शृंखला आलेख – 4: क्या वामपंथ के अस्तित्व के लिए चाहिये माओवाद?

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देश में कहीं कोई आक्रोश नहीं है, बल्कि अपने सुरक्षा जवानों पर गर्व का भाव है कि आजादी के समय से सतत तथा अपने उग्रतम रूप में चार दशक से जारी माओवाद की समस्या को निदान के करीब पहुँचा दिया गया है। इसी मध्य कई स्थानों से खुल कर तो कुछ दबे-छिपे स्वर उठ रहे हैं कि माओवादियों की अपील पर संज्ञान लिया जाना चाहिए और सरकार को उनके साथ “सीज फायर” करते हुए वार्ता करनी चाहिये। स्मृति पर जोर डालिये, जब तीन राज्यों की सीमा से जुड़ी कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों को घेर कर लगभग एक माह तक मुठभेड़ चली उसी समय तेलांगाना में एक “शांति समीति” सक्रिय हुई। इस कथित शांति के प्रयासकर्ताओं का “स्थान और समय” दोनों ही विचारणीय हैं। इस समीति को केवल एक ही राज्य की सरकार से समर्थन मिला, आखिर क्यों? क्या नक्सल उन्मूलन अभियान में छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र अलग तरह से काम कर रहे हैं और आंध्र-तेलांगना की सोच और शैली बिल्कुल अलग है?

जब यह स्पष्ट था कि अनेक माओवादी कैडर कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों घेर लिए गए हैं जिनको बचाने के लिए एक के बाद एक अपील जारी हुई, माओवादियों ने पर्चे लिखे यहाँ तक कि मीडिया के सामने आ कर भी उन्होंने सरकार से बातचीत की पेशकश की। नक्सलियों की इसी बात पर सरकार किसी भी तरह सहमत हो जाये इसके लिए शांति समीति प्रयास कर रही थी। जो सत्यान्वेषी हैं उन्हें इस शांति समीति तथा इसी ही समीतियों के सदस्यों के तब के बयानों और कार्यों को संज्ञान में लेना चाहिए जब माओवादी मजबूत थे और सुरक्षा बल के जवान मारे जा रहे थे। यह अभियान सफल तो रहा लेकिन परिणाम अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहे, आखिर क्यों? इन विचारणीय प्रश्नों से हो कर ही हम उस उत्तर तक पहुँच सकेंगे कि निर्धारित तिथि तक माओवाद समाप्त हो सकेगा अथवा नहीं।

इस मध्य स्थान स्थान से यह सूचना भी आने लगी है कि स्थानीय ग्रामीण धरना दे कर मांग कर रहे हैं कि नक्सलियों से वार्ता होनी चाहिए। इस तरह की मांग और उसके पीछे के तथ्यों को समझने के लिए आपको माओवादियों के काम करने की शैली को भी जानना होगा। वे तरह तरह के स्थानिक संगठन जिसमें बच्चों के बीच बालसंघम सहित विभिन्न नामों से महिला संगठन, मजदूर संगठन, किसान संगठन आदि तैयार करते हैं। कुछ संगठन सीधे माओवादी कार्यशैली का हिस्सा हैं कुछ छद्म संगठन हैं जिनकी माओवादियों द्वारा ग्रामीणों के मध्य ही अपनी ढाल के रूप में संरचना की गई है। इसके अतिरिक्त कुछ नेटवर्क तो जंगल से शहर तक के बीच की कड़ी का काम करते हैं और कोर-शहरी नक्सली टीम को महत्वपूर्ण इनपुट देने के लिए बनाये गये हैं। माओवादी पत्रों और उनके हालिया बयानों को हमें पढ़ना चाहिए, उनकी अपील है कि वे अपने वरिष्ठ कैडरों से संपर्क नहीं बना सके हैं और इसलिए आगे क्या करना है इसकी स्पष्टता के लिए युद्धविराम चाहिए। पहली बात कि आतंकवाद न तो युद्ध होता है न ही मानवीय और दूसरी बात कि माओवादी सुरक्षाबलों की सफलता के कारण स्वयं के बिखरे संगठनात्मक ढांचे को फिर से खड़ा करने के लिए समय चाहते हैं। जब लोहा गर्म हो हथौड़े क असर तभी होता है यही कारण है कि कर्रेगुट्टा की आंशिक सफलता का क्षोभ अबूझमाड में माओवादी महासचिव वसवाराजू की मौत के साथ पूर्ण सफलता में बदला।

