कैसे बना बांग्लादेश

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आज जिसे हम बांग्लादेश कहकर पुकारते हैं, वह पहले पाकिस्तान का हिस्सा था। उसे पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था। पश्चिम पाकिस्तान जो अब पाकिस्तान है। वहां का सिंध और पंजाब वाला हिस्सा था, वह पाकिस्तान में हमेशा से हावी रहे। दूसरी तरफ पूर्वी पाकिस्तान में थोड़ी गरीबी थी क्योंकि उसकी हमेशा से देश में उपेक्षा होती थी। यह क्षेत्र बंगाली मुसलमान बहुल क्षेत्र था। जिन्हें सिंध और पंजाब के मुसलमान हेय दृष्टि से देखते थे। उनका प्रभुत्व पाकिस्तान पर चल रहा था। यहां उल्लेखनीय है कि पूर्वी पाकिस्तान की जनसंख्या पाकिस्तान के अंदर पश्चिमी पाकिस्तान से अधिक थी।

पूर्वी पाकिस्तान के हिस्से में उन दिनों जहां 162 सीट आती थी, वहीं पश्चिमी पाकिस्तान के हिस्से में 138। इसलिए पाकिस्तान में 1970 के ऐतिहासिक चुनाव में पूर्वी पाकिस्तान के बड़े ही लोकप्रिय नेता शेख मुजीबुर रहमान की जीत हुई। शेख मुजीबुर की ही बेटी बांग्लादेश की नि-वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना हैं। 1970 में पाकिस्तान में चुनाव जीतने के बावजूद पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं ने उन्हें प्रधानमंत्री मानने से इंकार कर दिया।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव जीतने के बाद भी जब उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया जाता तो वे पाकिस्तान में बगावत करते हैं और मुक्ति वाहिनी के नाम से अपनी एक सेना बनाते हैं। इस सेना को बनाने में उन्होंने भारत की सरकार से भी मदद ली और 1971 में पश्चिमी पाकिस्तान के तानाशाहों को धूल चटाकर उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान की जमीन को उनसे छीन लिया। इस तरह पश्चिमी पाकिस्तान से मुक्त होकर पूर्वी पाकिस्तान 1971 में एक स्वतंत्र मुल्क बांग्लादेश बना।

तिरंगे का मान बचाने को तीन गोलियाँ खाईं सीने पर

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सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी चंद्रशेखर आजाद और भगतसिंह सहित दर्जनों क्राँतिकारियों के बलिदान और जेल में डाल देने से भले क्राँतिकारी आँदोलन में गतिरोध आया हो पर भारत की स्वतंत्रता के लिये नौजबानों के जज्बे में कोई अंतर नहीं आया था। जिसकी झलक जंगल सत्याग्रह और झंडा सत्याग्रह ही नहीं भारत छोड़ो आँदोलन में भी दिखी । क्राँतिकारी गुलाब सिंह लोधी ऐसे क्राँतिकारी थे जिन्होंने सीने पर तीन गोलियाँ खाईं पर ध्वज को नीचे नहीं गिरने दिया ।

जंगल सत्याग्रह के बाद भारत में हुये आंदोलनों और प्रदर्शनों में सैंकड़ो नौजवानों का बलिदान हुआ है । आँदोलन को दबाने केलिये अंग्रेजों का दमन जैसे जैसे बढ़ा नौजवानों का रोष भी बढ़ा। वे हर कीमत पर माँ भारती को दासता से मुक्ति कराना चाहते थे । अपना यही जज्बा लिये क्राँतिकारी गुलाब सिंह ने लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में झण्डा फहराने के दौरान अंग्रेजों गोली के आगे सीना तानकर खड़े हो गये और अपने प्राणों का बलिदान दिया ।

