अमेरिकी बैंक क्यों हो रहे दिवालिया

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अमेरिका में वर्ष 2023 में 3 बैंक (सिलिकन वैली बैंक, सिगनेचर बैंक, फर्स्ट रिपब्लिक बैंक) डूब गए थे एवं वर्ष 2024 में भी एक बैंक (रिपब्लिक फर्स्ट बैंक) डूब गया है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अमेरिकी केंद्रीय बैंक, यूएस फेडरल रिजर्व, द्वारा ब्याज दरों में की गई वृद्धि के चलते बैंकों के असफल होने की यह परेशानी बहुत बढ़ गई है।

सिलिकन वैली बैंक ने कई तकनीकी स्टार्ट अप एवं उद्यमी पूंजी फर्म को ऋण प्रदान किया था। इस बैंक के पास वर्ष 2022 के अंत में 20,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर की सम्पत्तियां थी और यह अमेरिका के बड़े आकार के बैंकों में गिना जाता था और हाल ही के समय में डूबने वाले बैंकों में दूसरा सबसे बड़ा बैंक माना जा रहा है। इसी प्रकार, सिगनेचर बैंक ने न्यूयॉर्क कानूनी फर्म एवं अचल सम्पत्ति कम्पनियों को ऋण सुविधाएं प्रदान कर रखी थीं। इस बैंक के पास वर्ष 2022 के अंत में 11,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक की सम्पत्ति थी और अमेरिका में हाल ही के समय में डूबने वाले बड़े बैंकों में चौथे स्थान पर आता है। 31 जनवरी 2024 तक के आंकड़ों के अनुसार, रिपब्लिक फर्स्ट बैंक की कुल सम्पत्तियां 600 करोड़ अमेरिकी डॉलर एवं जमाराशि 400 करोड़ अमेरिकी डॉलर थीं। न्यू जर्सी, पेनसिल्वेनिया और न्यूयॉर्क में बैंक की 32 शाखाएं थीं जिन्हें अब फुल्टन बैंक की शाखाओं के रूप में जाना जाएगा क्योंकि फुल्टन बैंक ने इस बैंक की सम्पत्तियों एवं जमाराशि को खरीद लिया है।

पीयू रिसर्च संस्थान के अनुसार, चार शताब्दी पूर्व, वर्ष 1980 एवं वर्ष 1995 के बीच अमेरिका में 2,900 बैंक असफल हुए थे। इन बैंकों के पास संयुक्त रूप से 2.2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की सम्पत्ति थी। इसी प्रकार, वर्ष 2007 से वर्ष 2014 के बीच अमेरिका में 500 बैंक, जिनकी कुल सम्पत्ति 95,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर थी, असफल हो गए थे। ऐसा कहा जाता है कि विशेष परिस्थितियों को छोड़कर अमेरिका में सामान्यतः बैंक असफल नहीं होते हैं। परंतु, इस सम्बंध में अमेरिकी रिकार्ड कुछ और ही कहानी कह रहा है। वर्ष 1941 से वर्ष 1979 के बीच, अमेरिका में औसतन 5.3 बैंक प्रतिवर्ष असफल हुए हैं। वर्ष 1996 से वर्ष 2006 के बीच औसतन 4.3 बैंक प्रतिवर्ष असफल हुए हैं एवं वर्ष 2015 से वर्ष 2022 के बीच औसतन 3.6 बैंक प्रतिवर्ष असफल हुए हैं। वर्ष 2022 में अमेरिकी बैंकों को 62,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुक्सान हुआ था। इसके पूर्व, वर्ष 1921 से वर्ष 1929 के बीच अमेरिका में औसतन 635 बैंक प्रतिवर्ष असफल हुए हैं। यह अधिकतर छोटे आकार के बैंक एवं ग्रामीण बैंक थे और यह एक ही शाखा वाले बैंक थे। अमेरिका में आई भारी मंदी के दौरान वर्ष 1930 से वर्ष 1933 के बीच 9,000 से अधिक बैंक असफल हुए थे। इनमें कई बड़े आकार के शहरों में कार्यरत बैंक भी शामिल थे और उस समय इन बैंकों में जमाकर्ताओं की भारी भरकम राशि डूब गई थी। वर्ष 1934 से वर्ष 1940 के बीच अमेरिका में औसतन 50.7 बैंक प्रतिवर्ष बंद किए गए थे।

