पहुँचे हुए थे । देखते ही देखते माहौल इतना उत्साहित हो गया कि लोगों को बार बार निवेदन करके पंडाल से बाहर भेजना पड़ा । दो मिनट में ही बिक्री ले लिए रखी है सभी पुस्तकें लोगों ने खरीद डाली और फिर किताब पर हस्ताक्षर और सेल्फी लेने का सिलसिला शुरू हुआ। जल्दी जल्दी में भी 60 से अधिक किताबों पर “ऑटोग्राफ” देने में १० मिनट से अधिक समय लग गए । मेरे लिये यह सब अनोखा था । अविश्वसनीय था । अकल्पनीय था ।
कुछ समय पहले अल्लू अर्जुन को देखने के लिये जब पटना वासी आए तो लोगों ने खूब आलोचना भी की लेकिन कल पुस्तक मेले में लोगों की भीड़ देखने के बाद कह सकते हैं -पटना में अजीब सी दीवानगी है।

पुस्तक ‘नया भारत: मोदी दृष्टि और विकास का विमोचन’

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नई दिल्ली : कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में को पत्रकार और साहित्यकार श्री रवि पाराशर की पुस्तक ‘नया भारत: मोदी दृष्टि और विकास’ का विमोचन भारत सरकार के पर्यटन और संस्कृति मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत और प्रसार भारती के चेयरमैन श्री नवनीत सहगल ने किया। पुस्तक के अंग्रेजी अनुवाद का भी इस मौके पर विमोचन किया गया। अनुवाद डॉ. शबीना शेख औऱ डॉ. केशव पटेल ने किया है।

बुधवार को हुए विमोचन समारोह के मुख्य अतिथि श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि देश बदल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने विकास के कई प्रतिमान गढ़े हैं। उनके कार्यकाल में अभी तक वह हुआ है, जो 70 वर्षों में नहीं हुआ। श्री शेखावत ने कहा कि आज विकास का लाभ जन-जन तक पहुंच रहा है। मोदी सरकार की प्राथमिकता है कि सरकार की योजनाओं का लाभ समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचे।

उन्होंने कहा कि नकारात्मक राजनीति के बीच सकारात्मक चर्चा करना और सही को सही, अच्छे को अच्छा लिखने का साहस कम ही लोग कर पाते हैं। श्री रवि पाराशर ने यह काम किया है, तो वे बधाई के पात्र हैं। केंद्रीय पर्यटन और संस्कृति मंत्री ने कहा कि देश में राजनीतिक विरोधी भले मोदी सरकार के काम की आलोचना करें, मगर वैश्विक मंचों पर मोदी सरकार के कामकाज की सराहना होती है।

उन्होंने कोरोना काल में मोदी सरकार के काम और आतंकवाद के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक का जिक्र करते हुए कहा कि विपक्ष ने उन मौकों पर भी नकारात्मक राजनीति ही की। श्री शेखावत ने कहा कि पहले गरीबी हटाओ के नारे बहुत लगते थे, मगर उस पर काम कभी नहीं होता था। अब सरकारी तंत्र में पूरी तरह पारदर्शिता है। अब हर गरीब तक सरकारी योजनाओं का लाभ शत प्रतिशत पहुंचता है। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भारत में विकास की दिशा में उठाए गए कदमों और देश के भविष्य की संभावनाओं को समझने का महत्वपूर्ण साधन है।

इस मौके पर प्रसार भारती के चेयरमैन श्री नवनीत सहगल ने कहा कि रवि पाराशर की पुस्तक ‘नया भारत: मोदी दृष्टि और विकास’ न सिर्फ मोदी सरकार की नीतियों पर सकारात्मक टिप्पणियां की गई हैं, बल्कि लेखक ने अपनी ओर से सुझाव देते हुए टिप्पणियां भी की हैं।

इस अवसर पर लेखक श्री रवि पाराशर ने पुस्तक की लेखन प्रक्रिया और प्रेरणा के बारे में अपने विचार साझा किए। अनुवादकों सुश्री डॉ. शबीना शेख और श्री केशव पटेल ने भी अपने अनुभव साझा किए और बताया कि किस प्रकार यह पुस्तक भारत की जड़ों और भविष्य के दृष्टिकोण को जोड़ती है।

इस आयोजन में डॉ. सुरेंद्र सिंघल और तनुल सिंघल समेत कई साहित्य प्रेमी, बुद्धिजीवी और श्री गोविंद सिंह, श्री राजकुमार सिंह, सुश्री सर्जना शर्मा, श्री खुशदीप, श्री ब्रह्म प्रकाश दुबे, श्री अवनींद्र कमल समेत कई वरिष्ठ मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित थे। प्रकाशक किताबवाले के मैनेजिंग डायरेक्टर श्री प्रशांत जैन ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों को धन्यवाद देते हुए कहा कि यह पुस्तक केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि नई सोच का प्रारंभ है। कार्यक्रम का संचालन श्री केशव पटेल ने किया।