गुलाब सिंह लोधी का जन्म 1903 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के अंतर्गत ग्राम चन्दीकाखेड़ा फतेहपुर चैरासी में हुआ था । उनके पिता ठाकुर रामसिंह लोधी क्षत्रिय एक संपन्न किसान और प्रतिष्टित जमींदार थे । घर में प्रताप समाचार पत्र आता था जिससे घर के वातावरण में जाग्रति और राष्ट्रभाव था । पढ़ाई के दौरान ही उनका संपर्क रामप्रसाद बिस्मिल से हो गया था । इस नाते वे क्राँतिकारी आँदोलन से जुड़ गये । प काॅकोरी काँड के बाद क्राँतिकारियों की टोली बिखर गई और उत्साही नौजवान गुलाब सिंह कांग्रेस से जुड़ गए।

1935 में जुलूस निकालकर झंडा सत्याग्रह करने का निर्णय हुआ । इसके लिये लखनऊ का अमीनाबाद स्थल निर्धारित हुआ । इस सत्याग्रह में लखनऊ के अतिरिक्त आसपास से भी जत्थे आये थे । जिन्हें पुलिस लाठियाँ चला कर खदेड़ रही थी । उन्नाव जिले का जत्था ठाकुर गुलाब सिंह जी के नेतृत्व में गया था । पुलिस की बर्बरता देखकर वीर गुलाब सिंह लोधी ने अपनी टोली का आव्हान किया और हाथ में तिरंगा लेकर आगे बढ़े। सिपाहियों ने लाठियाँ चलाकर रोकना चाहा पर गुलाब सिंह न रुके । वे भारत माता का जयघोष करते हुये हाथ तिरंगा लेकर अमीनाबाद पार्क में घुस गये पुलिस पीछे दौड़ी। संभवतः उन्हें भविष्य का अनुमान हो गया था । वे अपनै साथ बैलों को बाँधने वाला कुन्दा अपने साथ ले गये थे । उस कुन्दे के सहारे उन्होंने फुर्ती से तिरंगा पेड़ पर लहरा दिया और जयघोष किया । जैसे ही अमीनाबाद पार्क के बाहर एकत्र लोगों ने पार्क के भीतर तिरंगा फहरते हुये देखा तो उन्हे भी जोश आया और सब जयघोष करते हुये पार्क के भीत, आने के लिये लपके । पहले पुलिस ने लाठीचार्ज करके भीड़ को अन्दर आने पर रोक रखा था किन्तु झंडा देखकर पुलिस की लाठी पर जोश भारी पड़ा और लोग पार्क के भीतर आने पर उमड़ पड़े। पुलिस ने गोली चलाना आरंभ किया । पहला फायर गुलाब सिंह के सीने पर किया । लगातार तीन गोलियाँ उनके सीने पर लगीं। और क्रांतिवीर गुलाब सिंह भारत माता की गोद में चिरनिद्रा के लिये सो गये ।

क्रांतिवीर गुलाब सिंह लोधी द्वारा तिरंगा फहराने की इस घटना और उनके बलिदान बाद अमीनाबाद पार्क का नाम झंडा वाला पार्क हो गया । और आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन के लिये सभा स्थल भी हो गया । स्वतंत्रता के बाद इसी पार्क में बलिदानी गुलाब सिंह लोधी का स्मारक के रूप में प्रसिद्ध हुआ । केंद्र सरकार ने 23 दिसंबर 2013 को उनकी स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया ।

हिंदू समाज को एकजुट करने के लिए सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना होगा

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अट्ठारवीं लोकसभा के लिए भारत की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लगातार तीसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सराकर चलाने का निर्णय तो दिया किन्तु साथ ही विपक्ष भी अपनी सीटें बढ़ाने में सफल रहा। बढ़ी हुई सीटों के साथ आक्रामक विपक्ष यह दिखाने का प्रयास कर रहा है कि जनता ने उन्हें संविधान और आरक्षण की रक्षा के लिए चुना है जबकि वास्तविकता ये है कि उनकी बढ़ी हुई सीटें एक वर्ग के उनके झूठ में फँस जाने के कारण आई हैं ।विपक्ष को अपनी बढ़ी हुई सीटों के कारण यह आत्मविश्वास मिल गया है कि अब आरक्षण और जाति के आधार पर भाजपा, संघ व हिंदुत्व को कमजोर करके सत्ता प्राप्त की जा सकती है। विपक्ष के लिए जातिगत मुद्दे सत्ता प्राप्ति का मार्ग हो सकते हैं किन्तु हिन्दू समाज के अस्तित्व के लिए इन मुद्दों का उभार एक बड़े संकट का आरम्भ है।

