भारत के प्रति पश्चिमी मीडिया के नैरेटिव का पोस्टमार्टम

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बिजेंदर कुमार
              Western Media Narratives on India 
                           from Gandhi to Modi 
              Writer – Sh. Umesh Upadhayaa
दिल्ली। लेखक और वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय जी ने इस पुस्तक में पश्चिमी मीडिया  के   भारत के प्रति नैरेटिव जैसे गंभीर विषय पर अपनी बात रखने का साहस दिखाया है। इस विषय पर बहुत कम लिखा गया है। पुस्तक का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि वामपंथ के अतिरिक्त भी मीडिया समीक्षा की एक राष्ट्रीयतापरक दृष्टि हो सकती है, ये स्थापना  इस पुस्तक के माध्यम से स्थापित हुई है।  पुस्तक भारत में औपनिवेशिक शासन के आरंभ से  लेकर वर्तमान समय तक लगभग दो सौ वर्ष के इतिहास के पश्चिमी मीडिया के पूर्वाग्रह की पड़ताल करती है, जिसकी पुष्टि यथास्थान विभिन्न घटनाओं, तथ्यों, विवरणों और बयानों से बहुत रोचक तरीके से होती चलती है।
      पुस्तक दो सौ साल से चले या रहे  पश्चिमी नैरेटिव के  न केवल भारत, बल्कि अफ्रीका,लैटिन अमेरिका और एशिया समेत तीसरी दुनिया के विभिन्न विकासशील और अविकसित देशों के प्रति उसकी हिकारत और भेदभाव पूर्ण दृष्टिकोण का सिलसिलेवार परत दर परत विवेचन ही नहीं करती, बल्कि मीडिया को समझने का देशज नैरेटिव बनाते दिखती है, जिसमें स्थानीयता, स्वाभिमान, आत्मसम्मान और स्व भाव का गौरव है। पश्चिमी मीडिया का एकांगी, एकाधिकारवादी और अधिनायकवादी रवैया इस पुस्तक में प्रमाण सहित उजागर किया गया है।
      उमेश उपाध्याय जी  1975 में सूरीनाम आजादी की घटना की पश्चिमी मीडिया में उपेक्षापूर्ण कवरेज से पुस्तक का  आरंभ करते हुए वर्तमान समय में  डिजिटल मीडिया के नए एकाधिकारवादी आयामों , नई विश्व सूचना व्यवस्था और उसमें भारत की भूमिका को लेकर गंभीर वैचारिकी प्रस्तुत करते हैं। पश्चिमी मीडिया के साथ दक्षिण अमेरिकी प्रेस ने भी सूरीनाम की आजादी को की बहुत कम कवरेज की । इसका कारण लैटिन अमेरिका ,अफ्रीका ,एशिया समेत विकासशील और अविकसित देशों का सूचनाओं के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भरता थी जिसका मनमाना लाभ पश्चिमी मीडिया लेता रहा है । संसाधनों से लबरेज सूचना तंत्र के चलते विकसित देशों ने न  केवल सूचना एकाधिकारवादी दृष्टिकोण अपनाया बल्कि तमाम पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर अपने औपनिवेशिक राजनैतिक ,व्यावसायिक और सांस्कृतिक  हितों को भी साधा ।
        1970 के दशक में गुटनिरपेक्ष देशों ने सूचना साम्राज्यवाद को थोड़ी चुनौती अवश्य दी लेकिन आज भी ग्लोबल वित्तीय संस्थानों और सूचना तंत्र पर विकसित  देशों का आधिपत्य है। विश्व का अधिकांश सूचना प्रवाह इन देशों की न्यूज एजेंसियों के द्वारा नियंत्रित और संचालित है जिनमें ए पी ,रायटर ,ए एफ पी ,यू पी आई प्रमुख हैं। its an old story नामक प्रथम अध्याय में उमेश जी विस्तार से इनके वित्तीय हितों और नेरेटिव की पड़ताल करते हैं। इन एजेंसियों के निर्णय और प्राथमिकता की तहों में झाँककर देखने पर बाजार हितों और वैश्विक सत्ता समीकरणों की परतें खुलती हैं । उमेश जी इन परतों को खोलने में बहुत हद तक निष्पक्ष रहे हैं।
 दूसरे अध्याय में लेखक ने भारत में आजादी और उसके  बाद मीडिया के उभार और भारतीय राजनीति के प्रति पश्चिमी मीडिया के द्वारा की गई कवरेज के अनेक उदाहरणों से सिद्ध किया कि भारतीय नेताओं खासकर  गांधी ,नेहरू,अंबेडकर  और पटेल आदि के बारे की गई एजेंडा रिपोर्टिंग में निहित नेरेटिव न केवल भेदभावकारी है बल्कि भारत के प्रति हीनता का भाव रखने की पारंपरिक मंशा भी शरारत पूर्ण है।डा अंबेडकर ने तो अपने बारे में पश्चिमी प्रेस की संदिग्ध रिपोर्टिंग  और  गलतबयानी की पीड़ा को व्यक्त भी किया । चर्चिल ने आजादी को लेकर भारत पर जो सवाल और संदेह व्यक्त किए उनको पश्चिमी प्रेस ने हाथों -हाथ लेकर भारत के  राजनीतिक नेत्रत्व को कठघरे में रखा । पुस्तक इस नेरेटिव को ध्वस्त भी करती है और औपनिवेशिक सोच की संकीर्णता को उजागर भी करती है।आजादी के बाद  भारत  के  गुटनिरपेक्ष  रवैये की तुलना में पाकिस्तान का पिछलग्गू दृष्टिकोण पश्चिमी प्रेस का चहेता बनना बताता है कि पश्चिमी प्रेस शीत युद्ध के दौर में खेमेबाजी से मुक्त नहीं थी बल्कि वो खुद पश्चिमी  खेमे की  प्रतिनिधि की तरह व्यवहार कर रही थी ।