अब जबकि देश की पांच वामपंथी पार्टियों ने 9 जून, 2025 को प्रधानमंत्री को एक खुला पत्र लिखा है जिसमें यह अपील की गई है कि छत्तीसगढ़ और आसपास के इलाकों में माओवाद विरोधी अभियानों के नाम पर हो रही ‘न्यायेतर हत्याओं’ पर रोक लगानी चाहिये। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), भाकपा (माले)-लिबरेशन, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक ने इस अपील पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। पत्र के शब्द ‘न्यायेतर हत्याओं’ पर गौर कीजिए और अब रेखांकित कीजिए कि इस अपील के एक दिन पहले ही सुकमा-एर्राबोर-कोण्टा परिक्षेत्र में अतिरिक्त एसपी आकाश राव गिरीपुंजे की माओवादियों ने आईईडी विस्फोट के माध्यम से हत्या कर दी है। यही माओवादियों की बातचीत का तरीका और वास्तविक चेहरा है। इस पत्र के साथ ही यह समझ आता है कि वामपंथी दल और माओवादी दल एक ही पेज पर पूरी नग्नता के साथ सामने आ गए हैं और “गांधी विथ द गन्स” वाले स्थापित नैरेटिव को फिर से परोसने के प्रयास में हैं। इस पूरी कवायद का मेरा निष्कर्ष है कि आज वामपंथ देश में न केवल अप्रभावी है बल्कि राजनैतिक रूप से आखिरी साँसे ले रहा है, यही स्थिति माओवाद की भी है..। तो क्या यह समझा जाये कि उन्हें वामपंथ के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए ही चाहिये माओवाद?

शृंखला आलेख – 5: मध्यस्थता और बातचीत की बेचैनी क्यों?

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आम तौर पर जीता हुआ युद्ध बातचीत की मेज पर पराजय में बदल जाता है। हम वर्ष 1971 का युद्ध इस तरह जीते कि विश्व के लिए एक उदाहरण बन गया, लेकिन बातचीत की मेज पर इस तरह हारे कि जीती हुई जमीन भी लौटानी पड़ी और तिरानबे हजार सैनिकों के बदले कोई ठोस समझौता भी न हो सका। बातचीत पराजितों का हथियार है जो पैना और धारदार है। माओवाद के संदर्भ में भी यह प्रसंग किसी तरह से भिन्न नहीं है। भारत में माओवाद के इतिहास पर पैनी नजर रखने वाले जानते हैं कि अनेक बार सरकार-माओवादी वार्ता हुई है लेकिन पूर्णतया असफल।