कांग्रेस और इंडी गठबंधन जिसकी अधिकांश पार्टियाँ जाति आधारित हैं अपने मतदाताओं को जोड़े रखने के लिए आरक्षण के बहाने जाति का कार्ड खेल रही हैं । कांग्रेस और भी नीचे जाकर इस जाति कार्ड को संविधान की रक्षा का नाम दे रही है और एक भ्रमजाल फैला रही है। लोकसभा चुनावों से पहले किया गया झूठ का प्रयोग अब और व्यापक हो रहा है, राहुल गांधी जिस प्रकार की बयानबाजी कर रहे हैं उससे यह प्रतीत हो रहा है कि कांग्रेस अब पूरी तरह से टुकड़े टुकड़े गैंग का विस्तरित रूप ले चुकी है।

विगत दिनों ऐसी कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी हैं जिन पर कांग्रेस व इंडी गठबंधन के नेताओं का रुख जाती और आरक्षण के नाम पर देश को अराजकता में झोंकने वाला रहा है। इंडी गठबंधन के विभिन्न दलों के नेता तथा हर बात पर जाति पूछ रहे हैं और हर चर्चा को उसी धारा में मोड़ने का विकृत प्रयास कर रहे हैं। राहुल गाँधी द्वारा संसद के बजट सत्र में, बजट टीम का चित्र दिखाकर उसमें अधिकारियों की जाति पूछना एक ऐसा ही निंदनीय और घृणित प्रयास था ।

सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच ने 6-1 से आरक्षण में क्रीमीलेयर के मुद्दे पर कुछ व्यावहारिक सुझाव दिये थे फैसला नहीं दिया था और ये सुझाव तत्काल लागू भी नहीं किये जा रहे थे और इस मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भी तत्परता दिखाते हुए एस.सी. /एस.टी. व दलित सांसदो को भरोसा दिलाया था कि यह फैसला फिलहाल लागू नहीं किया जा रहा है। उस समय बसपा नेत्री मायावती ने केंद्र सरकार की सराहना की थी किंतु शीघ्र ही इस विषय पर उनका दोहरा मापदंड सामने आ गया । बसपा नेत्री मायावती को इस मुद्दे की आड़ में राजनीति में तीसरी ताकत बनने का सपना आ गया और उन्होंने कुछ दलित संगठनों द्वारा इस पर बुलाए गये बंद का समर्थन कर दिया।

विपक्ष ने केवल अपने निहित स्वार्थ व तुष्टिकरण की राजनीति के चलते भारत बंद बुलाया जो कहीं सफल और कहीं पूरी तरह से नाकाम हो गया। विपक्ष द्वारा आयोजित भारत बंद को कहीं भी आम जनता का पूर्ण समर्थन नहीं मिला । सुप्रीम कोर्ट के सुझावों के खिलाफ बुलाया गया बंद केवल अपनी अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया गया था। भारत बंद के दौरान राजनीतिक दलों के नेताओं व उनके प्रवक्ताओं ने प्रधानमंत्री मोदी के विरोध और उनकी छवि को खराब करने के कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। इस बीच स्वयंभू किसान नेता राकेश टिकैत ने मीडिया पर बंगाल की घटना को बेवजह हाईलाइट करने का आरोप तक लगा दिया। राकेश टिकैत कह रहे हैं कि मोदी सरकार को बहुत जल्दी हम बांग्लादेश की तरह निपटा देंगे। जिस दिन हम ट्रेक्टर लेकर लाल किला गये थे उसी दिन निपटा देते अगर हम अपने ट्रैक्टर संसद भवन की ओर घुमा देते। बिहार में भारत बंद के नाम पर भारी अराजकता देखी गई जहाँ इंडी गठबंधन में शामिल सभी दलों के अपराधिक प्रवृत्ति के लोग सड़कों पर हुडदंग ही कर रहे थे, ये लोग बच्चों से भरी स्कूल बस में आग लगाने का प्रयास करते भी देखे गए।