अमेरिका में इतनी भारी मात्रा में बैंकों के असफल होने के कारणों में मुख्य रूप से शामिल है कि वहां छोटे छोटे बैंकों की संख्या बहुत अधिक होना है। बैकों के ग्राहक बहुत पढ़े लिखे और समझदार हैं। बैंक में आई छोटी से छोटी परेशानी में भी वे बैंक से तुरंत अपनी जमाराशि को निकालने पहुंच जाते हैं, जबकि बैंक द्वारा इस राशि से खड़ी की गई सम्पत्ति को रोकड़ में परिवर्तित करने में कुछ समय लगता है। इस बीच बैंक यदि जमाकर्ता को जमाराशि का भुगतान करने में असफल रहता है तो उसे दिवालिया घोषित कर दिया जाता है और इस प्रकार बैंक असफल हो जाता है। कई बार बैंकों द्वारा किए गए निवेश (सम्पत्ति) की बाजार में कीमत भी कम हो जाती है, इससे भी बैंकें अपने जमाकर्ताओं को जमाराशि का भुगतान करने में असफल हो जाते हैं। अभी हाल ही में अमेरिका में मुद्रा स्फीति की दर को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ब्याज दरों में लगातार बढ़ौतरी की गई है, जिससे इन बैकों द्वारा अमेरिकी बांड में किये गए निवेश की बाजार में कीमत अत्यधिक कम हो गई है। अब इन बैंकों को बांड में निवेश की बाजार कीमत कम होने के स्तर तक प्रावधान करने को कहा गया है और यह राशि इन बैकों के पास उपलब्ध ही नहीं है, जिसके चलते भी यह बैंक असफल हो रहे हैं। एक सर्वे में यह बताया गया है कि आने वाले समय में अमेरिका में 190 अन्य बैंकों के असफल होने का खतरा मंडरा रहा है क्योंकि ब्याज दरों के बढ़ने से ऋण की मांग बहुत कम हो गई है। विभिन्न कम्पनियों ने अपने विस्तार की योजनाओं को रोक दिया है, इससे निर्माण की गतिविधियों में कमी आई है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक, फेडरल रिजर्व, का पूरा ध्यान केवल मुद्रा स्फीति को कम करने पर है एवं अमेरिकी अर्थव्यवस्था में विकास दर को नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उत्पादों की मांग कम हो और मुद्रा स्फीति को नियंत्रण में लाया जा सके। इसके चलते कई कम्पनियां अपने कर्मचारियों की छंटनी कर रही है एवं देश में युवा वर्ग बेरोजगार हो रहा है।

पूंजीवाद पर आधारित आर्थिक नीतियां अमेरिका में बैंकिंग क्षेत्र में उत्पन्न समस्याओं का हल नहीं निकाल पा रही हैं। अब तो अमेरिकी अर्थशास्त्री भी मानने लगे हैं कि आर्थिक समस्याओं के संदर्भ में साम्यवाद के बाद पूंजीवाद भी असफल होता दिखाई दे रहा है एवं आज विश्व को एक नए आर्थिक मॉडल की आवश्यकता है। इन अमेरिकी अर्थशास्त्रियों का स्पष्ट इशारा भारत की ओर है क्योंकि इस बीच भारतीय आर्थिक दर्शन पर आधारित मॉडल भारत में आर्थिक समस्याओं को हल करने में सफल रहा है। अमेरिका में बैकों के असफल होने की समस्या मुख्यतः मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से ब्याज दरों में की गई वृद्धि के कारण उत्पन्न हुई हैं। दरअसल, मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के उद्देश्य से उत्पादों की मांग को कम करने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि करने के स्थान पर बाजार में उत्पादों की उपलब्धता बढ़ाई जानी चाहिए ताकि इन उत्पादों की कीमत को कम रखा जा सके। प्राचीन भारत में उत्पादों की उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता था, जिसके कारण मुद्रा स्फीति की समस्या भारत में कभी रही ही नहीं है। बल्कि भारत में उत्पादों की प्रचुरता के चलते समय समय पर उत्पादों की कीमतें कम होती रही हैं। ग्रामीण इलाकों की मंडियों में आसपास ग्रामों में निवास करने वाले ग्रामीण व्यापारी एवं उत्पादक अपने उत्पादों को बेचने हेतु एकत्रित होते थे, सायंकाल तक यदि उनके उत्पाद नहीं बिक पाते थे तो वे इन उत्पादों को कम दामों पर बेचना प्रारम्भ कर देते थे ताकि गांव जाने के पूर्व उनके समस्त उत्पाद बिक जाएं एवं उन्हें इन उत्पादों को अपने गांव वापिस नहीं ले जाना पड़े। इस प्रकार भी विभिन्न उत्पादों की भारतीय मंडियों में मांग से अधिक आपूर्ति बनी रहती थी। अतः उत्पादों की कमी के स्थान पर उत्पादों की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता पर ध्यान दिया जाता था, इससे प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मुद्रा स्फीति का जिक्र ही नहीं मिलता है। दूसरे, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में आर्थिक मॉडल एवं नियमों को बहुत जटिल बना दिया गया है। इससे भी कई प्रकार की आर्थिक समस्याएं खड़ी हो रही है जिसका हल विकसित देश नहीं निकाल पा रहे हैं।