तीसरे अध्याय में पश्चिमी मीडिया के द्वारा इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और भारतीय राजनीति के विविध आयामों की एकतरफा और एजेंडा रिपोर्टिंग पर लेखक ने प्रकाश डाला  है। निक्सन के अशिष्ट व्यवहार को पश्चिमी मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दी हालांकि कालांतर में किसिंजर को इसके लिए माफी माँगनी पड़ी । अपनी रिपोर्टिंग के चलते बी बी सी को बैन का सामना भी करना पड़ा । एक बार आपातकाल में और एक बार और । भारत विरोधी एजेंडा भी पश्चिमी मीडिया का प्रिय शगल रहा है।
     लेखक के अनुसार बी बी सी की स्वायतता अपने आप में संदेह से परे नहीं रही है। जगजीत सिंह चौहान के साक्षात्कार में आपत्तिजनक कंटेन्ट को न हटाना इसका प्रमाण है। भारतीय  संसद पर हमले और ट्विन टॉवर पर हमले की पश्चिमी मीडिया द्वारा कवरेज में भी भेदभाव किया गया । जिस प्रकार का मीडिया अभियान पश्चिमी मीडिया ने अमेरिकी हमले को लेकर चलाया वैसा भारतीय संसद पर हुए हमले की कवरेज में देखने को नहीं मिला । पुस्तक सवाल उठाती है कि मंगल यान ,चंद्रयान ,पुलवामा और कारगिल जैसी अनेक घटनाओं में पश्चिमी मीडिया सिलेक्टिव क्यों हो जाती है और भ्रामक कवरेज क्यों करती है? इस अध्याय में लेखक कुछ गंभीर सवाल भी सामने रखते हैं कि कैसे  पश्चिमी मीडिया भारत का गरीबी के नाम पर उपहास करता है? लेखक भारत की गरीबी के पीछे उपनिवेशी शोषण और दमन को प्रमुख कारण मानते है और पिछले कुछ सालों में गरीबी के कम होने को सप्रमाण प्रस्तुत करते हैं।लेखक के अनुसार  इसरो और भारतीय सेटेलाइट मार्केट का उभार  पश्चिमी मीडिया सहन कर पा रहा है।
       पाँचवाँ  अध्याय कोविड और मोदी को लेकर है जिसे लेखक ने विस्तार से और मन से लिखा है। इसमें उन्होंने पश्चिमी प्रेस के द्वारा स्पेनिश फ्लू रिपोर्टिंग और उसमें उसके द्वारा गांधी जी बारे फैलाई गई निराधार खबरों का पर्दाफाश किया है। अवैज्ञानिक अफवाहें ,भ्रम पैदा करना ,अप्रमाणिक तथ्यों तथा यूरोप ,अमेरिका ,इंग्लैंड और भारत में कोविड रिपोर्टिंग के बारे जिस भेदभाव और एजेंडा भाषा का प्रयोग किया उसको लेकर लेखक ने परत दर परत पड़ताल की और पश्चिमी नेरेटिव को बेनकाब किया है।भारतीय वैक्सीन ,वैरियंट और फार्मा लॉबी के बारे में भी पुस्तक  प्रामाणिक  जानकारी प्रदान करके पश्चिमी मीडिया के   नेरेटिव की कलई खोलती है।
     छठा अध्याय भारत के बारे में पश्चिमी मीडिया के पुराने लेकिन निरंतर चलने वाले नेरेटिव के बारे में है जिसमे भारत को सपेरों का देश कहा जाता रहा है। सातवें अध्याय में लेखक ने पश्चिमी मीडिया के भारत के प्रति निरंतर जारी ओपनिवेशिक नेरेटिव की परतों को खंगाल कर उसके राजनीतिक ,आर्थिक और सांस्कृतिक आयामों के संदर्भ में डिजिटल मीडिया के वर्चस्व का विवेचन किया है। फेसबूक ,ट्विटर (अब एक्स )यूट्यूब आदि सोशल नेटवर्किंग साइट्स कैसे पश्चिमी नेरेटिव को आगे ले जाने का काम करती है,इसका वर्णन भी किया गया है। पुस्तक अंग्रेजी में है लेकिन लेखक ने भाषा की सरलता और सहजता का ध्यान रखा है। कुल मिलाकर पुस्तक मीडिया नेरेटिव को समग्रता में प्रस्तुत करती है और पश्चिमी मीडिया की एकतरफा एजेंडा कवरेज और नेरेटिव के साथ उसके निहित आर्थिक ,राजनीतिक और सांस्कृतिक हितों की वास्तविकता को सही मायने में सामने लाती है।