यूपीएससी द्वारा 45 पदों पर विशेषज्ञों की सीधी भर्ती पर निकाले गए विज्ञापन के बाद भी इंडी गठबंधन, भाजपा संविधान विरोधी है, भाजपा आरक्षण समाप्त कर रही है का नारा बुलंद करने लगा। वहीं सोशल मीडिया पर दिन रात झूठे विमर्श गढ़ने वाली राहुल गांधी की टीम ने लिखा कि केंद्र सरकार परोक्ष रूप से संघ के लोगों की भर्ती करने जा रही है। इंडी गठबंधन इस मामले को भी बांग्लादेश व श्रीलंका की तरह हल करने की वकालत करने लगा। भारत सरकार की नौकरशाही में सीधी भर्ती कोई नई बात नहीं है 1970 के दशक से ही सीधी भर्ती होती रही है, पहले यह भर्तियां कांग्रेस नेताओं की सिफारिश पर हो जाती थीं तथा कोई विज्ञापन भी नहीं निकाला जाता था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मोटेंक सिंह अहलूवालिया इसके प्रमुख उदाहरण हैं। अन्य प्रमुख लोगों में राहुल गांधी के गुरू सैम पित्रोदा और वी कृष्णमूर्ति, अर्थशास्त्री विमल जालान, कौशिक बसु ,अरविंद विरमानी, रघुराम राजन जैसी हस्तियां शामिल रही हैं। 45 सीधी भर्तियों का विरेध केवल इसलिए किया गया है क्योंकि अब राहुल गांधी के गुरू सैम पित्रोदा को इसमें जगह नहीं मिलने जा रही थी।कांग्रेस के शासनकाल में कभी भी आरक्षण नीति का ठीक ढंग से पालन ही नहीं किया गया कांग्रेस केवल अपनी राजनीति चमकाने और सत्ता प्राप्त करने के लिए इस पर हल्ला करती रही। वैसे भी अब प्रधानमंत्री के सीधे हस्तक्षेप के बाद यह विज्ञापन वापस ले लिया गया है और फिलहाल कांग्रेस के हाथ से भी यह मुद्दा निकल गया है।

कांग्रेस और इसका इंडी गठबंधन जाति जनगणना के नाम पर भी देश को गुमराह कर रहा है जबकि संसद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपनी ही जाति नहीं बता पा रहे हैं। अखिलेश यादव तो संसद में ही चीखने लगे, आप जाति कैसे पूछ सकते हैं? सच तो ये है कि अगर कांग्रेस ने अपने 70 वर्षो के शासनकाल में एससी -एस टी, ओबीसी, दलित समाज की रंचमात्र भी चिंता की होती तो आज देश के ऐसे हालात न होते।कांग्रेस ने हमेशा इनका हक मारा और झूठ की बुनियाद पर देश पर राज किया। कांग्रेस की गलतियों और गांधी परिवार की तानाशाही के कारण ही सपा, बसपा, राजद, जद (यू ) सहित तमाम क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ।

इधर उत्तर प्रदेश में जब से सपा के लोकसभा सांसदों की संख्या बढ़ी है तब से वह पीडीए- पीडीए का हल्ला कर रही है और अपने आपको पिछड़ों का सबसे बड़ा मसीहा साबित करने का प्रयास कर रही है। प्रदेश में पहले सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और बाद में अखिलेश यादव ने भी सीधी भर्तिंयां करी थीं । अखिलेश यादव ने तो प्रमोशन में आरक्षण तक का कड़ा विरोध किया था। वही अखिलेश यादव अब आरक्षण व जाति के नाम पर पीडीए को गुमराह कर रहे हें। समाजवाद का पीडीए अब केवल परिवारवाद और अल्पसंख्यकवाद बनकर रह गया है।

