पहले करो चुनाव सुधार, फिर एक राष्ट्र, एक चुनाव

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भारत सरकार द्वारा “एक राष्ट्र, एक चुनाव” के लिए जोर देने से उन महत्वपूर्ण मुद्दों की अनदेखी हो रही है, जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। एकल चुनाव प्रारूप को अपनाने से पहले, समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए व्यापक चुनावी सुधार आवश्यक हैं। मुख्य सुधारों में पहले आबादी का चार सालों से लंबित सेंसस हो, जनसंख्या गतिशीलता के आधार पर संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों को युक्तिसंगत बनाना, राजनीतिक दलों में लोकतांत्रिककरण और पारदर्शिता सुनिश्चित करना तथा वंशवादी शासन को समाप्त करना शामिल है। बाहुबल और राजनीतिक हिंसा से निपटने के उपायों के साथ-साथ कैंपेन फंड्स यानी अभियान वित्त का सख्त विनियमन आवश्यक है। उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि की जाँच, शैक्षिक योग्यता और सार्वजनिक सेवा का ट्रैक रिकॉर्ड उम्मीदवारी के लिए अनिवार्य होना चाहिए।

ये सुधार धन और शक्ति के प्रभाव को कम करने में मदद करेंगे, जिससे नागरिकों के सर्वोत्तम हितों की सेवा करने वाली लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुनिश्चित होगी। तभी एकीकृत चुनाव प्रारूप पर विचार किया जा सकता है। इन परिवर्तनों को लागू करने से अनुचित परिणामों को रोका जा सकेगा, यह सुनिश्चित होगा कि उम्मीदवारों का मूल्यांकन योग्यता और विचारों के आधार पर किया जाए, राजनीतिक प्रणाली की अखंडता को बनाए रखा जाए और लोगों की सच्ची इच्छा को प्रतिबिंबित किया जाए।

“एक राष्ट्र, एक चुनाव” को अपनाने से पहले व्यापक सुधार आवश्यक हैं। भारत के लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए चुनावी सुधार को प्राथमिकता दे मोदी सरकार।

केंद्र सरकार को चुनावी प्रक्रिया को सुधारने और उसे कारगर बनाने के लिए तत्काल कदम उठाने चाहिए। राजनीतिक दलों के ढांचे को लोकतांत्रिक और पारदर्शी बनाने की जरूरत है। राजनीतिक संगठनों में वंशवादी शासन को खत्म करने के लिए प्रभावी उपाय किए जाने चाहिए।

आज के राजनीतिक परिदृश्य में, खेल के मैदान को समतल करने और धन और बाहुबल के प्रभाव को कम करने के लिए कठोर चुनावी सुधारों की आवश्यकता तेजी से बढ़ गई है। चुनावों में धन और बल का अत्यधिक प्रभाव लोकतंत्र के मूल तत्व को कमजोर करता है और अनुचित परिणामों को जन्म दे सकता है जो वास्तव में लोगों की इच्छा को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

चुनावों में बाहुबल के इस्तेमाल से निपटने के उपाय आवश्यक हैं। राजनीतिक हिंसा और धमकी का लोकतांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं है और इसका त्वरित और गंभीर परिणाम भुगतना चाहिए। कानून प्रवर्तन को मजबूत करना और मतदाताओं और उम्मीदवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना इन बलपूर्वक युक्तियों को चुनाव परिणामों को विकृत करने से रोकने में मदद कर सकता है।

इस प्रकार, जबकि “एक राष्ट्र, एक चुनाव” के विचार के अपने गुण हो सकते हैं, यह जरूरी है कि हम पहले अपनी चुनावी प्रणाली को प्रभावित करने वाले बुनियादी मुद्दों को संबोधित करें। निष्पक्ष, पारदर्शी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए व्यापक सुधार आवश्यक हैं जो लोगों की सच्ची इच्छा को दर्शाता है। तभी हम पूरे देश के लिए एकीकृत चुनाव प्रारूप के कार्यान्वयन पर विचार कर सकते हैं।

बहुत कुछ कहता है-‘दी मोहन खोकर डांस कलेक्शन’