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती उत्पादों की मांग

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भारत में आज भी लगभग 60 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है एवं अपने जीवन यापन के लिए मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र पर ही आश्रित रहती है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार किये जा रहे विकास कार्यों के चलते इन क्षेत्रों में विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत व्यय की जाने वाली राशि में अतुलनीय वृद्धि दर्ज हुई है। इससे, ग्रामीण क्षेत्रों में भी रोजगार के नए अवसर निर्मित होने लगे हैं एवं ग्रामीण क्षेत्र से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन कुछ कम हुआ है। विशेष रूप से कोरोना महामारी के खंडकाल में शहरों से ग्रामीण इलाकों की ओर शिफ्ट हुए नागरिकों में से अधिकतर नागरिक अब ग्रामीण क्षेत्रों में ही बस गए हैं एवं अपने विशेष कौशल का लाभ ग्रामीण क्षेत्रों में नागरिकों को प्रदान कर रहे हैं।
हाल ही में जारी किए गए कुछ सर्वे प्रतिवेदनों के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग की एक नई कहानी लिखी जा रही है क्योंकि अब विभिन्न उत्पादों की मांग ग्रामीण क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती दिखाई दे रही है। उपभोक्ता वस्तुओं एवं ऑटो निर्माता कम्पनियों द्वारा प्रदान की गई जानकारी के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में हाल ही के समय में उपभोग की जाने वाली विभिन्न वस्तुओं एवं दोपहिया एवं चार पहिया वाहनों (ट्रैक्टर सहित) की मांग में तेजी दिखाई दे रही है, जो कि वर्ष 2023 में लगातार कम बनी रही थी। यह संभवत: रबी फसल के सफल होने के चलते भी सम्भव हो रहा है।
उक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने भी हाल ही में सम्पन्न अपनी द्विमासिक मोनेटरी पॉलिसी की बैठक में रेपो दर में किसी भी प्रकार की वृद्धि नहीं की है, ताकि बाजार, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के बाजार में, उत्पादों की मांग विपरीत रूप से प्रभावित नहीं हो, ताकि इससे अंततः वित्तीय वर्ष 2024-25 में देश के आर्थिक विकास की दर भी अच्छी बनी रहे।
भारत में पिछले कुछ समय से ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न उत्पादों की मांग, शहरी क्षेत्रों में उपलब्ध मांग की तुलना में कम ही बनी रही है। परंतु, वित्तीय वर्ष 2023-24 की तृतीय तिमाही के बाद से इसमें कुछ परिवर्तन दिखाई दिया है एवं अब ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादों की मांग में तेजी दिखाई देने लगी है। यह तथ्य विकास के कुछ अन्य सूचकांकों से भी उभरकर सामने आ रहा है। जनवरी-फरवरी 2024 माह में दोपहिया वाहनों की बिक्री में, पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान की बिक्री की तुलना में, 30.3 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की गई है। वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान दोपहिया वाहनों की बिक्री में 9.3 प्रतिशत की वृद्धि दर रही है, जो हाल ही के कुछ वर्षों में अधिकतम वृद्धि दर मानी जा रही है। दोपहिया वाहनों की बिक्री ग्रामीण इलाकों (लगभग 10 प्रतिशत) में शहरी इलाकों (लगभग 7 प्रतिशत) की तुलना में अधिक रही है। महात्मा गांधी नरेगा योजना के अंतर्गत प्रदान किए जाने वाले रोजगार के अवसरों की मांग में भी फरवरी-मार्च 2024 माह के दौरान 9.8 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है क्योंकि ग्रामीण इलाकों में निवासरत नागरिकों को रोजगार के अवसर अन्य क्षेत्रों में उपलब्ध हो रहे हैं। इसी प्रकार, ट्रैक्टर की बिक्री में भी जनवरी-फरवरी 2024 माह के दौरान 16.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान भारत में कुल 892,313 ट्रैक्टर की बिक्री हुई है जो पिछले वित्तीय वर्ष 2022-23 की तुलना में 7.5 प्रतिशत अधिक है।