कर्नाटक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया जो भ्रष्टाचार व घोटालों में आकंठ डूबे हैं जाति कार्ड खेलकर अपने आप को बचान चाहते हैं। उनका कहना है कि वह ओबीसी यानि पिछड़ी जाति से आते हैं इसलिए जानबूझकर उन्हें फंसाया जा रहा है।

इतना ही नहीं राहुल गांधी व कांग्रेस पार्टी अब आपराधिक घटनाओं पर भी जाति की ही बात कर रही है । रायबरेली मे अर्जुन पासी नामक एक युवक की हत्या हुई जिसमें शामिल सभी आरोपियों को पकड़ कर जेल भेज दिया गया लेकिन राहुल गाँधी अपनी राजनीति चमकाने के लिए अर्जुन के घर चले गए। राहुल गाँधी अर्जुन पासी के घर केवल इसलिये गये क्योंकि हत्या करने वाला आरोपी ठाकुर था। राहुल व कांग्रेस आजकल यही खेल पूरे भारत में खेल रही है जो भारत के भविष्य के घातक है और सनातनी शक्तियों को सचेत होना है। ध्यान देने वाली बात है कि बंगाल में घटी रेप व मर्डर की घटना पर बंगाल सरकार पर एक बार भी टिप्पणी नहीं की जबकि वह और उनकी बहिन प्रियंका जाति का झंडा उठाए उप्र के हाथरस और उन्नाव पहुँच जाते हैं।

हिंदू जनमानस को एक बार पुनः 1990 से 92 वाली एकजुटता प्राप्त करने का समय आ गया है। हिन्दुओं को समझना होगा जहां एक और इंडी गठबंधन आक्रामक मुस्लिम तुष्टिकरण कर रहा है वहीं दूसरी ओर आरक्षण जाति और संविधान के सहारे हिंदुओं को विभाजित कर रहा है। मुसलमान हमेशा ही भाजपा को हराने के लिए मतदान करने निकलता है जबकि हिंदू समाज बंटा हुआ है। हिन्दुओं को बंगला देश की घटना से सबक लेने की आवश्यकता है – जाति गौण है हिंदुत्व ही आधार है।

क्या भारत की विदेशनीति बदलनी चाहिए?

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उमेश चतुर्वेदी

हाल में एक संगठन के महिला विंग की बैठक हुई। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के खिलाफ बगावत के बाद के हालात के संदर्भ में यह बैठक नही थी। लेकिन इस बैठक में यह मामला उठ गया। इस संदर्भ में महिलाओं से उनकी राय मांगी गई। महिलाओं को जब बोलने का मौका मिला तो जैसे उनके गुस्से को अभिव्यक्ति मिल गई। उन्होंने खुलकर वह बोलना शुरू किया, जिसकी उम्मीद नहीं की जा रही थी।

दरअसल बांग्लादेश में जो हो रहा है, उसे लेकर भारत की बड़ी आबादी चिंतित है। महिलाओं की राय उस चिंता को जाहिर तो कर ही रही थी, साथ में भारत सरकार को एक ऐसा सुझाव दे रही थी, जैसा सुझाव अब तक कम से खुलेतौर पर कोई राजनीतिक दल नहीं दे पाया है। भारत की नीति रही है, किसी के आंतरिक मामले में दखल नहीं देंगे, साथ ही अपने आंतरिक मामले में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे। भारत ने संयम पूर्वक इसी नीति पर अब तक चलने का रिकॉर्ड बनाया है। लेकिन जिस तरह भारत के पड़ोस में हालात बदल रहे हैं, आए दिन अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं, उसे देख भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा अब मानने लगा है कि भारत को भी अपनी विदेश नीति बदलनी चाहिए और भारत को पहले की तुलना में संयम की बजाय चुनिंदा मुद्दों और मौकों पर गंभीर रूख अख्तियार करना चाहिए। उस संगठन की महिलाओं की राय तो इससे भी कहीं आगे की थी। उनका कहना था कि बांग्लादेश में भारत को सीधा हस्तक्षेप करना चाहिए।

