आम चुनाव 2024 और बस्तर (आलेख-1)

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राजीव रंजन प्रसाद

रायपुर। चुनावी मौसम है, और हर ओर चर्चा चुनावों की ही हो रही है। मैं बस्तर मे हुए पहले लोकसभा चुनावों से ले कर अब तक की परिस्थिति पर केंद्रित एक आलेख श्रंखला आप मित्रों के साथ साझा करने जा रहा हूँ। यह आलेख श्रंखला मैंने एक अखबार के लिए लिखी थी लेकिन संभव है संपादक महोदय का ध्यान इस ओर न गया हो। बहरहाल अपना मंच जिन्दाबाद है। इस आलेख श्रंखला में हम स-विस्तार और क्रमवार बस्तर की राजनैतिक परिस्थितियों की चर्चा करेंगे। आज पहली कड़ी में चलते हैं, उस परिस्थिति की ओर जबकि बस्तर में पहले चुनाव होने वाले थे।

बस्तर संभाग में चुनावों की परिपाटी को समझने के लिए उस क्षितिज की ओर चलना होगा जिन समयों में साम्राज्यवादिता का अवसान हुआ और नए नए स्वाधीन हुए देश भारत में लोकतंत्र की आहट सुनाई पड़ने लगी थी। यदि उन समयों के संदर्भों, प्रत्यक्षदर्शियों और पुस्तकों पर एक दृष्टि डाली जाये तो लगता है कि हमने संविधान तो बहुत शक्तिशाली और स्तुत्य बनाया है लेकिन इसके प्रतिपादन से पहले जिस तरह से व्यवस्था परिवर्तन हुआ वह बहुत आपाधापी भरा था। एक ओर जहाँ वह केन्द्रीय नेतृत्व जिसे हस्तानन्तरण के रूप मे सत्ता प्राप्त हुई थी, वह सैंकड़ों राजाओं-महाराजाओं की महत्वाकांक्षा से जूझ रहा था; सरदार वल्लभ भाई पटेल इस प्रयास मे थे कि देसी रियासतें भारतीय गणराज्य का स्वेच्छा से हिस्सा बना जायें। ब्रिटिश शासन में राजा महाराजा जिस तरह का जीवन जी रहे थे, जो सुविधा-संपन्नता और शान-शौकत उन्हे प्राप्त थी, जैसे अधिकार उन्हें मिले हुए थे ऐसे में लोकतंत्र की आहट उन्हें विचलित कर रही थी।

वे राज्य जहाँ की राजनीति को वहाँ की धार्मिक जनसंख्या प्रभावित कर रही थे, वे तो भारत और पाकिस्तान में सम्मिलित होने की रस्साकशी में उलझे दिखाई पड़े; जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर जैसे राज्यों में ऐसी समस्या सुरसा के मुख की तरह विकराल हो चली थीं। ऐसे राज्य विवेचनाहीन रह गये, और आज भी उनपर कम बातें होती हैं, जहाँ राजतन्त्र की छाया थी लेकिन वे द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत और उससे जनित खीचातानी का हिस्सा नहीं थे। क्या इन राज्यों में व्यवस्थापरिवर्तन सहजता से हो सका था? क्या इस व्यवस्था परिवर्तन ने ऐतिहासिक, राजनैतिक और समाजशास्त्रीय ताने-बाने को छिन्न भिन्न नहीं किया था? क्या इन प्रश्नों का उत्तर हमें बस्तर की राजनीति को ध्यान से समझने पर प्राप्त हो सकता है?

बस्तर में आज की स्थिति और राजनैतिक घटनाक्रमों को समझने के लिए हमें इतिहास की ओर ही लौटना पड़ेगा। यह समय था जबकि हैदराबाद का निजाम एक स्वतंत्र देश बनाने की अपनी इच्छा के लिए प्रतिबद्ध था और उसकी दृष्टि बस्तर रियासत पर गड़ी हुई थी। ब्रिटिश शासन के कालखण्ड में ही महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी के शासन समय में बैलाड़ीला में लौह अयस्क की खोज हो चुकी थी। अपनी पुस्तक ‘आई प्रवीर दि आदिवासी गॉड’ मे बस्तर रियासत के अंतिम महाराजा रहे प्रवीर चंद्र भंजदेव लिखते हैं “सरदार पटेल की रुचि अपने पसंद के प्रशासक की नियुक्ति करने में थी जिससे बस्तर रियासत को तत्कालीन हैदराबाद रियासत के प्रभाव से मुक्त रखा जा सके। नीलगिरी में जब अप्रिय घटनाएं होंए लगीं, हैदराबाद रियासत ने भारत के केन्द्रीय शासन की अधीनता को स्वीकार कर कुछ रियासतों के पूर्व शासकों को जिनकी राजनैतिक पहुँच थी और जिनका राजनीतिज्ञों पर प्रभाव था, राज्य प्रमुखों के पद पर नियुक्त कर दिया”।