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डा सचिदानंद जोशी, डॉ सोनल मानसिंह पद्मा सुब्रमण्यम आदि आईंजीएनसीए के न्यासी ने सिर्फ प्रशंसा या सराहना नहीं की अपितु डांस कलेक्शन का संरक्षण किया और संभाला भी है

तिब्बती भाषा में भारत का नाम ‘ग्यागर‘ है। ग्यागर का अर्थ है-कला और नृत्य की भूमि। नृत्य के आदि जनक नटराज यानि शिव और नटनागर यानि कृष्ण की कला और नृत्य की भारत भूमि में नृत्य के जरिए सौंदर्यबोध और आनंद की पराकाष्ठा की परिकल्पना की गई है। इसके लिए कलाकार अंग-प्रत्यंग, भाव, मुद्राओं, भंगिमाओं, अभिनय से रस की सृष्टि करता है। सौंदर्य और सृजन के लिए कलाकार को दैहिक और मानसिक रूप से अनुभव से गुजरना पड़ता है। खुद को अंदर से खाली करके अपने व्यक्तित्व के बजाय राधा, द्रौपदी या अष्टनायिका को सोचना होता है। तभी भरतनाट्यम नृत्यांगना बाला सरस्वती की ‘बेगनिबारो‘, ओडिसी गुरू केलुचरण महापात्र का जटायु मोक्ष, कथक नृत्यांगना उमा शर्मा की ‘हमरी अटरिया पे आ जा संवरिया‘, कथक सम्राट बिरजू महाराज का ‘कृष्ण का बाललीला‘ देखने वाले के मन में गहराई में उतर कर भावनाओं की अमिट
छाप छोड़ती है।

शायद, इस तरह की गहराई ने ही महान संस्कृति विद् और कला संग्राहक मोहन खोकर को भीतर तक छुआ होगा और वह कला के अनादि-अनंत सफर पर निकल पड़े होंगे। मोहन खोकर नृत्य के दस्तावेज तैयार करने वाले भारत के प्रमुख विद्वान रहे हैं। उन्होंने कथक नृत्य सीखा। लाहौर में उदयशंकर नृत्य शैली को सीखा। उन्होंने मद्रास जाकर भरतनाट्यम की तालीम हासिल की। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैली, इस नृत्य शैली
से जुड़े कलाकारों व समारोहों के संदर्भ में सबसे पहले पत्रिकाओं, जर्नल्स और समाचार पत्रों में लिखना शुरू किया। चुकि वह फोटोग्राफी भी करते थे, तो उस समय वह अपनी आलेखों से संबंधित फोटो भी खुद ही खींचते थे। उन्होंने स्वतंत्र, फ्री प्रेस जर्नल, पुष्पांजलि, दी इलस्टेड वीकली, मार्ग आदि में लंबे समय तक कला पर लेखन कार्य किया।

संस्कृति विद् और लेखक डाॅ आशीष मोहन खोकर के अनुसार उनके पिता मोहन खोकर का जन्म तीस दिसंबर 1924 ईस्वी को क्वेटा, अविभाजित भारत के सिंध पंजाब प्रांत में हुआ था। वहां बहुत भयानक भूकंप आया था। इसके बाद, 31 मई 1935 ईस्वी में उनका परिवार लाहौर में आकर बस गया। उनदिनों शास्त्रीय नृत्य कथक को ‘नाच’ के नाम से जाना जाता था, सो यहीं पर बालक मोहन खोकर ने कथक नृत्य सीखना शुरू किया। उनके पहले गुरु पंडित प्यारेलाल थे। उनदिनों उदयशंकर यदा-कदा लाहौर आते-जाते रहते थे। उनका झुकाव पंडित उदयशंकर नृत्य शैली सीखने के प्रति हुआ। इस क्रम में वह पंडित रामगोपाल और पंडित उदय उदयशंकर से नृत्य सीखने लगे। वास्तव में, कला विद् मोहन खोकर स्वयं पंडित उदयशंकर के व्यक्तित्व और कला से बहुत प्रभावित थे। इसलिए उन्होंने उदयशंकर नृत्य शैली को सीखा भी और जब कभी अवसर मिला मंच प्रस्तुतियां भी दीं।

भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रति उनका प्रेम अद्वितीय था। इसलिए जब उन्हें भरतनाट्यम नृत्य सीखने का मन हुआ तो वह लाहौर से मद्रास पहुंच गए। यह सन् 1945 की बात है। उनके इस जुनून से कलाक्षेत्र की संस्थापिका रूक्मिणी देवी अरूंडेल बहुत खुश हुई थीं। वह इस बात से भी खुश थीं कि एक सिक्ख नौजवान भरतनाट्यम नृत्य सीखने के लिए मद्रास आया है। उन्होंने रूक्मिणी देवी अरूंडेल के सान्निध्य में भरतनाट्यम सीखा।

संस्कृति विद् मोहन खोकर ने जीवन भर कला जगत के लिए कला से संबंधित संग्रह का अद्भुत कार्य किया। उनके संग्रह में उनके द्वारा खींची गईं लगभग एक लाख तस्वीरें हैं। उनके द्वारा संग्रहित कलेक्शन में विभिन्न कार्यक्रमों, समारोहों और आयोजनों से जुड़ीं लगभग तीस हजार ब्रोशर हैं। इसके अलावा, इन गतिविधियों से जुड़ी पच्चीस हजार प्रेस कटिंग्स हैं। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और लोक नृत्य के बारे में पांच किताबें लिखा था। उनके कुछ पुस्तकों के नाम है-डांसिंग भरतनाट्यम-अडवु, ट्रेडिशंस आॅफ इंडिया डांस, बाॅयोग्राफी आॅफ उदयशंकर, स्पलेंडर्स आॅफ इंडियन डांस और फोक डंास। वैसे ये किताबें अब आउट आॅफ प्रिंट हैं। उन दिनों उनकी इन किताबों को कई विश्वविद्यालयों ने अपने पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया था। दरअसल, अपने इन महती प्रयासों के माध्यम से वह भारतीय शास्त्रीय नृत्य के भविष्य को सुरक्षित रखना चाहते थे। इस बाबत उन्होंने कई नृत्यांगनाओं, शोधकर्ताओं और विद्वानों का मार्गदर्शन किया। निसंदेह उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य को संपूर्णता और समग्रता से समझा और उसे नया आयाम देने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

गौरतलब है कि देश की आजादी से पहले सन् 1930 ईस्वी से ही मोहन खोकर ने नृत्य से संबंधित सामग्रियों का संग्रह और संकलन शुरू कर दिया था। इस संग्रह में मूर्तियां, वस्त्र, पटाखे के पैकट, दीए, माचिस की डिबिया आदि शामिल हैं। इन सामग्रियों का स्थाई संग्रह इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में ‘दी मोहन खोकर डांस कलेक्शन-एम के डी सी’ में व्यवस्थित रूप से उपलब्ध है। इस संग्रह में बाला सरस्वती, एम के सरोजा, इंद्राणी
रहमान, यामिनी कृष्णमूर्ति, डाॅ सोनल मानसिंह उनके नृत्य परफाॅर्मेंस की तस्वीरें, पोस्टर, निमंत्रण पत्र आदि बहुत सुघड़ता से सुरक्षित और प्रदर्शित किया गया है। कलेक्शन में प्रदर्शित सौ साल पुराने भरतनाट्यम नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई के पोस्टर सुरक्षित रखा गया है। इसके अलावा, कलाकारों के काॅस्ट्यूम, ज्वेलरी और उपहारों को भी सहेजा गया है। देश के जाने-माने कलाकारों के संबंध में प्रकाशित सामग्रियां-पत्रिकाएं, अखबारों को करीने से प्रदर्शित किया गया है। इसमें कला से संबंधित विश्व के प्रतिष्ठित पत्रिकाएं और जर्नल्स का एक विशेष दी्रर्धा है। माचिस की डिबिया, ताश के पत्ते, साबुन के रैपर पर भी अगर नृत्य से जुड़े चित्र या तस्वीर है, तो वह मोहन खोकर के नजर में आई और उसे उन्होंने संभाल कर रखा है। यह उनकी पारखी नजर ने उसकी कीमत को पहचाना है। यह संग्रह आने वाली पीढ़ी के लिए शास्त्रीय नृत्य परंपरा और उससे जुड़ी गतिविधियों और सामग्रियों के बारे में जानने समझने के लिए समुचित व्यवस्था माना जा सकता है। किसी भी जिज्ञासु को किसी भी कलाकार के बारे में कुछ जानने की इच्छा है, तो यह संग्रह उसके लिए किसी स्वर्ग की तरह है। जहां उसे सब कुछ एक साथ मिल सकता है।