बातचीत के लिए बन रहे दबावों के वर्तमान प्रसंग को विवेचित करने से पूर्व मैं उदाहरण लेना चाहता हूँ जब वर्ष 2012 में सुकमा जिले के कलेक्टर अलेक्स पाल मेनन का माओवादियों ने न केवल अपहरण किया बल्कि उनके दो सुरक्षा कर्मियों को गोली मार दी थी। इतने बड़े प्रशासनिक अधिकारी का अपहरण कोई साधारण घटना नहीं थी और सरकार बहुत अधिक दबाव में थी। इस समय माओवादी बस्तर क्षेत्र में बहुत मजबूत थे और सुकमा उनके मजबूत गढ़ों में गिना जाता था। माओवादियों ने बातचीत की टेबल सजायी, उस दौर में बीबीसी को उन्होंने बयान दिया – “हमने कलेक्टर को गिरफ्तार किया है। हमारी शर्तें हैं कि ऑपरेशन ग्रीनहंट को बंद किया जाए, दंतेवाड़ा रायपुर जेल में फर्जी मामलों में बंद लोगों को रिहा किया जाए, सुरक्षाकर्मियों को वापस बैरक भेजा जाए, कोंटा ब्लॉक में कांग्रेस नेता पर हमले के मामले में लोगों पर से मामले हटाए जाएँ। हमारे आठ साथियों को छोड़ा जाए- मरकाम गोपन्ना उर्फ सत्यम रेड्डी, निर्मल अक्का उर्फ विजय लक्ष्मी, देवपाल चंद्रशेखर रेड्डी, शांतिप्रिय रेड्डी, मीनाचौधरी, कोरसा सन्नी, मरकाम सन्नी, असित कुमार सेन।“

इन सभी मांगों पर गौर कीजिए। इनका सार संक्षेपण करें तो अर्थ निकलता है कि बस्तर में माओवादी ही रहेंगे सुरक्षाबालों को पीछे हटाओ, लाल-अपराधियों पर से मुकदमें ही नहीं हटाओ बल्कि कुख्यातों को रिहा भी करो। बातचीत जैसे जैसे आगे बढ़ती है मांगे भी बढ़ने लगती हैं यहाँ तक कि आठ से बढ़ कर उन माओवादियों की संख्या सत्रह पहुँच जाती है जिन्हें छोड़ने की मांग थी। नक्सलियों के मध्यस्थ बने हैदराबाद के प्रोफेसर जी. हरगोपाल एवं भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के पूर्व अधिकारी बी.डी. शर्मा पर विषयांतर से बचाने के लिए अलग से चर्चा करेंगे। यह राहत की बात थी कि माओवादियों की मांगे उस स्वरूप में नहीं मानी गयीं, जैसा वे चाहते थे; लेकिन इस घटना ने उन्हें वह वैश्विक ख्याति प्रदान की जो इस घटना का मूल उद्देश्य था। इस घटना के बाद माओवादियों ने स्वयं को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विजेता और जन-अधिकारों के रक्षक की तरह सामने रखा, वे दुनिया भर के अखबारों की हैडलाईन थे, विदेशी समाचार चैनलों के लिए मसाला थे। इस घटनाक्रम और इसके हासिल से हमें वर्तमान में दिख रही मध्यस्थता की आतुरता और बातचीत के लिए दबावों के मायने समझ आ जाते हैं।

वर्ष 2016 में छत्तीसगढ़ पुलिस की स्पेशल टीम ने कलेक्टरके अपहरण में शामिल रहे नक्सली भीमा उर्फ आकाश को गिरफ्तार किया। फरवरी, 2023 को नई दुनिया में प्रकाशित एक खबर के अनुसार अदालत में स्वयं अलेक्स पाल मेनन ने अपने बयान में भीमा को नहीं पहचाना, उन्होंने कहा कि घटना काफी पुरानी है, इसलिए वे भीमा ही नहीं अभियुक्त गणेश उईके, रमन्ना, पापा राव, विजय मड़कम आकाश, हुंगी, उर्मिला, मल्ला, निलेश, हिड़मा, देवा यदि नक्सलियों को भविष्य में भी नहीं पहचान सकेंगे। इस तरह बातचीत से निकले समाधानों का पूर्ण पटाक्षेप हो गया है। इस घटना और ऐसी ही अनेक अन्य घटनाओं के जिम्मेदार लाल-अपराधी अब जा कर सुरक्षाबालों के हाथों या तो मारे जा रहे हैं या समर्पण कर रहे हैं। अब सरकार पूरी तरह सशक्त है, जीत की दहलीज पर खड़ी है और स्पष्ट है कि माओवाद को आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास की पुस्तकों में ही पढ़ेंगी, ऐसे में उन सभी आवाजों को भी हमें ठीक ठीक से पहचानना होगा जो सीजफायर करो, बातचीत करो चीख रही हैं।