रियासत की राजनीति ने अभी लोकतंत्र को ठीक से समझा भी नहीं था, अभी पहले चुनाव भी नहीं हुए थे और ऐसे में प्रभुत्व की कशमकश आरंभ हो गई थी, क्या इसके पीछे का कारण जल्दी ही होने वाले पहले राष्ट्रीय चुनाव थे? बस्तर में महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव प्रभावशाली थे, उन्हें न तो आसानी से नजरंदाज किया जा सकता था न ही उनकी लोकप्रियता के समानांतर कोई व्यक्तित्व खड़ा किया जा सकता था। क्या इसी लिए रियासत का एडमिनिस्ट्रेटर अथवा दीवान बदले जाने की कवायद होने ली थी? बस्तर रियासत का अब तक भारतीय गणराज्य में विलीनीकरण हो चला था तथापि राज्य की व्यवस्थायें बदलाव की आंधी को झेलते हुए भी कायम थी। अपनी पुस्तक ‘लौहण्डीगुड़ातरंगिणी’ में प्रवीर लिखते हैं, कि “मैंने अंग्रेजों की सलाह से रघुराजसिंह को अपना दीवान बनाया था। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मुझे दिल्ली बुलाया कर रघुराजसिंह को दीवान के पद से हटाने की कोशिश की”। यह संदर्भ केंद्र और समाप्त होती रियासत के चुनाव होंए से पहले बचे-खुचे अधिकार को ले कर भी होने वाली खींचतान को प्रदर्शित करता है।

बस्तर रियासत पर केंद्र से पद रहा दबाव क्यों था, क्या इसके लिए नई नई पनपने वाली स्थानीय राजनीति जिम्मेदार थी? क्या हस्तांतरण से मिली सत्ता के कारण केंद्र में बनी पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कॉंग्रेस पार्टी दूरदर्शिता के साथ पहले चुनाव में जाना चाहती थी और वह सभी प्रतिपक्षी स्वरों की पहचान कर रही थी? राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को कॉंग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के साथ साथ रियासत में नए नए पनपे स्थानीय कॉन्ग्रेसी नेताओं से भी शिकायत थी। अपनी पुस्तक ‘लौहण्डीगुड़ातरंगिणी’ में वे लिखते हैं – “बस्तर में आरंभ से ही मुझे अपनी प्रजा से अलग करने का प्रयास किया गया। गाँव गाँव में सूर्यपाल तिवारी और उसके आदमी राजा और रानी के विरुद्ध प्रचार करते।” इसी क्रम में अपनी पुस्तक में महाराजा स्पष्ट करते हैं कि उनकी प्रतिबद्धता कॉग्रेस पार्टी के प्रति नहीं थी, वे आश्चर्यचाकित थे कि जब राजतन्त्र नहीं रहा, राजा का शासन लौटने वाला नहीं है तो राजा का इतिहास और छवि को धूमिल करने का क्या औचित्य है? पहले चुनाव के रूप में लोकतंत्र की आहट पर टिप्पणी करते हुए वे आगे लिखते हैं – “स्वतंत्र भारत में कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी भी वैधानिक पार्टी का समर्थन कर सकता है। ऐसा न हो तो स्वतंत्रता का कोई प्रमाण नहीं रहा जाएगा”। इन्ही समयों में बस्तर रियासत के विभाजन की चर्चा भी जोरों पर थी।

पहले चुनाव से पहले ही बस्तर में दो व्यवस्थाओं की खींचतान देखी जा रही थी जिसने कालांतर में बड़ी दरार का स्वरूप ले लिया। विचार कीजिए कि बस्तर में निहित अनेक समस्याओं जिसमें नक्सलवाद भी सम्मिलित है, इसके बीज इसी समय पड गए थे?