बांग्लादेश में जो हुआ, वह तो सबके सामने है। वहां के अल्पसंख्यक हिंदुओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। इसे लेकर सीमा के इस पार चिंता होना स्वाभाविक है। आदिशक्ति की एक रूप ढाकेश्वरी देवी की आंचल में बसे ढाका शहर में हिंदुओं ने एकजुट होकर अपनी आवाज उठाई है, इसके बाद बांग्लादेश के अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनूस हिंदू छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर रहे हैं। वे बार-बार अल्पसंख्यकों की संपत्ति, घर आदि पर हमले को रोकने की अपील कर रहे हैं, इसके बावजूद बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदाय को लेकर भारतीय आबादी का बड़ा हिस्सा चिंतामुक्त नहीं हो पाया है। हमले अब भी जारी हैं। कट्टरता की आड़ में सांप्रदायिक खटास ऐसी है कि खुलेआम हिंदू महिलाओं को अपमानित किया जा रहा है। एक महिला को भीड़ द्वारा अपमानित करने, उसे जबरिया तालाब में धकेलने, एक हिंदू व्यक्ति को तालाब में जाने के लिए मजबूर करने का बाद उस पर चौतरफा पत्थर का वार करने के दृश्य पूरी दुनिया ने देख लिया है। दिलचस्प यह है कि दुनियाभर में मानवाधिकार की ठेकेदारी करने वाले अमेरिकी और ब्रिटिश प्रभु वर्ग से ऐसी राय सामने नहीं आई है। हां, दुनियाभर में फैले हिंदुओं के संगठन लगातार बांग्लादेश में हो रहे अल्पसंख्यक अत्याचार पर ना सिर्फ सवाल उठा रहे हैं, बल्कि प्रदर्शन भी कर रहे हैं।

सवाल यह है कि क्या बांग्लादेश के हिंदुओं को निशाना इसलिए बनाया जा रहा है, क्योंकि वे शेख हसीना के समर्थक हैं। शेख हसीना का समर्थक होना एक कारण तो हो सकता है, लेकिन असलियत यह है कि बांग्लादेश में जिस तरह की ताकतें लगातार आगे बढ़ रही हैं, उनकी सोच के मूल में कट्टरपन है। बांग्लादेश के हिंदुओं को निशाना इसलिए भी बनाया जा रहा है, क्योंकि उन्हें बांग्लादेश की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी भारत समर्थक मानती है। तीन ओर से भारत से घिरे होने के बावजूद बांग्लादेश की बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी भारत समर्थक तो कत्तई नहीं है। आज की बांग्लादेश की नई पीढ़ी इस अहसान के सोच से कोसों दूर है कि बांग्लादेश के जन्म ही नहीं, उसके निर्माण में भारत की बड़ी भूमिका रही है। उसे इतिहास से लेना-देना नहीं है, वह वर्तमान में खालिदा जिया के कट्टरपंथी राजनीतिक विचार और जमात ए इस्लामी के कट्टर विचार के प्रभाव में ज्यादा है। जिसके लिए उसकी कौम पहली प्राथमिकता है। बेशक इस्लाम के मूल में किसी धर्म की मुखालिफत का संदेश ना हो, लेकिन आधुनिक इस्लामी सोच के मूल में गैर मुसलमान से विरोध की सोच गहरे तक पैठ गई है। इसलिए भी भी बांग्लादेशी अपने ही पड़ोसी मुस्लिमों के निशाने पर हैं।