एम के डी सी के संदर्भ में, वरिष्ठ कला समीक्षक और संगीत नाटक अकादमी की पूर्व उपाध्यक्ष शांता सरबजीत सिंह का कहना था कि मोहन खोकर ने अपने संग्रह की शुरूआत मद्रास से की थी। उन्होंने शास्त्रीय नृत्य की पुरानी किताबों और सामग्रियों को इकट्ठा किया था। उन्होंने वाजिद अली शाह की किताब की प्रति को खरीदा था। उनके संग्रह में उदय शंकर जी का चैदह घंटे की लंबी इंटरव्यू उन्हीं की आवाज में सुरक्षित रखा गया था।

उस समय ऐसा अनुकरणीय काम करना आसान नहीं था। यह भी महत्वपूर्ण है कि उनके संग्रह में भारतीय संस्कृति के पुर्नजागरण काल के प्रणेताओं, जैसे- मार्था ग्राहम, टेड शान, बाला सरस्वती, रूक्मिणी देवी अरूंडेल, इ के असर, रामगोपाल आदि के साक्षात्कार सुरक्षित हैं। प्रतिभावान कला साधक मोहन खोकर ने बड़ौदा के एम एस विश्वविद्याल में नृत्य विभाग के विभागाध्यक्ष नियुक्त हुए, जब उनकी उम्र सिर्फ पच्चीस साल की थी। दिल्ली में उन्होंने संगीत नाटक अकादमी में अठारह

वर्ष तक अपनी सेवा प्रदान किया। इस प्रवास के दौरान उन्होंने कृष्णचंद नायक, दक्षा सेठ, शशधर नायर आदि को मदद किया। इसके अलावा, साठ के दशक में कथकलि गुरुओं को दिल्ली में पांव जमाने में मदद किया।

दी मोहन खोकर डांस कलेक्शन को राष्ट्रीय नृत्य संग्रहालय का रूप दिया जा सकता है। यह उनकी स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनके सुपुत्र आशीष मोहन खोकर अपने व्यक्तिगत प्रयासों से इस संग्रह को संरक्षित किया है। बहरहाल, वर्तमान समय में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एक कला दीर्घा-दी मोहन खोकर डांस कलेक्शन के रूप में प्रदर्शित है। इसे डिजिटल रूप देने का प्रयास जारी है।

इस कलेक्शन के संरक्षक व न्यासी आशीष मोहन कहते हैं कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के मुख्य सचिव डाॅ सच्चिदानंद जोशी, नृत्य संबंधित न्यासी डाॅ सोनल मानसिंह, भरतनाट्यम नृत्यांगना डाॅ पद्मा सुब्रह्मण्यम, प्रो भरत गुप्त, सरयू दोषी और प्रसून जोशी सभी ने हर मोड़ पर इस खजाने की सबने तारीफ की है। डाॅ अचल पांडया ने कई कर्मचारियों को इस संग्रह की देखभाल के लिए नियुक्त किया है, ताकि इस धरोहर की देखरेख और संरक्षण बेहतर हो सके। जब भी इस धरोहर के बारे में सोचता हूं तो मन पिता जी की दूरदृष्टि के प्रति नतमस्तक हो जाता है। इस धरोहर को संजोने में दो पीढ़ियों की मेहनत साफ-साफ दिखती है।

रिवर कनेक्ट कैंपेन ने विश्व नदी दिवस मनाया

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आगरा: आज शाम रिवर कनेक्ट कैंपेन के सदस्यों ने यमुना आरती स्थल पर विश्व नदी दिवस मनाया और अपना मांग पत्र प्रस्तुत किया।

रिवर कनेक्ट अभियान की मांग है:

यमुना में पूरे साल नियमित न्यूनतम प्रवाह हो। डाउनस्ट्रीम शहरों के लिए पानी का हिस्सा हरियाणा और दिल्ली को छोड़ना होगा। नदी को जीवित रखने और शहर में जलीय जीवन की रक्षा करने के साथ-साथ प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए यह पहली आवश्यकता है।