शतरंज की दुनिया का नया नायक -डी गुकेश

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भारत के शतरंज प्रेमियों के लिए वर्ष 2024 का लेखा – जोखा 18 वर्षीय भारतीय ग्रैंडमास्टर डी. गुकेश ने सुनहरे अक्षरों में उस समय लिख दिया जब उन्होंने सिंगापुर में गत चैपिंयन चीनी ग्रैंडमास्टर डिंग लिरेन को फिडे विश्व चैपिंयनशिप में 14 बाजियों में मात दी और विश्व शतरंज के सबसे युवा चैपिंयन बन गये। क्लासिकल शतरंज की शुरुआती 13 बाजियों में 6.5-6.5 अंक से बराबरी पर चल रहे दोनों खिलाडियों को टाई ब्रेकर में जाने से बचने के लिए यह मैच किसी भी हाल में जीतना था और गुकेश ने यह बाजी अपने नाम करके इतिहास रच दिया।

भारत के पूर्व शतरंज मास्टर विश्वनाथ आनंद के बाद डी गुकेश ऐसे दूसरे भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्होंने यह वैश्विक खिताब अपने नाम किया है। गुकेश के पूर्व पूर्व सोवियत संघ के गैरी कास्परोव ने 22 वर्ष की अवस्था में यह ख़िताब अपने नाम कर इतिहास रचा था जिसको 18 वर्षीय गुकेश ने ध्वस्त कर दिया है। यह ऐतिहासिक विजय प्राप्त करने के साथ ही डी गुकेश को 21.21 करोड़ रूपये की धनराशि प्राप्त हुई है।

वर्ष 2024 शतरंज की दुनिया में भारत और डी. गुकेश के लिए बहुत ही शानदार रहा है। इस वर्ष गुकेश ने कैडिडेटस टूर्नामेंट जीतकर लिरेन को चुनौती देने का अधिकार प्राप्त किया और इस प्रकार वह विश्व चैपिंयन को चुनौती देने वाले पहले सबसे युवा भारतीय बने। उन्होंने यह खिताब विश्व नंबर 2 कारुआना, विश्व नंबर तीन नाकामुरा और भारत के प्रगनानंद की उपस्थिति में जीता। इसी वर्ष उन्होंने भारत को पहली बार चेस ओलम्पियाड चैपिंयन बनाया। गुकेश ने यहां शीर्ष बोर्ड पर व्यक्तिगत स्वर्ण पदक भी जीता।ओलम्पियाड में भारत ने महिला ओैर ओपेन दोनों वर्ग में स्वर्ण जीतकर इतिहास रचा था।
इससे पूर्व डी गुकेश ने 2015 में एशियन स्कूल शतरंज चैपिंयनशिप ओर अंडर- 12 श्रेणी में 2018 में विश्व युवा शतरंज चैम्पियनशिप का अंडर -9 वर्ग जीता। गुकेश इससे पहले अंडर-12 व्यक्तिगत रेपिड और ब्लिटज अंडर -12 टीम रैपिड और ब्लिटज और अंडर 12 शास्त्रीय प्रारूपों में 2018 एशियाई युवा शतरंज में पांच स्वर्ण जीतकर इतिहास रच चुके हैं। वह मार्च 2018 में फ्रांस में 34वें ओपन डे कैंपले ला ग्रांडे शतरंज टूर्नामेंट के समापन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर के सबसे युवा खिलाड़ी बने और अब वे विश्व चैपिंयन हैं।

गुकेश का जन्म चेन्नई में 29 मई 2006 को हुआ, इनके पिता डा. रजनीकांत और माता डा. पद्मा हैं। गुकेश को बचपन से ही शतरंज खेलने का शौक था और उन्हें घर से बाहर जाना पड़ता था इसलिए उनके पिता ने अपनी नौकरी तक छोड़ दी थी। गुकेश की प्रारम्भिक शिक्षा उस विद्यालय में हुई है जहां से कार्तिकेयन, अरविंद चिदंबरम, प्रगनानंद जैसे ग्रैंडमास्टर निकल चुके हैं। गुकेश ने शतरंज का अभ्यास मात्र 7 वर्ष की अवस्था से ही आरम्भ कर दिया था और वह बचपन से ही शतरंज की दुनिया के नये सबसे युवा नायक बनना चाहते थे, अब उनका यह सपना पूरा हो चुका है। उनके विद्यालय कोच भास्कर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना था और उन्हें प्रशिक्षण देना प्रारम्भ किया।

आज संपूर्ण भारत गुकेश को बधाई दे रहा है । राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला सहित अनेक राजनेताओें व हस्तियों ने उनको बधाई दी है। जीत के बाद गुकेश की आंखों में खुशी के आंसू थे और चेहरे पर मुस्कान।अपनी विजय के बाद डी गुकेश ने कहा कि यह उनके जीवन का सबसे बेहतरीन पल है। गुकेश का प्रदर्शन शतरंज के युवा भारतीय खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा की तरह काम करेगा।

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