इस विषय के अंत में विचारार्थ आपके लिए मेरी ओर से छोड़ा गया प्रश्न है कि आखिर मध्यस्थता और बातचीत की ऐसी बेचैनी क्यों? क्या माओवादी स्वयं को पुनरगठित करने के लिए समय चाहते हैं और क्या उन्हें यही समय सरकार पर दाबाव बना कर शहरी नक्सली उपलब्ध कराने के लिए आतुर हैं। इस दबाव का सामना सरकार किस तरह करती है यह देखने वाली बात होगी।

शृंखला आलेख – 6: सफलता का मूलमंत्र है शहरी माओवादियों का दमन

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झिरम घाटी की घटना के कुछ ही दिनों पहले मैंने सलवा जुडुम आंदोलन के शीर्ष नेता महेंद्र कर्मा से बातचीत की थी। उनसे मेरा प्रश्न था कि माओवादियों से लड़ाई तो आप हार गये, इसका क्या कारण पाते हैं? तब उन्होंने दो टूक कहा था कि “जंगल में हम अपनी लड़ाई जीत जाते, उसे दिल्ली में पावर पॉईंट प्रेजेंटेशनों में हार गये”। यह कथोपकथन बहुत महत्व का है, उस दौर में दिल्ली वाली लॉबी कितनी सशक्त थी इसका उदाहरण यह कि तब एक वरिष्ठ कथाकार जिन्होंने बस्तर पर केंद्रित अनेक कहानियाँ लिखी हैं, उन्होंने महेंद्र कर्मा का यह साक्षात्कार जो तब छत्तीसगढ़ अखबार में प्रकाशित हुआ था, उसे फ़ेसबुक पर शेयर कर दिया। इसके बाद शहरी नक्सलतंत्र की प्रगतिशीलता जागी और उन्हें इस इस भांति की गालियां तथा साहित्यिक जगत से तड़ीपारी की धमकियाँ मिलने लगीं कि आखिर वे अपना पोस्ट डिलीट कर इस विषय पर सर्वदा के लिए शांत हो गये। शहरी नक्सल तंत्र एक दौर में इतना ताकतवर हो चला था कि केवल समूहों को ही नहीं, वह व्यक्तियों को भी निशाने पर ले रहा था, इसका उद्देश्य था कि केवल वही लिखा जाये जो वे निर्देशित करें, केवल वही कहा जाये जो जो वे चाहते हैं और केवल वही सुना जाये जो उन्होंने कहा है।

शहरी नक्सलवाद को हमेशा बहुत हल्के में लिया गया है। जिस दौर में आधे बस्तर संभाग पर माओवादी अपनी पकड़ बनाने में समर्थ हो चले थे, बड़ी बड़ी घटनायें जिनमें रानीबोदली के कैंप पर हमला हो या कि छिहत्तर जवानों का एंबुश में मारा जाना हो या कि झिरम घाटी में राज्य के शीर्ष कॉन्ग्रेसी नेतृत्व को मार दिया जाना हो, उसी दौर में समानांतर इन्हें जस्टीफाई करने के नैरेटिव गढे गये। देश के अधिकांश मीडिया संस्थानों पर वामपंथ हावी है शायद यही कारण है कि लाल नैरेटिव को फैलाने फैलाने में तब अधिक समस्या नही हुआ करती थी। माओवादी नेटवर्क केवल लेखक ही नहीं पालता-पोस्ता था बल्कि इनकी संगठित लीगल टीम भी विभिन्न नामों के साथ नक्सल क्षेत्रों में कार्य कर रही थी। देश की याददाश्त कमजोर है इसलिए मानवता के वे अपराधी भुला दिए गए है जो मानवअधिकार की खाल ओढ कर बंदूख वाले माओवादियों की अपनी कलम से ढाल बने हुए थे।