भारत के मौसम विभाग द्वारा जारी की गई भविष्यवाणी के अनुसार, वर्ष 2024 के मानसून मौसम के दौरान भारत में मानसून की बारिश के सामान्य से अधिक रहने की प्रबल सम्भावना है। इससे भारत के किसानों में हर्ष व्याप्त है क्योंकि मानसून के अच्छे होने से खरीफ की फसल के भी बहुत अच्छे रहने की सम्भावना बढ़ गई है। मौसम विभाग के सोचना है कि इस वर्ष अल नीनो के स्थान पर ला नीना का प्रभाव दिखाई देगा। अल नीनों के प्रभाव में देश में बारिश कम होती है एवं ला नीना के प्रभाव में देश में बारिश अधिक होती है। साथ ही, भारतीय किसान अब तिलहन, दलहन एवं बागवानी की फसलों की ओर भी आकर्षित होने लगे हैं। दालों, वनस्पति, फलों एवं सब्जियों के अधिक उत्पादन से किसानों की आय में वृद्धि दृष्टिगोचर है। केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न खाद्य उत्पादों की बिक्री के लिए ई-पोर्टल के बनाए जाने के बाद से तो भारतीय किसान अपनी फसलों को वैश्विक स्तर पर सीधे ही बेच रहे हैं और अपने मुनाफे में वृद्धि दर्ज कर रहे हैं। भारतीय खाद्य पदार्थों की मांग अब वैश्विक स्तर पर भी होने लगी है एवं खाद्य पदार्थों के निर्यात में भी नित नए रिकार्ड बनाए जा रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादों की मांग सामान्यतः अच्छे मानसून के पश्चात अच्छी फसल एवं विभिन्न सरकारों, केंद्र एवं राज्य सरकारों, द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यों पर किए जा रहे खर्चो में बढ़ौतरी के चलते ही सम्भव होती है। केंद्र सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की गई विकास की विभिन्न योजनाओं पर व्यय में लगातार वर्ष दर वर्ष वृद्धि की जा रही है एवं इसके लिए केंद्रीय बजट में भी बढ़े हुए व्यय का प्रावधान प्रति वर्ष किया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर निर्मित हो रहे हैं एवं इन इलाकों में विभिन्न उत्पादों की मांग भी बढ़ती हुई दिखाई दे रही है।
नीलसन द्वारा किए गए एक सर्वे के यह बताया गया है कि जनवरी एवं फरवरी 2024 माह में भारत में विभिन्न उत्पादों की शहरी क्षेत्रों में मांग 1.5 प्रतिशत की दर से बढ़ी है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में मांग 2.5 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। विशेष रूप से फरवरी 2024 के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादों की मांग में वृद्धि लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। रबी की फसल के भी अच्छे रहने की सम्भावना बलवती हुई है जिसके कारण किसानों की मनोदशा भी सकारात्मक बन रही है और यह वित्तीय वर्ष 2024-25 में देश की आर्थिक वृद्धि दर को बलवती करने के मुख्य भूमिका निभाने जा रही है। आज देश की लगभग 60 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है यदि ग्रामीण क्षेत्रों में निवासरत नागरिकों की मनोवृत्ति सकारात्मक हो रही है तो निश्चित ही वित्तीय वर्ष 2024-25, आर्थिक विकास की दृष्टि से अतुलनीय परिणाम देने वाला वर्ष साबित होने जा रहा है।