हीरामंडी: संजय लीला भंसाली से कहां हुई चूक

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मुंबई। संजय लीला भंसाली का ड्रीम प्रोजेक्ट माना जा रहा था हीरा मंडी को। लोग इसकी तुलना पाकीजा और उमराव जान के साथ कर रहे थे। फिल्म का फर्स्ट लुक, टीजर और ट्रेलर भी काफी प्रॉमिसिंग नजर आ रहे थे।

संजय लीला भंसाली की फिल्मों की खासियत होती है उनका भव्य सेट। बाजीराव मस्तानी की शूटिंग के दौरान राजस्थान में हुए हादसे के बाद संजय लीला भंसाली इंडोर शूट करने पर ज़्यादा भरोसा करते हैं।

फिल्म का एसथेटिक वैसा ही है जैसा कि संजय लीला भंसाली की फिल्मों का होता है। विशाल, वैभवपूर्ण और बेहद नफीस।

कास्टिंग की बात करें तो यहां संजय लीला भंसाली चूक कर गए हैं। बाकी सारी अदाकाराऐं मनीषा कोइराला, सोनाक्षी सिन्हा, रिचा चड्ढा, अदिति राव हैदरी, आमना शरीफ फिल्म में जान डालती हैं वही शरमीन सहगल जो के रिश्ते में भंसाली की शायद भांजी लगती हैं कहीं फिट नहीं होती। इस बार नेपोटिज्म के शिकार हुए हैं संजय लीला भंसाली जिसके चलते उन्होंने अपने इस शाहकार को सान दिया है।

जबकि शरमीन सहगल का किरदार आलम के इर्द गिर्द ही पूरी कहानी घूमा करती है।

आलम और ताजदार की प्रेम कहानी में वह जादू मिसिंग है। जिसे देखकर धड़कन है रुक जाए। जहां बाकी हीरोइनों ने भाषा पर मेहनत की है और उसे दौर के अंदाज और लिहाज को ढंग से पकड़ा है। वही शरमीन सहगल भाषा के साथ स्ट्रगल करती हुई नजर आई है। वह अपनी मुंबईया टोन छोड़ नहीं पाईं हैं ।

कहानी के पुरुष किरदार शेखर सुमन फरदीन खान अध्ययन सुमन सिर्फ होने भर के लिए हैं। किसी ने अपनी छाप नहीं छोड़ी है।

वह कमजोर लाचार मर्द ज्यादा नजर आए हैं। अय्याशी करने के लिए भी एक तरह की मर्दानगी की जरूरत होती है जो कि उनमें नदारत थी।
सीरीज के तीन चार एपिसोड निकालने के बाद कहानी जंग ए आजादी की तरफ मुड़ जाती है। लेकिन आजादी के मतवालों के बीच भी कोई याद रखने वाला कैरक्टर गढ़ने में संजय नाकाम रहे हैं।

पूरी सीरीज को देखते हुए ऐसा लगता है कि जैसे संजय लीला भंसाली बेजान चीजों में परफेक्शन डालने में इतनी ज्यादा व्यस्त हो गए कि किरदारों को गढ़ने और उनकी परतों को डिफाइन करने का मौका ही नहीं मिला।

संगीत की बात करें तो इस पूरी सीरीज में बहुत गुंजाइश थी उम्दा संगीत डालने की लेकिन वहां भी कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाए।
4, 6 घंटे लगाने के बावजूद जब सीरीज पूरी देख लेते हैं तब भी आपके जहां में कोई धुन ठहर नहीं पाती। बेहतर होता हीरामंडी के संगीत की जिम्मेदारी संजय किसी और के हाथों में देते।

संजय लीला भंसाली अब अपने आप को दोहरा रहे हैं। दर्शकों को वही दिखा रहे हैं जो दर्शक उनकी फिल्मों में लगातार देखते आ रहे हैं। उन्हें जरूरत है कुछ नया दिखाने की कुछ नया करने की।

Lokesh Garg’s song “Ram ko Laane wale aayenge,” to be launched on May 4th

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Mohini P

Delhi, April 30, 2024 – Celebrated singer-songwriter Lokesh Garg has announced the launch date of his new song “Ram ko Laane wale aayenge.” The song which is a tribute to the leaders behind the Ram Temple in Ayodhya will be released across digital platforms. The release date is May 4th, 2024. Lokesh Garg and Manndakini Bora have collaborated and sung this new devotional song together.