लोकसभा चुनावों में धराशायी विपक्ष के टूलकिट आधारित मुद्दे !

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स्वतंत्रता के बाद भारत में अभी तक जितने भी लोकसभा या विधानसभा चुनाव संपन्न हुए हैं उनमें पहली बार कांग्रेस के नेतृत्व में बना गठबंधन हर दृष्टि से कमजोर नजर आ रहा है । जब से लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस व इंडी गठबंधन के नेताओं ने प्रचार आरम्भ किया है तभी से कांग्रेस नेता राहुल गांधी व उनके प्रवक्ता मीडिया एजेंसियों व टीवी चैनलो पर बैठकर केवल एक ही बहस कर रहे हैं कि अगर मोदी जी तीसरी बार 400 सीटों के साथ प्रधानमंत्री बन जाते हैं तो फिर भाजपा संविधान को फाड़ कर फेंक देगी, दोबारा चुनाव नहीं होंगे क्योंकि इनके पास कोई मुद्दा नहीं है मोदी जी को घेरने का। इसके अतिरिक्त मोदी जी और अमित शाह के ए.आई. द्वारा बनाए गए डीप फेक वीडियो या फिर सम्पादित/ डॉक्टर्ड वीडियो को आधार बनाकर झूठ फैला रहे हैं ।
पिछले दिनों अमित शाह के ऐसे ही एक वीडिओ के साथ आरक्षण के सम्बन्ध में दुष्प्रचार किया गया हालांकि अब इस पर दिल्ली पुलिस ने कार्यवही आरम्भ कर दी है और कई लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं । उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस फर्जी वीडियो प्रकरण को कोअपने पक्ष में मोड़कर मुद्दा बनाने मे कुछ हद तक सफलता प्राप्त कर ली है साथ ही वे संविधान और आरक्षण के नाम पर विगत 70 साल में पिछली सरकारों ने जो किया उसे भी बेनकाब कर रहे हैं।

वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार आने के बाद से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ आरक्षण विरोधी होने का दावा कर अभियान चलाया जा रहा है। बिहार में 2015 के विधानसभा चुनावों में नितीश कुमार और लालू यादव के बीच गबठबंधन हुआ था तब इन दलों ने पांचजन्य साप्ताहिक में प्रकाशित एक साक्षात्कार के आधार पर संघ के खिलाफ विषवमन किया था। बसपा नेत्री मायावती ने एक पुस्तिका प्रकाशित करवा के घर घर तक बंटवाई थी और बताया गया था कि संघ किस प्रकार से आरक्षण विरोधी है।

अब समय बदल चुका है यह 2024 की बदली हुई भाजपा और संघ है जो दुष्प्रचार के प्रति पूरी तरह सतर्क और सशक्त है। इस बार कांग्रेस नेताओं का यह दांव जमीनी धरातल पर नहीं उतर पा रहा है क्योंकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ.मोहन भागवत ने कहा कि संघ हमेशा संविधान सम्मत आरक्षण का पक्षधर रहा है।संघ का मानना है कि जब तक सामाजिक भेदभाव रहेगा या आरक्षण देने के कारण बने रहेंगे तब तक आरक्षण जारी रहे।संघ प्रमुख ने कहा कि उन्होंने एक वीडियो के बारे में सुना है जिसमें कहा गया है कि संघ आरक्षण के खिलाफ है। संघ आरक्षण का कभी विरोधी नहीं रहा है किंतु यह उसके खिलाफ विमर्श स्थापित किया जा रहा है क्योंकि कांग्रेस को लगता है कि संघ व भाजपा को आरक्षण व संविधान विरोधी साबित कर वह चुनावी किला फतह कर सकती है।