दिल्ली का एक विश्वविद्यालय तो तब शहरी नक्सलवादियों की राजधानी बन कर उभरा था। सुरक्षाबल यदि माओवादियों के विरुद्ध अभियान में सफल होते तो मानवाधिकार के हनन पर सेमीनार आयोजित होते, विश्व भर के लाल-घड़ियाल बुक्का फाड़ फाड़ कर रोते और जवानों के मारे जाने पर विश्वविद्यालय के भीतर जाम टकराये जाते थे। एक पुस्तक के सिलसिले में, बड़ी संख्या में आत्मसामार्थित माओवादियों से मेरी बातचीत हुई है, अनेक ने मुझे बताया कि आजकल आना बंद हुआ है अन्यथा पहले जब विश्वविद्यालय में गर्मी की छुट्टियाँ होती और प्राध्यापकों के निर्देश पर समाजशास्त्र के छात्रों का समरकैम्प नक्सलियों के मध्य अबूझमाड में लगा करता था। जैसे जैसे माओवाद कमजोर पड़ता गया, विद्यार्थियों का समाज और शास्त्र अलग अलग हो गया और अब जंगलों में इनकी आमद नहीं के बराबर है।

अब दो रणनीतियाँ स्मरण कीजिये। बात एक दौर में बस्तर आईजी रहे एसआरपी कल्लूरी से ले कर वर्तमान में इस पद पर अवस्थित सुंदराजन तक की कर लेते हैं। ये दोनों ही समय माओवाद के विरुद्ध बड़ी सफलताओं के दौर हैं। दोनों के समय अच्छा मुखबिर नेटवर्क बनाने के लिए जाने जाएंगे यहाँ तक कि इन समयों की कार्यशाली में दो नामों पर गौर कीजिए एक हैं एसपीओ और दूसरा डीआरजी। एसपीओ अथवा स्पेशल पुलिस ऑफिसर भी स्थानीय थे, अनेक युवक माओवादी जीवन छोड़ने के कारण तो अनेक सलवाजुड़ुम के कारण माओवादियों के निशाने पर थे। सरकार ने इन्हें प्रशिक्षित लिया, इनकी सेवाएं लीं और तब माओवादियों के पैर उखाड़ने लगे थे। ठीक इसी समय पिटीशन पर पिटीशन दायर होंने लगीं। पुलिस अधिकारी मानवता के शत्रु निरूपित कर दिए गए। देश भर के अखबार इस तरह रंग गए जैसे माओवादी नहीं सुरक्षाबल ही अपराधी हैं। इन दबावों को सरकार और पुलिस झेलने में असमर्थ रही एसपीओ को डिसमैन्टल कर दिया गया और माओवादी पहले से अधिक तकतवर हो कर उभरे। सलवाजुडुम से जुड़े ग्रामीणों और एसपीओ से सम्बद्ध युवकों को तलाश तलाश कर माओवादियों ने मारा और मानवता के नारे जो सुरक्षाबलों के विरुद्ध मुखर थे, अब मुंह में दही जमा कर बैठ गये। वर्तमान में छत्तीसगढ़ में डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) सक्रिय है जिसमें अधिकांश आत्मसमार्थित माओवादी हैं। इन्हें मिलने वाली सफलता ऐसी है कि स्वयं माओवादी महासचिव वसवा राजू ने डायरी में लिखे एक संदेश में अपने कैडरों को डीआरजी से सावधान किया था। डीआरजी ने माओवाद की जड़ें ही ढीली नहीं की बल्कि नक्सल महासचिव को भी मिट्टी में मिला दिया है।