दिल्ली से आगरा तक नदी में खुलने वाले सभी नालों को मोड़ना होगा। हमें परवाह नहीं है कि कैसे और किस कीमत पर। बस करो। एक भी नाले को अनुपचारित अपशिष्ट जल को बहाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यूपी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को प्रदूषण फैलाने वालों की पहचान करनी चाहिए और उनके खिलाफ उचित कार्रवाई करनी चाहिए। प्रदूषण अधिनियम में जेल की सजा और दंड का प्रावधान है……प्रक्रिया शुरू करें……कृपया कोई बहाना न बनाएं

हम मांग करते हैं कि नदी के तल को साफ किया जाए, ड्रेजिंग की जाए और गाद निकाली जाए। कम से कम एक मीटर गाद हटानी होगी ताकि पानी रिसकर शहर के भूजल स्तर को ऊपर उठा सके। नदी के किनारे घाटों का रखरखाव करना होगा, कूड़ेदान रखने होंगे, प्रदूषणकारी सामग्री के विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना होगा….. धोबी और डेयरी….पशुपालकों को नदी को प्रदूषित करना बंद करना होगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पहले से ही मौजूद हैं। उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करें। यमुना, उटांगन, करबन आदि की सहायक नदियों को भी साफ करना होगा और बारिश के पानी को संग्रहित करने के लिए चेक डैम बनाने होंगे। पूरे शहर में सामुदायिक तालाबों की पहचान करके उन्हें साफ करना होगा। कई तालाब गायब हो गए हैं, लेकिन जो बचे हैं, उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। विशाल कीथम झील (सूर सरोवर) जो कभी गर्मियों के महीनों में आगरा के लिए आपातकालीन जलाशय हुआ करती थी, उसे भी साफ करने और जीर्णोद्धार करने की आवश्यकता है। और अंत में, (बेशक कई और मांगें हैं, लेकिन वे बाद में भी हो सकती हैं) हमें ताजमहल के नीचे की ओर एक बैराज की तत्काल आवश्यकता है। ताजमहल, एत्माउद्दौला, राम बाग के पीछे छह फुट तक पानी जमा होना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

आज की गोष्ठी में डा देवाशीष भट्टाचार्य, डा हरेंद्र गुप्ता, गोस्वामी नंदन श्रोतीय, चतुर्भुज तिवारी राकेश गुप्ता राजकुमार माहेश्वरी दिलीप जैन
राकेश बघेल आदि मौजूद रहे।

रिवर कनेक्ट कैंपेन के संयोजक ब्रज खंडेलवाल ने अपने वक्तव्य में आगरा के मंत्री गण, सांसद, विधायक, और अन्य नेताओं से आग्रह किया कि यमुना नदी जो कि शहर की जीवन रेखा है, धर्म और आस्था का केंद्र है, उसके संरक्षण के लिए, अति शीघ्र आवश्यक कदम उठाएं।

एक राष्ट्र, एक चुनाव: भारत के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए खतरा

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दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित “एक राष्ट्र, एक चुनाव” पहल को लागत कम करने, विकर्षणों को कम करने और चुनावी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के समाधान के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। हालाँकि, करीब से देखने पर पता चलता है कि यह प्रस्ताव वास्तव में भारत के जीवंत लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर सकता है। चुनाव ही लोक तंत्र की आत्मा होते हैं। पैसा बचाने के नाम पर सरकार इस प्रजातांत्रिक त्यौहार का आकर्षण खत्म करना चाहती है। एक चुनाव ही है जिससे हर निरंकुश शासक घबराता है।

चुनावों को समेकित करने से, नागरिकों के पास अपने प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने और देश की दिशा को आकार देने के कम अवसर होंगे। एक समान चुनाव कार्यक्रम क्षेत्रीय गतिशीलता और गंभीर मुद्दों को कमजोर कर सकता है, स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक आवाज़ों और विचारों की विविधता को दबा सकता है। चुनाव स्थानीय चिंताओं को संबोधित करने के लिए एक मंच के रूप में कार्य करते हैं, और इस प्रक्रिया को केंद्रीकृत करने से राजनीतिक विमर्श के एकरूप होने का जोखिम होता है।