राहुल गांधी आजकल भाजपा को संविधान विरोधी साबित करने में दिन-रात एक किये हुए है जबकि वास्तविकता यह है कि अगर आज आम नागरिक अपने संविधान को जान रहा है, पढ़ राहा है और उसके अनुरूप आचरण करना चाह रहा है और उसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयास ही हैं क्योंक अब हर वर्ष 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जा रहा है। भारतीय संविधान को अब वेबसाइट पर आसानी से पढ़ा जा सकता है। नए संसद भवन के उद्घाटन और सेंगोल स्थापना के अवसर पर सदन के सदस्यों को भी संविधान की मूल प्रति दी गई ।

कांग्रेस जो आज संविधान – संविधान का राग अलाप रही है संविधान का सत्यानाश कांग्रेस ने ही किया था। श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए संविधान में मूल भूत परिवर्तन करके उसमें धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी जैसे शब्द जोड़कर उसकी आत्मा ही नष्ट कर दी, आपातकाल लगाकर अपनी विकृत तानाशाही मानसिकता का परिचय दिया और मनमर्जी से विपक्षी दलों की प्रदेश सरकारों को गिराया । कांग्रेस के कार्यकाल में संविधान एक परिवार का बंधक हो गया था व एक धर्म विशेष का तुष्टीकरण कर रहा था।

इसी प्रकार कांग्रेस अयोध्या में प्रभु राम की जन्मभूमि और उस पर बन रहे भव्य मंदिर के प्रति भी नकारात्मक रही है।जन जन के आराध्य प्रभु राम को काल्पनिक कहने वाली कांग्रेस ने पहले तो मुद्दे को भटकाने, लटकाने, अटकाने के लिए जी जान लगा दी फिर भी असफल रहने पर अपने मुस्लिम तुष्टीकरण को मजबूती प्रदान कनने के लिए प्राण प्रतिष्ठा समारोह का बहिष्कार किया। उसके बाद राहुल गांधी व विपक्ष के नेता जनसभाओं में बयान देने लगे कि राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह में दलित आदिवासी होने के कारण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को नहीं बुलाया गया। यह भी बयान दिए जाने लग गये कि प्राण प्रतिष्ठा समारोह में केवल और केवल बड़े उद्योगपति और बड़े घरानो के लोग ही उपस्थित रहे आम जनता को कोई भाव नहीं दिया गया। पिछले दिनों राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के अयोध्या में रामलला के दर्शन करके ने राहुल गांधी के इस झूठ का करारा उत्तर दे दिया। राम मंदिर के गर्भगृह में राष्ट्रपति की उपस्थिति ने कांग्रेस नेता के आरोप को बुरी तरह से धो डाला।राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गर्भगृह में पहुंचकर रामलला का विधिवत पूजन किया। आराध्य को निकट से देखकर राष्ट्रपति बहुत भावुक दिखीं और उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने अनुभव भी साझा किए।

इस बीच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बयान जारी कर राहुल गांधी के सभी आरोपों को मिथ्या बताया। महासचिव चंपत राय ने बताया कि राहुल गांधी को स्मरण कराना चाहूंगा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू एवं पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वय को रामलला के मूल विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर आमंत्रित किया गया था। उन्होंने बताया कि इस अवसर पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग समाज से जुड़े हुए संत, महापुरुष गृहस्थजन औेर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यश प्राप्त करने वाले भारत का गौरव बढ़ाने वाले लोगों को भी आमंत्रित किया गया था। मंदिर में सेवारत श्रमिक और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे। राहुल गांधी अपनी जनसभाओं मे यह आरोप भी लगा रहे हैं कि वहां कोई गरीब, महिला, किसान युवा दर्शन नहीं करने गया अब यह भी झूठ हो गया है क्योंकि अब तक दो करोड़ से अधिक लोग राम मंदिर के दर्शन कर चुके हैं और इसमें समाज के सभी वर्गो की आम जनता ही शमिल है किंतु राहुल के पदचिन्हों पर चलने वाले कांग्रेस के प्रवक्ता अभी भी बाज नहीं आ रहे हैं और अयोध्या मंदिर व दर्शन कार्यक्रम को इवेंट बताकर उसका अपमान कर रहे है।