अब सोचिए कि एसपीओ से डीआरजी तक क्या बदला है? वस्तुत: अब शहरी माओवादी उजागर हो चले हैं, बैकफुट पर हैं। शहरी नक्सलवाद शब्द का पहले बहुत परिहास हुआ लेकिन जैसे जैसे इसके कारिंदे अपनी कलम और कारस्तानियों साहित उजागर होने लगे, बंदूख वाले नक्सली भी अपनी ढाल खो बैठे। अब बोलने-छापने वालों के बीच भी वामपंथ का दबदबा कम हुआ है और अन्य विचार विमर्श भी अपनी जगह बनाने लगे हैं। इससे आमजान ठीक से परिस्थतितियों को समझ सका, इसी कारण नक्सलवाद को लाल-आतंकवाद के रूप में उसकी सही पहचान मिली। आज समाज को न नक्सलियों से सहानुभूति है न नक्सल समर्थकों से इसलिए बंदूख वाले नक्सली मिट रहे हैं और कलम वाले बेबस।

शृंखला आलेख – 7: सड़क नहीं होगी तो सरकार भी नहीं होगी

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बस्तर परिक्षेत्र में सडक और माओवाद हमेशा एक बड़े नैरेटिव का हिस्सा रहे हैं। आज जब भी हम बस्तर के भीतर से आने वाले समाचारों, विशेषरूप से अबूझमाड के नक्सल परिक्षेत्रों और विकास की परिचर्चाओं से दोचार होते हैं तब सड़क पर विशेषरूप से विमर्श सामने आता है। इसे समझने के लिए हमें तीन पक्ष जानने होंगे – पहला रियासतकाल में बनाने वाली सड़कें, दूसरा स्वततंत्रता के पश्चात के प्रयास और तीसरा माओवाद के बाद की स्थिति। यहाँ हमें कुछ और बातें भी स्पष्ट होंगी जैसे नर्म वामपंथ और उग्रवामपंथ दोनों में केवल कार्यशैली का अंतर है और दोनों से परिणाम एक जैसे ही प्राप्त होने हैं। विमर्श की सुविधा के लिए सड़कों को ले कर नीति और समझ को चार विंदुओं में समझने का यत्न करते हैं। ये विंदु हैं – रियासत कालीन योजनायें, स्वतंत्र भारत के प्रशसकों के कदम, माओवादियों द्वारा सड़कों का नाश तथा बदलावों की दशा और दिशा।

बस्तर रियासत का गजट मानी जाती है पं. केदारनाथ ठाकुर की पुस्तक ‘बस्तर भूषण’ जोकि वर्ष 1910 में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक तत्कालीन बस्तर का इतिहास, राजनीति, समाजशास्त्र, भूगोल आदि का समग्र दस्तावेज है। इस पुस्तक में हमें उस दौर में विकास की जो अवधारणा थी, इसकी स्पष्ट झलख मिलती है। जगदलपुर से चांदा जाने वाली सड़क सन 1904 में पूरी कर ली गयी जो एक छोर से अबूझमाड़ को छू कर गुजराती थी। सन 1907 ई. तक अतिदुर्गम मार्ग ‘कोंडागाँव-नारायनपुर-अंतागढ़, तक सड़क बना ली गयी थी जिसे बाद में डोंडीलोहारा होते हुए राजनांदगाँव तक बढ़ा दिया गया। यह सड़क भी अबूझमाड तक रियासतकालीन दस्तक थी। इसके अतिरिक्त भीतरी क्षेत्रों में कच्चे और बैलगाड़ी के रास्ते भी तब निर्मित किये गये थे। पुस्तक में स्पष्टता है कि दुर्गम क्षेत्र होने के कारण सड़क निर्माण का कार्य आसान नहीं है अत: प्रमुख मार्गों की निर्मिती के पश्चात भीतरी अबूझमाड़ में संपर्क मार्गों का विकास किया जायेगा।