मुजम्मिल शेख, सलीम शेख, सद्दाम शेख, सज्जाद शेख को क्यों बचा रही है गौनाहा पुलिस

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एमएस डेस्क

आरटीआई एक्टिविस्ट आचार्य नितिन कुमार रवि  ने बिहार, डीजीपी को मुजम्मिल शेख, सलीम शेख, सद्दाम शेख,सज्जाद शेख (गम्हरिया, गौनाहा) पर एफआईआर और कार्रवाई ना होने के संबंध में पत्र लिखा है। आचार्य नितिन के अनुसार, उनका मामला कानून व्यवस्था से जुड़ा है। मुजम्मिल शेख, सलीम शेख, सद्दाम शेख, सज्जाद शेख के संबंध में बार बार शिकायत करने के बाद भी गौनाहा पुलिस मामले का सज्ञान नहीं ले रही।

जांच की स्थिति यह है कि इस मामले को पूर्व में देख रहे एसआई विवेक कुमार बालेन्दू फोन पर मीडिया स्कैन से थाना प्रभारी बन कर बात करते हैं और बातचीत के दौरान वे बताते हैं कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं है लेकिन इस बातचीत से पहले वे मामले पर रिपोर्ट लिख चुके होते हैं।

नितिन के अनुसार —थाने की लापरवाही या आरोपी को बचाने की मंशा बार बार दिखाई पड़ती है। नितिन पूछते हैं,
फसल की लूट में मुजम्मिल शेख, सद्दाम शेख और सज्जाद शेख शामिल हैं। अब तक लाखों रुपए की लूट हो चुकी है। लेकिन थाने की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गई। बिना किसी जांच पड़ताल के थाना यह मान चुका है कि यह जमीन मुजम्मिल शेख, सलीम शेख, सद्दाम शेख, सज्जाद शेख का है? यदि इस निष्कर्ष पर गौनाहा थाना किसी जांच पड़ताल के बाद पहुंचा है तो अब तक उसकी डिटेल उन्होंने पीड़ित पक्ष को उपलब्ध क्यों नहीं कराई है? थाना और अंचल पूरे मामले में इतनी लापरवाही से काम कर रहे हैं कि जांच और आरोपी पर कार्रवाई की जगह,  एक ही मामले में अलग अलग रिपोर्ट पेश कर रहे हैं। पीड़ित पक्ष का थाने की लापरवाही की वजह से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा?

मुजम्मिल शेख के अनुसार, वह एक कन्स्ट्रक्शन कंपनी से जुड़ा है। कंपनी के मालिक के संबंध में वह बताता है कि उनके दामाद भारतीय प्रशासनिक सेवा में है। क्या वह इन नामों का इस्तेमाल थाना और अंचल में भी कर रहा है? संभव है कि वह इतने प्रभावशाली लोगों के नाम का इस्तेमाल करके थाना और अंचल पर दबाव बनाने में सफल हुआ हो।

मुजम्मिल शेख

मुजम्मिल से जुड़े कुछ दूसरे मामलों की जानकारी भी मीडिया स्कैन को प्राप्त हुई है। जिसमें पीड़ित पक्ष का आरोप है कि गौनाहा थाना और अंचल ने आरोपी की मदद की। अब गौनाहा में थाना प्रभारी और अंचलाधिकारी बदल चुके हैं। नए थाना प्रभारी और अंचलाधिकारी को इन मामलों की एक बार फिर से जांच करनी चाहिए। थाना और अंचल से स्थानीय लोगों को न्याय नहीं मिलेगा फिर स्थानीय आदमी न्याय के लिए कहां जाएगा? जबकि गौनाहा आदिवासी बहुल प्रखंड है और नेपाल से लगा हुआ होने की वजह से अधिक संवेदनशील भी है।