इसके अलावा कांग्रेस और विपक्ष बार -बार ईवीएम मसहीनों पर ही संदेह पैदा कर रहा है किंतु ईवीएम यह दावा अब सुप्रीम कोर्ट में भी खारिज हो चुका है। पहले दो चरणों में कम मतदान का हवाला देकर विरोधी दलों ने सोशल मीडिया पर हल्ला मचाना प्रारम्भ कर दिया कि कम मतदान का मतलब है मोदी जी हार गये, हार गये। किंतु जब चार दिन बाद चुनाव आयोग ने मतदान प्रतिशत के अंतिम आंकड़े सार्वजनिक किये तो विपक्ष एक बार फिर ईवीएम और चुनाव आयोग पर संदेह करने लग गया। विपक्षी दलों के नेता सोशल मीडिया पर आकर ईवीएम -ईवीएम करने लगे और कहा कि चुनाव आयेग ने खेल कर दिया- खेल कर दिया।

इसी राजनैतिक गहमा गहमी के बीच एस्ट्राजेनेका आक्सफोर्ड की कोरोना वैक्सीन कोविडशील्ड को लेकर विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि को खराब करने का अभियान प्रारम्भ कर दिया । इस आभासी मुद्दे को टूलकिट के नए टूल के रूप में सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मो पर उठाया जा रहा है । कोविडशील्ड के प्रकरण में जनहित याचिका दायर करने वाले दलाल भी सक्रिय हो गये हैं और सुप्रीम कोर्ट पहुंच गये हैं जबकि वास्तविकत यह है कि कोविडशील्ड से नुकसान बहुत ही कम हुआ है जबकि लाभ अधिक हुआ है। कोविडशील्ड को लेकर उठ रहे सभी विवाद पूरी तरह से भ्रामक खबरो पर आधारित हैं। विशेषज्ञों का मत है कि हर वैक्सीन के साइड इफैक्ट होते ही हैं। वह वैक्सीन लगाने के 21 दिन या एक महीने के भीतर ही हो सकता था। कोविड काल में दो वर्ष पूर्व लगे इस वैक्सीन से कोई नुकसान नहीं अपितु लाभ ही हुआ है।

अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लातूर की जनसभा में कहा कि 2014 के पहले एक समय था जब खबर आती थी कि, “सड़क पर पड़ी कोई भी लावारिस वस्तु को आप लोग न छुएं यह बम हो सकता है किंतु अब एक ऐसी खबरें आनी बंद हो गयी है” ठीक उसके अगले ही दिन सुबह -सुबह दिल्ली के स्कूलों को बम से उड़ाने की धमकी आती है और विरोधी दल आनंदमग्न होकर उस पर अपनी विकृत राजनीति प्रारम्भ कर देते हैं किंतु बाद में वह फर्जी अफवाह निकलती है हालांकि प्रकरण की अभी जांच चल रही है और हो सकता है कि यह विपक्ष की ही करतूत रही हो । कुछ ऐसी ही विकृत राजनीति कर्नाटक के एक सैक्स स्कैंडल को लेकर देखने को मिल रही है विरोधी दल उसमें भी भाजपा की छवि खराब करने का प्रयास कर रहे थे। कर्नाटक का सैक्स स्कैंडल कांग्रेस के शासनकाल में ही हुआ है। इसमें यह भी महत्वपूर्ण है कि कर्नाटक में कांग्रेस के अपने ही नेता की बेटी के साथ लव जिहाद की बर्बर घटना होने जाने के बाद कांग्रेस तुष्टीकरण के कारन मौन रही और जब भाजपा ने इसका विरोध किया, परिवार के साथ आगे बढ़ी तो सेक्स स्कैंडल को लेकर हल्ला मचा दिया गया।