स्वतंत्रता पश्चात बस्तर को जो आरंभिक प्रशासक मिलें उन्होंने अनेक ऐसी गलतियाँ की हैं जिसकी आज भी भरपाई नहीं हो सकी है। ब्रम्हदेव शर्मा जो साठ के दशक में कलेक्टर थे, उन्होंने तय किया कि अबूझमाड़ में सड़कें नहीं बनने दी जायेंगी। उनका मानना था कि जहाँ सड़कें जाती हैं, सड़कों की बीमारी भी साथ जाती है अर्थात जनजातीय समाज को मुख्यधारा से अलग रखा जाना चाहिए। सड़कें नहीं बनी और अबूझमाड को सप्रयास मानवसंग्रहालय बना दिया गया। हमें संज्ञान में लेना होगा कि ब्रम्हदेव शर्मा का वामपंथ की ओर झुकाव स्पष्ट रहा है, यही नहीं वे उग्र वामपंथ के लिए भी मित्रवत थे तभी नक्सलियों की ओर से उन्होंने कलेक्टर अपहरण प्रकरण मीन मध्यस्थता भी की थी। सड़कविहीनता की स्थिति से लाभ उठा कर माओवादी बस्तर के भीतर प्रवेश करते हैं। अबूझमाड को वे आधार इलाका केवल इसलिए बना पते हैं चूँकि वहाँ सड़क नहीं थी, प्रशासन नहीं था, पुलिस नहीं थी और यह सब केवल इसलिए क्योंकि एक दौर का कलेक्टर ऐसा ही चाहता था; आश्चर्य लेकिन यही सच है।

माओवादियों ने आधार इलाका अर्थात अबूझमाड़ को सभी ओर से सुरक्षित करने के लिए जो भी सक्रिय सड़कें उस ओर जाती थीं, सभी को नष्ट कर दिया। जो कच्चे रास्ते थे वे पहले बड़ी बड़ी डाईक अथवा नियमित अंतराल पर समानांतर गड्ढे खोद कर माओवादियों द्वारा नष्ट करवा दिए गये। विस्फोटकों ने पक्की सड़कों के नाम निशान भी रहने नहीं दिए, अनेक स्थानों पर तो स्वयं ग्रामीणों ने दबाव में आ कर अपने ही क्षेत्र के आवागमन मार्ग को नष्ट किया। इस तरह से एक व्यापक किलेबंदी की गई और अबूझमाड को माओवादियों ने अपने लिए सर्वथा सुरक्षित बना लिया। यही नहीं उन समयों में एरिया डोमिनेशन के तहत वे जहां जहाँ भी आगे बढ़ते गये, क्षेत्र की सड़कों को मिटाते गये। अभी एक दशक पहले तक गीदम से कोन्टा या कि गीदम से भोपालपट्टनम जाना कठिनतम कार्य हुआ करता था क्योंकि ये राजमार्ग असंख्य स्थानों पर माओवादियों द्वारा काट दिए गये थे।

मैं माओवादियों की उपराजधानी कहे जाने वाले जगरगुंडा में उस दौर में भी गया हूँ जब यहाँ तक पहुंचना असंभव की श्रेणी में आता था और आज यही परिक्षेत्र एक ओर दोरनापाल और दूसरी ओर अरणपुर के द्वारा जुड़ा गया है। पहले माओवाद यहाँ का वर्तमान था जो आज इतिहास हो गया है। शहरी नक्सलियों का यह बहुचर्चित नैरेरिव है कि आजादी के इतने साल बाद भी जब सड़कें नहीं होंगी तो माओवादी क्यों नहीं होंगे? इस पूरी रूप देखा को सामने रख कर हमें यह समझना होगा कि सड़क और माओवाद का क्या संबंध है। हमें यह भी रेखांकित करना होगा कि माओवाद को बंदूख से तो हराया जा रहा है, अब अबूझमाड के भीतर तक पहुँचती सड़कों ने भी उनकी हार तय की है।

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