आरटीआई एक्टिविस्ट नितिन कुमार रवि  के अनुसार कोविड के दौरान जब उनका पूरा परिवार कोविड की चपेट में था। उस समय मुजम्मिल ने कब्जा का पहला प्रयास किया था। जिसकी शिकायत गौनाहा थाना में दर्ज की गई थी। लेकिन थाना ने कोई कार्रवाई नहीं की। थाना की तरफ से जो रिपोर्ट बनाई गई, उसमें भी साफ जल्दबाजी नजर आती है। जैसे बिना किसी जांच के थाने में बैठकर किसी ने रिपोर्ट लिखवाई हो क्योंकि अपनी रिपोर्ट को सपोर्ट करने वाला कोई डाक्यूमेंट गौनाहा थाना अब तक उपलब्ध नहीं करवा पाया है।

आचार्य नितिन कुमार रवि के अनुसार जितना कष्ट उनके परिवार को कोरोना की चपेट में आने के बाद नहीं हुआ, उससे अधिक पीड़ा वे गौनाहा थाना  और  अंचल की वजह से उठा चुके हैं। मुजम्मिल शेख, जिस कन्स्ट्रक्शन कंपनी के मालिक और कथित तौर पर उनके भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी दामाद का जिक्र इस जमीन कब्जा के मामले में कर रहा है। जांच उन सबकी भूमिका की भी होनी चाहिए और जांच तो इस बात की भी होनी चाहिए कि मुजम्मिल शेख पर कई सारी शिकायतों के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई गौनाहा में क्यों नहीं हो पा रही है? कौन है जो बार बार उसे बचा रहा है?

03 बार के विधानसभा प्रत्याशी रामप्रकाश राजोरिया काँग्रेस छोड़ बीएसपी मे हुए शामिल

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मुरैना – इस समय पूरे देश मे चुनाव का माहौल चल रहा है तो इसी माहौल मे राजनीतिज्ञों का दल – बदल का दौर भी तेजी पर है, इसी दौर मे कांग्रेस को फिर एक बार बड़ा झटका मध्य प्रदेश की मुरैना लोक सभा सीट पर लगा है। जहाँ जिले से 03 बार विधानसभा चुनाव लड़ चुके कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामप्रकाश राजोरिया ने कांग्रेस का दामन छोड़ बहुजन समाज पार्टी का दामन थाम लिया है। हालांकि राजोरिया के लिये ये कोई नई बात नही है वो पूर्व में बीएसपी से विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन बहुत कम अंतर से चुनाव हारे तो वही दूसरी बार उन्होंने आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा तो उस चुनाव में उनका वोट प्रतिशत बहुत गिर गया।

उसके बाद उन्होंने वापस बीएसपी जॉइन कर 2018 मे चुनाव लड़ा और फिर उनके हाथ हार लगी। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी के बड़े नेता कमलनाथ के कहने पर कांग्रेस की सदस्यता ले ली। वे बताते हैं कि पार्टी मे उनको अनदेखा किया जा रहा था। उन्होंने मुरैना लोकसभा प्रत्याशी रमेश गर्ग से हाथ मिलाया और उन्ही के साथ वापस बीएसपी मे शामिल हो गये है।
इस समय पूरे देश मे बीजेपी की लहर चल रही है वही मुरैना लोकसभा मे दोनो पार्टियों के बीच रमेश गर्ग बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे है, चूंकि रमेश गर्ग वैश्य समाज से आते है और इस लोकसभा मे वैश्य वर्ग का वोट लगभग सवा लाख के उपर है और जिस तरह से काफी लंबे समय से दोनो पार्टियों के द्वारा वैश्य वर्ग को विधानसभा और लोकसभा मे अनदेखा किया जा रहा था तो उसी को देख कर इस बार कहीं ना कहीं संपूर्ण वैश्य वर्ग अपने समाज के प्रत्याशी रमेश गर्ग का समर्थन कर रहा है।
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