आज की भाजपा अब 2014 के पहले वाली भाजपा नहीं रही कि उसे झूठे नैरेटिव चलाकर डराया, धमकाया या हराया जा सकता है। अब भजपा नेता हर बात के लिए सतर्क रहते हैं । गुजरात के एक सांसद रूपाला के बयान के बाद नैरेटिव चलाया गया कि राजपूत और क्षत्रिय भाजपा से नाराज हो गये हैं किंतु गुजरात में मोदी व भाजपा नेताओं की जनसभाओं में जैसी भीड़ आ रही है उससे लग रहा है कि राजपूत व क्षत्रियों की भाजपा से नाराजगी का नैरेटिव भी छिन्न भिन्न हो चुका है।

Renewable energy accounted for 71% of India’s power generation capacity addition in FY24: CEEW-CEF

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MS Desk

—Share of coal/lignite in India’s total installed capacity fell below 50 per cent for the first time
— ~95 per cent of MNRE’s annual bidding trajectory target was met in FY24
—Over USD 2 billion in FDI flowed into non-conventional energy for the second year running

New Delhi: Renewable energy (RE) sources contributed to 71 per cent of the ~26GW of power generation capacity that India added in FY 2023-2024, according to the latest edition of the CEEW Centre for Energy Finance (CEEW-CEF) Market Handbook released today. The country’s total installed energy capacity has now reached 442 GW, of which ~144 GW (33 per cent) was RE, and ~47 GW (11 per cent) came from hydro. Consequently, the coal/lignite share in India’s total installed capacity tipped below the 50 per cent mark for the first time.

The CEEW-CEF Market Handbook also found that solar—grid-scale and rooftop—continued to dominate India’s RE capacity addition, accounting for ~15 GW (or 81 per cent of RE addition) in FY24. Wind capacity addition almost doubled and stood at 3.3 GW (vs 2.3 GW in FY23). Notably, for the first time since FY17, nuclear capacity (1.4 GW) was added in FY24.

In line with India’s ambitious renewable energy goals, RE auctions reached a record with ~41 GW of auctioned capacity in FY24, the report found. Further, in this financial year, eight auctions with energy storage components were concluded, indicating a growing shift towards innovative power procurement formats.

Gagan Sidhu, Director, CEEW-CEF, said, “The CEEW-CEF Market Handbook found that ~95 per cent of India’s targeted 50 GW annual RE bidding trajectory was met in FY24. Bids of 47.5 GW that were issued are approximately three times the RE capacity that has been added annually in recent years. Further, there is a clear tilt away from pure vanilla RE procurement. Innovative formats such as wind-solar hybrids, firm and dispatchable renewable energy (FDRE), and RE-plus-storage accounted for 37 per cent of the capacity auctioned. Going forward, we can expect this share to increase further as innovative formats accounted for 57 per cent of bids issued. The sharp fall in the drop of battery energy storage systems (BESS) tariffs augurs well in this regard, with FY24 witnessing a ~59 per cent drop in BESS tariffs, providing 2 hours of storage per day (compared to August 2022). India’s main challenge with RE now is the scale of financing. Specifically, how can it be ramped up 3x to finance bids of 47.5 GW that were issued? Unlocking the domestic bond market for corporate green bond issuances can be a catalyst to achieve this scale.”

The CEEW-CEF report also found that peak power demand (met) continued to rise in FY24, and reached a new high of 240 GW. This was due to factors such as a fast-growing economy and lower-than-expected rainfall in August 2023 and October 2023, above-normal temperatures in November 2023, and severe cold days during the winter months in North India. In electricity demand (met) terms, there was an uptick of ~8 per cent compared to FY23.

Riddhi Mukherjee, Research Analyst, CEEW-CEF, said, “To fulfil India’s ever-increasing electricity requirement, the Ministry of Power amended the Electricity (Late Payment Surcharge and Related Matters) Rules of 2022, mandating the sale of un-requisitioned surplus power on exchanges. This move is expected to provide higher supply-side liquidity and further the discovery of competitive prices on the power exchanges. Moving to RE, FY24 saw several policy moves to shift gears beyond utility-scale RE. For instance, PM Surya Ghar: Muft Bijli Yojana was introduced to increase rooftop solar installation in the residential segment, which could result in the addition of ~30 GW.”