बांग्लादेश ही क्यों, भारत के पड़ोस के किसी भी देश को देख लीजिए। नेपाल तो हिंदू बहुल राष्ट्र है, लेकिन वहां की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा चीन के प्रभाव में भारत विरोधी रूख वाले तलवार से लस नजर आता है। भारत की बड़ी आबादी भले ही नेपाल को अपनी संस्कृति के विस्तार के रूप में देखती हो, वह नेपाल को अपना छोटा भाई मानती हो, लेकिन नेपाल की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा भारत विरोधी ग्रंथि से पीड़ित है। इसका असर आए दिन भारत विरोधी बयानों, भारतीय इलाकों को नक्शे में अपने हिस्से का दिखाने की होड़ के रूप में देखा जा सकता है। नेपाल में अभी केपी शर्मा ओली का शासन है। केपी शर्मा अपने भारत विरोध के लिए जाने जाते हैं। उनके पिछले शासन काल में भारत के हिस्से को नेपाल का हिस्सा जमकर बताया गया। भारत विरोधी भावनाओं को भी खूब भड़काया गया। भारत के पड़ोस स्थित म्यांमार की सैनिक सरकर भी भारत समर्थक नहीं है। भारत के समुद्री सीमा से सटे देश मालदीव की मुइज्जू सरकार ने तो भारत के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया था। श्रीलंका की भी स्थिति कमोबेश वैसी ही रही। यह बात और है कि चीन के औपनिवेशिक सोच के साइड इफेक्ट के असर में मालदीव भारत की ओर लौट रहा है तो श्रीलंका की ध्वस्त अर्थव्यवस्था को भारत ने ही बचाया। जहां तक पाकिस्तान की बात है तो उसका रवैया बदलने से रहा। भारतीय समुदाय की गंग-जमुनी संस्कृति समर्थक लॉबी की तमाम कोशिशों के बावजूद पाकिस्तानी सरकारों का रूख भारत विरोधी ही रहा है। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार का भी रूख कुछ बेहतर नहीं है।

भारतीय उपमहाद्वीप में भारत अकेला लोकतांत्रिक देश है, जिसका लोकतंत्र फिसलन भरे रास्तों के बावजूद बहुत आगे बढ़ आया है। नेपाल के लोकतंत्र में स्थायीत्व नहीं है तो बांग्लादेश का लोकतंत्र भी ध्वस्त हो चुका है। सेना के संगीनों के बीच पलता पाकिस्तानी लोकतंत्र कई बार प्रहसन लगता है। कहना न होगा कि बांग्लादेश का लोकतंत्र भी फिलहाल संगीनों के साये में ही नजर आ रहा है। ले-देकर एक मात्र पड़ोसी देश भूटान ही ऐसा है, जिससे भारत के रिश्ते बेहतर हैं।

कुछ लोगों को लगता है कि चूंकि भारत की नीति किसी के आंतरिक मामले में दखल देने की नहीं है, इसलिए भारत की तुलना में आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर देश भी भारत और भारतीय समुदाय को आंखें दिखाने लगते हैं। पाकिस्तान तो लगातार सीमा पार से आतंकवाद का निर्यात कर रहा है। ऐसे में अब यह मानने वालों की कमी नहीं है कि भारत को अपनी नीति बदलनी चाहिए। भारत की मौजूदा विदेश नीति अहिंसात्मक लगती है। वह ‘अहिंसा परमोधर्म:’ के सूक्त वाक्य पर आगे बढ़ती दिख रही है। भारत की अब तक की विदेश नीति क्षमा और शील पर केंद्रित है। जिसका पड़ोसी देश के कतिपय तत्व नाजायज फायदा उठाते हैं। लेकिन अब यह मानने वाले लोगों की संख्या भी कम नहीं है कि इसी श्लोक के अगले हिस्से ‘धर्म हिंसा तथैव च’ की नीति पर चलने का वक्त आ गया है। भारत अब दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है, भारत के पास दुनिया की चौथी बड़ी सेना है, भारत अड़ोस-पड़ोस से लेकर दूर के कमजोर राष्ट्रों को दवा, भोजन और दूसरी सहूलियतें देता रहता है। फिर उसे पड़ोसी मामलों में चुप क्यों रहना चाहिए। उसे भारतीय समुदाय की रक्षा के लिए पश्चिमी राष्ट्रों मसलन अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस की तरह आक्रामक कार्रवाई क्यों नहीं करनी चाहिए। पश्चिमी देशों की अक्रामक नीति ही कि उनके नागरिकों पर हाथ डालने, उनकी संस्कृति और आर्थिकी पर हमला करने से पहले बड़े से बड़े शूरमा भी सोचते हैं। इसे रोकने का वक्त आ गया है। इस दिशा में भारतीय बौद्धिक समाज और सरकार, दोनों को सोचना चाहिए।

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