चुनाव के अवसरों को सीमित करने से सत्तावादी प्रवृत्तियों के लिए प्रजनन भूमि बन सकती है, जो एक कार्यशील लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण जाँच परख और संतुलन को नष्ट कर सकती है। यह प्रस्ताव, प्रेशर वाले मुद्दों से ध्यान हटा सकता है और कुछ लोगों के हाथों में सत्ता को मजबूत कर सकता है। यह तर्क कि एक ही चुनाव चक्र से लागत बचत होगी, व्यापक वित्तीय कुप्रबंधन मुद्दों, जैसे वीआईपी संस्कृति और सार्वजनिक संसाधनों को खत्म करने वाली प्रणालीगत अक्षमताओं को नजरअंदाज करता है। पैसे बचाने के लिए चुनाव आवृत्ति को कम करना अंततः उल्टा साबित हो सकता है।

याद रखें कि समाजवादी विचारक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने क्या कहा था “ज़िंदा कौमें पाँच साल इंतज़ार नहीं करतीं।”

शॉर्टकट की तलाश करने के बजाय, नीति निर्माताओं को नागरिकों को सशक्त बनाने, संस्थानों को मजबूत करने और शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने पर ध्यान देना चाहिए।

“एक राष्ट्र, एक चुनाव” पहल, हालांकि सतही तौर पर “हार्मलेस” और कुशल प्रतीत होती है, लेकिन आगे जाकर ये भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा कर सकती है। लोकतंत्र का सार नागरिकों को अपनी राय व्यक्त करने और अपने नेताओं को जवाबदेह ठहराने के लिए लगातार और निष्पक्ष अवसर में निहित है। चुनावों की आवृत्ति को कम करके, हम एक ऐसा राजनीतिक माहौल बनाने का जोखिम उठाते हैं जहाँ नेताओं को अपने मतदाताओं की ज़रूरतों को पूरा करने और प्रदर्शन करने का कम दबाव महसूस होता है।

इसके अलावा, भारत की क्षेत्रीय विविधता का मतलब है कि विभिन्न राज्यों के अलग-अलग मुद्दे और प्राथमिकताएँ हैं। चुनावों के लिए एक ही तरह का दृष्टिकोण अपनाने से स्थानीय मुद्दों की उपेक्षा हो सकती है, क्योंकि राष्ट्रीय दल विशिष्ट क्षेत्रीय चिंताओं की तुलना में व्यापक, अधिक सामान्यीकृत मंचों को प्राथमिकता दे सकते हैं। इससे मतदाता अलग-थलग पड़ सकते हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की समग्र प्रभावशीलता कम हो सकती है।

बढ़ती अधिनायकवाद की संभावना एक और गंभीर चिंता है। कम चुनावों के साथ, सत्ता को नियंत्रित रखने वाले तंत्र कमजोर हो सकते हैं, जिससे कुछ लोगों के हाथों में सत्ता का केंद्रीयकरण हो सकता है। इससे स्वस्थ लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण जाँच और संतुलन में कमी आ सकती है।

वित्तीय रूप से, लागत बचत का तर्क भी दोषपूर्ण है। चुनावों से जुड़ी लागत लोकतांत्रिक प्रक्रिया में एक आवश्यक निवेश है। पैसे बचाने के लिए चुनावों में कटौती करने के बजाय, बेकार के खर्चों को कम करने और शासन की दक्षता में सुधार करने की दिशा में प्रयास किए जाने चाहिए।

इस प्रकार, जबकि “एक राष्ट्र, एक चुनाव” पहल तार्किक और वित्तीय लाभ प्रदान करती प्रतीत हो सकती है, भारत के लोकतंत्र के लिए संभावित जोखिम इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। हमारा ध्यान लोकतांत्रिक प्रथाओं को बढ़ाने, जवाबदेही सुनिश्चित करने और भारत की विविध आबादी की अनूठी जरूरतों को संबोधित करने पर होना चाहिए। तभी हम वास्तव में अपने लोकतंत्र को मजबूत कर सकते हैं और अपने राष्ट्र को परिभाषित करने वाले मूल्यों को कायम रख सकते हैं।

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