On the green financing front, foreign direct investment (FDI) flows towards non-conventional energy exceeded USD 2 billion for the second consecutive year, according to the CEEW-CEF Market Handbook. Further, the Reserve Bank of India concluded four sovereign green bonds auctions of INR 20,000 crore (vs INR 16,000 crore in FY23), whose proceeds may be used to finance/refinance eligible green projects.

वित्त वर्ष 2023-24 में स्थापित भारत की बिजली उत्पादन क्षमता में अक्षय ऊर्जा का योगदान 71 प्रतिशत रहा: सीईईडब्ल्यू-सीईएफ

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एमएस डेस्क

– भारत की कुल स्थापित क्षमता में कोयले/लिग्नाइट की हिस्सेदारी पहली बार 50 प्रतिशत के नीचे आई

– वित्त वर्ष 2023-24 में एमएनआरई का लगभग 95 प्रतिशत वार्षिक बिडिंग ट्रेजेक्टरी टारगेट पूरा हुआ

– लगातार दूसरे वर्ष गैर-पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र में 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा की एफडीआई आई

नई दिल्ली, वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान भारत में स्थापित लगभग 26 गीगावॉट बिजली उत्पादन क्षमता में अक्षय ऊर्जा (आरई) स्रोतों का योगदान 71 प्रतिशत रहा। यह जानकारी सीईईडब्ल्यू सेंटर फॉर एनर्जी फाइनेंस (सीईईडब्ल्यू-सीईएफ) की आज जारी हुई मार्केट हैंडबुक में दी गई है। अब देश की कुल स्थापित ऊर्जा क्षमता 442 गीगावॉट तक पहुंच गई है, जिसमें अक्षय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 144 गीगावॉट (33 प्रतिशत) और हाइड्रो पॉवर की हिस्सेदारी लगभग 47 गीगावॉट (11 प्रतिशत) रही। इसके कारण वित्त वर्ष 2023-24 में भारत की कुल स्थापित क्षमता में कोयला/लिग्नाइट की हिस्सेदारी पहली बार 50 प्रतिशत से नीचे आ गई।

सीईईडब्ल्यू-सीईएफ मार्केट हैंडबुक के अनुसार, भारत की अक्षय ऊर्जा क्षमता में हुई वृद्धि में सोलर-ग्रिड-स्केल और रूफटॉप का हिस्सा लगातार सबसे ज्यादा रहा। इनसे वित्त वर्ष 2023-24 में लगभग 15 गीगावॉट क्षमता बढ़ी, जो कुल जोड़ी गई अक्षय ऊर्जा क्षमता का 81 प्रतिशत है। इसी समयावधि में पवन ऊर्जा क्षमता में वृद्धि लगभग दोगुनी होकर 3.3 गीगावॉट पहुंच गई, जो वित्त वर्ष 2022-23 में 2.3 गीगावॉट थी। उल्लेखनीय है कि वित्त वर्ष 2016-17 के बाद पहली बार वित्त वर्ष 2023-24 में परमाणु क्षमता (1.4 गीगावॉट) में बढ़ोतरी हुई है।

सीईईडब्ल्यू-सीईएफ मार्केट हैंडबुक में पाया गया है कि भारत के महत्वाकांक्षी अक्षय ऊर्जा लक्ष्यों के अनुरूप, वित्त वर्ष 2023-24 में लगभग 41 गीगावॉट नीलामी क्षमता के साथ अक्षय ऊर्जा नीलामी एक रिकॉर्ड पर पहुंच गई। इसके अलावा, इसी वित्तीय वर्ष में ऊर्जा भंडारण घटकों (energy storage components) की आठ नीलामियां पूरी हुईं, जो बिजली खरीद के नए प्रारूपों की दिशा में बदलाव का संकेत देती है।