Produced by Garg’s Days n Days Films Entertainment and Bora’s Manndakini Productions, “Ram ko Laane wale aayenge” blends traditional Hindu spiritual poetry with contemporary musical arrangements. The profound lyrics convey a message that those who turned the dream of the Ram Mandir into a reality through strength of conviction will be rewarded with another term in power.

“This song is an ode to the leaders who turned the dream of the Ram Mandir into a reality after centuries. With this song, we hope to inspire the public to have faith that the forces who accomplished this historic milestone will be able to solve other national challenges,” said Garg.

The music video was filmed at the divine and spiritual places of Uttarakhand and features breathtaking shots of the magnificent mandir. It also celebrates Hindu dharma through opulent costumes, classical dance performances, and instrumentation.

Music enthusiasts and political observers are eagerly awaiting the full release of “Ram ko Laane wale aayenge” on May 4th across YouTube, music streaming platforms, and Lokesh Garg’s YouTube channel. For more details and updates, please follow the artists on social media.

कांग्रेस के वफादार पत्रकारों को, पब्लिक खूब पहचानती है

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कांग्रेस गठबंधन ने पहले न्यूज चैनल के 14 एंकरों का बहिष्कार किया। उनकी तस्वीर जारी की और उनकी जितनी बदनाम कर सकते थे, उन्होंने की। उन 14 में से सुधीर चौधरी और सुशांत सिन्हा जैसे एंकर भी थे, जिनके शो में गेस्ट बुलाए ही नहीं जाते।

अब कांग्रेस गठबंधन के प्रवक्ता आने लगे। प्रतिबंध खत्म हुआ लेकिन उनकी भाषा और अहंकार सातवें आसमान पर होता है। सुप्रिया श्रीनेत से लेकर रागिनी नायक तक तमाम प्रवक्ता सवाल कुछ पूछा जाएगा। जवाब कुछ और देंगे। कांग्रेस से कोई सवाल पूछना चाहेगा। कांग्रेस का ही इतिहास पार्टी के प्रवक्ताओं को कोई याद दिलाएगा तो वे बोलने नहीं देंगे।

आज दूरदर्शन पर देखा मैने, कांग्रेस का प्रवक्ता लगातार चिल्लाए जा रहा था। वह कोशिश कर रहा था कि शो का एंकर उसे बीच शो से बाहर निकाल दे लेकिन वह सफल नहीं हुआ। बाहर निकाल दिया जाता तो कांग्रेस इसी बात पर तमाशा करती। दूरदर्शन से जुड़ी कुछ पत्रकारों को वैसे भी खबर चाहिए होती है। वहां कुछ नहीं मिलता तो वे ‘कुछ भी’ छाप देते हैंं।

कांग्रेस गंठबंधन दर्जनों यू ट्यूबर को गोदी में बिठाकर दूसरों को दिन भर गोदी मीडिया कहलवाती हैं। दूसरी तरफ यही कांग्रेसी जिन्हें गोदी मीडिया कहते हैं, उनके चैनलों पर जाकर अपने झूठे अहंकार का प्रदर्शन भी करते हैं।

दिलचस्प है कि जिन्हें गठबंधन वाले गोदी मीडिया कहते हैं, उनके मंच पर जाकर अपना पक्ष रखकर भी आते हैं लेकिन गठबंधन ने जिन यू ट्यूबरों को अपनी गोदी में बिठा रखा है। उन्हें पत्रकारिता का सामान्य शिष्टाचार भी नहीं सिखाया कि सुबह शाम कांग्रेस गठबंधन की आरती ना किया करो। पत्रकारिता करने का ढोंग भी कर रहे हो तो दूसरे पक्ष को भी अपने यहां स्थान दो।

लेकिन कांग्रेस का शासन करने का तरीका ही यही है। मारती भी है और झुकाती भी है। सिखों का नरसंहार किया और मनमोहन सिंह जैसे विद्वान व्यक्ति को रिमोट से कंट्रोल भी किया। पंजाब में उसके बाद सरकार भी चलाई। बाबा रामदेव पर जानलेवा हमला भी करवाया और अपने किए के लिए आज तक माफी भी नहीं मांगी।

कांग्रेस सत्ता में थी तब भी अहंकारी थी और आज सत्ता में नहीं है फिर भी उसका अहंकार कम नहीं हुआ है। यह सब देश की जनता देख रही है।

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