गगन सिद्धू, डायरेक्टर, सीईईडब्ल्यू-सीईएफ, ने कहा, “सीईईडब्ल्यू-सीईएफ मार्केट हैंडबुक में पाया गया कि वित्त वर्ष 2023-24 में भारत के लक्षित 50 गीगावॉट वार्षिक बिडिंग ट्रेजेक्टरी टारगेट का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा पूरा हो गया था। वित्त वर्ष 2023-24 में 47.5 गीगावॉट की बोलियां जारी हुई, जो हालिया वर्षों में स्थापित वार्षिक आरई क्षमता से लगभग तीन गुना ज्यादा है। इसके अलावा, विशुद्ध अक्षय ऊर्जा की खरीद की जगह पर नए प्रारूपों की दिशा में झुकाव स्पष्ट है। नए प्रारूपों, जैसे विंड-सोलर हाइब्रिड, फर्म एंड डिस्पैचेबल रिन्यूएबल एनर्जी (एफडीआरई) और आरई-प्लस-स्टोरेज की नीलाम हुई क्षमता में हिस्सेदारी 37 प्रतिशत रही। हम यह हिस्सेदारी आगे और बढ़ने की उम्मीद कर सकते हैं, क्योंकि जारी हुई बोलियों में नए किस्म के प्रारूपों की हिस्सेदारी 57 प्रतिशत थी। बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (बीईएसएस) टैरिफ में आई तेज गिरावट इस बारे में एक अच्छा संकेत देती है। वित्त वर्ष 2023-24 में बीईएसएस टैरिफ में लगभग 59 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, जो प्रति दिन 2 घंटे स्टोरेज देता है (अगस्त 2022 की तुलना में)। अक्षय ऊर्जा के मामले में अब भारत की प्रमुख चुनौती वित्तपोषण का आकार है। विशेष रूप से, कैसे जारी हुई 47.5 गीगावॉट की बोलियों के वित्तपोषण के लिए इसे तीन गुना तक बढ़ाया जा सकता है? इस आकार का वित्त पोषण पाने के लिए कॉरपोरेट ग्रीन बांड को जारी करने के लिए घरेलू बांड बाजार को खोलना एक प्रभावी कदम हो सकता है।”

सीईईडब्ल्यू-सीईएफ रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि वित्त वर्ष 2023-24 में भी पीक पॉवर डिमांड (जिसे पूरा किया गया) में बढ़ोतरी जारी रही और यह 240 गीगावॉट की नई ऊंचाई पर पहुंच गई। ऐसा तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और अगस्त 2023 से अक्टूबर 2023 के उम्मीद से कम बारिश का होना, नवंबर 2023 में सामान्य से अधिक तापमान और उत्तर भारत में सर्दियों के महीनों में भीषण ठंड वाले दिन जैसे कारकों से हुआ था। बिजली की मांग के मामले में, वित्त वर्ष 2023-24 में वित्त वर्ष 2022-23 की तुलना में लगभग 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

रिद्धि मुखर्जी, रिसर्च एनालिस्ट, सीईईडब्ल्यू-सीईएफ, ने कहा, “भारत में बिजली की लगातार बढ़तीजरूरत को पूरा करने के लिए, बिजली मंत्रालय ने इलेक्ट्रिसिटी (लेट पेमेंट सरचार्ज एंड रिलेटेड मैटर्स) रूल्स-2022 में बदलाव किया था, जो बिना मांग वाली अतिरिक्त बिजली (un-requisitioned surplus power) की पॉवर एक्सचेंज में बिक्री को अनिवार्य बनाता है। इस कदम से आपूर्ति पक्ष के स्तर पर अधिक तरलता (liquidity) मिलने और पॉवर एक्सचेंजों में बिजली की ज्यादा प्रतिस्पर्धी दरें मिलने की उम्मीद है। अक्षय ऊर्जा के बारे में बात करें तो वित्त वर्ष 2023-24 के दौरान यूटिलिटी-स्केल अक्षय ऊर्जा से आगे बढ़ने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए गए। उदाहरण के तौर पर, आवासीय क्षेत्र में रूपटॉप सोलर को बढ़ावा देने के लिए पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना को शुरू किया गया,जो लगभग 30 गीगावॉट अतिरिक्त क्षमता जोड़ सकती है।”

सीईईडब्ल्यू-सीईएफ मार्केट हैंडबुक के अनुसार, हरित वित्तपोषण (green financing) के क्षेत्र में, गैर-पारंपरिक ऊर्जा के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) लगातार दूसरे वर्ष 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर से ज्यादा रहा। साथ ही, भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी 20,000 करोड़ रुपये (वित्त वर्ष 2022-23 में 16,000 करोड़ रुपये की तुलना में) के सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड्स की नीलामी पूरी की, जिन्हें उपयुक्त ग्रीन प्रोजेक्ट्स के वित्तपोषण/पुनर्वित्तपोषण के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

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